यू.के. से नीरा त्यागी की लघुकथा

अगस्त 3, 2010

कन्वेयर बेल्ट पर उगता माटी का सोना…

नीरा त्यागी

फ्लाईट आये घंटे से ऊपर हो चला था पर उन दोनों का कहीं अता-पता न था… उनके आने की ख़ुशी में उसे ढाई सौ मील के सफ़र का पता न चला, पर अब मंजिल पर पहुँच कर एक-एक मिनट घंटो से कम नहीं… वो उसके घर पहली बार आ रहे थे… पिता को तो एतराज़ ना था किन्तु उनकी सरकारी नौकरी इजाज़त नहीं देती बेटी के घर महीने भर से ज्यादा रह सकें और माँ को उनका बेटी की माँ होना रोकता था.. चलो दोनों आने को तो राज़ी हुए महीने भर को ही सही…. जिन बातों को अब तक वह चिठ्ठी और फोन पर बताती रही है वो खुद देख लेंगे जैसे सूरज का धरती से अक्सर नाराज रहना और बादलों को धरती से हद से ज्यादा प्यार करना… हर मौसम में जमीन के हर कोने में घास का धूल-मिटटी को जकड़े रहना… टायरों की चीख के बीच शमशान की शांति का सड़कों पर पसरे रहना.. बेचारे गीले कपड़ों को धूप नसीब ना होना उनका लांड्री की मशीनों में भभकती भाप में झुलसना… पानी के लोटे का बाथरूम के फर्श को तरसना, लोटे से पानी उड़ेल खुल कर नहाने पर पाबन्दी होना… हवा की नमी को विंड स्क्रीन पर सेलोटेप की तरह चिपक जाना और स्क्रेपर के साथ मिल कर बेहूदा आवाज़ निकालना… गाड़ी का पेट भी उसमें से निकल कर खुद भरना.. अनजान बच्चों का सड़क पर चलते चलते “पाकी” बुला कर अभिनन्दन करना…यदि आप सही और गलत वक्त पर थंकयू और सारी न कह पाए तो प्यार भरी आँखों के तीर के दर्द को अपनी नासमझी समझ कर भूल जाना …

अब उसकी आँखे और कमर दोनों जवाब देने लगे थे … वो सभी यात्री आने बंद हो गए थे जिनके सूटकेस और बैग पर एरो फ्लोट के टैग हों… कहाँ हो सकते हैं टायलेट में भी इतनी देर तो नहीं लग सकती .. इन्क़ुआयिरी पर यह उसका तीसरा चक्कर था … वो फ्लाईट लिस्ट चेक कर के उसे बता चुके हैं उनका नाम लिस्ट में है… उसका संयम टूटने लगा और चिंता बढ़ने लगी थी…

वह समय की गंभीरता को हल्का-फुल्का बनाने और उसके माथे पर चिंता की लकीरों को गालों के गड्ढों में बदलने के लिए अपने होंठों को उसके कानो के नज़दीक ला धीरे से फुसफुसाया…

“वो कहीं रशिया में अपने दूसरे हनीमून के लिए तो नहीं उतर गए…” और ही.. ही करने लगा… उसने घूर कर उसकी ओर देखा… ऐसे अवसरों पर उसका सेंस आफ हयूमर उसे चूंटी की तरह काटता है “बिना उससे कुछ बोले वह इन्क़ुआयिरी की तरफ बढ़ गई…

वह इन्क़ुआयिरी पर गिडगिडा रही है क्या वह बैगेज क्लेम तक जाकर उन्हें देख आये.. अब डेढ़ घंटा हो चला था… वो एक स्कुरिटी स्टाफ के साथ उसे अन्दर भेजने के लिए तैयार हो गए … वह उसके आगे-आगे हो ली… डिपारचर लांज को पार कर साड़ी और पेंट, कमीज़, कोट में दो पहचाने चेहरों को ढूंढने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा, वैसे भी वो अकेले ही थे कन्वेयर बेल्ट के पास … कन्वेयर बेल्ट खाली थी, उनके सूटकेस ट्राली में थे … तभी उसे नजर आया कन्वेयर बेल्ट पर चावल का ढेर उग आया है जैसे ही वह ढेर उनके पास से गुजरता है … चार हाथ बढ़ कर उस ढेर को बेग में उड़ेल रहे हैं और इंतज़ार करते हैं. धरती के घूमने और सफ़ेद ढेर का फिर पास से होकर निकलने का… वह भाग कर पीछे से जाकर दोनों को बाहों भर लेती है वो तीनो एक दूसरे के कंधे भिगोते हैं…नाक से सू…..सू करते हुए मुस्कुराते हैं एक दूसरे को टीशू पास करते हैं माँ उसे ऊपर से नीचे तक देखती है और शिकायत करती है..

“तू ऐसी की ऐसी… ना सावन हरे ना भादों… लगता नहीं आखरी महीना है कभी तो लगे बिटिया …..” तभी सफ़ेद ढेर पास से गुजरता है वह भी हाथ बढ़ाती है … माँ पकड़ कर झिड़क देती है “ऐसी हालत में झुकना ठीक नहीं… तू बस खड़ी रह… बहुत थकी लगती है”..

पिता को कहती है सूटकेस उतार दो बैठने के लिए… वह माँ को क्या समझाए ऐसी हालत में वो यहाँ क्या नहीं करती…
” कहा था न इन्हें सूटकेस में भर लेते हैं” माँ शिकायत के लहजे में बोली..

“अरे! मैंने कौनसा मना किया था” पिता झल्ला कर बोले…

“अब क्या फरक पड़ता है वो बेग में थे या सूटकेस में” वो हमेशा की तरह दोनों के बीच रेफरी बनी
वो दोनों से जिद करती है वहां से चलने की ..

“रहने दो… माँ बहुत अच्छा बासमती चावल मिलता है यहाँ”…

“पर यह देहरादून का बासमती चावल है…”
वह सिक्योरिटी स्टाफ की तरफ देखती है, वो उसकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए सर हिलाते हुए मुड़ जाता है …
वह पहाड़ों के बीच घाटी में खड़ी है, उसके चारों तरफ धान के खेत हैं, वह मुस्कुराते हुए देखती रहती है चार हाथ बड़ी तमन्यता से अपनी माटी का सोना बेग में भर रहे हैं..

उनके हाथों से गुजर अनगिनित सफ़ेद दानों की महक उसके ज़हन में हमेशा के लिए बसने जा रही है…

नीरा त्यागी

भारत से सुभाष नीरव की दो लघुकथाएं

जुलाई 27, 2010

रंग-परिवर्तन
सुभाष नीरव

आखिर मनोहरलाल जी का मंत्री बनने का पुराना सपना साकार हो ही गया। शपथ-समारोह के बाद वह मंत्रालय के सुसज्जित कार्यालय में पहुंचे तो वहाँ उनके प्रशंसकों का ताँता लगा हुआ था। सभी उन्हें बधाई दे रहे थे।
देश-विदेश के प्रतिष्ठित पत्रों के पत्रकार और संवाददाता भी वहां उपस्थित थे। एक संवाददाता ने उनसे पूछा, “मंत्री बनने के बाद आप अपने मंत्रालय में क्या सुधार लाना चाहेंगे?”
उन्होंने तत्काल उत्तर दिया, “सबसे पहले मैं फिजूलखर्ची को तत्काल बंद करूँगा।”
“देश और देश की जनता के बारे में आपको क्या कहना है?”
इस प्रश्न पर वह नेताई मुद्रा में आ गए और धारा-प्रवाह बोलने लगे, “देश में विकास की गति अभी बहुत धीमी है। देश को यदि उन्नति और प्रगति के पथ पर ले-जाना है तो हमें विज्ञान और तकनालोजी का सहारा लेना होगा। तभी हम इक्कीसवीं सदी में पहुँच सकेंगे। इसके लिए देश की जनता को धार्मिक अंधविश्वासों से ऊपर उठाना होगा।”
तभी मंत्रीजी के निजी सहायक ने फोन पर बजर देकर सूचित किया कि उनसे छत्तरगढ़ वाले आत्मानंदजी महाराज मिलना चाहते हैं। मंत्री महोदय ने कमरे में उपस्थित सभी लोगों से क्षमा-याचना की और वे सब कमरे से बाहर चले गए।
महाराज के कमरे में प्रवेश करते ही, मंत्री महोदय आगे बढ़कर उनके चरणस्पर्श करते हुए बोले, “महाराज, मैं तो स्वयं आपसे मिलने को आतुर था। यह सब आपकी कृपा का ही फल है कि आज….”
आशीष की मुद्रा में महाराज ने अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाया और फिर चुपचाप कुर्सी पर बैठ गए। उनकी शांत, गहरी आँखों ने पूरे कमरे का निरीक्षण किया और फिर यकायक वह चीख-से उठे, “बचो, मनोहरलाल, बचो!….इस हरे रंग से बचो। यह हरा तुम्हारी राशि के लिए अशुभ और अहितकारी है।”

मंत्री महोदय का ध्यान कमरे में बिछे हरे रंग के कीमती कालीन, सोफों और खिड़कियों पर लहराते हरे पर्दों की ओर गया। पूरे कमरे में हरीतिमा फैली थी।

“जानते हो, तुम्हारे लिए नीला रंग ही शुभ और हितकारी है।” महाराज ने उन्हें चेताया।
मंत्री महोदय ने निजी सचिव को बुलाकर उससे कुछ बातचीत की और फिर महाराज को साथ लेकर तुरंत अपनी कोठी चले गए।
अब मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मंत्री जी के कमरे से हरे रंग के कालीन,सोफे और पर्दे जो उनके पूर्ववर्ती मंत्री के आदेश पर कुछ दिन पूर्व ही खरीदे गए थे, हटवाकर उनकी जगह नीले रंग के नए कालीन, सोफे और पर्दे मँगवाकर लगवाने में युद्धस्तर पर जुटे थे।

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सफर में
सुभाष नीरव

“अबे, कहाँ घुसा आ रहा है?”सिर से पाँव तक गंदे भिखारीनुमा आदमी से अपने कपड़े बचाता हुआ वह लगभग चीख सा पड़ा। उस आदमी की दशा देखकर मारे घिन्न के मन ही मन वह बुदबुदाया-कैसे डिब्बे में चढ़ बैठा। अगर अर्जेंसी न होती तो कभी भी इस डिब्बे में न चढ़ता, भले ही ट्रेन छूट जाती।

माँ के सीरियस होने का तार उसे तब मिला, जब वह शाम सात बजे आफिस से घर लौटा। अगले दिन, राज्य में बंद के कारण रेलें रद्द कर दी गई थीं, और बसों के चलने की भी उम्मीद नहीं थी। अत: उसने रात की आखिरी गाड़ी पकड़ना ही बेहतर समझा।

एक के बाद एक स्टेशन पीछे छोड़ती ट्रेन आगे बढ़ी जा रही थी। खड़े हुए लोग आहिस्ता-आहिस्ता नीचे फर्श पर बैठने लग गए थे। कई अधलेटे-से भी हो गए थे।

“जाहिल! कैसी गंदी जगह पर लुढ़के पड़े हैं! कपड़ों तक का ख्याल नहीं है।” नीचे फर्श पर फैले पानी और संडास के पास की दुर्गन्ध और गन्दगी के कारण उसे घिन्न आ रही थी. किसी तरह भीड़ में जगह बनाते हुए आगे बढ़कर उसने डिब्बे में अंदर की ओर झांका। अंदर तो और भी बुरा हाल था। असबाब और सवारियों से खचाखच भरे डिब्बे में तिल रखने की जगह नहीं थी।

आगे बढ़ना असंभव देख वह वहीं खड़े रहने की विवश हो गया। उसने घड़ी देखी, साढ़े दस बज रहे थे-रात के। सुबह छह बजे से पहले गाड़ी क्या लगेगी दिल्ली ! रात-भर यहीं खड़े-खड़े यात्रा करनी पड़ेगी-वह सोच रहा था।

ट्रेन अंधकार को चीरती आगे बढ़ती जा रही थी। खड़ी हुई सवारियों में से दो-चार को छोड़कर शेष सभी नीचे फर्श पर बैठ गई थीं और आड़ी-तिरछी होकर सोने का उपक्रम कर रही थीं।

“जाने कैसे नींद आ जाती है इन्हें!” वह फिर बुदबुदाया।

ट्रेन जब अम्बाला से छूटी तो उसकी टाँगों में दर्द होना आरम्भ हो गया था। नीचे का गंदा-गीला फर्श उसे बैठने से रोक रहा था। वह किसी तरह खड़ा रहा और इधर-उधर की बातों को याद कर, समय को गुजारने का प्रयत्न करने लगा।

कुछ ही देर बाद, उसकी पलकें नींद के बोझ से दबने लगीं। वह आहिस्ता-आहिस्ता टाँगों को मोड़कर बैठने को हुआ, लेकिन तभी अपने कपड़ों का ख़याल कर सीधा तनकर खड़ा हो गया। पर खड़े-खड़े झपकियाँ जोर मारने लगीं और देखते-देखते वह भी संडास की दीवार से पीठ टिकाकर गंदे और गीले फर्श पर अधलेटा-सा हो गया।

किसी स्टेशन पर झटके से ट्रेन रूकी तो उसकी नींद टूटी। मिचमिचाती आँखों से उसने देखा-डिब्बे में चढ़ा एक व्यक्ति एक हाथ में ब्रीफकेस उठाए, आड़े-तिरछे लेटे लोगों के बीच से रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा था। उसके समीप पहुँचकर उस व्यक्ति ने उसे यूँ गंदे-गीले फर्श पर अधलेटा-सा देखकर नाक-भौं सिकोड़ी और बुदबुदाता हुआ आगे बढ़ गया,’जाहिल ! गंदगी में कैसे बेपरवाह पसरे पड़े हैं !’

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यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघु कथाएं

जुलाई 19, 2010

दाता दे दरबार विच

प्राण शर्मा

पंडित नरदेव जी नगर के प्रसिद्ध भजन गायक हैं. बहुत व्यस्त रहते हैं. खूब डिमांड है
उनकी. भजन गा गा कर यानि प्रभु का नाम ले लेकर उन्होंने अपना भव्य मकान
खड़ा कर लिया है. महीने में एक दिन वे भजन गायकी का कार्यक्रम अपने घर में भी
रखते हैं. श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है. उनके बड़े कमरे में बैठने को जगह नहीं मिलती है.
एक बार मेरा मित्र मुझे पंडित नरदेव जी के घर ले गया था. उनका कीर्तन चल
रहा था. वे अपनी भजन मंडली के साथ भजन पर भजन गाये जा रहे थे. क्या
सुरीली आवाज़ थी उनकी! सुन-सुन कर श्रद्धालु जन प्रेम भाव से झूम रहे थे और
साथ ही साथ धन की बरखा भी कर रहे थे. धन की बरखा होते देख कर पंडित
नरदेव जी का भजन गाने का उत्साह दुगुना-तिगुना हुआ जा रहा था. हर
भजन की समाप्ति पर वे कहते – श्रद्धालुओ, ऐसी संगत बड़े भाग्य से मिलती है .
वातावरण में भक्ति की उफान लेती धारा को देख कर पंडित नरदेव जी ने अपने
अति लोकप्रिय भजन का सुर अलापा –
‘तन, मन, धन सब वार दे अपने दाता दे दरबार विच’.
धुन बड़ी प्यारी थी, मंत्रमुग्ध कर देने वाली. सुन कर पाषाण ह्रदय भी पिघल गये.
श्रद्धालु जन तन, मन तो नहीं वार पाए लेकिन धन वारने में कोई पीछे नहीं हटा. शायद
ही किसीकी जेब बची थी. देखा देखी मेरी जेब भी नहीं बच पाई.
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आकांक्षा

प्राण शर्मा

“अरी ,क्या हुआ जो वो पैंसठ साल का बूढ़ा खूसट है ! है तो करोड़पति न ! !
एकाध साल में बेचारा लुढ़क जाएगा. उसकी सारी की सारी संपत्ति की तू ही तो – – – तब ऐश और आराम से रहना. इंग्लॅण्ड हो या इंडिया कौन छैल–छबीला करोड़ों कीजायदाद की मालकिन का हाथ मांगने को तैयार नहीं होगा ? देखोगी, तुझसे शादी करने के लिए हजारों लड़के ही भागे आयेंगे .”

तीस साल की आकांक्षा को माँ का सुझाव बुरा नहीं लगा.
दूसरे दिन ही अग्नि के सात फेरों के बाद वो बूढ़े खूसट की अर्धांगिनी बन गयी.
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भारत से रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की दो लघुकथाएं

जुलाई 12, 2010

पागल
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कई सौ लोगों का हुजूम। लाठी, भाले और गंडासों से लैस। गली–मुहल्लों में आग लगी हुई है। कुछ घरों से अब सिर्फ धुआँ उठ रहा है। लाशों के जलने से भयावह दुर्गन्ध वातावरण में फैल रही है। भीड़ उत्तेजक नारे लगाती हुई आगे बढ़ी।
नुक्कड़ पर एक पागल बैठा था। उसे देखकर भीड़ में से एक युवक निकला–‘‘मारो इस हरामी को।’’ और उसने भाला पागल की तरफ उठाया।
भीड़ की अगुआई करने वाले पहलवान ने टोका–‘‘अरे–रे इसे मत मार देना। यह तो वही पागल है जो कभी–कभी मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठा रहता है।’’ युवक रुक गया तथा बिना कुछ कहे उसी भीड़ में खो गया।
कुछ ही देर बाद दूसरा दल आ धमका। कुछ लोग हाथ में नंगी तलवारें लिए हुए थे, कुछ लोग डण्डे। आसपास से ‘बचाओ–बचाओ’ की चीत्कारें डर पैदा कर रही थीं। आगे–आगे चलने वाले युवक ने कहा–‘‘अरे महेश, इसे ऊपर पहुंचा दो।’’
पागल खिलखिलाकर हंस पड़ा। महेश ने ऊँचे स्वर में कहा–‘‘इसे छोड़ दीजिए दादा। यह तो वही पागल है जो कभी–कभार लक्ष्मी मन्दिर के सामने बैठा रहता है।’’
दंगाइयों की भीड़ बढ़ गई। पागल पुन: खिलखिलाकर हंस पड़ा।
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अपने–अपने सन्दर्भ
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

इस भयंकर ठंड में भी वेद बाबू दूध वाले के यहाँ मुझसे पहले बैठे मिले। मंकी कैप से झाँकते उनके चेहरे पर हर दिन की तरह धूप–सी मुस्कान बिखरी थी।
लौटते समय वेदबाबू को सीने में दर्द महसूस होने लगा। वे मेरे कंधे, पर हाथ मारकर बोले–‘‘जानते हो, यह कैसा दर्द है?’’मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मद्धिम स्वर में बोले–‘‘यह दर्दे–दिल है। यह दर्द या तो मुझ जैसे बूढ़ों को होता है या तुम जैसे जवानों को।’’
मैं मुस्करा दिया।
धीरे–धीरे उनका दर्द बढ़ने लगा।
‘‘मैं आपको घर तक पहुँचा देता हूँ।’’ मोड़ पर पहुँचकर मैंने आग्रह किया–‘‘आज आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही है।’’
‘‘तुम क्यों तकलीफ करते हो? मैं चला जाऊँगा। मेरे साथ तुम कहाँ तक चलोगे? अपने वारण्ट पर चित्रगुप्त के साइन होने भर की देर है।’’ वेद बाबू ने हंसकर मुझको रोकना चाहा।
मेरा हाथ पकड़कर आते हुए वेदबाबू को देखकर उनकी पत्नी चौंकी–‘‘लगता है आपकी तबियत और अधिक बिगड़ गई है? मैंने दूध लाने के लिए रोका था न?’’
‘‘मुझे कुछ नहीं हुआ। यह वर्मा जिद कर बैठा कि बच्चों की तरह मेरा हाथ पकड़कर चलो। मैंने इनकी बात मान ली।’’ वे हँसे
उनकी पत्नी ने आगे बढ़कर उन्हें ईज़ी चेयर पर बिठा दिया। दवाई देते हुए आहत स्वर मे कहा–‘‘रात–रात–भर बेटों के बारे में सोचते रहते हो। जब कोई बेटा हमको पास ही नहीं रखना चाहता तो हम क्या करें। जान दे दें ऐसी औलाद के लिए। कहते हैं–मकान छोटा है। आप लोगों को दिक्कत होगी। दिल्ली में ढंग के मकान बिना मोटी रकम दिए किराए पर मिलते ही नहीं।’’
वेदबाबू ने चुप रहने का संकेत किया–‘‘उन्हें क्यों दोष देती हो भागवान! थोड़ी–सी साँसें रह गई हैं, किसी तरह पूरी हो ही जाएगी–’’ कहते–कहते हठात् दो आँसू उनकी बरौनियों में आकर उलझ गए।
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भारत से सुधा अरोड़ा की लघु कथा

जून 30, 2010

डर
सुधा अरोड़ा

दुपहर की फुरसती धूप में शेल्फ पर मुस्कुराती किताबें थीं.
करीने से सजी किताबों में से एक नयी सी दिखती किताब को उसकी उँगलियों ने हल्के से बाहर सरका लिया. उसे उलट – पलट कर देखा. यह एक रूमानी उपन्यास था. कवर पर एक आकर्षक तस्वीर थी.

उसने कुछ पन्नों पर एक उड़ती सी निगाह डाली. फिर पहले पन्ने पर उसकी निगाह थम गई . किताब  के पहले पन्ने पर दायीं ओर ऊपर से चिपकाई हुई थी.
अब वहां किताब की जगह सिर्फ एक चिप्पी थी.
उसके नाखून भोथरे थे. फिर भी चिप्पी का एक कोना नरम होकर खुला.
उसकी उंगलियाँ अब कौशल में ड़ूब गई. उसे सिर्फ चिप्पी निकालनी थी. किताब का पन्ना खराब किये बिना.
“कोई फायदा नहीं , छोड़ दे” , उसने अपनी उँगलियों से कहा, “इस चिप्पी को हटाने के बाद भी इसके निशान किताब पर रह जाएंगे.”
पर उँगलियों ने सुना नहीं. वे अपने काम में दक्षता से तल्लीन रहीं. तब तक जब तक वह चिप्पी उखड़ नहीं गई.
उसकी मुस्कुराहट फैलने से पहले ही सिमट गई. चिप्पी के साथ किताब का थोड़ा सा कागज़ भी लितढ़ गया था. उस पर लिखा नाम आधा रगड़ खाए किताब पन्ने और आधा चिप्पी पर था.
वह अपनी सोच से लौट आई थी. उसने चिप्पी को कांपते हाथों से दुलारा, सीधा किया, हथेली पर रखा और आईने के सामने जा खड़ी हुई. आईने में नाम सीधा हो गया था.
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एक जादुई ताला जैसे खुला. वह सर थाम कर बैठ गई. वह इस नाम से परिचित थी. यह उसके पति की प्रेमिका का नाम था.

फिर ताकत लगाकर उठी. उसने अपनी उँगलियों को कोसा. क्यों वे कोई न कोई खुराफात करती रहना चाहती है?  क्यों?

उसके कानों में एक रूआबदार आवाज़ बजी, वह थरथराने लगी.

उस चिप्पी के पीछे गोंद लगा कर उसे फिर से चिपकाना चाहा. पर कागज़ उँगलियों के निरंतर प्रहार से छीज गया था. वह गीली छाप छोड़ रहा था.

उसने खुली किताब को धूप में रखा और बदहवास सी सारा घर ढूँढती फिरी, वैसी ही चिप्पी के लिए. मेज, दराज, शेल्फ. डिब्बे, फाइलें, लिफ़ाफ़े, अलमारियां, टी.वी. के ऊपर, किताबों के बीच. वह छपे हुए डाक के नीचे का अनछपा कागज था.

आखिर मिला वह – पुरानी डायरी में रखे डाक टिकट के साथ.

उसने उसी साइज़ की चिप्पी फाड़ी, वैसा ही उल्टा नाम लिखा. उसे एहतियात से चिपकाया. फिर उंगली को ज़रा मैला कर उस पर फिरा दिया.

उस चिप्पी को कई कोणों से उसने देखा.

अब उसने राहत की सांस ली. सब ठीक था.
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उसने इत्मीनान से किताब को शेल्फ पर मुस्कुराती दूसरी किताबों के साथ पहले की तरह टिका दिया और दुपहर की फुर्सत ओढ़कर लेट गई.
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अमेरिका से देवी नागरानी की दो लघुकथाएं

जून 23, 2010

कड़वा सच

देवी नागरानी

सोच के सैलाब में डूबा रामू पेड़ के नीचे बुझी हुई बीड़ी को जलाने की कोशिश में खुद ठिठुर रहा था. दरवाज़े की चौखट पर घुटनों के बल बैठा अपनी पुरानी फटी कम्बल से खुद को ठिठुरते जाड़े से बचाने की कोशिश में जूझ रहा था, पर कम्बल के छोटे-बड़े झरोखे उनकी जर्जर हालत बयान करने से नहीं चूके.

“रामू यहाँ ठंडी में क्यों बैठे हो? अंदर घर में जाओ” गली के नुक्कड़ से गुज़रते हुए देखा तो उसके पास चला गया. रामू मेरे ऑफिस का चपरासी है.

“साहब अंदर बेटे-बेटी के दोस्त आये हुए हैं. गाना-बजाना शोर-शराबा मचा हुआ है. सब झूम-गा रहे हैं. इसलिए मैं बाहर….” कहकर उसने ठंडी सांस ली.

“तुम्हारी उम्र की उन्हें कोई फ़िक्र नहीं, रात के बारह बज रहे हैं और यह बर्फीली ठण्ड!”

“साहब दर्द की आंच मुझे कुछ होने नहीं देती अब तो आदत सी पड़ गयी है. पत्नी के गुज़र जाने के बाद बच्चे बड़े होकर आज़ाद भी हो गए हैं, बस गुलामी की सारी बेड़ियाँ उन्होंने मुझे पहना दी है. कहाँ जाऊं साहब?” कहकर वह बच्चों की तरह बिलख पड़ा.

मैंने उसका कंधा थपथपाते हुए निशब्द राहत देने का असफल प्रयास किया और सोच में डूबा था की अगर मैं उस हालत में होता तो !

“क्या उन्हें बिलकुल परवाह नहीं होती कि तुम उनके बाप हो? क्या कुछ नहीं किया तुमने और तुम्हारी पत्नी ने उन्हें बड़ा करने के लिए?”

” वो बीती बातें हैं साहब, ‘आज’ मस्त जवानी का दौर है, उनकी मांगें और ज़रूरतें मैं पूरी नहीं कर पाता, उनकी पगारें कर देती हैं. पैसा ही उनका माई-बाप है.”

“तो इसका मतलब हुआ, संसार बसाकर, बच्चों कि पैदाइश से उनके बड़े होने तक का परिश्रम, जिसे हम ‘ममता’ कहते हैं कोई माइने नहीं रखता?”

“नहीं मालिक! मैं ऐसा नहीं सोचता. दुनिया का चलन है, चक्र चलता रहता है और इन्हीं संघर्षों के तजुर्बात से जीवन को परिपूर्णता मिलती है. जीवन के हर दौर का ज़ायका अलग-अलग होता है. जो मीठा है उसे ख़ुशी से पी लेते हैं, जो कड़वा है उसे निग़ल तक नहीं सकते. बीते और आने वाले पलों का समय ही समाधान ले आता है. काल-चक्र चलता रहता है, बीते हुए कल की जगह ‘आज’ लेता है और आज का स्थान ‘कल’ लेगा. यही परम सत्य है और कड़वा सच भी.

देवी नागरानी

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दाव पर द्रोपदी

देवी नागरानी

कहते हैं चोर चोरी से जाए पर हेरा फेरी से न जाए. अनील भी कितने वादे करता, किए हुए वादे तोड़ता और जुआ घर पहुँच जाता, अपनी खोटी किस्मत को फिर फिर आज़माता. बस हार पर हार उसके हौसले को मात करती रही.

एक दिन अपनी पत्नी को राज़दार बनाकर उसके सामने अपनी करतूतों का चिट्ठा खोलकर रखते हुए कहाँ- “अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है जो मैं दाव पर लगा सकूँ. क्या करूँ? क्या न करूँ, समझ में नहीं आता. कभी तो लगता है खुद को ही दाव पर रख दूँ.”

पत्नी समझदार और सलीकेदार थी, झट से बोली- “ आप तो खोटे सिक्के की तरह हो, वो जुआ की बाज़ार में कॅश हो नहीं सकता ? अगर आपका ज़मीर आपको इज़ाज़त देता है तो, आप मुझे ही दाव पर लगा दीजिए. इस बहाने आपके किसी काम तो आऊंगी.”

अनील सुनकर शर्म से पानी पानी हो गया. और इस तरह के कटाक्ष के वार से खुद को बचा न पाया. हाँ, एक बात हुई. ज़िंदगी की राह पर सब कुछ हार जाने के बाद भी, जो कुछ बचा था उसे दाव पर हार जाने से बच गया.

देवी नागरानी

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भारत से सुभाष नीरव की दो लघु कथाएं

जून 15, 2010

लेखक परिचय
हिंदी कथाकार/कवि सुभाष नीरव लगभग पिछले 35 वर्षों से कहानी, लघुकथा, कविता और अनुवाद विधा में सक्रिय हैं। अब तक तीन कहानी-संग्रह ”दैत्य तथा अन्य कहानियाँ (1990)”, ”औरत होने का गुनाह (2003)” और ”आखिरी पड़ाव का दु:ख(2007)” प्रकाशित। इसके अतिरिक्त, दो कविता-संग्रह ”यत्किंचित (1979)” और ”रोशनी की लकीर (2003)”, एक बाल कहानी-संग्रह ”मेहनत की रोटी (2004)”, एक लधुकथा संग्रह ”कथाबिन्दु”(रूपसिंह चंदेह और हीरालाल नागर के साथ) भी प्रकाशित हो चुके हैं। अनेकों कहानियाँ, लधुकथाएँ और कविताएँ पंजाबी, तेलगू, मलयालम और बांगला भाषा में अनूदित हो चुकी हैं।
हिंदी में मौलिक लेखन के साथ-साथ पिछले तीन दशकों से अपनी माँ-बोली पंजाबी भाषा की सेवा मुख्यत: अनुवाद के माध्यम से करते आ रहे हैं। अब तक पंजाबी से हिंदी में अनूदित डेढ़ दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ”काला दौर”, ”पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं”, ”कथा पंजाब-2”, ”कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ”, ”तुम नहीं समझ सकते”(जिन्दर का कहानी संग्रह)”, ”छांग्या रुक्ख” (पंजाबी के दलित युवा कवि व लेखक बलबीर माधोपुरी की आत्मकथा), पाये से बंधा हुआ काल(जतिंदर सिंह हांस का कहानी संग्रह), रेत (हरजीत अटवाल का उपन्यास) आदि प्रमुख हैं। मूल पंजाबी में लिखी दर्जन भर कहानियों का आकाशवाणी, दिल्ली से प्रसारण।
हिंदी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ, पंजाबी-हिंदी लधुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद हेतु ”माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार 1992” तथा ”मंच पुरस्कार, 2000” से सम्मानित।
सम्प्रति : भारत सरकार के पोत परिवहन विभाग में अनुभाग अधिकारी(प्रशासन)
सम्पर्क : 372, टाईप-4, लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली-110023
ई मेल : subhneerav@gmail.com
दूरभाष : 09810534373, 011-24104912(निवास)

एक और कस्बा
सुभाष नीरव

देहतोड़ मेहनत के बाद, रात की नींद से सुबह जब रहमत मियां की आँख खुली तो उनका मन पूरे मूड में था। छुट्टी का दिन था और कल ही उन्हें पगार मिली थी। सो, आज वे पूरा दिन घर में रहकर आराम फरमाना और परिवार के साथ बैठकर कुछ उम्दा खाना खाना चाहते थे। उन्होंने बेगम को अपनी इस ख्वाहिश से रू-ब-रू करवाया। तय हुआ कि घर में आज गोश्त पकाया जाए। रहमत मियां का मूड अभी बिस्तर छोड़ने का न था, लिहाजा गोश्त लाने के लिए अपने बेटे सुक्खन को बाजार भेजना मुनासिब समझा और खुद चादर ओढ़कर फिर लेट गये।

सुक्खन थैला और पैसे लेकर जब बाजार पहुँचा, सुबह के दस बज रहे थे। कस्बे की गलियों-बाजारों में चहल-पहल थी। गोश्त लेकर जब सुक्खन लौट रहा था, उसकी नज़र ऊपर आकाश में तैरती एक कटी पतंग पर पड़ी। पीछे-पीछे, लग्गी और बांस लिये लौंडों की भीड़ शोर मचाती भागती आ रही थी। ज़मीन की ओर आते-आते पतंग ठीक सुक्खन के सिर के ऊपर चक्कर काटने लगी। उसने उछलकर उसे पकड़ने की कोशिश की, पर नाकामयाब रहा। देखते ही देखते, पतंग आगे बढ़ गयी और कलाबाजियाँ खाती हुई मंदिर की बाहरी दीवार पर जा अटकी। सुक्खन दीवार के बहुत नज़दीक था। उसने हाथ में पकड़ा थैला वहीं सीढ़ियों पर पटका और फुर्ती से दीवार पर चढ़ गया। पतंग की डोर हाथ में आते ही जाने कहाँ से उसमें गज़ब की फुर्ती आयी कि वह लौंडों की भीड़ को चीरता हुआ-सा बहुत दूर निकल गया, चेहरे पर विजय-भाव लिये !

काफी देर बाद, जब उसे अपने थैले का ख़याल आया तो वह मंदिर की ओर भागा। वहाँ पर कुहराम मचा था। लोगों की भीड़ लगी थी। पंडित जी चीख-चिल्ला रहे थे। गोश्त की बोटियाँ मंदिर की सीढ़ियों पर बिखरी पड़ी थीं। उन्हें हथियाने के लिए आसपास के आवारा कुत्ते अपनी-अपनी ताकत के अनुरूप एक-दूसरे से उलझ रहे थे।

सुक्खन आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सका। घर लौटने पर गोश्त का यह हश्र हुआ जानकर यकीनन उसे मार पड़ती। लेकिन वहाँ खड़े रहने का खौफ भी उसे भीतर तक थर्रा गया- कहीं किसी ने उसे गोश्त का थैला मंदिर की सीढ़ियों पर पटकते देख न लिया हो ! सुक्खन ने घर में ही पनाह लेना बेहतर समझा। गलियों-बाजारों में से होता हुआ जब वह अपने घर की ओर तेजी से बढ़ रहा था, उसने देखा- हर तरफ अफरा-तफरी सी मची थी, दुकानों के शटर फटाफट गिरने लगे थे, लोग बाग इस तरह भाग रहे थे मानो कस्बे में कोई खूंखार दैत्य घुस आया हो!

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चोर

सुभाष नीरव

मि. नायर ने जल्दी से पैग अपने गले से नीचे उतारा और खाली गिलास मेज पर रख बैठक में आ गये।

सोफे पर बैठा व्यक्ति उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ।

”रामदीन तुम ? यहाँ क्या करने आये हो ?” मि. नायर उसे देखते ही क्रोधित हो उठे।

”साहब, मुझे माफ कर दो, गलती हो गयी साहब… मुझे बचा लो साहब… मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं… मैं बरबाद हो जाऊँगा साहब।” रामदीन गिड़गिड़ाने लगा।

”मुझे यह सब पसन्द नहीं है। तुम जाओ।” मि. नायर सोफे में धंस-से गये और सिगरेट सुलगाकर धुआँ छोड़ते हुए बोले, ”तुम्हारे केस में मैं कुछ नहीं कर सकता। सुबूत तुम्हारे खिलाफ हैं। तुम आफिस का सामान चुराकर बाहर बेचते रहे, सरकार की आँखों में धूल झोंकते रहे। तुम्हें कोई नहीं बचा सकता।”

”ऐसा मत कहिये साहब… आपके हाथ में सब कुछ है।” रामदीन फिर गिड़गिड़ाने लगा, ”आप ही बचा सकते हैं साहब, यकीन दिलाता हूँ, अब ऐसी गलती कभी नहीं करुँगा, मैं बरबाद हो जाऊँगा साहब… मुझे बचा लीजिए… मैं आपके पाँव पड़ता हूँ, सर।” कहते-कहते रामदीन मि. नायर के पैरों में लेट गया।

”अरे-अरे, क्या करते हो। ठीक से वहाँ बैठो।”

रामदीन को साहब का स्वर कुछ नरम प्रतीत हुआ। वह उठकर उनके सामने वाले सोफे पर सिर झुकाकर बैठ गया।

”यह काम तुम कब से कर रहे थे ?”

”साहब, कसम खाकर कहता हूँ, पहली बार किया और पकड़ा गया। बच्चों के स्कूल की फीस देनी थी, पैसे नहीं थे। बच्चों का नाम कट जाने के डर से मुझसे यह गलत काम हो गया।”

इस बीच मि. नायर के दोनों बच्चे दौड़ते हुए आये और एक रजिस्टर उनके आगे बढ़ाते हुए बोले, ”पापा पापा, ये सम ऐसे ही होगा न ?” मि. नायर का चेहरा एकदम तमतमा उठा। दोनों बच्चों को थप्पड़ लगाकर लगभग चीख उठे, ”जाओ अपने कमरे में बैठकर पढ़ो। देखते नहीं, किसी से बात कर रहे हैं, नानसेंस !”

बच्चे रुआँसे होकर तुरन्त अपने कमरे में लौट गये।

”रामदीन, तुम अब जाओ। दफ्तर में मिलना।” कहकर मि. नायर उठ खड़े हुए। रामदीन के चले जाने के बाद मि. नायर बच्चों के कमरे में गये और उन्हें डाँटने-फटकारने लगे। मिसेज नायर भी वहाँ आ गयीं। बोलीं, ”ये अचानक बच्चों के पीछे क्यों पड़ गये ? सवाल पूछने ही तो गये थे।”

”और वह भी यह रजिस्टर उठाये, आफिस के उस आदमी के सामने जो…” कहते-कहते वह रुक गये। मिसेज नायर ने रजिस्टर पर दृष्टि डाली और मुस्कराकर कहा, ”मैं अभी इस रजिस्टर पर जिल्द चढ़ा देती हूँ।”

मि. नायर अपने कमरे में गये। टी.वी. पर समाचार आ रहे थे। देश में करोड़ों रुपये के घोटाले से संबंधित समाचार पढ़ा जा रहा था। मि. नायर ने एक लार्ज पैग बनाया, एक सांस में गटका और मुँह बनाते हुए रिमोट लेकर चैनल बदलने लगे।

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यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

जून 8, 2010

‘राज़ ‘

- प्राण शर्मा

धर्मपाल ने टेलिफ़ोन का चोगा उठाकर सतपाल का फ़ोन नंबर मिलाया.फ़ोन की लाइन अंगेज थी.” पता नहीं कि लोग फोन पर क्या- क्या बातें करते हैं? घंटों ही लगा देते हैं.किसी और को बातकरने का मौक़ा ही नहीं देते  हैं.” खीझ कर उसने फोन पर चोगा पटक दिया.

कमरे में इधर-उधर चक्कर लगा कर धर्मपाल ने फिर सतपाल को फोन किया.दूसरी ओर से फ़ोन की घंटी बजी.धर्मपाल के चेहरे पर सब्र का प्याला छलका.

” कौन ? “दूसरी और से सतपाल की आवाज़ थी.

” मैं धर्मपाल  बोल रहा हूँ. सतपाल, तुम बड़े अजीब किस्म के आदमी हो. एक राज़ को तुमने कुछ ही दिनों  में  यारों-दोस्तों में उगल दिया. क्या उसे तुम अपने दिल में नहीं रख सकते थे ? “

” किस राज़ को उगल दिया मैंने ?

” वही यशपाल का राज़ कि वो किसी और ब्याही औरत से छिप- छिप कर इश्क लड़ाता है.अभी-अभी वो मुझसे लड़ कर गया है. बहुत गुस्से में था.”

” भाई, तुमने तो मुझे यशपाल का राज़ बताया ही नहीं था. राज़ तो योगराज और सुधीर ने मुझे बताया था.धर्मपाल , पकड़ना है तो उन्हें पकड़ो.” सतपाल ने फ़ोन के बेस  पर चोगा रख दिया.

धर्मपाल ने फ़ोन पर योगराज को पकड़ा ” योगराज , तुमने ये हंगामा क्या बरपा कर दिया है?”

” कैसा हंगामा,भाई.समझा नहीं.” योगराज ने हैरानगी ज़ाहिर की.

” क्या तुम एक राज़ को अपने दिल में नहीं रख सकते थे?”

” किस राज़ को ? जरा खोल कर बात करो.

” वही यशपाल वाला राज़ कि वो छिप-छिप कर किसी ब्याही औरत से रंगरलियाँ मनाता है.उसका राज़ तुमने सतपाल को खोल दिया और उसने कई यारों-दोस्तों  को.मुझे तुमसे ये आशा कतई नहीं थी.”

” देखो धर्मपाल, तुम मुगालते में हो. तुमने तो ये राज़ मुझसे कहा ही नहीं तो खफा क्यों होते हो ? राज़ तो मुझे सुधीर ने बताया था. पकड़ना है तो उसे पकड़ो.”

योगराज ने भी फ़ोन के बेस पर चोगा पटक दिया.

धर्मपाल को याद आया कि राज़ उसने सुधीर को ही  बताया था. उसने उसको पकड़ना मुनासिब समझा. फ़ोन लगने पर सुधीर की पत्नी बोली – ” कौन ?

” भाभी जी, मैं धर्मपाल बोल रहा हूँ. क्या सुधीर घर में है? “

” जी, नहीं. कुछ मेहमान आने वाले हैं. उनके लिए मीठा – नमकीन लेने गये हैं.आने वाले ही हैं.आप कुछ देर के बाद फ़ोन कर लीजिये .ठहरिये, वो आ गये हैं. लीजिये, उनसे बात कीजिये.”

”  सुधीर.”

” बोल रहा हूँ , धर्मपाल.”

” तुम अच्छे हमराज़ निकले हो ! एक राज़ को तुम अपने पेट के किसी कोने में दबा कर नहीं रख सके.”

” कौन सा राज़, मेरे यार ?”

” वही यशपाल का किसी ब्याही औरत से लुक-लुक  कर मिलने वाला राज़.”

” अरे यार, इसे तुम राज़ कहते हो ?  इश्क-विश्क के चक्कर को तुम राज़ समझते हो .ये रोग भी कहीं छिपाने से छिपता  हैं? देखो, धर्मपाल, तुमने मुझसे यशपाल का राज़ बताया. बताया न ?

” बताया.”

” राज़ था तो उसे राज़ ही रहने देते.- – – मैं गलत तो नहीं कह रहा हूँ ? – – – – चुप क्यों हो गये हो ?  – – – – बोलो न?”

धर्मपाल को दूसरी ओर से टेलिफ़ोन के बेस पर चोगा रखने की आवाज़ सुनायी दी.

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सुरक्षाकर्मी

- प्राण शर्मा

रामस्वरूप और राजनारायण कई सालों से पुलिस विभाग में काम कर रहें हैं. उनके काम को सराहते हुए विभाग ने उन्हें उद्योगपति पी.के.धर्मा की सुरक्षा में तैनात कर दिया.

पी.के. धर्मा वही उद्योगपति हैं जो हर साल देश की प्रमुख पार्टी को एक करोड़ रुपयों की धनराशि चन्दा के रूप में देते हैं. गत मास किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन पर गोली चला कर हमला किया था. गोली उनके सर के दस-ग्यारह मीटर ऊपर होकर निकल गयी थी. उनको कोई जानी नुक्सान नहीं हुआ था.

मीडिया ने उक्त घटना को पी.के. धर्मा का स्टंट बताया. सरकार  ने इसकी छानबीन करवाई. छानबीन पर लाखों रूपए खर्च हुए. जल्द ही एक सौ पृष्ठों की रिपोर्ट छपी. रिपोर्ट का सारांश था – ” चूँकि पी.के. धर्मा सैंकड़ों संस्थाओं को चन्दा देते हैं इसलिए वे कई ईर्ष्यालु संस्थाओं की हिटलिस्ट में हैं. वे सरकारी सुरक्षा व्यवस्था के पूरे हक़दार हैं.”

पी.के. धर्मा की सुरक्षा में तैनात रामस्वरूप और राजनारायण को तीन महीने भी नहीं बीते थे कि उन्हें और उनके परिवार को जान से मार देने के धमकी भरे पत्र और फ़ोन आने लगते हैं. हिम्मती हैं इसलिए कुछ दिनों तक दोनो ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन रोज़ – रोज़ के धमकी भरे पत्रों और फ़ोनों से वे घबरा जाते हैं. अपनी चिंता कम और परिवार वालों की चिंता उन्हें ज्यादा है. अपनी और अपने परिवार वालों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए उन्होंने पूरा विवरण अपने विभाग को भेज दिया.

विभाग ने उनकी दरखास्त को नामंजूर कर दिया. जवाब में लिखा था – ” आप सुरक्षाकर्मी हैं. आपको सुरक्षा की क्या आवश्यकता है ? “

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कनाडा से विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय “उड़नतश्तरी” हिंदी ब्लॉग के समीर लाल “समीर” की दो लघुकथाएं

जून 2, 2010

समीर लाल का जन्म २९ जुलाई, १९६३ को रतलाम म.प्र. में हुआ. विश्व विद्यालय तक की शिक्षा जबलपुर म.प्र से प्राप्त कर आप ४ साल बम्बई में रहे और चार्टड एकाउन्टेन्ट बन कर पुनः जबलपुर में १९९९ तक प्रेक्टिस की. सन १९९९ में आप कनाडा आ गये और अब वहीं टोरंटो नामक शहर में निवास करते है. आप कनाडा की सबसे बड़ी बैक के लिए तकनिकी सलाहकार हैं एवं पेशे के अतिरिक्त साहित्य के पठन और लेखन की ओर रुझान है. सन २००५ से नियमित लिख रहे हैं. आप कविता, गज़ल, व्यंग्य, कहानी, लघु कथा आदि अनेकों विधाओं में दखल रखते हैं एवं कवि सम्मेलनों के मंच का एक जाना पहचाना नाम हैं. भारत के अलावा कनाडा में टोरंटो, मांट्रियल, ऑटवा और अमेरीका में बफेलो, वाशिंग्टन और आस्टीन शहरों में मंच से कई बार अपनी प्रस्तुति देख चुके हैं.
आपका ब्लॉग
“उड़नतश्तरी” हिन्दी ब्लॉगजगत का विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय नाम है एवं आपके प्रशांसकों की संख्या का अनुमान मात्र उनके ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को देखकर लगाया जा सकता है.
आपका लोकप्रिय काव्य संग्रह ‘बिखरे मोती’ वर्ष २००९ में शिवना प्रकाशन, सिहोर के द्वारा प्रकाशित किया गया. अगला कथा संग्रह ‘द साईड मिरर’ (हिन्दी कथाओं का संग्रह) प्रकाशन में है और शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है.
सम्मान: आपको सन २००६ में तरकश सम्मान, सर्वश्रेष्ट उदीयमान ब्लॉगर, इन्डी ब्लॉगर सम्मान, विश्व का सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी ब्लॉग, वाशिंगटन हिन्दी समिती द्वारा साहित्य गौरव सम्मान सन २००९ एवं अनेकों सम्मानों से नवाजा जा चुका है.
समीर लाल का ईमेल पता है:
sameer.lal@gmail.com

अंतिम फैसला

सामने टीवी पर लॉफ्टर चैलेंज आ रहा है. वो सोफे पर बैठा है और नजरें एकटक टी वी को घूर रही हैं, लेकिन वो टीवी का प्रोग्राम देख नहीं रहा है.

उसके कान से दो हाथ दूर रेडियो पर गाना बज रहा है

‘जिन्दगी कितनी खूबसूरत हैssssss!’

साथ में पत्नी गुनगुनाते हुए खाना बना रही है. उसके कान में न रेडियो का स्वर और न ही पत्नी की गुनगुनाहट, दोनों ही नहीं जा रही हैं.

एकाएक वो सोफे से उठता है और अपने कमरे में चला जाता है.

रेडियो पर अब समाचार आ रहे हैं: ’न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेन्ज ७०० पाईंट गिरा’

कमरे से गोली चलने की आवाज आती है.

पत्नी कमरे की तरफ भागती है. उसका शरीर खून से लथपथ जमीन पर पड़ा है, उसने खुद को गोली मार ली.

रेडियो पर समाचार जारी हैं कि ७०० पाईंट की गिरावट मानवीय भूलवश हुई है अतः उस बीच हुई सभी ट्रेड रद्द की जाती है.

वो मर चुका है.

-समीर लाल ‘समीर’

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कर्ज चुकता हुआ??

इकलौता बेटा है.

हाल ही बी ई पूरी कर ली. मास्टर माँ बाप की आँख का तारा, उनका सपना. एक शिक्षक को और क्या चाहिये, बेटा पढ़ लिख कर इन्जिनियर बन गया.

विदेश जाकर आगे पढ़ने की इच्छा है.

शिक्षक का काम ही शिक्षा का प्रसार है, वो भला कब शिक्षा की राह में रोड़ा बन सकता है वो भी तब, जब उसका इकलौता बेटा उनका नाम रोशन करने और उनके सपने पूरे करने के लिए माँ बाप से बिछोह का गम झेलते हुए अकेला अपनी मातृ भूमि से दूर अनजान देश में जा संघर्ष करने को तैयार हो.

बैंक से एक मात्र जमा पूँजी, अपना मकान गिरवी रख, लोन लेकर मास्साब ने बेटे को आशीषों के साथ विदेश रवाना किया.

दो बरस में बेटा कमाने लायक होकर, मुश्किल से साल भर में कर्ज अदा कर देगा फिर मास्साब की और उनकी पत्नी की जिन्दगी ठाट से कटेगी. फिर वो ट्यूशन नहीं पढ़ायेंगे. बस, मन पसंद की किताबें पढ़ेंगे और साहित्य सृजन करेंगे.

अब चौथा बरस है. बेटे ने एक गोरी से वहीं विदेश में शादी कर ली है. उससे एक बेटा भी है. भारत की बेकवर्डनेस बहु और पोते दोनों के आने के लिए उचित नहीं . इसके चलते बेटा भारत आ नहीं सकता और वहाँ विदेश में घर में माँ बाप के लिए जगह नहीं और न ही कोई देखने वाला.

नई फैमली है, खर्चे बहुत लगे हैं. फोन पर भी बात करना मंहगा लगता है अतः लोन वापस करने की अभी स्थितियाँ नहीं है और न ही निकट भविष्य में कोई संभावना है. बेटे और उसकी पत्नी को बार बार का तकादा पसंद नहीं अन्यथा भी अनेक टेंशन है, जो भारतीय माँ बाप समझते नहीं,  अतः इस बारे में बात न करने का तकादा वो माँ को फोन पर दे चुका है वरना उसे मजबूर होकर फोन पर बात करना बंद करना होगा. माँ ने पिता जी को समझा दिया है और पिता ने समझ भी लिया है.

आज रिटायर्ड मास्साब ने अपने ट्यूशन वाले बच्चों को नये घर का पता दिया. कल वो उस किराये के घर में शिफ्ट हो जायेंगे.

जाने कौन सा और किसका कर्ज चुकता हुआ. कम से कम बैंक का तो हो ही गया.

साहित्य सृजन की आशा इतिहास के पन्ने चमका रही है.

इतिहास भी तो साहित्य का ही हिस्सा है!!

उसकी चमक बरकरार रखने का श्रेय तो मिलना ही चाहिये!!

-समीर लाल ‘समीर’

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आयरलैंड (यू.के.) से दीपक चौरासिया “मशाल” की दो लघुकथाएं

मई 25, 2010

दीपक चौरसिया ‘मशाल’
२४ सितम्बर सन् १९८० को उत्तर प्रदेश के उरई जिले में जन्मे दीपक चौरसिया ‘मशाल’ की प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के ही कोंच नामक स्थान पर हुई. बाद में आपने जैव-प्रौद्योगिकी में परास्नातक तक शिक्षा अध्ययन किया और वर्तमान में आप उत्तरी आयरलैंड (यू.के.) के क्वींस विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. शोध में संलग्न हैं. १४ वर्ष की आयु से ही आपने साहित्य रचना प्रारंभ कर दी थी. लघुकथा, व्यंग्य तथा निबंधों से प्रारंभ हुई. आपकी साहित्य यात्रा धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी तथा कहानियाँ तक पहुँची. साहित्य के अतिरिक्त चित्रकारी, अभिनय, पाक कला, समीक्षा निर्देशन तथा संगीत में आपकी गहरी रूचि है. तमाम पत्र-पत्रिकाओं में आपकी विविध विधाओं की रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं. आपकी कविताओं में जहाँ एक ओर प्रेम की सहज संवेदना अभिव्यक्ति होती है वहीं सामाजिक सरोकार और विडम्बनाओं के प्रति कचोट स्पष्ट भी दिखाई देती है.
इसी वर्ष आपकी कविताओं का संग्रह “अनुभूति” शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है.

पुस्तक के लिए नीचे लिखे पते पर संपर्क कीजिए:
शिवना प्रकाशन
P.C. Lab, Samrat Complex Basement,
Opp. New Bus Stand, Sehore, M.P. 466001, India.
Phone: +91-9977855399, +91-7562405545
E mail: shivnaprakashan@gmail.com

शनि की छाया
दीपक ‘मशाल’

पूजा के लिए सुबह मुँहअँधेरे उठ गया था वो, धरती पर पाँव रखने से पहले दोनों हाथों की हथेलियों के दर्शन कर प्रातःस्मरण मंत्र गाया ‘कराग्रे बसते लक्ष्मी.. कर मध्ये सरस्वती, कर मूले तु…..’. पिछली रात देर से काम से घर लौटे पड़ोसी को बेवजह जगा दिया अनजाने में.

जनेऊ को कान में अटका सपरा-खोरा(नहाया-धोया), बाग़ से कुछ फूल, कुछ कलियाँ तोड़ लाया, अटारी पर से बच्चों से छुपा के रखे पेड़े निकाले और धूप, चन्दन, अगरबत्ती, अक्षत और जल के लोटे से सजी थाली ले मंदिर निकल गया. रस्ते में एक हड्डियों के ढाँचे जैसे खजैले कुत्ते को हाथ में लिए डंडे से मार के भगा दिया.

ख़ुशी-ख़ुशी मंदिर पहुँच विधिवत पूजा अर्चना की और लौटते समय एक भिखारी के बढ़े हाथ को अनदेखा कर प्रसाद बचा कर घर ले आया. मन फिर भी शांत ना था…

शाम को एक ज्योतिषी जी के पास जाकर दुविधा बताई और हाथ की हथेली उसके सामने बिछा दी. ज्योतिषी का कहना था- ”आजकल तुम पर शनि की छाया है इसलिए की गई कोई पूजा नहीं लग रही.. मन अशांत होने का यही कारण है. अगले शनिवार को घर पर एक छोटा सा यज्ञ रख लो मैं पूरा करा दूंगा.”

‘अशांत मन’ की शांति के लिए उसने चुपचाप सहमती में सर हिला दिया.
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‘शक’
दीपक ‘मशाल’

यूनिवर्सिटी ने जब से कई नए कोर्स शुरू किये हैं, तब से नए छात्रों के रहने की उचित व्यवस्था(हॉस्टल) ना होने से यूनिवर्सिटी के पास वाली कालोनी के लोगों को एक नया व्यापार घर बैठे मिल गया. उस नयी बसी कालोनी के लगभग हर घर के कुछ कमरे इस बात को ध्यान में रखकर बनाये जाने लगे कि कम से कम १-२ कमरे किराये पर देना ही देना है और साथ ही पुराने घरों में भी लोगों ने अपनी आवश्यकताओं में से एक-दो कमरों की कटौती कर के उन्हें किराए पर उठा दिया. ये सब कुछ लोगों को फ़ायदा जरूर देता था लेकिन झा साब इस सब से बड़े परेशान थे, उनका खुद का बेटा तो दिल्ली से इंजीनिअरिंग कर रहा था लेकिन फिर भी उन्होंने शोर-शराबे से बचने के लिए कोई कमरा किराए पर नहीं उठाया. हालाँकि काफी बड़ा घर था उनका और वो खुद भी रिटायर होकर अपनी पत्नी के साथ शांति से वहाँ पर रह रहे थे लेकिन कुछ दिनों से उन्हें इन लड़कों से परेशानी होने लगी थी.
असल में यूनिवर्सिटी के आवारा लड़के देर रात तक घर के बाहर गली में चहलकदमी करते रहते और शोर मचाते रहते, लेकिन आज तो हद ही हो गई रात में साढ़े बारह तक जब शोर कम ना हुआ तो गुस्से में उन्होंने दरवाज़ा खोला और बाहर आ गए.
”ऐ लड़के, इधर आओ” गुस्से में झा साब ने उनमे से एक लड़के को बुलाया.
लेकिन सब उनपर हंसने लगे और कोई भी पास नहीं आया, ये देख झा साब का गुस्सा और बढ़ गया.. वहीँ से चिल्ला कर बोले- ”तुम लोग चुपचाप पढ़ाई नहीं कर सकते या फिर कोई काम नहीं है तो सो क्यों नहीं जाते? ढीठ कहीं के”
एक लड़का हाथ में शराब की बोतल लिए उनके पास लडखडाता हुआ आया और बोला- ” ऐ अंकल क्यों टेंशन लेते हैं, अभी चले जायेंगे ना थोड़ी देर में. अरे यही तो हमारे खेलने-खाने के दिन हैं..”
शराब की बदबू से झा साब और भी भड़क गए- ” बिलकुल शर्म नहीं आती तुम्हें इस तरह शराब पीकर आवारागर्दी कर रहे हो.. अरे मेरा भी एक बेटा है तुम्हारी उम्र का लेकिन मज्जाल कि कभी सिगरेट-शराब को हाथ भी लगाया हो उसने, क्यों अपने माँ-बाप का नाम ख़राब रहे हो जाहिलों..”
उनका बोलना अभी रुका भी नहीं था कि एक दूसरा शराबी लड़का उनींदा सा चलता हुआ उनके पास आते हुए बोला- ”अरे अंकल, आप निष्फिकर रहिये आपके जैसा ही कुछ हमारे माँ-बाप भी हमारे बारे में समझते हैं इसलिए आप जा के सो जाइये.. खामख्वाह में हमारा मज़ा मती ख़राब करिए.”
और वो सब एक दूसरे के हाथ पे ताली देते हुए ठहाका मार के हंस दिए.
अब झा साब को कोई जवाब ना सूझा और उन्हें अन्दर जाना ही ठीक लगा.. उनका मकसद तो पूरा ना हुआ लेकिन उस लड़के की बात ने एक शक जरूर पैदा कर दिया.
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