महेन्द्र दवेसर दीपक की पुस्तक ‘अपनी-अपनी आग’ पर समीक्षा

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समीक्षक:

उषा राजे सक्सेना

महेन्द्र दवेसर दीपक की पुस्तक ‘अपनी-अपनी आग’ अभी हाल ही में मेधा बुक्स ने प्रकाशित की है।

ब्रिटेन के हिंदी साहित्य जगत में महेन्द्र दवेसर ‘दीपक’ का नाम कोई नया नहीं है। दवेसर जी ब्रिटेन की साहित्यिक पत्रिका ‘पुरवाई’ में लिखते रहे है। भारत की पत्र-पत्रिकाओं में भी वे लिखते रहते हैं।‘अपनी-अपनी आग’ महेन्द्र जी का तीसरा कहानी संग्रह है इससे पूर्व उनके दो और कहानी-संग्रह आ चुके है, ‘पहले कहा होता’ और ‘बुझे दिए की आरती’। और अब यह ‘अपनी-अपनी आग’ जिसके प्रकाशन के लिए भारतीय उच्चायोग ने उन्हें ढाई सौ पाउँड का अनुदान देकर उनका मान बढ़ाया है। ‘अपनी-अपनी आग’ इस संग्रह की शीर्ष कहानी है जिसमें ‘आग’ एक प्रतीक है। आग जो हम सबके अंदर किसी न किसी रूप में दहकती रहती है जो हमे जीवित रखती है, हमें जीजिविषा प्रदान करती है। हमारा यह देह पाँच तत्वों से बना है। आग उसका ही एक तत्व है। ‘क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा, पंच रचित यह अधम शरीरा’। इन कहानियों के केंद्र में दवेसर जी ने इस आग को नए-नए रूप में, नए-नए चेहरों, नए-नए किरदारों के माध्यम से प्रज्जवलित किए रखा है। यहाँ तक कि यह आग ‘चक्कर ही चक्कर’ और ‘अतिथि’ जैसी हास्य-व्यंग्य की हल्की-फुल्की कहानियों में भी जलती रहती है।

दवेसर जी एक ऐसे सृजक हैं, जो भावुक हैं संवेदनशील हैं। उनके जीवन में या उनके आस-पास जो कुछ घटता है वह उनके अंदर बैठे सृजक को मथता है, उत्प्रेरित करता है। वे चैन से नहीं रह पाते हैं उनकेDavesar & Ravi Sharma 1 अनुभव, उनकी संवेदनाएँ उनको झकझोरती हैं और उनकी लेखनी चल पड़ती है। वे स्वयं पुस्तक की भूमिका में स्वीकारते हैं, मैं अपने जीवन के 80वें वर्ष से गुज़र रहा हूँ, मेरे पास अनुभवों का कोई अभाव नहीं हैं। वास्तव में उनके पास अनुभवों का अकूत भंडार है। उन अनुभवों को वे शब्दों में ढालते चले जाते हैं। जीवन के सुख-दुख, ईर्ष्या-द्वेष, षड़यंत, हादसे, अत्याचार, प्रतिशोध, करुणा, संघर्ष और पीड़ा उनके सरोकार हैं जो कहानियों के बुनावट में उतरते है। वे पर-पीड़ा को आत्मसात करने में सक्षम हैं। पुरुष होते हुए भी वे स्त्री के मनोभावों को, उसकी पीड़ा को, उसकी सीमाओं को, उसकी कुटिलता को, उसकी सरलता-सहजता को, उसके छले जाने को, पाठकों तक शब्दों के माध्यम से कहानियों में ढालकर पहुँचाते है।

दवेसर जी की अधिकांश कहानियाँ नायिका प्रधान होती हैं। ‘अपनी-अपनी आग’ की कहानियाँ शिल्प-सुघड़ या किसी वाद से जुड़ी कहानियाँ नहीं हैं, लेकिन इनमें एक बेचैन धड़कती हुई ज़िंदगी है जो अपने अफ़साने पाठकों से पढ़वा लेती है। यही इन कहानियों की खूबी है। कहानियों की भाव-भूमि ब्रिटेन है। इन कहानियों में दवेसर जी ने परंपराओं महत्वकांक्षाओ और उनसे उपजी त्रासद परिस्थितियों के बीच पिसते मनुष्य को, विभिन्न किरदारों और घटनाओं द्वारा क्षय होते मानवीय संबंधों की पड़ताल करने की कोशिश की हैं।

पुस्तक ‘अपनी-अपनी आग’ में दस कहानियाँ हैं। ‘बीस पाउँड’ ‘आधा गुनाह’ ‘नहीं’ ‘चक्कर ही चक्कर’ ‘ईबू’ ‘अतिथि’ ‘अपनी-अपनी आग’ ‘एक सूखी बदली’ ‘सुरभि’ ‘प्यासे प्रश्न’ आदि। आग की तपिश पुस्तक की तकरीबन हर कहानी में किसी-न-किसी रूप में दहकती है कहीं रूढियों में जकड़े माँ-बाप द्वारा बेटी के छले जाने की पीड़ा में, तो कहीं परमिस्सिव सोसाइटी में औरत के यौन, स्वछंद व्यौहार से आती गुनाह की ग्लानि में, तो कहीं मृदुला जैसी शीलवंती पत्नि के प्रतिशोध में, तो कही रिश्तों में आते जा रहे खोखलेपन में, तो कहीं ईबू जैसे नन्हें बालक के भविष्य में अड़चने डालनेवाले समाज और व्यवस्था के घेराबंदी में, तो कहीं सुरभि जैसी निर्दोष, कोमलह्रदया किशोरी के तथा-कथित बाप द्वारा शोषण में, तो कहीं कैलाश और मधु के प्यासे प्रश्नों में। कैसी विडंबना है सनातन काल से मनुष्य सुख की खोज में भटक रहा है, वह चाहे कितना भी हाथ-पाँव मारे पर वह कहीं भी सुखी नहीं रह पाता है। कभी वह स्वयं महत्वकांक्षाओं के मकड़जाल बुनता है तो कभी परिवेश, समाज, कानून या व्यवस्था उसकी राह में रोड़े अटकाते हैं।

समय की सीमा है अतः मैं दो कहानियों पर कुछ विस्तृत चर्चा कर अपना वक्तव्य समाप्त करुंगी।

संग्रह की पहली कहानी ‘बीस पाउँड’ ब्रिटेन में जन्मी सोलह वर्ष की समीना अख्तर की है जिसने अभी-अभी ओ-लेवेल की परीक्षा दी है उसकी आँखों में सपने है वह आगे पढना चाहती है। रूढ़ संस्कारों में जकड़े अम्मी-अब्बू के लिए समीना उनके बुढापे की इन्श्योरेंस है वे उसकी शादी पाकिस्तान में रहनेवाले, पचाससाला अपढ़-गवाँर दो बच्चों के बाप अरशद के साथ इस लिए करना चाहते हैं कि वह उस घर में इतनी अमीर हो जाएगी कि एक दिन जब वे बूढ़े हो जाएँगे तो वह उनकी देख-भाल कर सकेगी। समीना की अम्मी बुड्ढे से शादी करने के लिए उसे इमोशनल ब्लैकमेल करती हैं। समीना अपने से दो साल बड़ी सहेली बलजीत के पास निस्तार के लिए पहुँती है पर वह तो खुद उसी आग में जल रही होती है। बलजीत के दार जी बलजीत और उसके प्रेमी का कत्ल कर सकते हैं पर उसका उसके मनपसंद लड़के से ब्याह नहीं कर सकते। बलजीत घर से भाग कर अपने प्रेमी से शादी कर लेती है। समीना बलजीत का सहारा लेकर घर से भागती है पर विडंबना यह है कि बल्ली और जग्गी तो शादी के बाद हनीमून के लिए चले जाएँगे पर वह कहाँ जाएगी? बलजीत और जग्गी हनीमून पर जाते हुए उसे ठेंगा दिखा देते हैं। पल भर में मित्रता की उष्मा खतम हो जाती है। समीना अकेली पड़ जाती है, अब अपने शहर बर्मिंघम में रहने का मतलब, फिर से उसी नारकीय स्थिति में पहुँच जाना जहाँ से वह निस्तार के लिए भागी थी। अल्लाह पर भरोसा रख समीना लंदन पहुँच कर पिकैडिली सर्कस की भीड़ में खो जाना चाहती है। पर उसका ज़मीर उसे उस भीड़ से अलग करता है, वह बिकना नहीं चाहती है। कड़कड़ाती ठंड है तेज़ तिरछी हवा है भूख है, आँखे नीद से बोझिल है, कहाँ जाए समीना? पुलिस वार्निंग देती है। समीना मन ही मन चाहती है कि पुलिस उसे जेल में ठूँस दे ताकि उसे रात भर को छत मिल जाए। तभी युवा पत्रकार योगेश चोपड़ा की नज़र उस देसी लड़की पर पड़ती है जिसकी आँखों में आँसू है चेहरे पर लाचारी है। लड़की भूखी है वह उसे बीस पाउँड देकर विमेन्स हाँस्टल याने ‘शेल्टर’ में जाने को कहता है। घर से भागी समीना शेल्टर में जाने से घबड़ाती है। योगेश को भाई कह कर द्रवित करती है और वह उसे अपने घर ले जाने को राज़ी कर लेती है। जैसा कि आम होता है योगेश की पत्नि प्रीति को योगेश का आधी रात को एक अंजान खूबसूरत लड़की का घर लाना नागवार लगता है। वह योगेश को जली-कटी सुनाती है और समीना को देह व्यापार करनेवाली औरत मान कर उसे रंडी का खिताब देती है। समीना बंद दरवाज़े से बाहर आती आवाज़ें सुनती है। वह निर्दोष है परिस्थितियों की मारी, बिना कुछ पूछे योगेश की पत्नि उसे कटघरे में खड़ा कर लांछित करती है। चोट खाई समीना, एक बार फिर दिगभ्रमित, अकेली और लाचार महसूस करती है। उसका आत्मसम्मान जोश मारता है वह योगेश के दिए बीस पाउँड का नोट एक फूलदान के नीचे दबा कर एक छोटा सा नोट लिख जाती है, ‘थैंक यू ब्रदर मेरे लिए आपको बहुत कुछ सुनना पड़ा। मैं छोड़ रही हूँ यह रैन बसेरा।’ वह फिर सड़क पर आ जाती है।

पुस्तक: ‘अपनी-अपनी आग’
लेखक: महेन्द्र दवेसर दीपक
प्रकाशक: मेधा बुक्स
x-11, नवीन शाहदरा,
नई दिल्ली-110032
टेलीफोन: 91-(011)-2116672
फैक्स: 91-(11)-22321818
ई मेल: medhabooks@gmail.com
मूल्य: 200 रुपये

कहानी के अंत में योगेश दुखी होता है तो उसकी पत्नि प्रीति रिलीव्ड कि चलो अच्छा हुआ छुट्टी मिली… पर समीना का क्या हश्र हुआ? कहानीकार ने सबीना को जागरूक तो बनाया पर उसे आज की प्रगतिशील लड़कियों की तरह चतुर और सजग नहीं बनाया कि अपनी रक्षा वह स्वयं कर सके।

संग्रह की एक और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर, प्रभावशाली और पाठक को उद्वेलित करनेवाली, भावप्रवण कहानी है ‘ईबू’। इस कहानी के केंद्र में एक नन्हाँ बालक ‘वरजा’ है जिसकी माँ तूफ़ानी सुनामी को भेट चढ़ चुकी है, और है कोमल-ह्रदया अविवाहित, लोक-सेवा को समर्पित, डा. शेफाली। डा. शेफाली मानवता के नाते अपनी सहकर्मी मित्र सुंदरी के साथ इंडोनेसिया के एक गाँव मोलाबो आती है जिसे तीन-दिन पहले सुनामी लहरों के तांडव ने तहस-नहस कर दिया है। वहीं वह नन्हें वरजा से मिलती है। वरजा की माँ को सुनामी लील गई, बाप की मृत्यु तो पहले ही हो चुकी थी। अनाथ वरजा का भोला-भाला चेहरा डॉ. शेफाली के मातृत्व को झकझोरता है। वरजा जब उसे ईबू कहकर पुकारता है तो उसका अंग-अंग थिरकने लगता है। वह वरजा को इस हद तक प्यार करने लगती है कि अविवाहित होते हुए भी उसे गोद लेने का निर्णय ले लेती है किंतु क्या वह उसे गोद ले पाती है? क्या उसे वह सुरक्षित घर दे पाती है? धर्म के ठेकेदार, कानून, समाज, मनुष्य की सुरक्षा, प्रगति और विकास के लिए बनाई गईं व्यवस्था किस तरह एक संवरते हुए अबोध बालक की जिंदगी में कुटिलता से दखल देकर उसके सारे संभावनाओं को नष्ट कर देती है। इंसान कितना बेइमान, संकीर्ण, फ़सादी खुदगर्ज़, नृशंस, अत्याचारी और भावशून्य हो सकता है इसे नन्हें अनाथ वरजा की कहानी ‘ईबू’ पढ़ कर जाना जा सकता है।

आज का वक्त सांस्कृतिक एवं साहित्यिक वैचारिकता के संकट का समय है। दवेसर जी का यह संग्रह चरित्रों और परिवेशों का आत्मावलोकन है। संग्रह की तमाम कहानियों को पढ़ कर महसूस होता है कि दवेसर जी अपनी कहानियों में जीने की कोशिश करते हैं और पाठक में सकारात्मक और वैचारिक ऊर्जा भरते है। संग्रह की सभी कहानियाँ पठनीय है। कहानियों की भाषा सहज और सरल है।

दवेसर जी आपकी लेखनी इसी तरह चलती रहे। निश्चय ही ‘अपनी-अपनी आग’ का हिंदी जगत में भरपूर स्वागत होगा।

समीक्षक: उषा राजे सक्सेना

प्रेषक: महावीर शर्मा

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पुष्पा भार्गव के काव्य संग्रह ‘लहरें’ का लोकार्पण

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रविवार ३१ मई २००९ को काव्य धारा लन्दन के विशेष कार्यक्रम में पुष्पा भार्गव के काव्य संग्रह ‘लहरें’ का विमोचन भारतीय उच्चायोग की संस्कृति मंत्री तथा नेहरू केंद्र की निर्देशिका श्री मती मोनिका कपिल मोहता के कर-कमलों द्वारा बोम्बे पैलेस, लन्दन में हुआ. इस आयोजन का संचालन काव्य धारा के मुख्य सचिव श्री मोडगिल ने किया. इस अवसर पर लन्दन के जानेमाने साहित्यकार, लेखक, कवि और विभिन्न संस्थाओं के अध्यक्ष तथा काव्य धारा के सभी सदस्य व पदाधिकारी उपस्थित थे.

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बाएं से दायें: प्रेम मोडगिल, मधुप मोहता, मोनिका कपिल मोहता, पुष्पा भार्गव

आयोजन की व्यवस्था बहुत ही सुन्दर और सुरुचिपूर्ण रूप से की गई थी. स्वागत और परिचय के पश्चात कार्यक्रम का आरम्भ सरस्वती वन्दना के साथ दीप जला कर किया गया.

संस्कृति मंत्री श्री मती मोनिका कपिल मोहता और लन्दन के विख्यात लेखक और कवि डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने दीप प्रज्जलित किया. तत्पश्चात काव्य धारा की सदस्या कवयित्री उर्मिला भारद्वाज ने कविता पाठ करके पुष्प भार्गव का अभिनन्दन किया.

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बाएं से दायें: प्रेम मोडगिल, मधुप मोहता, मोनिका कपिल मोहता,

पुष्पा भार्गव, उषा राजे सक्सेना, कमलेश भार्गव

कार्यक्रम के बीच डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने काव्य संग्रह ‘लहरें’ के ऊपर अपना बहुत ही प्रभावशाली वक्तव्य दिया. इसके उपरान्त हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा और लन्दन की जानीमानी लेखिका व कवयित्री श्री मती उषा राजे सक्सेना ने पुष्पा भार्गव के सामाजिक व साहित्यिक कार्यों की प्रसंशा करते हुए उनके काव्य संग्रह की भरसक सराहना की.  इस आयोजन में पुष्पा भार्गव के गीतों पर आधारित नृत्यों का प्रदर्शन शमा डांस कम्पनी द्वारा किया गया जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

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पुष्पा भार्गव के गीतों पर आधारित ‘शमा डांस कम्पनी’ द्वारा नृत्य-प्रदर्शन

काव्य संग्रह के विमोचन के पश्चात श्री मती मोहता ने पुष्पा भार्गव के अतियन्त सुन्दर काव्य संग्रह ‘लहरें’ की प्रसंशा करके उनको उनकी सफलता के लिए अनेकानेक बधाईयाँ दीं.

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जया भार्गव द्वारा कविता-पाठ

इस अवसर पर श्री मती पुष्पा भार्गव की पोती जया भार्गव ने कविता-पाठ किया जिसकी सभी ने बहुत प्रसंशा की.

इस आयोजन में भारतीय उच्चायोग के उच्च अधिकारी और प्रसिद्ध कवि श्री मधुप मोहता भी उपस्थित थे. इसके अतिरिक्त लन्दन के जानेमाने कवि सोहन ‘राही’, भारतेंदु विमल, तोषी अमृता व हिन्दी अधिकारी श्री आनंद कुमार, ‘लहरें’ के चित्रक श्री बजरंग माथुर एम. बी. ई., शमा डाँस कम्पनी की आर्टिस्टिक डायरेक्टर श्री मती सुषमा मेहता, भारतीय संस्थाओं के अध्यक्ष, नृत्यकला की आर्टिस्टिक डायरेक्टर बीथिका राहा, हिन्दू वेलफ़ेयर एसोसिएशन एसेक्स के चेयरमेन श्री बलदेव गोयल एम. बी. ई. इत्यादि उपस्तिथ थे. अंत में स्वादिष्ट प्रितिभोजन के बाद आयोजन समाप्त हुआ.

प्रेषक: महावीर शर्मा

सुन्दर ग़ज़लों और कविताओं के लिए नीचे दिए ब्लॉग पर क्लिक कीजिए:
महावीर

गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाएं

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गणतंत्र दिवस पर आप सभी को शुभकामनाएं

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता के लिए नीचे क्लिक कीजिएः

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जाग रहे हम वीर जवान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान!

प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़ल

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प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़लः

चूल्हा-चौका, कपड़ा-लत्ता ख़ौफ़ है इनके बहने का
तूफ़ानों का ख़ौफ़ नहीं है ख़ौफ़ है घर के ढहने का

सब से प्यारा, सब से न्यारा जीवन मुझ को क्यों न लगे
शायद ही कोई सानी है दुनिया में इस गहने का

बेशक सब ही कोशिश कर लें बेहतर रहने की लेकिन
आएगा ऐ दोस्त सलीका किसी किसी को रहने का

जाने क्या क्या सीखा उससे जिस जिससे अंजान थे हम
खूब तजरबा रहा हमारा संग दुखों के रहने का

इतना भी कमज़ोर बनो क्यों दीमक खाई काठ लगो
मीत तनिक हो साहस तुम में दुख तकलीफ़ें सहने का

बात कोई मन की मन में ही कैसे क्यों कर रह जाए
दिल वालों की महफ़िल में जब वक्त मिले कुछ कहने का

‘प्राण’ कभी तो अपनी खातिर ध्यान ज़रा दे जीवन पर
एक यही तो घर है तेरा कुछ आराम से रहने का

‘प्राण’ शर्मा

रश्मि प्रभा जी की कविता

आओ पीछे लौट चलें……

joybrains-photostream-boatस्वर्गीय महाकवि सुमित्रा नंदन पंत की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद की सुपुत्री रश्मि प्रभा को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है फिर भी उन्हीं के शब्दों में उनका परिचय पढ़िएः

मैं रश्मि प्रभा…सौभाग्य मेरा कि मैं कवि पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद rashmi-prabha-1की बेटी हूँ और मेरा sumitranandan_pantनामकरण स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पन्त ने किया और मेरे नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियाँ मेरे नाम की…”सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन” , शब्दों की पांडुलिपि मुझे विरासत मे मिली है. अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते…मेरा मन जहाँ तक जाता है, मेरे शब्द उसके अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन, ये शब्द ही मेरा सुकून हैं…”

आओ पीछे लौट चलें……

बहुत कुछ पाने की प्रत्याशा में

हम घर से दूर हो गए !

जाने कितनी प्रतीक्षित आँखें

दीवारों से टिकी खड़ी हैं -

चलो उनकी मुरझाई आंखों की चमक लौटा दें !

सूने आँगन में धमाचौकड़ी मचा दें

- आओ पीछे लौट चलें………..

आगे बढ़ने की चाह में

हम रोबोट हो गए

दर्द समझना,स्पर्श देना भूल गए !

दर्द तुम्हे भी होता है,

दर्द हमें भी होता है,

दर्द उन्हें भी होता है

- बहुत लिया दर्द, अब पीछे लौट चलें……….

पहले की तरह,

रोटी मिल-बांटकर खाएँगे,

एक कमरे में गद्दे बिछा

इकठ्ठे सो जायेंगे …

कुछ मोहक सपने तुम देखना,

कुछ हम देखेंगे -

आओ पीछे लौट चलें…………………

रश्मि प्रभा

प्रो. श्याम मनोहर पांडेय के सम्मान में इटालियन विद्वानों की संगोष्ठी

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प्रो. श्याम मनोहर पांडेय के सम्मान में इटालियन विद्वानों की संगोष्ठी

30 अक्तूबर 2008 को नेपल्स विश्वविद्यालय के सभागार में भारतीय मूल के विश्वप्रसिद्ध, मध्ययुगीन सूफ़ी साहित्य के अध्येता एवं विशेषज्ञ डॉ. शयाम मनोहर पांडेय के अवकाश प्राप्त करने के अवसर पर उनको विदाई देने के लिए, उनके सम्मान में एक समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में इटली के विभिन्न विश्वविद्यालयों के हिंदी-संस्कृत, एवं उर्दू के श्रेष्ठ विद्वान निमंत्रित थें। डॉ, पांडेय पिछले तीस वर्षो से नेपुल्स विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और प्राचार्य रहे। इस बीच उनके ‘लोरिकी और चनैनी’ जैसे लोक महाकाव्य, पाँच जिल्द हिंदी और अँग्रेज़ी में प्रकाशित हुएँ। अभी हाल ही में उनकी एक अन्य कृति ‘ चँदायन के रचयिता मौलाना दाउद’ प्रकाशित हुई है।कार्यक्रम दिन को 9.30 बजे आरंभ हुआ और सांयकाल 7 बजे प्रो, रोसा के धन्यवादज्ञापन के साथ समाप्त हुआ।

कार्यक्रम के आरंभ में विश्वविद्यालय की उपकुलपति प्रो. डॉ. श्रीमती लीडा बिगानोनी ने डॉ,श्याम मनोहर पांडेय, तथा अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा, ‘नेपुल्स ओरियँटल विश्वविद्यालय डॉ पांडेय का सदा ऋणी रहेगा।‘ उन्होंने डॉ. पांडेय द्वारा लिखी गई लोरिक-चँदा संबंधी महाकाव्यों की चर्चा करते हुए, उनके द्वारा संपादित हिंदी-इटालियन शब्द कोश का विशेष उल्लेख किया।

डीन ऑफ़ द फैकलिटी डा. श्रीमती रोजैली ने कहा, ‘डॉ. पांडेय विद्वान होने के साथ-साथ हमारे विश्वविद्यालय के एक श्रेष्ठ शिक्षक और अभिन्न मित्र भी रहे हैं उनकी कमी हमें सदा महसूस होती रहेगी।‘ एशियन अध्ययन विभाग के निदेशक प्रो. स्फेर्रा, ने डॉ. पांडेय के सम्मान में आयोजित इस कार्क्रम की प्रसंशा करते हुए कहा, ‘इतने बड़े विद्वान को ऐसी ही उत्कृष्ट बिदाई मिलनी चाहिए।’

दिन के 9.30 बजे आरंभ हुए इस कार्यक्रम की आध्यक्षा प्रो, श्रीमती ओरोफीनो- (तिब्बतानों की प्राध्यापिका), ड़ा, पांडेय की भूतपूर्व छात्रा ने उनके शिक्षण प्रणाली की प्रसंशा करते हुए कहा कि वह डा. पांडेय को वर्षों से जानती है और वह उनकी विद्वता से सदा ही प्रभावित रहीं।

डॉ. श्रीमती कोंसोलोरो एवं डॉ. श्रीमती कराकी- तोरीनो विश्वविद्यालय, तोरीन (टूरिन), ने क्रमशः ‘उत्तरी इटली में शहरी जीवन चरित्र’ एवं ‘रामकथा- उपन्यासकार प्रेमचँद के परिपेक्ष्य में’ पर आलेख पढ़ते हुए कहा, डॉ पांडेय जैसे विद्वान आदर के पात्र है साथ ही मिलान से आई डॉ, श्रीमती दोलचीनी, प्राचार्या हिंदी विभाग, मिलान विश्वविद्यालय ने, ‘प्रेम सागर और लल्लू लाल’ पर पर्चा पढ़ते हुए कहा, वे 30 वर्षों बाद ड़ा. पांडेय से मिल रही हैं, और उनकी हार्दिक इच्छा है कि डा. पांडेय भविष्य में ‘फेलो मेम्बर अकादेमिया आन्द्राज़ियाना’ स्वीकार करे तो वह गौरवान्वित महसूस करेंगी।

नेपल्स विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के इतिहास के प्राचार्य प्रो. आमेदेओ माईयेलो ने ‘उर्दू इन द्रविणियन इंडिया’ पर व्याख्यान देते हुए अपनी और डा. पांडेय के मित्रता की चर्चा करते हुए कहा कि नेपल्स विश्वविद्यालय में उन्हें डॉ. पांडेय के साथ कार्य करने का विशेष अवसर मिला भविष्य में वे उनकी अनुरस्थिति शिद्दत से महसूस करेंगे।

दूसरे सत्र में रोम विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर डॉ. मिलानेसी, ने डॉ. पांडेय के सम्मान में एक कविता पढ़ते हुए कहा इटली के सभी विद्वान उन्हें मध्यकालीन साहित्य विषय पर अपना गुरू मानते है। प्रोफेसर डॉ. मिलानेसी ने ‘हिंदी के सूफी साहित्य पर एक निबंध पढ़ा’।

डॉ. श्रीमती दानियोला ब्रेदी, उर्दू विभाग की अध्यक्षा- रोम विश्वविद्यालय, डॉ. स्टेफनो पियानो- पूर्व अध्यक्ष संस्कृत-इंडियालोजी विभाग, तोरीनो विश्व विद्यालय- तोरीनो, आदि ने विभिन्न विषयों पर विद्वता पूर्ण आलेख पढ़े।

इस अवसर पर विश्व विद्यालय में आए सभी विद्वानों ने एक स्वर में कहा, आज के समय में डॉ. पांडेय जैसे प्रतिबद्ध विद्वान बहुत कम हैं। डॉ. पांडे के कारण इतनी बड़ी संख्या में इटली के सम्मानित विद्वान एक मंच पर मिल कर इंडियोलोजी पर विचारों का आदान-प्रदान कर सके। अतः यह आयोजन बहुत सफल रहा।

डॉ. पांडेय के सम्मान में दिए गए इस बिदाई समारोह में भारतीय परंपरा के अनुसार शाकाहारी भोजन का प्रबंध था। आयोजन डॉ. श्याम मनोहर पांडेय की छात्राओं, स्टाफेनिया केवालियेरे, दानियेला दे सीमोना, फियोरेनूसो यूलियानो ने भव्य स्तर पर आयोजित किया था। नेपल्स विश्वविद्यालय में इस प्रकार का बिदाई समारोह संभवतः पहली बार आयोजित हुआ जिसमें इतने अधिक संख्या में इटालियन मूल के विशेषज्ञ विद्वान एक मंच पर एकत्रित हुए।

उषा राजे सक्सेना

सह संपादिका

“पुरवाई”
(यू.के. हिन्दी समिति द्वारा प्रकाशित)

सीमा गुप्ता की दो कविताएं

सीमा गुप्ता की दो कविताएं

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मृगतृष्णा

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
seema-gupta-1ढूँढ़ा तुमको तकदीरों में
चन्दा की सब तहरीरों में
हाथों की धुँधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम

इन आंखों की तस्वीरों में

कैसी ये ………………….

अम्बर के झिलमिल तारों में
सावन में रिमझिम फुहारों में
लहरों के उजले किनारों में
तुमको पाया तुमको पाया

प्रेम-विरह अश्रुधारों में

कैसी ये…………………….

ढूँढ़ा तुमको दिन रातों में
ख्वाबों ख्यालों जज्बातों में
उलझे से कुछ सवालातों में
बसते हो तुम बसते हो तुम

साँसों की लय में बातों में

कैसी ये……………………..

ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम

हर्फ बने जब उठी दुआयें

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी

“यादें”

सीमा गुप्ता

बहुत रुला जाती हैं , दिल को जला जातीं हैं ,
नीदों मे जगा जाती हैं , कितना तड़पा जातीं हैं ,
“यादें” जब भी आती हैं ”

भीगे भीगे अल्फाजों को , लबों पर लाकर ,
दिल के जज्बातों को , फ़िर से दोहरा जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं ”

खाली अन्ध्यारे मन के , हर एक कोने में ,
बीते लम्हों के टूटे मोती , बिखरा जाती हैं ,
“यादें जब भी आती है ”

हम पे जो गुजरी थी , उन सारी तकलीफों के ,
दिल मे दबे हुए , शोलों को भड़का जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं ”

कितना सता जाती हैं , दीवाना बना जाती हैं ,
हर जख्म दुखा जाती हैं , फिर तन्हा कर जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं”

मनोशी चैटर्जी की ग़ज़ल उन्हीं के मधुर सुरों में

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दुआ में मेरी कुछ यूँ असर हो

तेरे सिरहाने हर इक सहर हो

जहां के नाना झमेले सर हैं
कहाँ किसी की मुझे ख़बर हो

यहाँ तो कुछ भी नहीं है बदला
वहाँ ही शायद नई ख़बर हो

मिले अचानक वो ख़्वाब मे कल
कहीं दुबारा न फिर कहर हो

दिलों दिलों में भटक रहे हैं
कहीं तो अब ज़िंदगी बसर हो

न याद कोई जुड़ी हो तुम से
कहीं तो ऐसा कोई शहर हो

चलो चलें फिर से लौट जायें
शुरु से फिर ये शुरु सफ़र हो

मनोशी चैटर्जी

आतंक के युद्ध में जीत!!!

shaheed

आतंक के युद्ध में जीत!!!

यह सब से बड़ा आतंकी हमला था। १० आतंकियों को मार कर आतंक के खिलाफ यह जंग जीत ली है – गर्व की बात है!
१९९३ के बम विस्फोट में, संसद पर हमले में, दिल्ली में, जयपुर में – जहां भी देखो कितनी ही जानें खो कर अंत में यही कहने में गर्व होने लगता है – ‘आतंकियों पर जीत’ और जय जयकार से आकाश गूंज उठता है।

बस, कुछ करना-धरना नहीं, केवल खोखली बातें :
“सरकार को यह करना चाहिए, वह करना चाहिए था, जो मैं कह रहा हूं वही करना चाहिए, मैंने तो पहले ही कह दिया था कि ये आतंकी फिर आएंगे ……” –

बस यहां ख़त्म हो जाती हमारी कर्मभूमि की सीमा! वागाडंबर और वाग्-युद्ध में हमें सिद्धि प्राप्त है!

१९९३ के बम-विस्फोट में, संसद पर हमले में, दिल्ली में, जयपुर में – जहां भी देखो कितनी ही जानें खो कर अंत में यही shok1कहने में गर्व होने लगता है और वही पुनरावृत्ति – ‘आतंकियों पर जीत’ और जय जयकार से आकाश गूंज उठता है। कितनी ही बार यही विजय-घोष का नारा सुनते आए हैं किंतु विजयश्री की श्रृंखला में अनेक निर्दोष लोगों की आत्माएं गोलियों से छिदे और विस्फोट की आग में झुलसते हुए शरीरों से विदा लेकर रोती रहीं। हमले का आकार और भीषणता का विस्तार होता रहा। मिडिया और अखबारों का व्यापार बढ़ जाता है। पान की दुकान पर, पार्कों में, हर जगह लोगों के झुंड इकट्ठे हो कर शासन-नीति, कूट-नीति, सरकारी-नीति पर बहस और दावेदारी के साथ एक दूसरे पर लांछन और आरोप लगा कर अपनी भड़ास निकालने का अवसर मिल जाता है।

मैं भी तो यही कर रहा हूं। ब्लॉग में अपनी भड़ास ही तो निकाल रहा हूं - अपनी शर्मिंदगी पर आवरण डालने की कोशिश में कहे देता हूं :-

“इस वाग्-युद्ध के अलावा हम क्या कर सकते हैं, यह तो सरकार का, पुलिस का, खुफिया एजेंसियों, डिज़ास्टर मैनेजमेंट विभाग का, कमांडो का कर्तव्य है। ड्यूटी ही तो कर रहे हैं हम – नारा लगा रहे हैं, लोगों में जागृति उत्पन्न कर रहे हैं।”

भैया, कुछ भी नहीं कर सकते तो फिरका-परस्ती मिटाने के लिए इतना तो कर सकते हो कि जब कोई पूछे -
“भाई साहब आप हिंदू हो?”
“नहीं”
“मुसलमान हो?”
“नहीं।”
“तो क्या सिख हो?”
“नहीं।”
” तो फिर लगता है पारसी या यहूदी होगे।”
“नहीं”
“अरे अब समझ गया। दलित हो तुम!”

” मैं बताता हूं। मैं क्या हूं! मैं हूं ‘भारतीय’ – केवल ‘भारतीय’ जिसका मुझे गर्व है।
दुनिया के किसी भी भाग में चला जाऊं, मैं जन्म-जन्मांतर से ‘भारतीय’ हूं। “

महावीर
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‘नीरज त्रिपाठी’ ने जयपुर में विस्फोट पर एक कविता में अपना रोष कुछ शब्दों में व्यक्त किया था जो आज भी लागू होते हैं।

जब भी यही हुआ था, आज फिर उसकी पुनरावृत्ति और कल भी कौन जाने………?
यह पंक्तियां उसी दिन स्वयं ही लुप्त हो जाएंगी जिस दिन ‘आतंकवाद’ शब्द मानव की जबान पर आते ही उबकाई आने लगेः-

नीरज त्रिपाठी की कविता की कुछ पंक्तियां :-

मिट गया सिंदूर हाथ मेंहदी है अभी भी
राख है वो आज मासूमियत उसकी हँसी
सुलगेगी बस अब जिंदगी भर जिंदगी
वो जहाँ जब भी जो चाहेंगे करेंगे
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

था लगा मन में वो कुछ सपने संजोने
था क्या पता हैं पापियों के हम खिलौने
बम फटे और साथ में अरमान उसके
बहन खोयी भाई खोये खोये हैं बेटे किसी ने
कैसे मरे कितने मरे दो चार दिन चर्चा करेंगे
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

शर्ट के टुकड़े मिले हैं लाल गायब
लाश भी मिलती नही कुछ को चहेतों की
सरकार ने तो कर दिया है काम अपना
एक कमेटी थोड़ा शोक थोड़ा पैसा
ये धमाके कल हुए थे आज भी और कल भी होंगे
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

नीरज त्रिपाठी

प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़ल

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प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़लः

परखचे अपने उड़ाना दोस्तो आसां नहीं
आपबीती को सुनाना दोस्तो आसां नहीं

ख़ूबियां अपनी गिनाते तुम रहो यूं ही सभी
ख़ामियां अपनी गिनाना दोस्तो आसां नहीं

देखने में लगता है यह हल्का फुल्का सा मगर
बोझ जीवन का उठाना दोस्तों आसां नहीं

रूठी दादी को मनाना माना कि आसान है
रूठे पोते को मनाना दोस्तो आसां नहीं

तुम भले ही मुस्कुराओ साथ बच्चों के मगर
बच्चों जैसा मुस्कुराना दोस्तो आसां नहीं

दोस्ती कर लो भले ही हर किसी से शौक से
दोस्ती सब से निभाना दोस्तो आसां नहीं

आंधी के जैसे बहो या बिजली के जैसे गिरो
होश हर इक के उड़ाना दोस्तो आसां नहीं

कोई पथरीली जमीं होती तो उग आती मगर
घास बालू में उगाना दोस्तो आसां नहीं

एक तो है तेज पानी और उस पर बारिशें
नाव कागज़ की बहाना दोस्तो आसां नहीं

आदमी बनना है तो कुछ ख़ूबियां पैदा करो
आदमी ख़ुद को बनाना दोस्तों आसां नहीं

प्राण शर्मा