यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

लघुकथा

दुष्कर्मी

– प्राण शर्मा

पंद्रह वर्षीय दीपिका रोते-चिल्लाते घर पहुँची. माँ ने बेटी को अस्तव्यस्त देखा तो गुस्से में पागल हो गयी– ” बोल ,तेरे साथ दुष्कर्म किस पापी ने किया है?”

” तनु के पिता मदन लाल ने. ” सुबकते हुए दीपिका ने उत्तर दिया .

” तुझे कितनी समझाया था कि छाती पूरी तरह ढक कर अन्दर-बाहर कदम रखा कर. इन राक्षसों की कामी नज़रें औरतों की नंगी छातियों पर ही पड़ती हैं. नंगी छाती रखने का नतीजा देख लिया तूने? मैं तो कहीं की नहीं रही. पचास साल के उस बूढे़ का सत्यानाश हो. रब्बा, वो जीते जी जमीन में गड़ जाए. मेरी भोली-भाली नाबालिग़ बेटी का जीवन बर्बाद कर दिया है उस दुष्कर्मी ने. मुए ने अपनी बेटी का बलात्कार क्यों——- “

मदन लाल का स्यापा करती हुई माँ दीपिका का हाथ पकड़े हुए बाहर आ गयी. उसका रुदन सुनते ही अड़ोसी- पड़ोसी बाहर निकल आये. सेंकड़ों ही लोग इकठ्ठा हो गए.

दीपिका के बलात्कार के बारे में जिसने भी सुना वो लाल-पीला हो गया.

सभी मदन लाल के घर की ओर लपके. मदन लाल के घर तक पहुँचते-पहुँचते लोगों का अच्छा-खासा हजूम बन गया था. मदन लाल घर पर ही था. कुछ लोगों ने उसे घसीट कर बाहर जमीन पर पटक दिया. मदन लाल रोया-चिल्लाया. हाथ जोड़-जोड़ कर उसने माफियाँ माँगी. नाक रगड़े उसने. गुस्साए लोगों हजूम था. किसीने घूँसा मारा और किसी ने जूता. जमकर धुनाई हुई उसकी. लहुलुहान हो गया वो.

मदन लाल को लहुलुहान करने वालों में कई ऐसे दुष्कर्मी लोग भी थे जिनके हवस की शिकार कई महिलायें हो चुकी थीं.

प्राण शर्मा

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चश्मदीद गवाह

–प्राण शर्मा

फुटपाथ पर बैठा एक अँधा भिखारी जोहनी वाकर की तरह हाथ फैला कर गुहार लगा रहा था – ” एक रूपये का सवाल है.”  एक “दानी” ने एक रूपये का सिक्का उसके अल्युमिनियम के कटोरे में फैंका. सिक्का बाहर गिरा. उसकी खनक खोटे सिक्के जैसी थी. अँधा भिखारी झट खोटे सिक्के की खनक को पहचान गया. उसने कनखियों से देखा. खोटा सिक्का ही था. वो ओम प्रकाश के लहजे और अंदाज़ में बोला — “साहिब, सिक्का तो खोटा है. क्या हम ही रह गये  थे खोटे सिक्के के लिए.?”

” अरे, तू तो देख सकता है ! अभी बुलाता हूँ पुलिस को.”

” साहिब, बेकसूर हूँ. मैं तो किसी और अंधे का काम कर रहा हूँ.”

”  वो कहाँ है ? “

”  साहिब, वो मेट्रो में फिल्म देखने गया है- चश्मदीद गवाह.

–प्राण शर्मा


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14 Comments »

  1. पहली लघुकथा का सार-जो पकड़ा गया वो चोर…यही होता है.

    दूसरी पढ़्कर अंत में हंसी आ गई.

    बहुत बढ़िया.

  2. 2

    दोनों ही कहानियाँ प्रभावित करती हैं..आभार

    regards

  3. प्राण जी की दोनों ही कहानियां सुंदर हैं । पहली कहानी ने जियादह प्रभावित किया । वही बात है कि यहां पर अपराधी सिर्फ वही है जिसका अपराध सार्वजनिक हो चुका हो । नहीं तो कुछ फर्क नहीं पड़ता है । दूसरी कहानी अंत में आनंद देती है । प्राण साहब की लेखी का साधुवाद । बहुत दिनों से प्राण साहब की गज़लें तथा आदरण्‍ीय दादा भाई के गीत इस ब्‍लाग पर पढ़ने का आनंद नहीं मिला, कृपया पाठकों की फरमाइश का ध्‍यान रखें ।

  4. अरे मैं तो भूल ही गया था कि कविताओं और ग़ज़लों का ब्‍लाग तो दूसरा है । ये तो कहानियों का ब्‍लाग है ।

  5. 5

    आदरणीय महावीर जी गुरुदेव प्राण शर्मा जी की लेखनी का एक और नायब नमूना पढने का सुअवसर आपने हमें प्रदान किया इसके लिए आप का कोटिश धन्यवाद…प्राण साहब की पहली कहानी जहाँ दूसरों पर उँगलियाँ उठाने वालों को इशरा करती है की वो अपने गिरेबान भी झांकें वहीँ दूसरी कहानी हास्य का अद्भुत पुट लिए हुए है…

    आप दोनों गुरु जनों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.

    नीरज

  6. 6
    वन्दना Says:

    dono hi kahaniyan ek alag sa hi ahsaas karwati huyi.
    pahli kahani ne to aaj ke halat bayan kar diye.
    doosri kahani bhi ek sabak de jati hai………..aankh wale andhe.

  7. 7
    rashmi prabha Says:

    दोनों लघुकथाएं एक अमिट छाप छोड़ जाती है दिल पर……..सामाजिक विसंगति को पहली लघु कथा में बखूबी उभारा है

  8. 8

    आज बहुत दिन बाद आदरणीय प्राण भाई साहिब की कहानी पढने को मिली। पढ कर अभिभूत हूँ। कहानी के लिये किसी घतना का सत्य होना जरूरी नहीं मगर वो सत्य प्रतीत हो यही बात महत्वपूर्ण है। ये आस पास के समाज मे आज क्या हो रहा है ओसे बहुत सुन्दर ढंग से शब्द दिये हैं सही मे जैसे पंकज सुबीर जी ने कहा है अपराधी वही है जिसका अपराध सार्वजनिक हुया है। इस कथ्य को बखूबी निभाया है इस कहानी मे।
    और चश्मदीद गवाह मे भी कैसे आजकल भीख का धन्धा भी एक स्कैन्डल सा हो गया है । हम लोग आँखें होते हुये भी इस इस धन्धे को पहचाने बिना भीख दे रहे हैं। अच्छा सन्देश देती लघु कथा। भाई साहिब की गज़ल हो या कहानी सब मे सामाजिक सरोकार प्रभावोत्पादक होते हैं । उन्हें बहुत बहुत बधाई। मानव मन की संवेदनाओं को शब्द देना कोई भाई साहिब से सीखे।इस ब्लाग के सभी साथिओं को नव वर्ष की शुभकामनायें।

  9. २०१० का आगामी नव वर्ष , खुशहाली लेकर आये यही कामना है
    समस्त परिवार जनों के लिए, मंगल कामना सहित,
    – लावण्या

  10. 10
    तिलक राज कपूर Says:

    न जाने क्‍यूँ पहली कहानी में मैं कुछ विपरीत की अपेक्षा कर रहा था कुछ-कुछ एन्‍टी-क्‍लाईमेक्‍स जैसा; लेकिन प्राण साहब की जितनी भी रचनायें पढ़ीं एक खासियत सभी में रही कि सीधी-सादी बात सीधे-सादे शब्‍दों में भी बयान की जा सकती है। कभी मुलाकात तो नहीं हुई लेकिन दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनमें एक सरल और इन्‍सान है इतनी सादगी और सरलता से अपनी बात कहता है।
    दूसरी कहानी में उन्‍होनें अपनी बात भले ही सीधे और सरल शब्‍दों कह दी लेकिन इस दुनिया में फैले एक विचित्र अंधत्‍व पर गहरा कटाक्ष प्रस्‍तुत किया है।
    बधाई।
    तिलक राज कपूर

  11. 11
    shrddha Says:

    मदन लाल को लहुलुहान करने वालों में कई ऐसे दुष्कर्मी लोग भी थे जिनके हवस की शिकार कई महिलायें हो चुकी थीं.

    bahut sach baat chor bhi mouka milne par khud ko sipaahi samjhna shuru kar deta hai

  12. 12
    shrddha Says:

    hahaha dusri khanai bhi sahi hai
    wo metro mein movie dekhne gaya hai
    aapki dono kahani achchi lagi

  13. 13
    ashok andrey Says:

    priya bhai pran jee aapki dono laghu kathaon ne achchhaa prabhav mun par chhodaa hai pehlee rachnaa ne to aadmee kee giree hue soch ko hee oojagar kiya hai hum kiss hudh tak gir sakte hain yeh ek chintaniya vishaya hai har aadmee ke sammukh aapne ise achchhe dang se prastut kiya hai badhaai

  14. 14
    रूपसिंह चन्देल Says:

    प्राण जी की दोनों लघुकथाएं समय की विद्रूपता को उद्घाटित करती हैं. चोर चोर को पीटने में सबसे आगे रहता है और भिखारी—-अब ठेके पर क्षेत्र उठने लगे हैं.
    सामयिक और उल्लेखनीय लघुकथाएं..

    चन्देल


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