Archive for the ‘Uncategorized’ Category

यू.के. से नीरा त्यागी की लघुकथा

फ़रवरी 24, 2010

गले से गले को लगाती रहे : लुभाती रहे मन सुहाती रहे
सदा होली रंगीं बनाती रही : सदा होली रंगीं बनाती रहे
प्राण शर्मा


उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी..
नीरा त्यागी

समुद्र कि लहरें उनके पाँव को चारों तरफ से चूमती हैं..उनकी घुटनों तक मुड़ी जींस को छू कर लौट जाती हैं उन्हें दोबारा भिगोने के लिए … समुद्र ने सूरज को अपने भीतर छुपाने से पहले हाथों में ऊपर उठा रखा है ताकि सब उसे गौर से देख लें…आज की तारीख का सूरज देखने का यह आखरी मौका है… उसका रंग पीले से नारंगी हो चला है .. पर्यटक अपनी चटाई, तौलिये, फ्लास्क, छतरी, सेंडविच बॉक्स समेट रहे हैं … घोड़ेवाला बच्चों को घोड़े पर आखरी सवारी दे रहा है … आइसक्रीम वाले के पास अब सिर्फ वेनीला और मिंट फ्लेवर की आइसक्रीम बची है, तट पर चार पांच साल का लड़का रेत का महल पेरों तले रोंद कर खुश हो रहा है और उसकी बड़ी बहन उसकी दीवारें और छत बचाने कि कोशिश में उसे धक्का दे रही है…. उनकी माँ चिल्ला रही है ‘उसे रोंद लेने दो वैसे भी लहरें बहा ले जायेंगी यह महल…’ तट पर हलचल कम होने लगी है तो सामने सड़क पर बढ़ गई है और सड़क के उस पार दुकानों पर दिवाली जैसी जगमगाहट है …

रेचल पहली बार अपने गाँव से बाहर निकली है उसका गाँव यहाँ से अस्सी किलोमीटर कि दूरी पर है, इससे पहले उसने चहल-पहल गाँव में हर रविवार लगने वाले बाज़ार में देखी है. यहाँ पहली बार उसने समुद्र और शहर कि जगमगाहट देखी है. गाँव में एक ही बेकरी है, रेचल उसमें काम करती है जहाँ पर हर रोज राबर्ट लंच टाइम में सेंडविच और केक खरीदने आता था … रॉबर्ट गाँव से बाहर एक ऊन की फेक्ट्री बन रही है जिसमें क्रेन चलाने का काम करता है उसे पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी क्योंकि सोलह वर्ष के होते ही उसके पिता ने खर्चा देने से इनकार कर दिया …

रेचल को जो भी सीपी नज़र आती है वो उठा लेती है और उसे रॉबर्ट कि कमीज़ की जेब में डाल देती है… उसके क़दमों के साथ सीपियाँ छनक रही हैं पार्श्व में लहरों का संगीत सातवें स्वर में उनका साथ दे रहा है, ढेर सारा जीवन बिखरा पड़ा है गीले रेत पर पाँव के निशाँ में, लहरों में उबलते बुलबुलों में, हवा के साथ डोलते जहाज़ों में, नीले पानी में घुलती किरणों कि लाली में, आकाश में उड़ते परिंदों कि कतारों में, सड़क पर झिलमिलाती रौशनी में, कैफे से उड़ती मछली कि महक में, एम्यूजमेंट की मशीनों से आते शोर में …. वे समेट रहे हैं यह जीवन रेत में पड़ी सीपियों के साथ अपने ख़्वाबों में ….
दोनों थक कर बेंच पर बैठ जाते हैं …. रेचल का गुलाबी रंग नारंगी रौशनी में चमक रहा है. दोनों की नीली आँखे डूबते सूरज की अनगिनत किरणों को सोख रही हैं …. रेचल ने अपना सर रॉबर्ट के कन्धों पर टिका लिया है. दोनों की उम्र उनीस वर्ष है यह उनके हनीमून का आखरी दिन है… उनकी आँखों में वो सभी ख्वाब दस्तक दे रहे हैं जो प्यार के समुद्र में गोता लगाने आसमान से उतर कर आते हैं फिर नींद में बस जाते हैं … उन्होंने फैसला किया है उनके कुछ ख्वाब नींद से ज़मीन पर उतरेंगे … वह शादी कि पच्चीसवी सालगिरह यहीं मनाएंगे इसी तट पर, इसी बेंच पर, यहीं सूरज के सामने … वह दो बच्चे अगले दो वर्ष में पैदा करेंगे…उन्हे एक साथ पाल-पोस कर बड़ा करके … वह रेचल का दुनिया घूमने का सपना पूरा करेगा … वहां से लौट कर वह यूनिवेर्सिटी में दाखला लेगा और डिग्री की पढ़ाई पूरी करेगा ….

आज वो दोबारा से उसी बेंच पर बैठे हैं राबर्ट के माथे के ऊपर से सर से कुछ बाल उड़ गए हैं और रेचल के बाल कुछ ज्यादा सुनहरे हो गए हैं एक वर्ष पहले उनका तेईस वर्षीय बेटा माइकल इराक़ कि लड़ाई में मारा गया.. वह पेट्रोल से भरी लारी चला रहा था जिस पर किसी ने हेंड ग्रेनेड फेंक दिया…बेटे कि जगह उन्हे सरकार से कुछ पैसे, उसका सूटकेस और उसके दोस्तों से आखिर के दिनों में खींचे फोटो मिले … उसकी गर्भवती पत्नी एलिक्स को गहरा सदमा लगा था. छ: महीने बाद बेटे के जन्म के समय उसे ब्रेन हेमरेज हो गया…. उनकी बेटी लिज़ जो माइकल से एक साल बड़ी है बचपन में दादा के फार्म पर जाकर रहा करती, उसके दादा ने उसका यौन शोषण किया, उस दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसने हिरोइन का सहारा लिया, जब वो माँ बनी उसे बच्ची के पिता का नाम तक ना मालूम था… अपनी बच्ची को वह बहुत प्यार करती थी .. अपने आप को काबिल माँ बनाने के लिए वह एक वर्ष रिहाब में रही….फिर भी सोशल सर्विस ने बेटी को चिल्ड्रेन होम से माँ के पास नहीं लौटने दिया .. लिज़ वर्तमान से दूर भागने के लिए फिर से जाने- पहचाने पुराने रास्तों की तरह मुड़ ली … राबर्ट और रेचल को नातिन की कस्टडी के लिए कोर्ट में केस करना पड़ा जिसे वह दो साल बाद जीत गए….

आज भी चारों तरह बहुत सारा जीवन बिखरा पड़ा है. राबर्ट की गोदी में एक जीवन आँखे मूंदे दाये हाथ का अंगूठा चूस रहा है और दूसरा जीवन रेचल और रॉबर्ट के बीच बैठा बाएं हाथ की अंगुली उठा-उठा कर मुश्किल से मुश्किल सवाल पूछ रहा है जिसका वो बारी-बारी मुस्कुरा कर जवाब दे रहे हैं … आज भी समुन्द्र उनके पेरों को चूम रहा है, सूरज को उसने हाथों में उठा रखा है … राबर्ट के हाथ रेचल के कंधे पर है उनके सपने भले ही फिर से पचीस साल के लिए सूरज के साथ समुद्र में छिप गए हैं किन्तु पचीस साल पहले किया सूरज और समुद्र से इस बेंच पर मिलने का वादा उन्होंने निभाया है… आज भी उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी है जो उन्होंने दशकों पहले सोखी थी ..

नीर त्यागी

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यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

फ़रवरी 17, 2010


“वक़्त वक़्त की बात”
प्राण शर्मा

सरिता अरोड़ा की देवेन्द्र साही से जान-पहचान कालेज के दिनों से ही है. कभी दोनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार भी जागा था. आज देवेन्द्र साही का फिल्म उद्योग में अच्छा-खासा नाम है. फिल्म उद्योग उसके काम को अच्छी नज़र से देखता है. उसने एक नहीं, तीन-तीन हिट फ़िल्में दी हैं. उसकी फ़िल्में साफ़-सुथरी होती हैं.

सरिता अरोड़ा के के मन में इच्छा जागी कि क्यों न वो अपनी रूपवती बेटी अरुणा अरोड़ा को हीरोइन बनाने की बात देवेन्द्र साही से कहे. मन में इच्छा जागते ही उसने मुम्बई का टिकेट लिया और जा पहुँची अपने पुराने मित्र के पास.

देवेन्द्र साही सरिता अरोड़ा के मन की बात सुनकर बोला, “देखो सरिता, ये फिल्म जगत है. इसके रंग-ढंग बड़े निराले हैं. देखो -सुनोगी तो तुम दांतों तले अपनी उँगलियाँ दबा लोगी. हर हीरोइन को अपने तन पर पारदर्शी कपड़े पहनने पड़ते हैं. कभी-कभी तो उसे निर्वस्त्र भी —– “.
“तो क्या हुआ? हम सभी कौन से वस्त्र पहनकर पैदा हुए थे? सभी इस संसार में निर्वस्त्र ही तो आते है—— ”
सरिता अरोड़ा अपनी बात कहे जा रही थी और देवेन्द्र साही मुँह पर हाथ रखे सोचे जा रहा था कि क्या ये वही सरिता अरोड़ा है जो अपने तन को पूरी तरह ढक कर कालेज आया करती थी.
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“आपका क्या जाता है?”
प्राण शर्मा

मेरे मोहल्ले में तीन ऐसे मियां-बीवी के जोड़े हैं जो अपने-अपने कारनामों यानि विचारों की अभिन्नता के लिए मोहल्ले के अन्य मियां-बीवी के जोड़ों में खूब जाने जाते हैं.

मियां-बीवी का पहला जोड़ा है धनीराम जी और लक्ष्मी देवी का. इस जोड़े के जीवन का एक ही मक़सद है धन कमाना और जोड़ते ही रहना. यह जोड़ा कमाता तो बहुत है लेकिन खर्च कम करता है. खर्च करने के मामले में वह जोड़ा चमड़ी जाए, दमड़ी नहीं जाए की उक्ति को पूरी तरह चरितार्थ करता है.

एक दिन मैंने धनीराम जी से पूछ ही लिया “सुना है कि आप मियां बीवी कमाते तो बहुत हैं लेकिन खर्च कम करते हैं?”

मेरा प्रश्न सुनते ही धनीराम जी उत्तर में बोले- “हजूर, आपने सत्य सुना है. हम बुढापे के लिए जोड़ते हैं. हम भी आपसे एक बात पूछते हैं. हम अगर कम खर्च करते हैं और ज्यादा जोड़ते हैं तो आपका क्या जाता है? “

दूसरा जोड़ा है सुखीराम और आनंदी का. जैसा नाम वैसा काम. दोनों सुख और आनंद में खाते–पीते और जीते हैं. जितना कमाते हैं उतना उड़ाते हैं. छुट्टियों में में कहीं न कहीं सैर-सपाटे को निकल जाते हैं. उनका भव्य मकान और नयी-नकोर कार को देखकर कोई जलता है और कोई हाथ मलता है.

एक दिन मैंने सुखीराम जी से पूछ ही लिया- “सभी आपके अच्छे रहन-सहन से जलते हैं. ये देख-सुनकर क्या आप दुखी नहीं होते हैं?”
मेरा प्रश्न सुनते ही सुखीराम जी उत्तर में बोले – ” नहीं, बिलकुल नहीं. लोगों के जलने और हाथ मलने से हम दुखी क्यों हों? इतनी फुर्सत ही कहाँ हैं हमें. लेकिन एक बात आपसे पूछते हैं हम – “हमारा रहन -सहन अच्छा है तो आपका क्या जाता है?”

तीसरा जोड़ा है भोलेराम और सुशीला का. मोहल्ले भर में सबसे ज्यादा चर्चित जोड़ा. शादी से लेकर अब तक यानि बारह सालों में दोनों ने मिलकर ग्यारह बच्चों की कतार लगा दी है. बारहवां बच्चा भी कतार में लगने वाला है इस साल के मध्य में. अड़ोसी- पड़ोसी सभी ने दाँतों तले उँगलियाँ दबा रखी हैं.

एक दिन भोले राम जी से मैंने आश्चर्य में पूछ ही लिया- “किस चक्की का आटा खाते हैं आप ? इतने बच्चे, राम दुहाई ?”
मेरा प्रश्न सुनते ही भोले राम जी उत्तर में बोले –  ” हम तो उसी चक्की का आटा खाते हैं जिस चक्की का आटा आप खाते हैं. कैसी राम दुहाई, अपना तो यही है मनोरंजन भाई. लेकिन एक बात आपसे हम पूछते हैं -“अगर हमारे ढेर सारे बच्चे हैं तो आपका क्या जाता है ?

प्राण शर्मा

प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

जनवरी 20, 2010

वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर
आप सब को शुभकामनाएं

अखबार
– प्राण शर्मा

भरत उच्च शिक्षा के लिए यू.के. में आया था .पंजाब यूनीवर्सिटी से उसने अंग्रेज़ी में एम.ए. कर रखी थी. यूँ तो वो पढ़ा-लिखा था लेकिन यहाँ के रीति-रिवाजों से अनजान था. उसके आने के कुछ दिनों के बाद ही उसके चाचा हरिकृष्ण ने उसको समझा दिया था- “भरत, इस देश की दो बातों को हमेशा याद रखना. पहली ये कि अगर तुमने
चाय के लिए एक बार न कह दी तो अँगरेज़ दुबारा तुमसे चाय पीने के लिए नहीं पूछेगा. वो वैसे भी नहीं पूछता है. दूसरी बात, उससे पढ़ने के लिए कभी अखबार नहीं माँगना. ये यू.के. है, यू.के. भारत नहीं .
एक दिन भरत ट्रेन में सफ़र कर रहा था. उसके साथ वाली खाली सीट पर एक अँगरेज़ आकर बैठ गया था. उसके हाथ में तीन-चार अखबार थे . भरत देखकर हैरान हो गया. वो अपने दिल ही दिल में कह उठा-” इतने सारे अखबार !”
अँगरेज़ ने चाय का आर्डर दिया. चाय पीने के साथ-साथ वो एक अखबार पढ़ने लगा. दूसरे अखबार उसने अपनी दायीं बगल में रख लिए.
भरत को अपने चाचा की समझाई दो बातें याद नहीं रहीं. चाय पीने की तो उसकी कोई इच्छा नहीं थी लेकिन अखबार को पढने की इच्छा उसमें जाग उठी. वो अँगरेज़ से पूछ बैठा -“क्या मैं आपका एक अखबार पढ़ सकता हूँ? ”
अँगरेज़ ने सुना-अनसुना कर दिया.
भरत को लगा कि अँगरेज़ अखबार में व्यस्त होने के कारण उसको सुन नहीं पाया है. वो उससे फिर पूछ बैठा-“क्या मैं आपका एक अखबार पढ़ सकता हूँ? ”
अँगरेज़ ने टेढ़ी नज़रों से भरत को घूरा. वो अँगरेज़ का घूरना समझा नहीं. अखबार पढ़ने की तीव्र लालसा में उसने एक बार और अँगरेज़ से बड़ी नम्रता में पूछा -” क्या मैं आपका एक अखबार पढ़ सकता हूँ? ”
” नहीं, पढ़ने की इतनी ही इच्छा है तो अपना अखबार खरीदो और पढ़ो.” अँगरेज़ भरत पर बिफर उठा.
भरत अपनी मूर्खता पर दिल ही दिल में हंसने लगा.
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नेकी कर और कुँएँ में डाल
– प्राण शर्मा

दयाराम जी को देख कर कोई भी कह सकता था कि वे दया की मूर्ति थे. बेचारे हर एक की मुसीबत में काम आते. कई यार-दोस्त उनकी दया पर निर्भर थे.
वे कभी मिलते तो सभी कह उठते-” दयाराम जी, आपकी दया अपम्पार है. आप कितने दयावान हैं. आप तो हमारे लिए भगवान् हैं, भगवान्. संकट में आपका ही सहारा है. हम सब आपके ऋणी हैं. आपका ऋण कई जन्मों तक हम उतार नहीं पायेंगे. कभी हमें भी आप अपनी सेवा करने का मौक़ा दीजिये.
दयाराम जी की धर्मपत्नी को कैंसर हो गया. उसने चारपाई को ऐसा पकड़ा कि वो उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी. उसकी लम्बी बीमारी से दयाराम जी आर्थिक और मानसिक रूप से टूटने लगे. वे टूटते गये और यार-दोस्त एक-एक करके ये कह कर” दयाराम जी, आपकी पत्नी कैंसर की मरीज़ है. आज नहीं तो कल उसका मरना निश्चित
है. चिंता करनी छोड़िये. भाग-दौड़ और सेवा करने से कोई लाभ नहीं होगा” पीठ दिखाते गये. धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधकों ने भी जो उनपर निर्भर थे, कहना शुरू कर दिया-
” हमारी संस्थाएं दान लेती हैं,देती नहीं.
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यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

दिसम्बर 30, 2009

लघुकथा

दुष्कर्मी

– प्राण शर्मा

पंद्रह वर्षीय दीपिका रोते-चिल्लाते घर पहुँची. माँ ने बेटी को अस्तव्यस्त देखा तो गुस्से में पागल हो गयी– ” बोल ,तेरे साथ दुष्कर्म किस पापी ने किया है?”

” तनु के पिता मदन लाल ने. ” सुबकते हुए दीपिका ने उत्तर दिया .

” तुझे कितनी समझाया था कि छाती पूरी तरह ढक कर अन्दर-बाहर कदम रखा कर. इन राक्षसों की कामी नज़रें औरतों की नंगी छातियों पर ही पड़ती हैं. नंगी छाती रखने का नतीजा देख लिया तूने? मैं तो कहीं की नहीं रही. पचास साल के उस बूढे़ का सत्यानाश हो. रब्बा, वो जीते जी जमीन में गड़ जाए. मेरी भोली-भाली नाबालिग़ बेटी का जीवन बर्बाद कर दिया है उस दुष्कर्मी ने. मुए ने अपनी बेटी का बलात्कार क्यों——- “

मदन लाल का स्यापा करती हुई माँ दीपिका का हाथ पकड़े हुए बाहर आ गयी. उसका रुदन सुनते ही अड़ोसी- पड़ोसी बाहर निकल आये. सेंकड़ों ही लोग इकठ्ठा हो गए.

दीपिका के बलात्कार के बारे में जिसने भी सुना वो लाल-पीला हो गया.

सभी मदन लाल के घर की ओर लपके. मदन लाल के घर तक पहुँचते-पहुँचते लोगों का अच्छा-खासा हजूम बन गया था. मदन लाल घर पर ही था. कुछ लोगों ने उसे घसीट कर बाहर जमीन पर पटक दिया. मदन लाल रोया-चिल्लाया. हाथ जोड़-जोड़ कर उसने माफियाँ माँगी. नाक रगड़े उसने. गुस्साए लोगों हजूम था. किसीने घूँसा मारा और किसी ने जूता. जमकर धुनाई हुई उसकी. लहुलुहान हो गया वो.

मदन लाल को लहुलुहान करने वालों में कई ऐसे दुष्कर्मी लोग भी थे जिनके हवस की शिकार कई महिलायें हो चुकी थीं.

प्राण शर्मा

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चश्मदीद गवाह

–प्राण शर्मा

फुटपाथ पर बैठा एक अँधा भिखारी जोहनी वाकर की तरह हाथ फैला कर गुहार लगा रहा था – ” एक रूपये का सवाल है.”  एक “दानी” ने एक रूपये का सिक्का उसके अल्युमिनियम के कटोरे में फैंका. सिक्का बाहर गिरा. उसकी खनक खोटे सिक्के जैसी थी. अँधा भिखारी झट खोटे सिक्के की खनक को पहचान गया. उसने कनखियों से देखा. खोटा सिक्का ही था. वो ओम प्रकाश के लहजे और अंदाज़ में बोला — “साहिब, सिक्का तो खोटा है. क्या हम ही रह गये  थे खोटे सिक्के के लिए.?”

” अरे, तू तो देख सकता है ! अभी बुलाता हूँ पुलिस को.”

” साहिब, बेकसूर हूँ. मैं तो किसी और अंधे का काम कर रहा हूँ.”

”  वो कहाँ है ? “

”  साहिब, वो मेट्रो में फिल्म देखने गया है- चश्मदीद गवाह.

–प्राण शर्मा


भारत से डॉ. बलराम अग्रवाल की दो लघुकथाएं

दिसम्बर 9, 2009

डॉ. बलराम अग्रवाल
जन्म: २६ नवंबर, १९५२ को उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर में हुआ था.
शिक्षा: हिन्दी साहित्य में एम.ए., अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, और ’समकालीन हिन्दी लघुकथा का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की.
लेखन व सम्पादन : समकालीन हिन्दी लघुकथा के चर्चित हस्ताक्षर. सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, लघुकथा आदि प्रकाशित. अनेक रचनाएं विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित व प्रशंसित . भारतेम्दु हरिश्चन्द्र , प्रेमचंद, प्रसाद, शरत, रवींद्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की चर्चित/ज़ब्त कहानियों के संकलनों के अतिरिक्त कुछेक लघु-पत्रिकाओं व लघुकथा-विशेषांकों का संपादन. प्रेमचंद की लघुकथाओं के संकलन ’दरवाज़ा’ (२००५) का संपादन. ’अंडमान-निकोबार की लोककथाएं’(२००१) का अंग्रेजी से अनुवाद व पुनर्लेखन.हिन्दीतर भारतीय कथा-साहित्य की श्रृंखला में ’तेलुगु की सर्वश्रेष्ठ कहानियां’ (१९९७) तथा ’मलयालम की चर्चित लघुकथाएं’ (१९९७) के बाद संप्रति तेलुगु की लघुकथाओं पर कार्यरत. अनेक विदेशी लुघुकथाओं पर कार्यरत. अनेक विदेशी लघुकथाओं व कहानियों के अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित.अनेक वर्षों तक रंगमंच से जुड़ाव. कुछ रंगमंचीय नाटकों हेतु गीत-लेखन भी. हिन्दी फीचर फिल्म ’कोख’ (१९९४) के संवाद-लेखन में सहयोग.कथा-संग्रह ’सरसों के फूल’ (१९९४), ’दूसरा भीम’ (१९९६) और ’चन्ना चरनदास’ (२००४) प्रकाशित.
e-mail: 2611ableram@gmail.com
सम्पर्क : एम-७०, नवीन शाहदरा, दिल्ली -११००३२.
फोन.०११-२२३२३२४९, मो.०९९६८०९४४३१

सुंदर
डॉ. बलराम अग्रवाल

लड़की ने काफी कोशिश की लड़के की नज़रों को नज़रअंदाज़ करने की। कभी वह दाएँ देखने लगती, कभी बाएँ। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र सामने पड़ती, लड़के को अपनी ओर घूरता पाती। उसे गुस्सा आने लगा। पार्क में और भी स्टूडैंट्स थे। कुछ ग्रुप में तो कुछ अकेले। सब के सब आपस की बातों में मशगूल या पढ़ाई में। एक वहीं था जो खाली बैठा उसको तके जा रहा था।
गुस्सा जब हद से ऊपर चढ़ आया तो लड़की उठी और लड़के के सामने जा खड़ी हुई।
‘‘ए मिस्टर!’’ वह चीखी।

वह चुप रहा और पूर्ववत् ताकता रहा।
‘‘जिंदगी में इससे पहले कभी लड़की नहीं देखी है क्या?’’ उसके ढीठपन पर वह पुन: चिल्लाई।
इस बार लड़के का ध्यान टूटा। उसे पता चला कि लड़की उसी पर नाराज हो रही है।
‘‘घर में माँ–बहन है कि नहीं।’’ लड़की फिर भभकी।

‘‘सब हैं, लेकिन आप ग़लत समझ रही हैं।’’ इस बार वह अचकाचाकर बोला, ‘‘मैं दरअसल आपको नहीं देख रहा था।’’
‘‘अच्छा!’’ लड़की व्यंग्यपूर्वक बोली।
‘‘आप समझ नहीं पाएँगी मेरी बात।’’ वह आगे बोला।
‘‘यानी कि मैं मूर्ख हूं।’’
‘‘मैं खूबसूरती को देख रहा था।’’ उसके सवाल पर वह साफ–साफ बोला, ‘‘मैंने वहाँ बैठी निर्मल खूबसूरती को देखा–जो अब वहाँ नहीं है।’’
‘‘अब वो यहाँ है।’’ उसकी धृष्टता पर लड़की जोरों से फुंकारी, ‘‘बहुत शौक है खूबसूरती देखने का तो अम्मा से कहकर ब्याह क्यों नहीं करा लेते हो।’’
‘‘मैं शादी शुदा हूँ, और एक बच्चे का बाप भी।’’ वह बोला, ‘‘लेकिन खूबसूरती किसी रिश्ते का नाम नहीं है। नहीं वह किसी एक चीज़ या एक मनुष्य तक सीमित है। अब आप ही देखिए, कुछ समय पहले तक आप निर्मल खूबसूरती का सजीव झरना थी–अब नहीं है।’’
उसके इस बयान से लड़की झटका खा गई।
‘‘नहीं हूं तो न सही। तुमसे क्या?’’ वह बोली।
लड़का चुप रहा और दूसरी ओर कहीं देखने लगा। लड़की कुछ सुनने का इंतज़ार में वहीं खड़ी रही। लड़के का ध्यान अब उसकी ओर था ही नहीं। लड़की ने खुद को घोर उपेक्षित और अपमानित महसूस किया और ‘बदतमीज कहीं का’ कहकर पैर पटकती हुई वहाँ से चली गई।

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जहर की जड़ें

डॉ. बलराम अग्रवाल

दफ्तर से लौटकर मैं अभी खाना खाने के लिए बैठा ही था कि डॉली ने रोना शुरू कर दिया।

‘‘अरे–अरे–अरे, किसने मारा हमारी बेटी को?’’ उसे प्यार करते हुए मैंने पूछा।

‘‘डैडी…..हमें स्कूटर चाहिए।’’ सुबकते हुए वह बोली।

‘‘लेकिन तुम्हारे पास तो पहले ही बहुत खिलौने हैं!’’ इस पर उसकी हिचकियाँ बंध गई, बोली, ‘‘मेरी गुड़िया को बचा लो डैडी।’’

‘‘बात क्या है?’’ मैंने दुलारपूर्वक पूछा।

‘‘पिंकी ने पहले तो अपने गुड्डे के साथ हमारी गुडि़या की शादी करके हमसे गुडि़या छीन ली।’’ डॉली ने जारों से सुबकते हुए बताया, ‘‘अब कहती है–दहेज में स्कूटर दो, वरना आग लगा दूंगी गुडि़या को।…..गुडि़या को बचा लो डैडी….हमें स्कूटर दिला दो…।’’

डॉली की सुबकियाँ धीरे–धीरे तेज होती गईं और शब्द उसकी हिचकियों में डूबते चले गए।

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भारत से श्याम सखा की कहानी: एनकाउंटर

नवम्बर 25, 2009

कहानी

(यह कहानी हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष १९९८ में सर्वश्रेष्ठ पुस्तक से पुरस्कृत कथा संग्रह -अकथ से जिसे बाद में श्री दिव्य रजत अलंकरण भोपाल से भी नवाजा गया।)

एनकाउंटरए लव स्टोरी
श्याम सखा

बात कुछ यूँ शुरू हुई, कि तकरीबन दो महीने से, हमारे टेलीफोन की घण्टी बजती और जैसे ही,

हम टेलीफोन उठाते, हैलो कहते मगर, फिर दूसरी तरफ से कोई बोलता नहीं। परन्तु हमें ये अहसास होता कि टेलीफोन कटा नहीं, बल्कि कोई हमारी आवाज सुन रहा है और बोलता नहीं। एक दिन तो कुछ नहीं हुआ, हमने इसे टेलीफोन लाइन या एक्सचैंज की कोई गड़बड़ मान लिया। टेलीफोन या तो लगभग ग्यारह बजे रात या सुबह पांच बजे आता था। फिर हमें लगने लगा कि कोई जानबूझकर ऐसा कर रहा है। यह भी महसूस होता कि दूसरी तरफ जो भी कोई है कुछ कहना चाहता है परन्तु झिझक के कारण, कुछ कह नहीं पाता। एक उत्सुकता सी रहती  थी कि कौन होगा ! जाने क्यों ऐसा लगता है कि कोई अपना है जो चाहकर भी बात नहीं कर पा रहा ! उत्सुकता के साथ यह विचार भी आता, कि आखिर उसे ऐसी क्या मजबूरी है !
अब अक्सर ऐसा होने लगा, कि रात को टेलीफोन की तरफ, मैं सोने लगा। एक दिन घण्टी बजी, मैं उन्नीदा-सा बोला, ‘‘हैलो’’ उधर से आवाज आई- ‘‘हैलो कौन’’?
‘‘आप कौन’’ और फोन कट गया।
मैंने सोचा, गलत नम्बर होगा।
दो दिन बाद, फिर ऐसा ही हुआ। उधर से आवाज आई- ‘‘हैलो’’
मैंने कहा-‘‘हैलो कौन’’?
‘‘मैं‘‘
‘‘आप कौन?‘‘
‘‘मैं डाक्टर नवल‘‘
फोन कट गया।
अब सिलसिला चल निकला कि फोन की घण्टी बजती, अगर पत्नी फोन उठाती तो उधर से कोई आवाज नहीं आती और अगर मैं उठाता तो, दो-एक जुमलों के बाद फोन कट जाता। हालांकि रात, वक्त-बेवक्त, फोन आता था। पर जाने क्यों झुंझलाहट या चिड़ कभी नहीं हुई ! पत्नी ने एक दो-बार पूछा कौन था? मैं यह कहकर टाल गया, कि गलत नम्बर था। यह सोचकर कि औरतें, बात में से बात निकालती हैं और फिर पता नहीं, बात किधर जा निकले। अब भी फोन पर खुलकर बात नहीं हो पाती थी। हाँ, एक आध जुमला अवश्य, इधर-उधर हो जाता था। मसलन एक सुबह फोन बजा। मैं उठा, बोला- हैलो !
‘हैलो, डाक्टर नवल, गुड़ मार्निंग!‘‘
‘‘जी, बेनाम हसीना।‘‘
‘‘आपने हसीना कैसे कहा?‘‘
‘‘जैसे आपने डॉ० नवल।‘‘
‘‘पर आप तो डॉ० नवल हैं।‘‘
‘‘और आप बेनाम भी हैं, हसीन भी।‘‘
फोन कट गया।
मैं दिमाग लगाता रहा, कि आखिर कौन हो सकती है मोहतरमा, पर न तो जान-पहचान में से यह स्वर मालूम हुआ, न ही श्रीमती जी की कोई सहेली लगी। फिर आखिर कौन थी?
एक बात अवश्य थी, कि फोन लगातार आ रहे थे तथा तकरीबन उसी संख्या में, आ रहे थे। हाँ, तरतीब कोई नहीं थी। किसी दिन, दिन में दो बार तो कभी-कभी दो दिन भी नहीं। हाँ, दो-तीन बार से अधिक ऐसा नहींं हुआ। पत्नी फोन उठाती तो, कोई आवाज नहीं आती और मेरे फोन उठाने पर, उसी तरह सरगोशी के लहजे में, थोड़ी बहुत बात होती, फिर फोन कट जाता। एक हिचक-सी दूसरी ओर से बात करने वाले के मन में मुझे महसूस होती रही। एक बार रात डेढ़ बजे फोन आया-मैंने कहा-
हैलो !
~……….उधर से कोई आवाज नहीं।
हैलो, मैं डॉ० नवल।
………
हैलो, मैं फोन रख रहा हूँ।
ना, ऐसा ना करें।
तुम कौन हो ?
……..
इस वक्त, फोन क्यों करती हो ?
……….‘‘
पत्नी के फोन उठाने पर, जवाब क्यों नहीं देती ?
……….‘‘
‘‘अच्छा ! मैं फोन रख रहा हूँ
‘‘……….‘‘
फोन कट जाता है। मेरी नींद, कोसों दूर चली गई है। रह-रहकर सोचता हूँ। कौन हो सकती है ! परन्तु कोई भी सूत्रा नहीं पकड़ा जाता। आवाज भी, पहचानी नहीं जाती।
पर जाने क्यों, बार-बार महसूस होता, कि है कोई जान पहचान वालों में से। और जैसे, बहुत कुछ कहना चाहती है, पर कह नहींं पाती। मेरी शादी घरवालों ने तय की थी तथा पहले मेरा किसी से, प्यार-व्यार का चक्कर भी नहीं था। न ही, इतने सालों की नौकरी, करते हुए किसी से, घनिष्ठता हुई थी। फिर कौन हो सकता है? मैं थककर सो गया। दस, पन्द्रह दिन तक कोई फोन नहीं आया। परन्तु मैं, जागते-सोते, फोन का, इन्तजार करने लगा। मैं कोशिश करता कि फोन, मैं ही उठा। कहीं ऐसा न हो, कि फोन पर वही हो। फोन न आने पर, मैं बेचैन रहने लगा। ऐसा लगा कि, मेरा कोई अभिन्न मित्रा, मुझसे छूट गया हो। आखिर एक दिन फोन बजा, ठीक रात के दो बजे। पत्नी ने फोन उठाया-‘‘हैलो, हैलो‘‘ और पटक दिया। बोली आप इसको ठीक करवाइए, कहीं क्रास फाल्ट है और घण्टी यहाँ बजती रहती है। मैंने कुछ नहीं कहा। परन्तु इन्तजार करने लगा। लगभग बीस मिनट बाद, घण्टी बजी। मैंने जल्दी से रिसीवर उठाया। पत्नी सो चुकी थी।
‘‘हां कहो!‘‘ मैंने कहा।
‘‘मैं बोल रहा हूँ।‘‘
तुम कल रात दिल्ली आ सकते हो ?
‘‘क्यों?‘‘
‘‘तुम कल दिल्ली आ सकते हो?‘‘
‘‘रात को रुकना भी पड़ेगा, पता नोट कर लें।‘‘
‘‘लोधी होटल, लाबी में, रिसेप्शन के पास।‘‘
‘‘तुम हो कौन?‘‘
‘‘मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगी।‘‘
‘‘मगर तुम हो कौन ‘‘
‘‘देख लेना‘‘
और फोन कट गया।
मेरी नींद उड़ गई। रह-रहकर जाने कैसे-कैसे विचार आ रहे थे ? कौन होगी वह?  मुझे ही टेलीफोन क्यों करती है? कहीं कोई षड~यन्त्र तो नहीं। मैं अब तक, शहर का नामी चिकित्सक हो चुका था। हालांकि मेरा, अब तक किसी से झगड़ा या बैर नहीं हुआ था। परन्तु आजकल के माहौल, को देखते हुए, जाने कैसे-कैसे उतार-चढ़ाव मन में आने लगे ! जितना, मैं इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करता, उतनी ही और उलझ जाती। कालेज के दिनों मैडिकल कालेज हस्पताल में, नौकरी के दौरान मेरा, कितनी ही लड़कियों व नर्सों से सम्पर्क हुआ, लेकिन घनिष्ठता किसी से नहीं हुई थी। मैंने मन ही मन सोचा कि मैं नहीं जाऊंगा। अगर उसका फोन, फिर आया तो जवाब भी नहीं दूँगा। इस उम्र में मेरा यह खिलंदरापन ठीक नहीं है। हो सकता है, कोई मित्र बेवकूफ बनाना चाहता हो और किसी से, फोन करवा रहा हो। खैर ! मन में पक्का निश्चय ‘न जाने का‘ करने के बाद कुछ धीरज-सा हुआ। मैं सो गया। सोचा, आज चौबीस तारीख है और फर्स्ट अप्रैल के सात दिन बाकी हैं।
चार-पांच दिन, कोई फोन नहीं आया। मैंने भी, कुछ अधिक ध्यान नहीं दिया। छठे दिन, रात लगभग दो बजे फिर फोन आया-‘‘हैलो।
‘‘………………….‘‘ मैं चुप रहा।
‘‘हैलो, डॉ० साहब आप क्यों नहीं आए?Þ
‘‘…………………….Þ
‘‘बोलिए न मुझे पता है, फोन पर आप ही हैं’
मैंने फोन रख दिया।
घण्टी फिर बजी।
‘‘हैलो, डॉ० साहब! कल आप जरूर आइएगा, आप किसी अनर्थ की ना सोचं।”
आवाज में अनुनय था। ‘‘मेरा आपसे मिलना जरूरी है। मेरा एक वायदा है आपसे, बरसों पुराना।  देखिए ! मैं बहुत दूर, दूसरे देश से आई हूं। हैलो!”
मुझे मजाक सूझा। ‘‘कहीं इन्द्रलोक से तो नहीं आई हैं आप‘‘ उसने सुना-अनसुना कर के कहा  ‘‘आप जरूर आएँ। मेरा आप पर, वश तो नहीं है। पर विनती जरूर है कि आप आएँ।‘‘
फोन कट गया।
मैं, पहले से भी उद्विग्न हो गया। रात-भर, कई तरह के सोच विचार किए और न जाने की सोच कर सो गया।
सुबह उठते ही मस्तिष्क ने फिर उसी तरह सोचना, शुरू कर दिया। मैंने पत्नी से कहा कि अटैची लगा दे। मुझे एक-दो दिन के लिए, दिल्ली जाना पड़ेगा। पत्नी को थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैं, अक्सर बाहर जाने का प्रोग्राम, इतनी जल्दी नहीं बनाता। बल्कि कई दिन पहले ही मेरे जाने की चर्चा घर में गूँजने लगती है। चाहे आफिशियल काम हो या संस्था के काम से अथवा निजी घूमने वगैरा के चक्कर में। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। चुपचाप अटैची में कपड़े सहेजने लगी। मेरे मन में चोर था, अत: स्पष्टीकरण देने लगा, कि रात राजू का टेलीफोन आया था। उसे कुछ काम है, शायद इसीलिए बुलाया है। राजू मेरा लंगोटिया यार था। साल में दो-चार बार आकर मेरे यहाँ रुकता था। मैं भी साल में एक बार उसके पास जरूर जाता था।
सारा दिन, सफर पता नहीं, कितना लम्बा लगता रहा। गाड़ी होटल के पोर्च में रुकी। दरबान ने, अभिवादन कर बड़े अन्दाज से, दरवाजा खोला, पर मुझपर जैसे किसी आसेब का साया था। बिना जवाब दिए, अन्दर दाखिल हो गया। इन फाइव स्टार होटलों के बेयरे, दरबान, बड़े खुर्राट किस्म के जीव होते हैं। मानो मनुष्य की जून में घडियाल। ऐसी छोटी-मोटी तोहीन को जरा से कन्धे उचकाकर झाड़ देना, शायद उनकी ट्रेंनिग में शामिल होता है। खैर ! मैं लाबी में पहुँचा और बीचों-बीच बनाए गए खूबसूरत फव्वारे, की बांईं तरफ के सोफे पर बैठ गया। कसमसाकर दो-चार मिनट पहलू बदले होंगे, कि वेटर एक बढ़िया तश्तरी में, एक लिफाफा लेकर, आ मौजूद हुआ। लिफाफे के साथ ही, तश्तरी में उसे खोलने के लिए, खूबसूरत चाकू रखा था। इन होटलों में चोचलों  की भरमार रहती  है। मैं अधिकतर लोगों की तरह लिफाफा फाड़कर पत्र निकालने का आदी हूँ। परन्तु होटल के माहौल तथा उस बावर्दी बेयरे की मौजूदगी में, ऐसा न कर सका और चाकू से लिफाफा खोलने लगा। मैं खुद को सिमटा सा महसूस कर रहा था, क्योंकि इस तरह लिफाफा खोलना मेरे लिए काफी कोफ्त का काम था। खैर पत्र निकाल कर, लिफाफा चाकू तथा टिप बेयरे की तश्तरी के हवाले की। बेयरा दो कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया।
मैं पत्र पढ़ने लगा। लिखा था कृपया बेयरे के साथ चले आएँ ‘बेनाम’। मैंने बेयरे पर नजर डाली, वह झुककर व्यावसायिक मुस्कराहट चेहरे पर ले आया। मैं उठ खड़ा हुआ। आगे चलकर लिफ्ट में दाखिल होकर उसने बटन दबाया और लिफ्ट ऊपर सरकने लगी। लिफ्ट तीन ओर से पारदर्शी  शीशे की बनी हुई थी। मैं इसमें पर जाते हुए ऐसा महसूस कर रहा था कि जैसे बीच बाजार में, मेरी नुमाइश लगी हो।
ऊपर पहुंचकर, हम कुछ देर गद्देदार गलीचों से ढके, गलियारे से होकर, एक कमरे के सामने पहुँचे। बेयरे ने घण्टी बजाई, फिर कुछ देर रुक कर दरवाजा खोल दिया। मैं अन्दर आ गया। बैरा, बिना कुछ बोले दरवाजा बन्द करके, चला गया। कुछ देर तो मैं, अहमक सा बना खड़ा रहा, फिर आगे बढ़कर कमरे का मुआयना करने लगा। कमरा फाइव स्टार होटल के अच्छे कमरों में से था। एक तरफ बैठने की जगह थी, जहाँ तीन भव्य कुर्सियाँ पड़ी थीं तथा बीच में काफी टेबुल। दूसरी तरफ झीना सा पर्दा था। उसके उस पार एक डबल बैड था, जिसकी समु्द्र फेन सी, सफेद चादर पर पड़ी् सिलवटें बतला रहीं थीं कि इस, बेड से उठकर अभी कोई गया है। मैं एक कुर्सी पर बैठ गया। कWाफी टेबुल पर एक फूलदान था जिसमें बड़ी खूबसूरती से हल्के पीले व गहरे नीले रंगे के फूल थे। मैं तो इन फूलों का नाम भी नहींं जानता था। फूलदान के पास एक खूबसूरत लिफाफा रखा था, जिस पर मेरा नाम लिखा था। मैंने लिफाफा उठा लिया और खोलने लगा। एक भीनी सी खुशबू मेरे जहन में उतर गई। पत्रा में लिखा था कुछ पल और प्रतीक्षा करें, मैं शावर में हूँ। तब तक आप पाइप पीजिए। पाइप दराज में है। मैं कभी पाइप पीता था, पर अब मुझे पाइप छोड़े हुए बरसों बीत गए थे। फिर भी मैंने दराज खोला उसमें एक चायनीज पाइप, प्रिंस हेनरी का तम्बाकू तथा लाइटर रखे थे।
मैंने पुराने अभ्यास वश, पाइप को भरा और लाइटर से सुलगाकर एक लम्बा कश लिया। अब तक मैं संयत हो चुका था तथा हर किसी होनी अनहोनी के लिए तैयार था। पर मैं हैरान था, कि मेरे बारे में इतना जानने वाली कौन है आखिर !
तभी टेबुल पर रखे फोन की घण्टी बजी। मैंने रिसीवर उठाया, तो वही आवाज आई, जो इतने दिनों फोन पर सुनता आ रहा था। वह बोल रही थी ‘खुशामदीद किन अलफाज से शुक्रिया करूँ ! बस आ रही हूँ, दो मिनट में। उसकी आवाज के साथ शावर के पानी गिरने की आवाज आ रही थी।
अचानक वह फोन पर हँसने लगी। उसकी खिलखिलाहट तो बहुत जानी-पहचानी थी। अरे ! शेगी तुम ! मैं कह उठा। उसकी खिलखिलाहट और तेज हो गई, जैसे उस पर हँसी का दौरा पड़ गया हो।
मुझे रोमांच हो आया, शेगी उर्फ शुभांगी, मेरी स्कूल तथा कालेज की सहपाठी थी। प्री-मेडिकल तक। हम दोनों में काफी दोस्ताना था, लगाव था, जो शायद प्रेम में बदल जाता। परन्तु उसके पिता फ़ॉरेन चले गए थे, सबको लेकर। और फिर यादों के आइने पर धूल की परत चढ़ गई। मैं सोच भी नहींं सकता था कि इतने बरसों, लगभग बीस बरसों बाद उससे मुलाकात होगी और वह भी इस रहस्यमय तरीके से।
यह शुभांगी की बचपन की आदत है। वह पहले भी, लोगों को अक्सर अचम्भित करती रहती थी।
वह कहने लगी, सीधी रोम से आ रही हूँ। फोन भी वहीं से करती थी। मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था, किसी किशोर दिल की मानिन्द, जो पहली बार अपनी प्रेमिका से मिलने आया हो। थूक और सांस गले में अटकते से महसूस हुए। फिर यह सोच कर कि शुभांगी मुझसे बात करते हुए नहा रही थी, मेरे माथे की नसें फटने को हो आई। शुभांगी मेरी कक्षा की सबसे सुन्दर लड़की थी। इतनी सुन्दर कि उससे बात करते हुए आम लड़के हकलाने लग जाते थे। वह अपनी तरह की एक ही  थी, बेलौस बेबाक।
हम क्योंकि, बचपन से इकट्ठे एक ही कालोनी तथा एक ही स्कूल में थे, अत: मुझ में उसके प्रति कोई काम्पलेक्स नहीं था। मात्रा एक बार, जब वे लोग देश छोड़कर जा रहे थे, तो मुझे लगा था, कि मेरे भीतर का कोई अहम~हिस्सा टूटकर जा रहा हो। उन दिनों मैं काफी उदास हो गया था। जाने से पहले दिन, कालोनी के पार्क में हम दोनों मिले थे, तब मुझे लगा था कि शुभांगी को भी, मेरी तरह ही कुछ खोने का अहसास था। हम दोनों पार्क की बैंच पर, अँधेरा होने तक बैठे रहे थे। जब जाने के लिए उठे, तो शुभांगी ने अचानक मेरा चेहरा हाथों में लेकर चूम लिया था। इससे पहले कि मैं इस अनायास झटके से बाहर आता, वह भाग ली थी। मैं उसके पीछे भागा‘ठहर, मेरी उधार देकर जा।’ बचपन से ही हम एक-दूसरे की पीठ पर घूँसे जमाते आए थे और जो घूँसा लगाकर भाग जाता था तो दूसरा उसे उधारी मान लेता था। उस दिन जाते-जाते शुभांगी कह गई थी, उधार अगले मिलन पर। पर अगला मिलन कभी नहीं हुआ। उधर शुभांगी फोन पर कह रही थी कि कहाँ खो  गए,  तुम्हारी उधार देने आई हूँ। मैं कह उठा, बाहर तो आओ, सूद समेत वसूल करूंगा। उसने फोन रख दिया। मैं एक अजीब उन्माद में फँसा, शुभांगी की प्रतीक्षा करने लगा। जाने कितनी अतृप्त इच्छाएँ जागृत हो उठीं। फिर इस माहौल व एकान्त की मादकता का भी प्रभाव रहा होगा। शुभांगी ने टेलीफोन का रिसीवर, शायद हैंगर पर टाँग दिया था, क्योंकि पानी की कलछल के साथ, उसके गुनगुनाने की आवाज भी मुझे फोन पर सुनाई दे रही थी। शुभांगी का स्वर, आरम्भ से ही मीठा एवं लय लिए हुए था।
मैं दिवास्वप्न में डूब गया। शुभांगी का उस शाम का चेहरा, जब हम आखिरी बार पार्क में बैठे थे, मेरी आँखों के सामने तैर गया। वह हमेशा से ही चंचल, चुलबुली, अलबेली, मस्त-मौला रही है। पर उस शाम पार्क में वह खोई सी अनमनी-सी बैठी रही थी। मात्रा मैं जो बहुत कम बोलने वाला समझा जाता हूँ, बोलता रहा था। वह हाँ ना में जवाब देकर अपनी उँगलियाँ उमेठती बैठी थी। फिर अचानक उठकर मुझे चूमकर भाग निकली थी।
वही था हमारा, आखिरी मिलन। यही उधार थी जिसे चुकाने का इशारा वह टेलीफोन पर कर रही थी। मुझ पर एक अजीब रोमांच हावी था। तभी हल्के से, बाथरूम का दरवाजा खुला। खुशबू का एक रेला तैर कर मुझ तक पहुँच गया। शायद यह आगे आने वाले खुशबुओं के तूफान का नामवर था। फिर शुभांगी बाहर आई। उसके ब्वायकट बाल, उसका थुल-थुल बदन, उसके लगभग पारदर्शी गाउन से बाहर निकल पड़ रहा था। अधेड़ उम्र उसके शरीर ही नहीं चेहरे तथा आँखों पर भी, धावा बोल चुकी थी। मैं भौचक्का सा रह गया।
शुभांगी आकर सामने बैठ गई। कहने लगी,‘बहुत दिन तड़पाया है तुमने।’ टेलीफोन पर भी नहीं पहचाना। और सुनाओ।
मैं केवल यह कह पाया सब ठीक है। फिर हाथ मुंह धोने की कहकर, बाथरूम भाग लिया। बाथरूम में आकर एक लम्बी साँस ली और वाश-बेसिन के नल को खोल, सिर उसके नीचे रख दिया और सोचने लगा। हे राम ! कहाँ फँस गया इस बबाल में। कुछ देर पानी चलता रहा था। सिर में ठण्डक पड़ी। मैंने सिर ऊपर उठाया तो सामने आइने में अपनी सूरत दिखलाई पड़ी-ओह, तो क्या शुभांगी भी यही कुछ नहींं सोच रही होगी। वह क्या किसी खल्वाट लिए, पेट निकले अधेड़ की उधार चुकाने आई थी ?
वक्त, किसी को नहीं छोड़ता। मात्र हम स्वयं, अतीत से चिपके रहते हैं। चलो बाहर चलकर देखा जाए, क्या होता है ?
शुभांगी वहीं, उसी कुर्सी पर बैठी थी। उसने होल्डर लगी सिग्रेट सुलगा रखी थी। बीयर की बोतल खुली पड़ी थी। दो गिलास भरे पड़े थे पर शायद वह भी इस मुलाकात के सदमे को सहन नहीं कर पाई थी। अत: शिष्टाचार को ताक पर रखकर बीयर पीने लग गई थी। मुझे बाहर आया देखकर कहने लगी, ओ‘आओ नरेश ! बैठो और सुनाओ, क्या हाल है ? क्या वक्त सचमुच बेरहम नहीं है ?
उसने मेरी ओर, और फिर दीवार पर लगे आइने में अपने पर नजर डालते हुए कहा,‘चलो आज अपनी बीती उम्र का मातम मनाने के लिए पीते हंै
मैंने बीयर का भरा गिलास उठाकर, उसके हाथ में लगभग आधे हुए गिलास से, टकराकर कहा‘चियर्स ! और फिर हम दोनों खोखली हँसी हँस पड़े।

श्याम सखा

रोहतक, हरियाणा

भारत.

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समीर लाल ‘समीर’ की पुस्तक ‘बिखरे मोती’ पर देवी नागरानी की समीक्षा

नवम्बर 18, 2009

“वक्त की पाठशाला में एक साधक”-श्री समीर लाल समीर

कलम आम इन्सान की ख़ामोशियों की ज़ुबान बन गई है. कविता लिखना एक स्वभाविक क्रिया है, शायद इसलिये कि हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, एक चित्रकार और शिल्पकार छुपा हुआ होता है. ऐसे ही रचनात्मक संभावनाओं में जब एक कवि की निशब्द सोच शब्दों का पैरहन पहन कर थिरकती है तो शब्द बोल उठते हैं. यह अहसास हू-ब-हू पाया, जब श्री समीर लाल की रचनात्मक अनुभूति ‘बिखरे मोती’ से रुबरु हुई. उनकी बानगी में ज़िन्दगी के हर अनछुए पहलू को कलम की रवानगी में खूब पेश किया है-

हाथ में लेकर कलम, मैं हाले-दिल कहता गया

काव्य का निर्झर उमड़ता, आप ही बहता गया.

यह संदेश उनकी पुस्तक के आखिरी पन्ने पर कलमबद्ध है. ज़िन्दगी की किताब को उधेड़ कर बुनने का उनका आगाज़ भी पाठनीय है-

मेरी छत न जाने कहाँ गईस

छांव पाने को मन मचलता है!

इन्सान का दिल भी अजब गहरा सागर है, जहाँ हर लहर मन के तट पर टकराकर बीते हुए हर पल की आहट सुना जाती है. हर तह के नीचे अंगड़ाइयां लेती हुई पीड़ा को शब्द स्पष्ट रुप में ज़ाहिर कर रहे हैं, जिनमें समोहित है उस छत के नीचे गुजारे बचपन के दिन, वो खुशी के खिलखिलाते पल, वो रुठना, वो मनाना. साथ साथ गुजरे वो क्षण यादों में साए बनकर साथ पनपते हैं. कहाँ इतना आसान होता है निकल पाना उस वादी से, उस अनकही तड़प से, जिनको समीर जी शब्द में बांधते हुए ‘मां’ नामक रचना में वो कहते हैं:

वो तेरा मुझको अपनी बाहों मे भरना

माथे पे चुम्बन का टीका वो जड़ना..

जिन्दगी में कई यादें आती है. कई यादें मन के आइने में धुंधली पड़कर मिट जाती हैं, पर एक जननी से यह अलौकिक नाता जो ममता कें आंचल की छांव तले बीता, हर तपती राह पर उस शीतलता के अहसास को दिल ढूंढता रहता है. उसी अहसास की अंगड़ाइयों का दर्द समीर जी के रचनाओं का ज़ामिन बना है-

जिन्दगी, जो रंग मिले/ हर रंग से भरता गया,

वक्त की है पाठशाला/ पाठ सब पढ़ता गया…

इस पुस्तक में अपने अभिमत में हर दिल अज़ीज श्री पंकज सुबीर की पारखी नज़र इन सारगर्भित रचनाओं के गर्भ से एक पोशीदा सच को सामने लाने में सफल हुई है. उनके शब्दों में ‘पीर के पर्वत की हंसी के बादलों से ढंकने की एक कोशिश है और कभी कभी हवा जब इन बादलों को इधर उधर करती है तो साफ नज़र आता है पर्वत’. माना हुआ सत्य है, ज़िन्दगी कोई फूलों की सेज तो नहीं, अहसासों का गुलदस्ता है जिसमें शामिल है धूप-छांव, गम-खुशी और उतार-चढ़ाव की ढलानें. ज़िन्दगी के इसी झूले में झूलते हुए समीर जी का सफ़र कनाडा के टोरंटो, अमरीका से लेकर हिन्दोस्तान के अपने उस घर के आंगन से लेकर हर दिल को टटोलता हुआ वो उस गांव की नुक्कड़ पर फिर यादों के झरोखे से सजीव चित्रकारी पेश कर रहा है अपनी यादगार रचना में ‘मीर की गजल सा’-

सुना है वो पेड़ कट गया है/ उसी शाम माई नहीं रही

अब वहां पेड़ की जगह मॉल बनेगा/ और सड़क पार माई की कोठरी

अब सुलभ शौचालय कहलाती है,

मेरा बचपन खत्म हुआ!

कुछ बूढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!

मीर की गज़ल सा…!

दर्द की दहलीज़ पर आकर मन थम सा जाता है. इन रचनाओं के अन्दर के मर्म से कौन अनजान है? वही राह है, वही पथिक और आगे इन्तजार करती मंजिल भी वही-जानी सी, पहचानी सी, जिस पर सफ़र करते हुए समीर जी एक साधना के बहाव में पुरअसर शब्दावली में सुनिये क्या कह रहे हैं-

गिनता जाता हूँ मैं अपनी/ आती जाती इन सांसों को

नहीं भूल पाता हूँ फिर भी/ प्यार भरी उन बातों को

लिखता हूँ बस अब लिखने को/ लिखने जैसी बात नहीं है.

अनगिनत इन्द्रधनुषी पहुलुओं से हमें रुबरु कराते हुए हमें हर मोड़ पर वो रिश्तों की जकड़न, हालात की घुटन, मन की वेदना और तन की कैद में एक छटपटाहट का संकेत भी दे रहे हैं जो रिहाई के लिये मुंतजिर है. मानव मन की संवेदनशीलता, कोमलता और भावनात्मक उदगारों की कथा-व्यथा का एक नया आयाम प्रेषित करते हैं- ‘मेरा वजूद’ और ‘मौत’ नामक रचनाओं में:

मेरा वजूद एक सूखा दरख़्त / तू मेरा सहारा न ले

मेरे नसीब में तो / एक दिन गिर जाना है

मगर मैं/ तुम्हें गिरते नहीं देख सकता, प्रिये!!

एक अदभुत शैली मन में तरंगे पैदा करती हुई अपने ही शोर में फिर ‘मौत’  की आहट से जाग उठती है-

उस रात नींद में धीमे से आकर/ थामा जो उसने मेरा हाथ…

और हुआ एक अदभुत अहसास/ पहली बार नींद से जागने का…

माना ज़िन्दगी हमें जिस तरह जी पाती है वैसे हम उसे नहीं जी पाते हैं, पर समीर जी के मन का परिंदा अपनी बेबाक उड़ान से जोश का रंग, देखिये किस कदर सरलता से भरता चला जा रहा है. उनकी रचना ‘वियोगी सोच’ की निशब्दता कितने सरल शब्दों की बुनावट में पेश हुई है-

पूर्णिमा की चांदनी जो छत पर चढ़ रही होगी..

खत मेरी ही यादों के तब पढ़ रही होगी…

हकीकत में ये ‘बिखरे मोती’ हमारे बचपन से अब तक की जी हुई जिन्दगी के अनमोम लम्हात है, जिनको सफल प्रयासों से समीर जी ने एक वजूद प्रदान किया है. ब्लॉग की दुनिया के सम्राट समीर लाल ने गद्य और पद्य पर अपनी कलम आज़माई है. अपने हृदय के मनोभावों को, उनकी जटिलताओं को सरलता से अपने गीतों, मुक्त कविता, मुक्तक, क्षणिकाओं और ग़ज़ल स्वरुप पेश किया है. मन के मंथन के उपरांत, वस्तु व शिल्प के अनोखे अक्स!!

उनकी गज़ल का मक्ता परिपक्वता में कुछ कह गया-

शब्द मोती से पिरोकर, गीत गढ़ता रह गया

पी मिलन की आस लेकर, रात जगता रह गया.

वक्त की पाठशाला के शागिर्द ‘समीर’ की इबारत, पुख़्तगी से रखा गया यह पहला क़दम…आगे और आगे बढ़ता हुआ साहित्य के विस्तार में अपनी पहचान पा लेगा इसी विश्वास और शुभकामना के साथ….

शब्द मोती के पिरोकर, गीत तुमने जो गढ़ा

मुग्ध हो कर मन मेरा ‘देवी’ उसे पढ़ने लगा

तुम कलम के हो सिपाही, जाना जब मोती चुने

ऐ समीर! इनमें मिलेगी दाद बनकर हर दुआ..

देवी नागरानी

न्यू जर्सी,

dnangrani@gmail.com

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कृति: बिखरे मोती,
लेखक: समीर लाल ‘समीर’,
पृष्ठ : १०४, मूल्य: रु २००/ ,
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन,
पी.सी. लेब, सम्राट कॉम्पलैक्स बेसमेन्ट,
बस स्टैंड के सामने, सिहोर, म.प्र. ४६६ ००१
भारत.

पंकज सुबीर की कहानी- ‘जब दीप जले आना’

अक्टूबर 14, 2009

“महावीर” और “मंथन” की टीम की तरफ से आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

diwali lamps

‘जब दीप जले आना’ –कहानी

पंकज सुबीर

Subeer Pankajवो लड़की आज भी उसी प्रकार खिड़की में नज़र आ रही है । दोनों तरफ खड़े ग़ुलमोहर के पेड़ों के ठीक बीच बनी हुई वह खिड़की दूर से देखने पर किसी चित्र की तरह नार आती है । उस मकान के जितने दूर से होकर वह रोज़ गुजरता है उतनी दूर से किसी की चीज़ के  बारे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, ठीक ठाक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता । उस मकान का एक पार्श्व उस ओर से दिखाई देता है जिस तरफ से वह निकलता है ।

कंटीले तारों की घेरदार बाड़ के  उस  तरफ  कुछ छोटे फूलदार पौधे लगे हैं । उसके बाद खड़े हैं गुलमोहर के दो पेड़ । जिसके बीच से नजर आती है मकान की वह दीवार जिसमें वह खिड़की बनी है । गहरे नीले रंग से पुती हुई खिड़की । इसी खिड़की पर शायद हाथों की टेक लगा कर उसी प्रकार खड़ी रहती है वह लड़की । रोज़ बिना नागा किसी नियम की तरह ।

एक माह हो गया है शिरीष को यहाँ आये तब से ही वह रास्‍ते कालेज आते और जाते समय इस दृष्य को  देख रहा है । ये नियम कभी नहीं टूटता । जिस सड़क से होकर वह गुजरता है उसके बाद एक बडा सा खाली मैदान है और उसके बाद है वह खिड़की वाला मकान । जो धीरे धीरे शिरीष के लिये कौतुहल और उत्सुकता का पर्याय बनता जा रहा है ।

मकान के ठीक समांनातर पर आकर शिरीष ने मकान की ओर  देखा । लडक़ी उसी प्रकार वहां थी, शिरीष को लगा कि वह लड़की मुस्कुरा रही है, फिर उसे अपने ही विचार पर हंसी आ गई । भला इतनी दूर से नज़र आ भी सकता है कि किसी के चेहरे पर किस प्रकार के भाव हैं ? यहां से तो उस लड़की की पीली फ्राक पर बने हुए लाल फूल भी ठीक ठीक दिखाई नहीं  देते हैं । पीली फ्राक ….? लाल फूल ….? चलते चलते शिरीष को अचानक झटका सा लगा, ये तो उसने कभी सोचा ही नहीं । एक माह से रोज़ वो लड़की इसी फ्राक में नज़र आ रही  है । उसने ठिठक कर मकान की ओर  देखा लड़की उसी प्रकार वहां थी । जरूर ही यह कोई पेंटिंग है जो किसी चित्रकार ने मकान की इस तरफ वाली दीवार पर बना दी है । उसने गौर से खिड़की की तरफ देखा और कुछ देर तक देखता रहा, लड़की इस बार उसे बिल्कुल स्थिर किसी पेंटिंग की तरह नज़र आई । उसने मुस्कुराते हुए अपने ही सर पर चपत लगाई ”फिजूल ही  एक पेंटिंग के चक्कर में एक महीने से परेशान है”  । और आगे बढ़ गया ।

शाम को जब कालेज से लौट रहा था तो अपनी सुबह की खोज पर मुस्कुराते हुए उसने खिड़की की ओर देखा एक बार फिर उसके पैर जम गये । लड़की खिड़की पर नहीं थी । एक माह में ये पहली बार हुआ है कि शिरीष को वह लड़की खिड़की पर  नहीं दिखाई  दी है । सुबह की उसकी खोज पर पानी फिर गया ।

कमरे पर लौटकर उसका किसी काम में मन नहीं लगा, एक ग्लास पानी पीकर पलंग पर  आकर  लेट गया । खिड़की के बाहर दिन के रात में परिवर्तित होने की क्रियाऐं चल रही हैं । आज पहली बार उस लड़की ने शिरीष को उलझन में डाल दिया है । एक विचित्र सा रहस्यमय आकर्षण उसे उस खिड़की की ओर खींच रहा है क्या यही प्रेम है ? फिर उसे अपने  ही फिज़ूल के विचार पर हंसी आ गई । इतनी दूर से नार आने वाली एक धुंधली सी आकृति भला प्रेम कैसे हो सकती है । मगर फिर है क्या आखिर ? क्यों खिंचाव सा महसूस हो रहा है उसे । कुछ तो है ।

लेटे लेटे ही शिरीष ने तय कर लिया कि  दीपावली के दिन वह जाएगा उस लड़की से मिलने । अगले सप्ताह दीपावली है,  दीपावली की छुट्टियों में घर जाने का उसका कोई कार्यक्रम नहीं है, यहाँ रहकर पढ़ाई करना चाह रहा है वह । दीपावली के दिन जाएगा वह उस लड़की से मिलने । और किसी दिन जाएगा तो शायद उस घर के लोग अन्यथा ले लें लेकिन दीपावली को कोई भी अन्यथा नहीं लेगा । उस लड़की से मिलना इस लिए भी ज़रूरी है क्योंकि वह लड़की अब उसकी पढ़ाई में बाधक बन रही है । निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से आया है वह, उसके माता पिता ने खुद के काफी सारे सपनों को स्थगित करते हुए उसे उसके सपने पूरे करने भेजा है यहां । वह किसी भी कारण  इन सपनों के खंडित टुकड़े लेकर पराजित योद्धा की तरह वापस नहीं लौटना चाहता ।

अगले  दिन जब शिरीष वहां  से गुज़रा तो लड़की वहीं थी, उसी प्रकार अपनी लाल फूलों वाली पीली फ्राक पहने हुए । मगर आज शिरीष को कोई तनाव  नहीं है दीपावली के दिन वह इस गुत्थी को सुलझा ही लेगा । शिरीष खिड़की की ओर देखकर मुस्कुराया आज फिर उसे लगा कि वह लड़की भी मुस्कु रा रही है । लड़की के मुस्कुराते ही खिड़की के दोनों तरफ खड़े गुलमोहर  के हरे भरे पेड़ भी मुस्कुराने लगे हैं । कंटीले तार के पास कतार में खड़े गुलाब के पोधों में चटक चटक कर कुछ कलियाँ फूल बनने लगी हैं और दिन की धूप ज़र्द से अचानक सफेद होकर चांदनी बनती जा रही है, हवाओं में धीमी धीमी घंटियां बजने लगी हैं, मानो कोई भेड़ों का  रेवड़ पास से होकर गुजर रहा हो । शिरीष स्तब्ध सा खड़ा उस खिड़की की ओर देखता रहा उसे लगा मानो मकान के पहिये लग गए हैं और वह मकान मैदान  को पार करता हुआ धीरे-धीरे  उसकी ओर बढता  आ रहा है । ”ए भाई अब चलो भी, रास्ता घेर कर क्यों  खडे हो ?” पीछे से किसी की आवाज़ सुनकर शिरीष की तंद्रा टूटी । ठंडी सांस छोड़ते हुए वह अपनी राह पर बढ़ गया ।

बीच के सात दिन बड़ी उहापोह में गुजरे शिरीष के । कई बार लगता कि कालेज जाते समय मुड जाए उस घर की ओर । मगर मर्यादाओं के प्रश् पैरों में गुंथ कर थाम लेते । क्या कहेगा वहाँ जाकर ? किसको जानता है वो वहाँ ? दीपावली का दिन ऐसा लगा मानो वर्षों  के इंताज़ार के बाद आया । जैसे समय का पहिया किसी रेतीले टीले में  फंसकर सुस्त हो गया  हो । उस पर भी दीपावली  का पूरा दिन काटना उसके लिए किसी युग को काटने  के समान हो गया । शाम  ढले जब सूर्य ने अपनी सत्ता मावस के अंधेरे असमान पर टिमटिमाते सितारों को सौंप कर अस्ताचल में विदा ली तो अंधेरे को चुनौती देते हुए जगमगा उठे हजारों हजार दीपक  । शिरीष ने कमरे से बाहर आकर देखा तो चारों तरफ पृथ्वी पर सितारे उतरे हुए थे । अंधेरा अपना साम्राज्य पसारना चाह रहा था पर विफल होकर कहीं अटका हुआ था । शिरीष ने घड़ी देखी आठ बज रहे हैं बाज़ार से मिठाई वगैरह खरीदने में आधा घंटा तो लग ही जाएगा । तब तक लक्ष्मी पूजन भी हो जाएगी तब ही जाना ठीक रहेगा । सोचता हुआ वह कमरे पर ताला लगा कर निकल पड़ा । बाजार से मिठाई खरीद कर लौटने में उसकी उम्मीद से ज्यादा समय लगा गया कितनी भीड़ थी दुकान पर आधे घंटे में उसका नंबर आया । मिठाई और शुभकामना संदेश खरीद कर लौट पड़ा वह ।

तिराहे पर आकर उसके पैर ठिठक गए यहाँ से ही तो एक रास्ता उस नीली खिड़की वाले मकान की ओर गया है । कुछ देर तक ठहर कर  सोचता रहा फिर सधे कदमों से उस मकान की ओर  जाने वाले रास्ते पर बढ़ गया ।  छोटा सा मकान खामोशियों में  डूबा हुआ था गेट के दोनों तरफ दीपकों की पंक्तियाँ  झिलमिला रहीं थीं जो कतार में मकान से जुड़ी पगडंडी को घेरते हुए मकान तक गईं थीं । मकान का वह पार्श्व जहाँ वह खिड़की है सामने से नज़र नहीं आ रहा था । गेट खोलकर शिरीष  अंदर आया और झिझकते कदमों से आगे बढ़ा।

”कौन ?”  गेट के खुलने और बंद होने की आवाज़ से अंदर से एक स्त्री स्वर आया ।

”जी मैं हूं शिरीष” अपने ही  उत्तर के अटपटेपन को महसूस किया शिरीष ने ।

कुछ देर में दरवाज़ा खुला, एक अधेड उम्र की महिला दरवाजे पर खड़ीं थीं । स्थिति असहज बनने से पहले ही शिरीष ने उनके हाथ में मिठाई का डब्बा तथा शुभकामना संदेश थमा कर उनके पैर छू लिए ”दीपावली की शुभकामानाएं आंटी”। ”बस बस ,खुश रहो । आओ, अंदर आओ” कहते हुए वे दरवाजे से हट गईं ।

अंदर आकर शिरीष ने देखा चारों तरफ ख़ामोशी बिछी हुई है ”तुम बैठो बेटा मैं अभी आती हूं ”  कह कर वो महिला अंदर चली गईं । कुछ  देर बाद एक प्लेट में नाश्ता वगैरह लेकर लौटीं । टेबल पर रखते हुए बोलीं ”लो बेटा दीपावली की मिठाई खाओ”।

मिठाई का एक छोटा सा टुकड़ा उठाते हुए कहा शिरीष ने ”और कोई नहीं है घर में ?”।

”मैं यहाँ अकेली ही रहती हूँ ” महिला का उत्तर सुनकर शिरीष को ऐसा लगा मानो कोई बड़ा पटाखा उसके ठीक पास ही चल गया हो । उसने देखा सामने दीवार पर एक लड़की की फोटो लगी है, उसने अटकते हुए पूछा ”और ये ? ” ।

” ये मेरी बेटी थी, दो साल पहले नहीं रही । ” महिला ने ठंडे स्वर में उत्तर दिया ।

महिला का एक एक शब्द शिरीष को किसी कुंए में गूंजता प्रतीत हो रहा था ”दोनो पैरों से विकलांग थी सुधा, मगर दोनो ऑंखें सपनों से भरी रहतीं थीं हमेशा । जैसे जैसे बडी होने लगी उसके सपने प्रेम की दस्तक सुनने की प्रतीक्षा में सुनहले रुपहले होने लगे । खिड़की पर बैठकर घंटों रास्ते की ओर देखती रहती । मानो किसी की प्रतीक्षा कर रही हो । किसी से प्रेम करना चाहती थी वह, और इसी लिए अपने जीवन में प्रेम की प्रतीक्षा करती रहती थी । दीपावली के दिन बाहर पगडंडी के दोनों तरफ कतार से दीपक लगवाती, मैं पूछती तो कहती ”इससे आने वाले को लगता है कि उसका स्वागत में पलके बिछीं हुईं हैं कोई उसके आने की प्रतिक्षा कर रहा है । सपने देखने वाली उसकी ऑंखें दो साल पहले अचानक बुझ गईं” कहते कहते महिला का कंठ रुंध गया ।

शिरीष अवचेतन से वर्तमान में लौटा और बोला ”सॉरी आंटी मुझे पता नहीं था”।

”कोई बात नहीं बेटा, मिठाई तो लो तुम तो कुछ ले ही नहीं रहे” महिला ने अपने को संभालते हुए कहा ”नहीं आंटी अब मैं चलूंगा, और भी जगह जाना  है मिलना है” कहते हुए शिरीष उठ कर खड़ा हो गया । महिला उसे गेट तक छोड़ने आईं । जब विदा लेकर वह चलने लगा तो पीछे से महिला की आवाज़ आई ”बेटा” । सुनकर शिरीष ठिठक कर पलटा  और बोला ”जी आंटी ” ।

वो महिला कुछ न बोली बस शिरीष की ओर देखती रही । शिरीष  भी चुपचाप खड़ा कुछ देर तक महिला के निचले होंठ और ठुड्डी में होते हुए कंपन तथा पलकों के भीगते किनारों को देखता रहा, फिर अचानक महिला ने कांपते स्वर में शिरीष की ओर देखते हुए पूछा

”क्या तुम्हें भी नज़र आई थी वह ?”

(समाप्त)

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अगला अंक: २१ अक्तूबर २००९
प्राण शर्मा की दो लघुकथाएँ
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प्राण शर्मा की लघुकथा- शुभचिंतक

सितम्बर 30, 2009

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प्राण शर्मा

लघुकथा-

शुभचिंतक

प्राण शर्मा

भोलानाथ जी के सुपुत्र प्रभात के विवाह की बात विवेकनाथ जी की सुपुत्री निशा के साथ पक्की  हो चुकी थी। दोनों और से विवाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से होने लगी थी।सगुन के गीत गाये जाने लगे थे।

एक दिन पहली डाक से विवेकनाथ  को एक लिफाफा मिला। लिफाफे पर “अर्जेंट” लिखा था।  उनहोंने तुंरत लिफाफा खोला। कागज़ के एक टुकड़े पर अटपटी लिखावट में लिखा था-“जिस लड़के  से आपने  अपनी लड़की का रिश्ता जोड़ा है,सच पूछिए तो वो चरित्रहीन है। शहर में कई लड़कियों  के साथ उसके नाजायज़  सम्बन्ध हैं। क्या ऐसी चरित्रहीन लड़के को आप अपने दामाद  के रूप में स्वीकार करेंगे? बिरादरी और समाज में आपकी नाक न कट जाए इसलिए मैं ये बात आपको लिख रहा हूँ। बदनामी से बचाने के लिए आपको सावदान करना मेरा फ़र्ज़ है, आपका  और आपके समूचे परिवार का एक शुभचिंतक।

शुभ चिन्तक मोटे-मोटे शब्दों में लिखा हुआ था। पत्र की इबारत पढ़ते ही विवेक नाथ का शरीर  सुन्न हो गया और उनके पैरों के नीचे  से ज़मीन खिसक गयी । बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने आपको संभाला। सँभलते ही वे  सीधे भोला नाथ जी के  घर पहुँचे। क्रोध से तमतमाए हुए थे वे।

एक कागज़ का टुकडा भोला नाथ जी के चेहरे पर उछालते हुए दहाड़े –  पढो अपने कुपुत्र की करतूतें । लफंगा , दुराचारी । शहर की कई लड़कियों के साथ उसके नाजायज़ सम्बन्ध हैं।”

भोला नाथ जी ने भी कागज़ का एक टुकडा विवेक नाथ जी को थमा दिया। इबारत पढ़ते ही  विवेक नाथ को बात समझने में देर नहीं लगी।

देखते-ही-देखते दोनों के चेहरे खिलखिला उठे।

प्राण शर्मा

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देवी नागरानी की लघुकथा – भिक्षा-पात्र

जुलाई 6, 2009

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भिक्षा पात्र

(लघुकथा)

देवी नागरानी

दरवाज़े पर भिक्षा दते हुए देवेन्द्र नारायण सोच रहे थे, ये सिलसिला कब तक चलेगा ? पिताजी के ज़माने से चलता आ रहा है ! दरवाज़े पर आए भिक्षुक को खाली हाथ न भेजो ! और बेख्याली में भिक्षा पात्र में न पड़कर नीचे ज़मीन पर गिरी। कुछ रूखे अंदाज़ से बढ़बढ़ाते हुए कह उठे, “भई ज़रा उठा लेना, मैं जल्दी में हूँ” और अंदर चले गए ।

बरसों बीत गए और ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव जहाँ ऊँट की करवट लेकर थमे, वहाँ पासा भी पलटा । सेठ देवेन्द्र नारायण मसइलों की गर्दिश से गुज़र कर खास से आम हो गए और फिर पेट के फाके क्या नहीं कराते ? नियति कहें या परम विधान! एक दिन वो भिक्षा पात्र लेकर उसी भिक्षू के दरवाजे की चौखट पर आ खड़े हुए जिसे एक बार उन्होंने अनचाहे मन से भिक्षा दी थी । बाल भिक्षू अब सुंदर गठीला नौजवान हो गया था और कपड़ों से उसके मान-सम्मान की व्याख्यान मिलती रही । सर नीचे किये हुए सोच से घिरे देवेन्द्रनारायण अतीत में खो गए। ”
मान्यवर आप कृपया अपना पात्र सीधा रखें ताकि मैं आपकी सेवा कर पाऊँ ।” विनम्रता का भाव उनके हृदय में करुणा भरता गया और साथ में दीनता भी । नौजवान ने उनके भावों को पहचानते हुए और विनम्रता से कहा – “हम तो वही है मान्यवर बस स्थान बदल गए है और यह परिवर्तन एक नियम है जो हमें स्वीकारना है, इस भिक्षा की तरह. न हमारा कुछ है, न कुछ आपका ही है। बस लेने वाले हाथ कभी देने वाले बन जाते हैं.”।

देवी नागरानी
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