आचार्य संजीव ‘सलिल’ की दो लघुकथाएं

SanjivVerma1

लघुकथा
एकलव्य

‘नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?’
- ‘हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.’
- ‘उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?’
-’हाँ बेटा.’

- ‘दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा – ‘काश वह आज भी होता.’
आचार्य संजीव ‘सलिल’
*********************
- लघुकथा
समय का फेर

गुरु जी शिष्य को पढ़ना-लिखना सिखाते परेशां हो गए तो खीझकर मारते हुए बोले-
‘ तेरी तकदीर में तालीम है ही नहीं तो क्या करुँ? तू मेरा और अपना दोनों का समय बरबाद कर रहा है. जा भाग जा, इतने समय में कुछ और सीखेगा तो कमा खायेगा.’
गुरु जी नाराज तो रोज ही होते थे लेकिन उस दिन चेले के मन को चोट लग गयी. उसने विद्यालय आना बंद कर दिया, सोचा ‘आज भगा रहे हैं. ठीक है भगा दीजिये, लेकिन मैं एक दिन फ़िर आऊंगा… जरूर आऊंगा.
गुरु जी कुछ दिन दुखी रहे कि व्यर्थ ही नाराज हुए, न होते तो वह आता ही रहता और कुछ न कुछ सीखता भी. धीरे-धीरे गुरु जी वह घटना भूल गए.
कुछ साल बाद गुरूजी एक अवसर पर विद्यालय में पधारे अतिथि का स्वागत कर रहे थे. तभी अतिथि ने पूछा- ‘आपने पहचाना मुझे?
गुरु जी ने दिमाग पर जोर डाला तो चेहरा और घटना दोनों याद आ गयी किंतु कुछ न कहकर चुप ही रहे.
गुरु जी को चुप देखकर अतिथि ही बोला
- ‘आपने ठीक पहचाना. मैं वही हूँ. सच ही मेरे भाग्य में विद्या पाना नहीं है, आपने ठीक कहा था किंतु विद्या देनेवालों का भाग्य बनाना मेरे भाग्य में है यह आपने नहीं बताया था.
गुरु जी अवाक् होकर देख रहे थे समय का फेर.

आचार्य संजीव ‘सलिल’
*****************************

देवी नागरानी की दो लघुकथाएं

devi_nangrani

देवी नागरानी

लघुकथा

असली शिकारी

देवी नागरानी

हमारे पड़ोसी श्री बसंत जी अपनी तेरह महीने के नाती को स्ट्रोलर में लेकर घर से बाहर आए और मुझे सामने हरियाली के आस पास टहलते देखकर कहाः “”नमस्कार बहन जी”

“नमस्कार भाई साहब. आज नन्हें शहज़ादे के साथ सैर हो रही है आपकी. “

” हाँ यह तो है पर एक कारण इसका और है। इस नन्हें शिकारी से अंदर बैठे महमानों और घरवालों को बचाने का यही तरीका है.”

” वह कैसे?” मैंने अनायास पूछ लिया.

” अजी सब खाना खा रहे हैं, और यह किसीको एक निवाला भी खाने नहीं देता. किसीकी थाली पर तो किसी के हाथ के निवाले पर झपट पड़ता है और……………..”

अभी उनकी बात ख़त्म ही नहीं हुई तो एक कौआ जाने किन ऊँचाइयों से नीचे उतरा और बच्चे के हाथ में जो बिस्किट था, झपटे से अपनी चोंच में ले उड़ा. मैंने उड़ते हुए पक्षी की ओर निहारते हुए कहा..” बसंत जी, देखिये तो असली शिकारी कौन है?”

और वे कुछ समझ कर मुस्कराये और फिर ठहाका मारकर हस पड़े.

वक्त को मात है दे रहा ऐसा ही इक बाज़

काल शिकारी आएगा यूँ ही बिन आवाज़

देवी नागरानी

*************************

लघुकथा

तरबूजे का सफ़र

यादों के गुलशन से महका करती है भूली बिसरी आप बीती बातें जो हमारी उम्र के साथ हमारी समझ के साथ भी अर्थ बदलती है, उन्हीं यादों का यह अंश है.

बहन से विदा लेते हुए जब शशिकाँत अपने गाँव जाने को हुआ तो बड़ी बहन ने पास में रक्खा एक बड़ा तरबूजा उठाकर उसे देते हुए कहाः “इसे तुम्हें माँ तक ले जाना है, पर संभालकर.”

१८‍, १९ साल का शशिकाँत अदब की मर्यादा से परिचित था, हामी भरकर तरबूजे को उठाया और बस के लिये रवाना हुआ. सफ़र तो बस सफ़र था, कोई आसान न था. एक बस से दूसरी बस, फिर टाँगे की सवारी तय करके ट्रेन पकड़ कर सफर का आख़िरी पड़ाव तय किया और किसी तरह उस तरबूज़े के बोझ को झेलता हुआ शशिकाँत घर पहुंचा और माँ को अमानत सौंपते हूए खुद को आज़ाद किया.

आख़िर नतीजा क्या हुआ? लाड़ प्यार से लाये हुए उस तरबूज़ को ५०० किलोमीटर तक संभाला, पर जब माँ ने उसे काटा तो वह बिलकुल सफेद निकला और माँ हक्की बक्की बेटे का मुंह देखती रही. क्या प्यार का रंग भी फीका पड़ सकता है!!!

देवी नागरानी

***************************************

प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं


अधजल गगरी छलकत जाए

- प्राण शर्मा

कमाल मेरा नया नया दोस्त बना था. दसवीं में तीन बार फ़ेल था. बेकारी में घूम रहा था. एक दिन मिला तो उसने अपने नाना, दादा की तारीफ़ें करनी शुरू दीं. कहने लगा-“मेरे चाचा जी एम .ए. और पी.एच .डी थे. सरकारी विभाग में सीनिअर ऐडवाईज़र थे. पांच हजार रूपये उनकी मंथली इनकम थी. मैं तब की बात कर रहा हूँ जब भारत के दो टुकड़े नहीं हुए थे. मेरे मामा जी रईस थे, रईस. कई राजे-महाराजे और नवाब उनका हुक्का भरा करते थे. मेरे दादा जी की योग्यता का कहना ही क्या! वे अंग्रेजी बोलते थे तो अँगरेज़ वाह, वाह कह उठते थे.  कई दांतों तले उँगलियाँ दबा लेते थे और कई पानी-पानी हो जाते थे. नाना जी इतने सुन्दर थे कि अंग्रेज युवतियां गोपियों की तरह उनके आगे-पीछे मंडराती थी. खूबियाँ ही खूबियाँ थी मेरे सम्बन्धियों में. “

” कोई खूबी अपनी भी सुनाओ, कमाल.”  सुनते ही कमाल कोई बहाना बनाकर भाग उठा.

*******************************************

दादी

-प्राण शर्मा

कुछ महीने पहले गाँव से आई दादी ने अपने दस साल के पोते को अपने पास बिठाकर पूछा-

” तू कितना अच्छा ,कितना आज्ञाकारी है! है न ?”

” हाँ”. पोते ने उत्तर दिया.”

” मेरी एक छोटी सी बात मानेगा ?”

” मानूंगा.”

” मुझे तू क्या कहकर पुकारता है ?”

” दादी माँ .”

” अब से तू मुझे ग्रैंड मम कहकर पुकारा कर.”

” वो क्यों?”  पोते ने जिज्ञासा में पूछा.

” ये आजकल का फैशन है, बेटे. सभी बच्चे अब माँ को

मम और दादी माँ को ग्रैंड मम कहते हैं.

पोता अपनी दादी का चेहरा देखने लगा.

***************************

प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

pran_sharma1

प्रेमिका

-प्राण शर्मा

अनुरागी और मधुरिमा के बीच इन्टरनेट पर रोज़ ही प्रेम-वार्तालाप होना शुरू हो गया. प्रेम-वार्तालाप में वे दोनो इतना खो जाते कि उन्हें खाने-पीने की कोई सुध नहीं रहती. मधुरिमा प्यारी-प्यारी और मधुए-मधुर बातें करती. इश्क के रटे  हुए शेर सुनाती. अनुरागी भी  कुछ कम नहीं थे. प्रेम करने के वे सब गुर जानते थे. कोलेज के दिनों में वे एक-एक करके तीन लड़कियों से प्रेम की पींग चढ़ा चुके थे. साथियों में रांझा के नाम से विख्यात थे वे. मधुरिमा को देखा तो कभी था नहीं उन्होंने लेकिन जब वे उसकी सुन्दरता की भूरी-भूरी प्रशंसा करते -” मधुरिमा, बातें करने में आप कितनी मधुर हैं , देखने में कितनी सुन्दर हैं शायद ही आप जैसा कोई संसार में हैं ” तो मधुरिमा खिल-खिल जाती.

एक दिन मधुर-मधुर बातों के बीच मधुरिमा ने अपने मन की बात कह सुनायी- ” मेरे मन के राजा अनुरागी जी ,आपसे मैं  ब्याह रचाना चाहती हूँ . “जवाब में अनुरागी ने कहा – “ये तो नामुमकिन है. आपकी और मेरी उम्र में बहुत फर्क है. मैं ठहरा बाल-बच्चों वाला और आप ——- “.  मधुरिमा ने अनुरागी की बात को काट कर तुंरत कहा – “तो क्या हुआ, मैं कौन सी कुंवारी हूँ. मैं भी बाल – बच्चों वाली हूँ.”
अनुरागी ने मधुरिमा को बहुत समझाया लेकिन वह कब मानने वाली थी और अनुरागी से ब्याह रचाने की जिद पर अड़ी रही.
अनुरागी चिंता के सागर में गोते लगाने लगे – ऐ भगवान, मुझे बचा. मेरी तौबा अब प्रेम-वेम से. कैसी मुसीबत मोल ले ली है मैंने!
एक दिन मधुरिमा ने कह दिया- ” मुझको  यू.के का वीजा मिल गया है. मैं सबकुछ छोड़- छाड़ कर आपके पास आ रही हूँ “.
सुनकर अनुरागी के पसीने छूट गये. रात की नींद उड़ गयी उनकी. सारी रात करवटें लेते हुए बीती उनकी.
सुबह अनुरागी ने डरते -डरते अपनी पत्नी साहिबा को सारा वृत्तांत सुनाया .
” वो आपसे शादी रचाने आ रही है तो क्या हुआ? सौतन का स्वागत है.”
” पत्नी हो तो ऐसी !” अनुराग पत्नी की प्रशंसा अपने मन में करने ही लगा था कि उसके  कानों में पत्नी के ये शब्द पड़े-
“मधुरिमा कोई और नहीं, मैं ही थी. अपने दफ्तर से मैं ही आपसे चैट करती थी.”

***************************************************

जूता बनाम जूती

-प्राण शर्मा

श्रीमान लाल और श्रीमती लाल  का कवि-सम्मेलनों में आना-जाना लगा रहता है. उनकी कवितायें कैसी भी हों लेकिन गवैयों जैसा स्वर पाया है दोनों ने. दोनो की खूब मांग है. न कभी टैक्स का भुगतान और न ही घर में दाल-भात बनाने की चिंता. दोनो की पाँचों उँगलियाँ घी में.

आज सुबह ही श्रीमान लाल और श्रीमती लाल अलग-अलग कवि-सम्मलेन से घर लौटे थे. दोनो को लम्बे सफ़र की थकान थी. श्रीमान लाल हाथ-मुँह धोकर गुसलखाने से बाहर निकले तो अपने जूतों को देख कर घरवाली से बोले – “लो, जूते पर जूता फिर चढ़ा हुआ है.”

पत्नी अपने जूतों को भी देखकर बोल उठी- “पतिदेव जी, अकेला आपका जूता ही नहीं, देखिये मेरी  जूती भी जूती पर चढ़ी हुई है..”

*********************************

जूते पर जूता चढ़ने का यह अर्थ है कि व्यक्ति फिर यात्रा की तैयारी में है.
एक उर्दू की शायरा शबाना यूसफ ने लिखा है:

अभी तो पहले सफ़र की थकान है पावों में
कि फिर से जूती पे जूती मेरी चढ़ी हुई है.

************************

अगला अंक: २८ अक्टूबर २००९

प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं
**************************



पंकज सुबीर की कहानी- ‘जब दीप जले आना’

“महावीर” और “मंथन” की टीम की तरफ से आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

diwali lamps

‘जब दीप जले आना’ -कहानी

पंकज सुबीर

Subeer Pankajवो लड़की आज भी उसी प्रकार खिड़की में नज़र आ रही है । दोनों तरफ खड़े ग़ुलमोहर के पेड़ों के ठीक बीच बनी हुई वह खिड़की दूर से देखने पर किसी चित्र की तरह नार आती है । उस मकान के जितने दूर से होकर वह रोज़ गुजरता है उतनी दूर से किसी की चीज़ के  बारे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, ठीक ठाक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता । उस मकान का एक पार्श्व उस ओर से दिखाई देता है जिस तरफ से वह निकलता है ।

कंटीले तारों की घेरदार बाड़ के  उस  तरफ  कुछ छोटे फूलदार पौधे लगे हैं । उसके बाद खड़े हैं गुलमोहर के दो पेड़ । जिसके बीच से नजर आती है मकान की वह दीवार जिसमें वह खिड़की बनी है । गहरे नीले रंग से पुती हुई खिड़की । इसी खिड़की पर शायद हाथों की टेक लगा कर उसी प्रकार खड़ी रहती है वह लड़की । रोज़ बिना नागा किसी नियम की तरह ।

एक माह हो गया है शिरीष को यहाँ आये तब से ही वह रास्‍ते कालेज आते और जाते समय इस दृष्य को  देख रहा है । ये नियम कभी नहीं टूटता । जिस सड़क से होकर वह गुजरता है उसके बाद एक बडा सा खाली मैदान है और उसके बाद है वह खिड़की वाला मकान । जो धीरे धीरे शिरीष के लिये कौतुहल और उत्सुकता का पर्याय बनता जा रहा है ।

मकान के ठीक समांनातर पर आकर शिरीष ने मकान की ओर  देखा । लडक़ी उसी प्रकार वहां थी, शिरीष को लगा कि वह लड़की मुस्कुरा रही है, फिर उसे अपने ही विचार पर हंसी आ गई । भला इतनी दूर से नज़र आ भी सकता है कि किसी के चेहरे पर किस प्रकार के भाव हैं ? यहां से तो उस लड़की की पीली फ्राक पर बने हुए लाल फूल भी ठीक ठीक दिखाई नहीं  देते हैं । पीली फ्राक ….? लाल फूल ….? चलते चलते शिरीष को अचानक झटका सा लगा, ये तो उसने कभी सोचा ही नहीं । एक माह से रोज़ वो लड़की इसी फ्राक में नज़र आ रही  है । उसने ठिठक कर मकान की ओर  देखा लड़की उसी प्रकार वहां थी । जरूर ही यह कोई पेंटिंग है जो किसी चित्रकार ने मकान की इस तरफ वाली दीवार पर बना दी है । उसने गौर से खिड़की की तरफ देखा और कुछ देर तक देखता रहा, लड़की इस बार उसे बिल्कुल स्थिर किसी पेंटिंग की तरह नज़र आई । उसने मुस्कुराते हुए अपने ही सर पर चपत लगाई ”फिजूल ही  एक पेंटिंग के चक्कर में एक महीने से परेशान है”  । और आगे बढ़ गया ।

शाम को जब कालेज से लौट रहा था तो अपनी सुबह की खोज पर मुस्कुराते हुए उसने खिड़की की ओर देखा एक बार फिर उसके पैर जम गये । लड़की खिड़की पर नहीं थी । एक माह में ये पहली बार हुआ है कि शिरीष को वह लड़की खिड़की पर  नहीं दिखाई  दी है । सुबह की उसकी खोज पर पानी फिर गया ।

कमरे पर लौटकर उसका किसी काम में मन नहीं लगा, एक ग्लास पानी पीकर पलंग पर  आकर  लेट गया । खिड़की के बाहर दिन के रात में परिवर्तित होने की क्रियाऐं चल रही हैं । आज पहली बार उस लड़की ने शिरीष को उलझन में डाल दिया है । एक विचित्र सा रहस्यमय आकर्षण उसे उस खिड़की की ओर खींच रहा है क्या यही प्रेम है ? फिर उसे अपने  ही फिज़ूल के विचार पर हंसी आ गई । इतनी दूर से नार आने वाली एक धुंधली सी आकृति भला प्रेम कैसे हो सकती है । मगर फिर है क्या आखिर ? क्यों खिंचाव सा महसूस हो रहा है उसे । कुछ तो है ।

लेटे लेटे ही शिरीष ने तय कर लिया कि  दीपावली के दिन वह जाएगा उस लड़की से मिलने । अगले सप्ताह दीपावली है,  दीपावली की छुट्टियों में घर जाने का उसका कोई कार्यक्रम नहीं है, यहाँ रहकर पढ़ाई करना चाह रहा है वह । दीपावली के दिन जाएगा वह उस लड़की से मिलने । और किसी दिन जाएगा तो शायद उस घर के लोग अन्यथा ले लें लेकिन दीपावली को कोई भी अन्यथा नहीं लेगा । उस लड़की से मिलना इस लिए भी ज़रूरी है क्योंकि वह लड़की अब उसकी पढ़ाई में बाधक बन रही है । निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से आया है वह, उसके माता पिता ने खुद के काफी सारे सपनों को स्थगित करते हुए उसे उसके सपने पूरे करने भेजा है यहां । वह किसी भी कारण  इन सपनों के खंडित टुकड़े लेकर पराजित योद्धा की तरह वापस नहीं लौटना चाहता ।

अगले  दिन जब शिरीष वहां  से गुज़रा तो लड़की वहीं थी, उसी प्रकार अपनी लाल फूलों वाली पीली फ्राक पहने हुए । मगर आज शिरीष को कोई तनाव  नहीं है दीपावली के दिन वह इस गुत्थी को सुलझा ही लेगा । शिरीष खिड़की की ओर देखकर मुस्कुराया आज फिर उसे लगा कि वह लड़की भी मुस्कु रा रही है । लड़की के मुस्कुराते ही खिड़की के दोनों तरफ खड़े गुलमोहर  के हरे भरे पेड़ भी मुस्कुराने लगे हैं । कंटीले तार के पास कतार में खड़े गुलाब के पोधों में चटक चटक कर कुछ कलियाँ फूल बनने लगी हैं और दिन की धूप ज़र्द से अचानक सफेद होकर चांदनी बनती जा रही है, हवाओं में धीमी धीमी घंटियां बजने लगी हैं, मानो कोई भेड़ों का  रेवड़ पास से होकर गुजर रहा हो । शिरीष स्तब्ध सा खड़ा उस खिड़की की ओर देखता रहा उसे लगा मानो मकान के पहिये लग गए हैं और वह मकान मैदान  को पार करता हुआ धीरे-धीरे  उसकी ओर बढता  आ रहा है । ”ए भाई अब चलो भी, रास्ता घेर कर क्यों  खडे हो ?” पीछे से किसी की आवाज़ सुनकर शिरीष की तंद्रा टूटी । ठंडी सांस छोड़ते हुए वह अपनी राह पर बढ़ गया ।

बीच के सात दिन बड़ी उहापोह में गुजरे शिरीष के । कई बार लगता कि कालेज जाते समय मुड जाए उस घर की ओर । मगर मर्यादाओं के प्रश् पैरों में गुंथ कर थाम लेते । क्या कहेगा वहाँ जाकर ? किसको जानता है वो वहाँ ? दीपावली का दिन ऐसा लगा मानो वर्षों  के इंताज़ार के बाद आया । जैसे समय का पहिया किसी रेतीले टीले में  फंसकर सुस्त हो गया  हो । उस पर भी दीपावली  का पूरा दिन काटना उसके लिए किसी युग को काटने  के समान हो गया । शाम  ढले जब सूर्य ने अपनी सत्ता मावस के अंधेरे असमान पर टिमटिमाते सितारों को सौंप कर अस्ताचल में विदा ली तो अंधेरे को चुनौती देते हुए जगमगा उठे हजारों हजार दीपक  । शिरीष ने कमरे से बाहर आकर देखा तो चारों तरफ पृथ्वी पर सितारे उतरे हुए थे । अंधेरा अपना साम्राज्य पसारना चाह रहा था पर विफल होकर कहीं अटका हुआ था । शिरीष ने घड़ी देखी आठ बज रहे हैं बाज़ार से मिठाई वगैरह खरीदने में आधा घंटा तो लग ही जाएगा । तब तक लक्ष्मी पूजन भी हो जाएगी तब ही जाना ठीक रहेगा । सोचता हुआ वह कमरे पर ताला लगा कर निकल पड़ा । बाजार से मिठाई खरीद कर लौटने में उसकी उम्मीद से ज्यादा समय लगा गया कितनी भीड़ थी दुकान पर आधे घंटे में उसका नंबर आया । मिठाई और शुभकामना संदेश खरीद कर लौट पड़ा वह ।

तिराहे पर आकर उसके पैर ठिठक गए यहाँ से ही तो एक रास्ता उस नीली खिड़की वाले मकान की ओर गया है । कुछ देर तक ठहर कर  सोचता रहा फिर सधे कदमों से उस मकान की ओर  जाने वाले रास्ते पर बढ़ गया ।  छोटा सा मकान खामोशियों में  डूबा हुआ था गेट के दोनों तरफ दीपकों की पंक्तियाँ  झिलमिला रहीं थीं जो कतार में मकान से जुड़ी पगडंडी को घेरते हुए मकान तक गईं थीं । मकान का वह पार्श्व जहाँ वह खिड़की है सामने से नज़र नहीं आ रहा था । गेट खोलकर शिरीष  अंदर आया और झिझकते कदमों से आगे बढ़ा।

”कौन ?”  गेट के खुलने और बंद होने की आवाज़ से अंदर से एक स्त्री स्वर आया ।

”जी मैं हूं शिरीष” अपने ही  उत्तर के अटपटेपन को महसूस किया शिरीष ने ।

कुछ देर में दरवाज़ा खुला, एक अधेड उम्र की महिला दरवाजे पर खड़ीं थीं । स्थिति असहज बनने से पहले ही शिरीष ने उनके हाथ में मिठाई का डब्बा तथा शुभकामना संदेश थमा कर उनके पैर छू लिए ”दीपावली की शुभकामानाएं आंटी”। ”बस बस ,खुश रहो । आओ, अंदर आओ” कहते हुए वे दरवाजे से हट गईं ।

अंदर आकर शिरीष ने देखा चारों तरफ ख़ामोशी बिछी हुई है ”तुम बैठो बेटा मैं अभी आती हूं ”  कह कर वो महिला अंदर चली गईं । कुछ  देर बाद एक प्लेट में नाश्ता वगैरह लेकर लौटीं । टेबल पर रखते हुए बोलीं ”लो बेटा दीपावली की मिठाई खाओ”।

मिठाई का एक छोटा सा टुकड़ा उठाते हुए कहा शिरीष ने ”और कोई नहीं है घर में ?”।

”मैं यहाँ अकेली ही रहती हूँ ” महिला का उत्तर सुनकर शिरीष को ऐसा लगा मानो कोई बड़ा पटाखा उसके ठीक पास ही चल गया हो । उसने देखा सामने दीवार पर एक लड़की की फोटो लगी है, उसने अटकते हुए पूछा ”और ये ? ” ।

” ये मेरी बेटी थी, दो साल पहले नहीं रही । ” महिला ने ठंडे स्वर में उत्तर दिया ।

महिला का एक एक शब्द शिरीष को किसी कुंए में गूंजता प्रतीत हो रहा था ”दोनो पैरों से विकलांग थी सुधा, मगर दोनो ऑंखें सपनों से भरी रहतीं थीं हमेशा । जैसे जैसे बडी होने लगी उसके सपने प्रेम की दस्तक सुनने की प्रतीक्षा में सुनहले रुपहले होने लगे । खिड़की पर बैठकर घंटों रास्ते की ओर देखती रहती । मानो किसी की प्रतीक्षा कर रही हो । किसी से प्रेम करना चाहती थी वह, और इसी लिए अपने जीवन में प्रेम की प्रतीक्षा करती रहती थी । दीपावली के दिन बाहर पगडंडी के दोनों तरफ कतार से दीपक लगवाती, मैं पूछती तो कहती ”इससे आने वाले को लगता है कि उसका स्वागत में पलके बिछीं हुईं हैं कोई उसके आने की प्रतिक्षा कर रहा है । सपने देखने वाली उसकी ऑंखें दो साल पहले अचानक बुझ गईं” कहते कहते महिला का कंठ रुंध गया ।

शिरीष अवचेतन से वर्तमान में लौटा और बोला ”सॉरी आंटी मुझे पता नहीं था”।

”कोई बात नहीं बेटा, मिठाई तो लो तुम तो कुछ ले ही नहीं रहे” महिला ने अपने को संभालते हुए कहा ”नहीं आंटी अब मैं चलूंगा, और भी जगह जाना  है मिलना है” कहते हुए शिरीष उठ कर खड़ा हो गया । महिला उसे गेट तक छोड़ने आईं । जब विदा लेकर वह चलने लगा तो पीछे से महिला की आवाज़ आई ”बेटा” । सुनकर शिरीष ठिठक कर पलटा  और बोला ”जी आंटी ” ।

वो महिला कुछ न बोली बस शिरीष की ओर देखती रही । शिरीष  भी चुपचाप खड़ा कुछ देर तक महिला के निचले होंठ और ठुड्डी में होते हुए कंपन तथा पलकों के भीगते किनारों को देखता रहा, फिर अचानक महिला ने कांपते स्वर में शिरीष की ओर देखते हुए पूछा

”क्या तुम्हें भी नज़र आई थी वह ?”

(समाप्त)

*********************************
अगला अंक: २१ अक्तूबर २००९
प्राण शर्मा की दो लघुकथाएँ
*********************************


प्राण शर्मा और देवी नागरानी की लघुकथाएं

लघुकथा-

खट्टे संतरे
प्राण शर्मा

pran_sharma round

रमेश बड़े शौक़ से खाने के लिए साफ़ सुथरे और चमचम करते संतरे सुबह सब्जी मंडीसे खरीद कर लाया था. उसकी आदत है रात को रोटी खाने के बाद दो-तीन संतरे लेने की. रोटी खाने के बाद दो-तीन संतरे लेने से सुबह खुलकर पखाना आता है, ऎसी उसकी मान्यता है.

रात को भोजन करने के पश्चात रमेश से पहला संतरा चखा नहीं गया. नींबू से भी ज्यादा खट्टा था वो. गुस्से में उसने थाली में पटक दिया उसको, क्या करता वो? इतना खट्टा संतरा उसने पहले कभी चखा नहीं था.

रमेश ने दूसरा संतरा चखा. वह और भी खट्टा निकला. मुंह बना कर उसने उसको भी थाली में पटक दिया.

रमेश ने तीसरा संतरा चखा. उफ़, वो भी खट्टा. दांत किचकिचाते हुए उसने तीसरा संतरा भी थाली में दे मारा.

थोड़ी देर के बाद रमेश को लगा कि थाली में पड़े तीनों संतरे अपनी दुर्दशा से आहत होकर एक स्वर में उससे कह रहे हैं  “साब, आपने हमें थाली में इस तरह क्यों फ़ेंक दिया है?”  “इसलिए मैंने फ़ेंक दिया है तुम्हें थाली में क्योंकि तुम तीनों ही नींबू से ज्यादा खट्टे हो. देखो, तुम तीनों की एक फाड़ी ने ही मेरे दांत खट्टे करके रख दिए.”
“साब, अगर हम खट्टे हैं तो हमारा क्या कुसूर है?
कसूर तो उनका है जिन्होंने हमें उगाया है और सींचा है.”

******************

लघुकथा-

‘पत्थर दिल’
देवी नागरानी

devi_nangraniरमेश कब कैसे, किन हालात के कारण इतना बदल गया यह अंदाजा लगाना उसके पिता सेठ दीनानाथ के लिये मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगा । अपने घर की दहलीज पार करके उसके बंगले के सामने खड़े होकर सोचते रहे – जो मान सम्मान, इज्ज़त उम्र गुजा़र कर पाई, आज वहीं अपने बेटे की चौखट पर झुकेगी, वो भी इसलिये कि उसकी पत्नी राधा मृत्यु-शैया पर लेटी अपने बेटे का मुंह देखने की रट लगाये जा रही थी – मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा। दरवाजे पर लगी बेल बजाते ही घर की नौकरानी ”कौन है” के आवाज़ के साथ उन्हें न पहचानते हुए उनका परिचय पूछ बैठी.

“मैं रमेश का बाप हूँ, उसे बुलाएं.” वह चकित मुद्रा में सोचती हुई अंदर संदेश लेकर गई और तुरंत ही रोती सी सूरत लेकर लौटी. जो उत्तर वह लाई थी वह तो उसके पीछे से आती तेज़ तलवार की धार जैसी उस आवाज में ही उन्हें सूद समेत मिल गया.

“जाकर उनसे कह दो यहां कोई उनका बेटा-वेटा नहीं रहता । जिस गुरबत में उन्होने मुझे पाला पोसा, उसकी संकरी गली की बदबू से निकल कर अब मैं आजा़द आकाश का पंछी हो गया हूँ. मै किसी रिश्ते-विश्ते को नहीं मानता. पैसा ही मेरा भगवान है. अगर उन्हें जरूरत हो तो कुछ उन्हें भी दे सकता हूँ जो उनकी पत्नी की जान बचा पायेगा शायद ………….!!” और उसके आगे वह कुछ न सुन पाया. खामोशियों के सन्नाटे से घिरा दीनानाथ लड़खड़ाते कदमों से वापस लौटा जैसे किसी पत्थर दिल से उनकी मुलाकात हुई हो ।
देवी नागरानी
******************

प्राण शर्मा की लघुकथा- शुभचिंतक

pran_sharma1

प्राण शर्मा

लघुकथा-

शुभचिंतक

प्राण शर्मा

भोलानाथ जी के सुपुत्र प्रभात के विवाह की बात विवेकनाथ जी की सुपुत्री निशा के साथ पक्की  हो चुकी थी। दोनों और से विवाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से होने लगी थी।सगुन के गीत गाये जाने लगे थे।

एक दिन पहली डाक से विवेकनाथ  को एक लिफाफा मिला। लिफाफे पर “अर्जेंट” लिखा था।  उनहोंने तुंरत लिफाफा खोला। कागज़ के एक टुकड़े पर अटपटी लिखावट में लिखा था-”जिस लड़के  से आपने  अपनी लड़की का रिश्ता जोड़ा है,सच पूछिए तो वो चरित्रहीन है। शहर में कई लड़कियों  के साथ उसके नाजायज़  सम्बन्ध हैं। क्या ऐसी चरित्रहीन लड़के को आप अपने दामाद  के रूप में स्वीकार करेंगे? बिरादरी और समाज में आपकी नाक न कट जाए इसलिए मैं ये बात आपको लिख रहा हूँ। बदनामी से बचाने के लिए आपको सावदान करना मेरा फ़र्ज़ है, आपका  और आपके समूचे परिवार का एक शुभचिंतक।

शुभ चिन्तक मोटे-मोटे शब्दों में लिखा हुआ था। पत्र की इबारत पढ़ते ही विवेक नाथ का शरीर  सुन्न हो गया और उनके पैरों के नीचे  से ज़मीन खिसक गयी । बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने आपको संभाला। सँभलते ही वे  सीधे भोला नाथ जी के  घर पहुँचे। क्रोध से तमतमाए हुए थे वे।

एक कागज़ का टुकडा भोला नाथ जी के चेहरे पर उछालते हुए दहाड़े –  पढो अपने कुपुत्र की करतूतें । लफंगा , दुराचारी । शहर की कई लड़कियों के साथ उसके नाजायज़ सम्बन्ध हैं।”

भोला नाथ जी ने भी कागज़ का एक टुकडा विवेक नाथ जी को थमा दिया। इबारत पढ़ते ही  विवेक नाथ को बात समझने में देर नहीं लगी।

देखते-ही-देखते दोनों के चेहरे खिलखिला उठे।

प्राण शर्मा

—————————————————–

देवी नागरानी की लघुकथा – ‘दो गज़ ज़मीन चाहिए’

devi_nangrani लघुकथा:

“दो गज़ ज़मीन चाहिए”
देवी नागरानी

सुधा अपनी सहेलियों के साथ कार के हिचकोलों का आनंद लेती हुई खुशनुमा माहौल का भरपूर आनंद लुटा रही थी. अक्टूबर का महीना, कार के शीशे बंद, दायें बाएँ शिकागो की हरियाली अपने आप को जैसे इन्द्रधनुषी रंगों का पैरहन पहना रही हो.

जानलेवा सुन्दरता में असुंदर कोई भी वस्तु खटक जाती है; इसका अहसास उसे तब हुआ जब उसकी सहेली ने रास्ते में एक ढाबे पर चाय के लिए कार रोकी. चाय की चुस्की लेते हुए उसी सहेली ने जिसकी कर थी, अपने बालों को हवा में खुला छोड़ते हुए चाय के ज़ायके में कुछ घोलकर कहा -
‘सुधा, अपनी कार का होना कितना जरूरी है, जब चाहो, जहाँ चाहो, आनंद बटोरने चले जाओ. यह एक जरूरत सी बन गई है. बिना उसके कहाँ बेपर परिंदे उड़ पते हैं?’

सुधा नज़रअंदाज़ न कर पाई. तीर निशाने पर बैठा था. अपनी औकात वह जानती थी और उसीका परिचय सभी सहेलियों से बिना किसी मिलावट के अपनी मुस्कान के साथ कराते हुए कहा, “मैं ज्यादा पैसे वाली तो नहीं, पर मुझे अपनी ज़रूरतों और दायरों का अहसास है. उन्हीं कम ज़रूरतों ने मुझे सिखाया है कि मुझे फ़क़त “दो गज़ ज़मीन चाहिए.”

देवी नागरानी, न्यू जर्सी, यू. एस. ए.
dnangrani@gmail.com

बुधवार, ३० सितम्बर २००९ से ६ सितम्बर २००९ तक
इसी ब्लॉग पर पढ़िये:

प्राण शर्मा की लघुकथा
‘शुभचिंतक’

भारत से रूप सिंह चंदेल की कहानी – “भेड़िये”

श्री रूप सिंह चंदेल जी का संक्षिप्त परिचय:

chandelRS१२ मार्च, १९५१ को कानपुर के गाँव नौगवां (गौतम) में जन्मे वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल कानपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. हैं।

* अब तक उनकी ३९ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें ७ उपन्यास  जिसमें से ‘रमला बहू’, ‘पाथरटीला’, ‘नटसार’ और ‘शहर गवाह है’ -  चर्चित रहे हैं, १० कहानी संग्रह, ३ किशोर उपन्यास, १० बाल कहानी संग्रह, २ लघुकथा संग्रह, यात्रा संस्मरण, आलोचना, अपराध विज्ञान, २ संपादित पुस्तकें सम्मिलित हैं।

* इनके अतिरिक्त बहुचर्चित जीवनीपरक पुस्तक ‘दॉस्तोएव्स्की के प्रेम’ (जीवनी)  संवाद प्रकाशन, मेरठ से २००८ प्रकाशित से प्रकाशित हुई थी।

* उन्होंने महान रूसी लेखक लियो तोल्स्तोय के अंतिम उपन्यास ‘हाजी मुराद’ का हिन्दी में पहली बार अनुवाद किया है जो २००८ में ‘संवाद प्रकाशन’ मेरठ से प्रकाशित हुआ था।

* हाल में लियो तोल्स्तोय पर उनके रिश्तेदारों, मित्रों, सहयोगियों, लेखकों और रंगकर्मियों द्वारा लिखे संस्मरणों का अनुवाद किया है जो ’संवाद प्रकाशन’ से ही ’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’ से शीघ्र प्रकाश्य है.

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

चिट्ठे- रचना समय, वातायन और रचना यात्रा

संप्रति: roopchandel@gmail.com
roopschandel@gmail.com

***********************************

कहानी

भेड़िये

रूपसिंह चन्देल

ठंड कुछ बढ़ गई थी. बौखलाई-सी हवा हू-हू करती हुई चल रही थी. उसने शरीर पर झीनी धोती के ऊपर एक पुरानी चादर लपेट रखी थी, लेकिन रह-रहकर हवा के तेज झोंके आवारा कुत्ते की तरह दौड़ते हुए आते और चादर के नीचे धोती को बेधते हुए बदन को झकझोर जाते. वह लगातार कांप रही थी और कांपने से बचने के लिए उसने दोनों हाथ मजबूती से छाती से बांध लिए थे; और दांतों को किटकिटाने से बचाने के लिए होठों को भींच रखा था.

‘भिखुआ आ जाता तो, कितना अच्छा होता.’ वह सोचने लगी –’किसी तरह छिप-छिपाकर दोनों उस शहर से दूर चले जाते, जहां वे उन्हें ढूंढ़ न पाते. आज चौथा दिन है उसे गए— न कोई चिट्ठी , न तार, जबकि जाते समय उसने कहा था कि तीसरे दिन वह जरूर आ जाएगा. बापू की तबीयत अगर ज्यादा खराब हुई तो उन्हें साथ लेता आएगा.’

मेनगेट के पास खड़े पीपल के पेड़ से कोई परिंदा पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ा, तो बिल्डिंग के अंधेरे कोने में छिपे कई चमगादड़ एक साथ बाहर निकल भागे. वह चौंक उठी और उन्हें देखने लगी. क्षण-भर बाद वे फिर अंधेरे कोनों में जा छिपे. तभी उसे लगा, जैसे कोई आ रहा है. उसने इधर-उधर देखा, कोई दिखाई नहीं पड़ा.

‘पता नहीं वह सिपाही कहां गुम हो गया— कह रहा था — अभी बुला लाता है थानेदार को. साहब सो रहे होंगे. रात भी तो काफी हो चुकी है. साहब लोग ठहरे—- आराम से उठेंगे, तब आएंगे—-’

उसे इस समय भिखुआ की याद कुछ अधिक ही आ रही थी. ’उसे जरूर आ जाना चाहिए था. हो सकता है, बापू की तबीयत कुछ ज्यादा खराब हो गई हो. न वह उन्हें ला पा रहा होगा, न आप आ पा रहा  होगा. लेकिन उसे उसकी चिंता भी तो करनी ही चाहिए थी. जबकि उसने उस दिन उसे बता दिया था कि उनमें से एक — महावीरा को उसने सड़क के मोड़ वाली पान की दुकान पर खड़े देखा था.’

“तू नाहक काहे कू डरती है रे. उनकी अब इतनी हिम्मत नाय कि तोको लै जांय. मुफ्त मा नाय लाया था तोको. पूरे पांच हजार गिने थे—ऊ का नाम —- शिवमंगला को. बाद में ’कोरट’ में अपुन ने रजिस्ट्री भी तो करवा ली थी. अब अपुन को कौन अलग करि सकत है ?” भीखू ने उसके गाल थपथपाते हुए कहा था.

“तू कछू नाई जानत, भीखू, वो कितने जालिम हैं. शिवमंगला जो है न, यो सबते अपन को मेरा मामा बताउत है. वैसे भी यो मामा है, दूर-दराज का. मेरे बापू की लाचारी और मजबूरी का फायदा उठाकर इसी पापी ने मेरी पहली शादी करवाने का ढोंग किया था, बूढ़े बिरजू के साथ. खुद एक हजार लेकर, एक हजार बापू को दिए थे. और उसके बाद, मां और बापू के मरने के बाद, यो महावीरा के साथ मिलकर —- सातवीं बार तेरे हाथ मेरे को—–” वह रोने लगी थी.

“भूल भी जा अब पुरानी बातों को, सोनकी. अब कोई चिंता की बात नईं. मैं पुलिस-थाने को सब बता दूंगा. तू काहे को फिकर करती ?” उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता हुआ भीखू बोला, तो वह निश्चिंत हो सोचने लगी थी कि दुनिया में अब कोई तो है उसका, जो उसे चाहने लगा है. उससे पहले शिवमंगला ने जिसके साथ भी उसे बांधा, साल-डेढ़ साल से अधिक नहीं रह पाई थी वह उसके साथ.

शिवमंगला पहले ही उससे कह देता, “साल-डेढ़ साल रह ले. जमा-पूंजी जान ले, कहां कितनी है. उसके बाद मैं एक दिन आऊंगा—तुझे लेने. सारी पूंजी बांध, चल देना. न-नुकर की, तो तड़पा-तड़पाकर मारूंगा.”

****

और वह चाबी-भरे खिलौने की तरह उसका कहना मानने को मजबूर होती रही सदैव. चौथे मरद के साथ जमना चाहा, तो पुलिस को साथ लेकर वह जा पहुंचा और उसको यह कहकर पकड़वा दिया कि वह उसकी इस अनाथ भांजी– सोनिया — को भगा लाया है. तब उसने चाहा था कि पुलिस को सब कुछ बता दे, लेकिन महावीरा ने कान के पास धीरे से कहा था, “अगर मुंह खोला—- तो समझ लेना—-.”

वह उनके साथ घिसटती चली गई थी, पांचवें के पास जाने के लिए. एक शहर से दूसरे शहर भटकती रही है वह, क्योंकि कभी भी उन्होंने उसे एक ही शहर में दूसरी बार नहीं बेचा. हर बार, जब तक कोई ग्राहक उन्हें नहीं मिलता, शिवमंगला खुद हर रात उसके शरीर से खेलता रहता. कभी-कभी इस खेल में महावीरा को भी शामिल कर लेता. वह कराहती, तड़पती, लेकिन शिवमंगला भूखे भेड़िये की तरह उसके शरीर को नोचता रहता और तब वह उस यातना से मुक्ति पाने के लिए कुछ दिनों के लिए ही सही, किसी-न-किसी के हातों बिक जाना बेहतर समझती.

***

खट—खट—खट  ! गेट की ओर कुछ कदमों की आहट सुनाई पड़ी. कोई ट्रक चिघ्घाड़ता हुआ सड़क पर गुजरा. उसकी रोशनी में उसने चार सिपाहियों को अपनी ओर आते देखा. वह कुछ संभलकर बैठ गई. सोचा, शायद थानेदार साहब आ रहे हैं.

“तू यहां किसलिए—-ऎं !” चारों उसके सामने खड़े थे. वह सिपाही, जो थाने पहुंचते ही उसे मिला था और जिससे उसने थानेदार को बुलाने के लिए कहा था, उनके साथ था.

“हुजूर, मैं थानेदार साब को—- कुछ बतावन खातिर—-” कांपती हुई वह खड़ी हो गई.

“क्या बताना है ? इस समय वो कुछ नहीं सुनेंगे— सुबह आना.” लंबी मूंछोंवाला, जो आगे खड़ा था ओवरकोट पहने, गुर्राकर बोला.

“हुजूर, वो—वो– मेरे पीछे पड़े हैं. मैं –मैं…” उसकी जुबान लटपटा गई.

“तू उनके पीछे पड़ जा न—हा—हा—हा—हा—-.”

“दुबे, क्या इरादा है, मिलवा दिया जाए इसे थानेदार साब से ?” लंबी मूंछोंवाले के पीछे खड़े सिपाही ने, जिसके होंठ मोटे थे और उसने भी ओवरकोट पहन रखा था, बोला. शेष तीनों उसकी ओर देखने लगे. टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में चारों ने आंखों ही आंखों में कुछ बात की और वापस मुड़ गए.

“अभी बुलाकर लाते हैं थानेदार साब को. तू यहीं बैठ.” जाते-जाते एक बोला.

चारों चले गए, तो वह आश्वस्त हुई थी कि थानेदार को जरूर बुला देंगे. वह फिर बैठ गई उसी प्रकार और सोचने लगी कि कैसे और क्या कहेगी वह थानेदार से. लेकिन जैसे भी हो, वह उसे सब कुछ बता देगी—- बचपन से अब तक क्या बीती है उस पर —- सब कुछ. धीरे-धीरे वह पुरानी स्मृतियों में खोने लगी. हवा का क्रोध कुछ शांत होता-सा लगा, लेकिन ठंड ज्यों-की-त्यों थी.

****

बापू ने बहुत सोच-विचारकर उसका नाम रखा था — सोनिया. एक कहानी बताई थी उन्होंने कभी उसे– जिस दिन वह पैदा हुई थी, बाप को मालिक के खेत में हल जोतते समय सोने का कंगन मिला था.बापू ने चुपचाप वह कंगन मालिक को दे दिया था. उनका कहना था कि जिसके खेत में उन्हें कंगन मिला है, उस पर उसी का अधिकार बनता है. मालिक ने उसके बदले दस रुपये इनाम दिए थे बापू को. वह उसी से खुश था—-”बेटी भाग्यवान है. तभी तो सोना मिला था मुझे. मैं इसका नाम सोनिया रखूंगा.” और उस दिन से ही वह सोनिया और दुलार-प्यार में सोना हो गई थी.

लेकिन बापू की कल्पना कितनी खोखली सिद्ध हुई थी. उसके जन्म के बाद घर की हालत और खस्ता होती चली गई थी. मां बीमार रहने लगी थी. काम करने वाला अकेला बापू– वह भी मजूर— और खाने वाले तीन. जब वह छः-सात साल की थी, तभी से बापू के साथ काम पर जाने लगी थी और जिन हाथों को पाटी और कलम-बोरकला पकड़ना था, वे खुरपी और हंसिया पकड़ने लगे थे. वह बड़ी होती गई—- मां चारपाई पकड़ती गई और बापू का शरीर कमजोर होता गया था. बापू उसे लेकर चिंतित रहने लगा था — उसके विवाह के लिए. कहां से लाएगा दहेज, जब खाने के लाले पड़े हों ! और तभी एक दिन मां की तबीयत अधिक बिगड़ गई थी.बापू इधर-उधर भटकता रहा था पैसों के लिए. उस दिन यही इसका दूर-दराज का मामा— शिवमंगला आया था बापू के पास और कुछ व्यवस्था करने का आश्वासन दे गया था.

दूसरे दिन वह बिरजू के साथा आया. कोठरी के अंदर कुछ गुपचुप बातें हुईं और फिर उसने देखा कि बिरजू बापू को सौ-सौ के दस नोट पकड़ा गया था. मां का इलाज शुरू हो गया था . वह कुछ ठीक भी होने लगी थी. लगभग पंद्रह दिन बीत गए कि बिरजू फिर आया, शिवमंगला के साथ. उस दिन बापू ने उसे बताया कि उन्होंने बिरजू के साथ उसकी शादी तय कर दी है. वह आज उसे लेने आया है.

आंखें छिपाते हुए बापू बोला था, “सोना बेटा, मैंने बहुत बड़ा पाप किया है, जिसकी सजा मुझे भगवान देगा. लेकिन बेटा, यह पाप मुझे तेरी मां के लिए करना पड़ा है. तू मुझे माफ कर देना, बेटा.”

वह बापू से लिपटकर रोई थी फूट-फूटकर. बापू उसके सिर पर हाथ फेरता रहा था, फिर बिरजू से बोला था, “पाहुन, मेरी सोना अभी छोटी है. पंद्रह साल की है. बड़े कष्टों में मैंने इसे पाला है. इसे आप कष्ट न देना.”

चलने से पहले बिरजू ने बापू को आश्वस्त किया था—

जब तक सोना बिरजू के पास रही, मानसिक कष्ट तो उसे भोगने पड़े, लेकिन जीवन की सुख-सुविधा के तमाम साधन उसने जुट रखे थे उसके लिए.

दो साल वह उसके पास रही थी. इन्हीं दो वर्षों में पहले मां और बाद में बापू के चल बसने का समाचार उसे मिला था.

और दो वर्षों बाद— एक दिन शिवमंगला के धमकाने पर उसे बिरजू का घर छोड़ना पड़ा था. उसके बाद शुरू हो गया था उसके बसने और उजड़ने का सिलसिला.

भीखू को बेचते समय भी शिवमंगला ने उसे चेता दिया था कि डेढ़-दो साल से अधिक नहीं रहना है इसके पास. एक दिन वह आएगा और उसे ले जाएगा. शुरू में कुछ महीने वह यह सोचकर रहती रही कि एक दिन उसका साथ भी छोड़ना पड़ेगा. अधिक माया-मोह बढ़ाना ठीक नहीं समझा उसने, लेकिन भीखू का निश्छल प्यार धीरे-धीरे उसे बांधता चला गया और वह महसूस करने लगी कि वह भीखू को कभी छोड़ नहीं पाएगी. इतना प्यार उसे किसी ने न दिया था—चौथे ने भी नहीं. सभी उससे किसी खरीदे माल की तरह जल्दी -से-जल्दी, अधिक-से-अधिक कीमत वसूल कर लेना चाहते. भीखू को उसने सबसे अलग पाया था. जिस अपनत्व-प्यार के लिए वह तरसती आई थी, भीखू ने उसे दिया था. और इसलिए उसने उस दिन अपने अंधे अतीत का एक-एक पृष्ठ खोलकर रख दिया था उसके सामने.

सुनकर भीखू ने जो कुछ कहा था, उससे उसने महसूस किया था कि उसके कष्टों के दिन बीत गए. उसका जीवनतरु अब नई रोशनी में पल्लवित,विकसित और पुष्पित हो सकेगा. भावातिरेकवश वह भीखू के सामने झुक गई थी, उसकी चरणरज माथे से लगाने के लिए, लेकिन भीखू ने उसे पहले ही पकड़ लिया था, “सोना, मैं तुझ पर कोई एहसान थोड़े ही कर रहा हूं. अनपढ़-गंवार जरूर हूं, लेकिन हूं तो इनसान. इनसान होने के नाते उन भेड़ियों से तुझे बचाना मेरा फर्ज है. मेरे पैर छुकर तू मुझे महान मत बना. मैं बस, इनसान ही रहना चाहता हूं.”

प्यार से आंसू उमड़ पड़े थे उसके—- उस क्षण उसने निर्णय किया था —- अब वह उनके डराने-धमकाने के सामने नहीं झुकेगी. भीखू को छोड़कर वह कभी नहीं जाएगी.

उस दिन पान की दुकान के पास दिखने के बाद महावीरा जब दोबारा उसे नहीं दिखा, तो वह कुछ निश्चिंत -सी हो गई थी. कुछ भय भीखू ने कम कर दिया था— और जब भीखू गांव जाने लगा, तब वह बोली थी, “मेरी ज्यादा चिंता न करना तुम. बापू को—-” बात बीच में ही रोक दी थी, क्योंकि डर तब भी उसके अंदर अपने पंजे गड़ा रहा था.

“चिंता तो रहेगी ही, सोना. अगर कोई खतरा दिखे तो पुलिस-थाने की मदद ले लेना.”

शायद भीखू को भी इस बात का डर सता रहा था कि उसके जाने के बाद वे आ सकते हैं—-.

लेकिन जैसे-जैसे एक-एक दिन भीखू के जाने के बाद बिना किसी संकट के कटते चले गए, सोना बिलकुल निश्चिंत होती गई. कोठरी का दरवाजा सांझ ढलने के साथ ही वह बंद कर लिया करती थी. आज भी दरवाजा बंद कर वह भीखू का इंतजार कर रही थी. शायद आखिरी बस से आ जाए—- और जब दरवाजे पर दस्तक हुई, तो दौड़कर उसने दरवाजा खोला. लेकिन भीखू नहीं, सामने शिवमंगला खड़ा था.मुंह से शराब की बदबू छोड़ता हुआ.

“तो रानीजी पति का इंतजार कर रही हैं—-” वह कमरे में घुस आया. वह एक ओर हट गयी. शिवमंगला निश्चिंततापूर्वक चारपाई पर बैठ गया. उसे अवसर मिल गया था. वह तीर की तरह वहां से भाग निकली . सीधे थाने में जाकर ही दम लिया .

****

खट—खट—-खट—-खट—-

उसके कान फिर चौकन्ने हो गए. एक सिपाही चला आ रहा था.

“चलो, थानेदार साब बुला रहे हैं.”

वह उसके पीछे हो चली– ठंड से दोहरी होती हुई.

****

रात-भर चारों सिपाही एक के बाद एक उसके शरीर को नोचते - झिंझोंड़ते रहे. वह चीखती-चिल्लती और तड़पती रही और वे हिंस्र पशु की भांति उसे चिंचोंड़ते रहे— उसके बेहोश हो जाने तक.—.

जब उसे होश आया, वह एक पार्क में पड़ी थी—– और शिवमंगला और महावीरा उसके पास खड़े थे, उसे घेरे. वह पूरी ताकत के साथ चीख उठी और फिर बेहोश हो गई.
******

प्राण शर्मा की कहानी- ‘पराया देश’

pran_sharma1

(लावण्या जी और समीर जी के अनुरोध पर प्राण शर्मा जी लम्बी कहानी ‘पराया देश’ प्रस्तुत है. यह कहानी ‘कादम्बिनी’ के दीवाली विशेषांक नवम्बर १९८३ में प्रकाशित हुई थी. ‘उषा राजे सक्सेना’, ‘रमाकांत भारती’ और ‘हिमांशु जोशी’ के प्रवासी कथा-संकलनों में यह कहानी भी शामिल हैं.)

मस्तिष्क को झंझोड़ देने वाली कहानी जिसमें स्वदेश के लिए एक प्रवासी की तड़प है, हर सुविधा के बावजूद अकेलेपन का अहसास है. इसी कशमकश और छटपटाहट के भावों को कलम के जादूगर प्राण शर्मा ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त किये हैं. पाठक पढ़ कर कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध हो जाता है.
मेरे दो शेर प्राण शर्मा जी, कहानी के नायक और प्रवासियों के लिए अर्पित हैं:
अपने ग़मों की ओट में यादें छुपा कर रो दिए
घुटता हुआ तन्हा, कफ़स में दम निकलता जाए है।

हर तरफ़ ही शोर है, ये महफ़िले-शेरो-सुख़न
अजनबी इस देश में हम तो अकेले हो गए !
महावीर शर्मा
—————————————————————-

पराया देश

- प्राण शर्मा

टाइल हिल लेन के बस स्टाप से अन्य यात्रियों में एक अधेड़ उम्र की अंग्रेज महिला मेरी बस में चढ़ी. टिकेट लेते समय उसने मुझसे कहा कि वो दो स्टापों के बाद ” हर्सल  कामन ” के स्टाप पर उतरना चाहती है. कह कर वो इत्मीनान से एक खाली सीट पर बैठ गयी . मैं बस दौड़ाने लगा.

पिछले कुछ सालों से इंग्लॅण्ड के सभी शहरों की बसों में कंडक्टर की सेवाएँ समाप्त  कर दी गयी हैं. यात्रियों को टिकेट देने का काम अब ड्राईवर ही अपनी सीट पर बैठा-बैठा करता है. यात्रियों को चढ़ाना-उतारना, उन्हें टिकेट देना, बस को चलाना यानि कि पूरी बस का संचालन करना अब ड्राईवर की ही जिम्मेदारी है. बड़ी सावधानी का काम है. इसलिए उनकी  वीकली वेज  भी अच्छी है.

हर्सल  कामन तक के  रास्ते में  बस पकड़ने वाला कोई और यात्री नज़र नहीं आया मुझको. मैं भूल ही गया कि उस महिला को हर्सल कामन पर उतारना था. बस तेज स्पीड से दौड़ने लगी.
” ड्राईवर, बस रोको, मुझे ये स्टाप चाहिए.” उस महिला ने चिल्ला कर कहा. मेरे कानों के परदे जैसे फट गए. मुझको अपनी गलती का अहसास हुआ. मैंने देखा कि हर्सल कामन का
स्टाप पीछे छूट गया था. अब तो अगला स्टाप आनी वाला था. मैंने तुंरत बस रोकी. बड़े विनय से उस महिला को सोरी कहा. इंग्लॅण्ड की परम्परा है कि सोरी कहने से दूसरा व्यक्ति शांत हो जाता है लेकिन वो महिला शांत की बजाय मुझ पर बरस पड़ी. लगी लेने मेरे यूनिफार्म और बस के नंबर. डर के मारे मेरे पसीने छूटने लगे sad-male05कि कहीं वो “पर्सोनल” से मेरी शिकायत नहीं
कर दे. मैं  गिड़गिड़ा कर उस से क्षमा मांगने लगा. लेकिन वो लाल-पीली हुए जा रही थी. कुछ यात्री भी उसका साथ दे रहे थे. खुद को असहाय पाकर मैंने बड़ी नम्रता से कहा- “मैडम, हम सब इंसान है. गलती किससे  नहीं होती है?” वो मुझे “यू ब्लैक बास्टर्ड ” और ” पाकी” कहती हुई क्रोध से तिलमिलाती हुई बस से उतर गयी.

बस “पूल मेडो” के बस अड्डे पर पहुँची. मेरा चालीस मिनट का ब्रेक था. चाय पीने के लिए मैं कैंटीन चला आया. चाय का प्याला लेकर हरबंस सिंह के पास जा बैठा. सारी घटना उसे सुनाई. उस महिला का मुझको “ब्लैक बास्टर्ड” और ” पाकी”  कहना हरबंस सिंह  को मज़ाक लगा. मुझ पर हंस कर वो दूर जा बैठा और अन्य साथियों से गपशप मारने लगा.

“हम लोगों का जमीर मर गया  है” सोचते हुए मैं मन ही मन में रुआंसा हो गया. नीचे आकर अन्य मनस्क सा ‘पूल मेडो’ का चक्कर लगाने लगा. मैं उस घटना को भूलना चाह रहा था लेकिन भूल नहीं पा रहा था. उस महिला का अशिष्ट और जला-भुना व्यवहार और उस पर हरबंस सिंह की उपेक्षा मुझी बार-बार कचोट रही थी. यहाँ अँगरेज़ युवकों का हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी लोगों को ” पाकी” कहना आम है. लेकिन आज एक भद्र और सभ्य दिखने वाली महिला के मुख से ऐसे घिनौने शब्द सुनकर मैं विचलित हुए बिना नहीं रह सका. मन-मस्तिष्क में असंख्य सुईयों का चुभना मैंने महसूस किया. बड़ी कठिनाई से दोबहर के दो बजे मैंने ड्यूटी समाप्त की. ओवर टाइम लिया हुआ था. उसे वापस कर घर पहुंचा. मैं धड़ाम से कुर्सी में जा धंसा.

बच्चे स्कूल में थे. सुषमा भी काम पर थी. कुर्सी में धंसा-धंसा मैं छत को निहारने लगा. न जाने कब गहरी सोच में डूब गया मैं. इंग्लॅण्ड में क्या रखा है? इससे तो अच्छा अपना भारत देश ही है. माना कि वहां कुछ आर्थिक विषमताएं हैं लेकिन कोई ‘ब्लैक बास्टर्ड’ या ‘पाकी’ कहने वाला तो नहीं है. जहाँ मान  नहीं, इज्ज़त नहीं, वहां रहना ही क्यों? ये धन, ये गाड़ियां किस काम की? आपमान का जीवन भोगने से तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना अच्छा है. किसी ने सच कहा है कि पराये देश में सुख और आराम से जीने से अपने देश की गरीबी और मौत कहीं ज्यादा अच्छी है.

सोलह साल पहले मैं और मेरी पत्नी अटल इरादा लेकर भारत से इंग्लॅण्ड में आये थेकि यहाँ पांच साल रह कर,खूब धन कमाकर भारत लौट जायेंगे. खूब धन कमा लिया है लेकिन दोनो अभी तक यहीं पड़े हैं दोनो, ब्लैक बास्टर्ड और पाकी सुनने के लिए. भारत वापस जाने के लिए पत्नी से कई बार तकरार भी होती है. मेरी बात का कोई असर नहीं होता है,  न पत्नी के सामने और न ही बेटों-बेटी  के सामने. किसी ने सच ही कहा है कि पति का जोर तब तक ही पत्नी पर है जब तक औलाद बड़ी न हो जाए.

भारत में भाई-बहन, यार-दोस्त आदि सभी याद करते हैं. लिखते हैं- “अब तो भारत लौट आओ ,कितना समय हो गया है तुम सबको विदेश में रहते हुए…. लगता है, तुम लोगों ने अपना देश भुला दिया है. “क्या करूँ, मैं भारत जाने को तैयार हूँ लेकिन सुषमा भारत जाने की नेक सलाह पर नाक-भौं चढ़ा लेती है. हर बार वो टका सा जवाब देती है–” हमें नहीं जाना भारत. यहीं सुखी हैं हम. आप भी खूब हैं, लोग कितना खर्च करके अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लॅण्ड में भेजते हैं और एक आप हैं कि यहाँ पढ़ रहे अपने बच्चों को उखाड़ कर भारत ले जाना चाहते हैं. सरला अगले साल “ऐ लेवल” करके यूनीवर्सिटी में चली जायेगी. उमेश और दिनेश भी पढ़ाई में अच्छे है. भारत में वे न इधर के रहेंगे और न ही उधर के. आपभारत जाना चाहते हैं तो शौक से जाइये. हम यहीं अच्छे हैं.” सरला, उमेश और दिनेश भी अपनी माँ की बात में “हाँ” मिलाने लगते हैं. उमेश तो उछल कर कहता है -”पापा, हम इंडिया नहीं जाएँगे, नहीं जायेंगे. वहां तो मक्खियाँ ही मक्खियाँ हैं . मक्खियों में आप जाकर रहिये.

इंग्लॅण्ड के टी.वी. पर भारत के पिछड़े इलाकों की गरीबी और गंदगी दिखा-दिखा कर ये अँगरेज़ हमारे बच्चों में भारत के प्रति कितनी हेयता की भावना पैदा कर रहे हैं. भारत सरकार न जाने क्यों इन लोगों को भारत के पिछड़े  इलाकों की तस्वीरें लेने देती हैं? पिछड़े इलाके सही लेकिन ज़मीर तो ऊंचा है .

” अरे, बेटे, भारत तो स्वर्ग है, स्वर्ग. सुन्दरता का दूसरा नाम है भारत. चलो, मेरे साथ. मैं दिखाऊंगा तुम्हें उसकी सुन्दरता.”

” लेकिन पापा, अँग्रेज कौम का खाना-पीना, रहना-सहना और उठाना-बैठना सलीके का है. कितनी सफाई इस कौम में. भारत के लोग गंदे हैं, गंदे. आपने ही तो एक बार कहा था कि भारत में कई लोग दीवारों से सट-सट कर पेशाब करना शुरू कर देते हैं. “उमेश का अंतिम वाक्य सुनकर सरला और दिनेश के हंसी का फव्वारा फूट पड़ता है.

मैं उनकी हंसी पर ध्यान न देकर कहता हूँ- “ये मत भूलो कि हम भारतीय हैं. हम यहाँ हजारों साल रह लें लेकिन रंग से भारतीय ही रहेंगे. अँगरेज़ हम कभी न बन पायेंगे और न ही अँगरेज़ लोग हमें अँगरेज़ के रूप में स्वीकार करेंगे. हम प्रवासी भारतीय ही कहलवाएंगे. यहाँ की संस्कृति, यहाँ की सभ्यता के प्रभाव हम अपना सब कुछ खो रहे हैं . अँगरेज़ लोग लगभग दो सौ वर्ष भारत में रहे लेकिन वे भारतीय रंग में नहीं रंगे. हम हैं कि कुछ ही सालों में अँग्रेजी रंग में रंग गए हैं. भारतीय नवयुवक तो अब अपने नामों से ही घृणा करने लगे हैं. कोई जानी है और कोई स्टीवन. आनंद अपने को एंडी कहलवाता है. हरि अपना नाम हैरी बताता है और कपूर अपने को कूपर कहलवाना अधिक पसंद करता है. बेटो,ये मत समझना कि मैं कोई उपदेश दे रहा हूँ. मैं तुम को समझा रहा हूँ, एक बाप की हैसियत से. अपना देश अपना होता है और पराया देश पराया. मेरी इस बात को समझोगे तो फायदे  में रहोगे. भारत में रह कर अँगरेज़ इस बात को समझे. आप भी समझो”.

मेरी किसी बात का असर न तो बच्चों पर पड़ता है और न ही पत्नी पर. सब की एक ही रट है कि वे भारत नहीं जायेंगे. इंग्लॅण्ड में रहेंगे सदा के लिए. सरला उल्टे मुझे ही समझाने लगती है-”पापा, आप भारत जाकर, कुछ सालों में ही आपको खाने-पीने के लाले पड़ जायेंगे. यहाँ फिर दौड़े आयेंगे आप.”

कुछ सोच कर वो मुझसे प्रश्न करती है-”आप यहाँ किसलिए आये थे” ? खुद ही उसका उत्तर देने लगती है- “धन के लिए न. धन कमा लिया तो इसका मतलब ये तो नहीं कि आप बोरिया-बिस्तर बांधकर नौ-दो ग्यारह हो जाएँ यहाँ से. ये तो स्वार्थ हुआ न. जिस देश ने आपको खाने के लिए भोजन दिया, रहने के लिए घर दिया, घूमने के लिए गाड़ी दी, धन से आपकी तिजोरी भर दी, उस देश से चले जाना, विमुख हो जाना, क्या आप इसको उचित समझते हैं?”

मैं कुछ कह नहीं पाता  हूँ. मुझे निरुत्तर देखकर सरला फूली नहीं समाती है. इन गोरों के चिमचों को कैसे समझाया जाए कि पराया देश तो पराया देश देश ही है. सदा के लिए पराये देश में टिकना अपनी सभ्यता और संस्कृति से हाथ धोना है. लेकिन ये बच्चे मानते ही नहीं हैं. मेरे ही नहीं सब के बच्चों का यही हाल है. अपने को ब्लैक बास्टर्ड और पाकी कहलवाना सहन कर लेंगे पर अपने देश में बसना इन्हें पसंद नहीं. कभी-कभी पत्नी और बच्चों की बातों से इतना तंग आ जाता हूँ कि सोचता हूँ कि मैं अकेला ही भारत लौट जाऊं. फिर सोचता हूँ कि अगर अकेला भारत मैं लौट गया तो वहां सगे-संबन्धी और यार-दोस्त पूछेंगे कि पत्न्नी-बच्चे कहाँ छोड़ आये? इसी उलझन और कश्मकाश में भारत लौटने का इरादा टाल जाता हूँ. वर्ना यहाँ के भेद भरे जीवन में रखा ही क्या है. हाल के रिपोर्ट के अनुसार इंग्लॅण्ड में रंगभेद  की समस्या इतनी जटिल हो रही है कि यहाँ की पुलिस भी अब अपराध के मामले में एशियन और काले लोगों से ज़्यादा पूछताछ करती है.

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आती है. मेरी विचार-श्रृंखला टूट जाती है. थकी नज़रों से मैं घड़ी देखता हूँ. सवा चार बज रहे हैं. सुषमा और बच्चे लौंज में प्रवेश करते हैं. मुझे कुर्सी में अस्तव्यस्त सा धंसा देखकर शुष्मा मुझसे पूछती है-

“बड़े उखड़े -उखड़े हो .क्या तबीअत ठीक नहीं?”

” कुछ नहीं.” मैं अनमने भाव से कहता हूँ.

” कुछ तो जरूर है?” अपना बैग टेबल पर रखते हुए वह फिर मुझसे पूछती है.

” कहा न, कुछ नहीं “

” आप कुछ छिपा रहे हैं. बताएं न, क्या बात है ?” वह कोट उतार कर पास वाली कुर्सी पर बैठ जाती है और कुछ क्षणों तक मेरा उतरा हुआ चेहरा पढ़ते हुए कहती है- “लगता है कि आज फिर किसी पैसेंजर से आपकी तू-तू , मैं-मैं हो गयी है.

” हाँ.” मैं रुंधे स्वर में स्वीकार करता हूँ.”

” क्या बात हुई?”

मैं सारी घटना सुषमा को सुनाता हूँ. सुनते ही वो जोर खिलखिलाकर हंस पड़ती है-

“आप तो यूँ ही छोटे सी बात को दिल से लगा लेते हैं..” उसका इस तरह से हंसना मुझे अच्छा नहीं लगता है. मैं घायल शेर की तरह बिफर पड़ता हूँ- “तुम हर बात को टाल जाती हो. अंग्रेजियत क्या हुई कि तुम लोग मानसिक रूप से गुलाम हो गए हो उसके. तुम लोगों की सोच मर गयी है. मैं अब भी कहता हूँ कि इस देश में ज़्यादा दिन टिकना ठीक नहीं है. वह और टाइम था जब यहाँ हर एक को काम मिलता था. अब लाखों बेकार हैं. गोरों को नौकरियां मिलती नहीं, हमारे बच्चों को कहाँ से मिलेंगी? गोरों को पहले ही हमसे चिढ़ है कि हमारे पास दो-दो कारें हैं, रहने को अपना घर है और अच्छा बैंक बैलेंस है. एक बार हालत खराब हो गए, साम्प्रदायिक दंगे छिड़ गए तो हम सब को अपनी-अपनी कमाई यहीं छोड़कर भागना पड़ेगा. तब हमें अपना देश याद आएगा. मेरी बात अपने पल्ले बांधो. बच्चों को लेकर हम भारत चलते  हैं.”

सुषमा गुस्से भरी नज़रों से मेरी ओर देखती है. सदा की तरह इस बार भी उस पर मेरी बात का असर नहीं पड़ता है. वो असंयत होकर कहती है- “तौबा, इतनी भावुकता! आप भारत की संस्कृति ओर सभ्यता की बात करते हैं, सब संस्कृतियाँ और सभ्यताओं का मेल-जोल  हो रहा है अब. हमारी तरह हजारों-लाखों लोग यही सोच कर इंग्लॅण्ड में आये थे कि धन कमाकर पांच सालों में वे लौट जायेंगे. सुविधाएँ पाकर सभी यहाँ रह गए हैं. रही भेद-भाव की बात, सो मैं आपसे पूछती हूँ कि भारत इससे अछूता है? क्या वहां साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते? वहां तो एक प्रांत के लोग दूसरे प्रांत के लोगों से भी मिल-जुल कर नहीं रहते हैं. आपस में इतना अलगाव है कि मराठी अपना मकान पंजाबी को किराये पर देने के लिए तैयार नहीं है और पंजाबी मराठी को नहीं. कौन है वहां सच्चा भारतीय? सभी साम्प्रदायिक हैं. सभी प्रांतीयता के संकुचित दायरे में बंधे हैं. आये दिन वहां से किसी न किसी साम्प्रदायिक दंगे की खबर सुनने में आती है. यहाँ कभी कोई छोटी सी घटना हो भी जाती है तो आप शोर मचाने लगते हैं. आप भारत में गणित के अध्यापक थे. हिसाब लगाकर बताईये कि यहाँ पर साम्प्रदायिक दंगे अधिक होते हैं या वहां पर? अब भारत में जाइये और देखिये वहाँ पर अंग्रेजियत के चमत्कार. दांतों तले उंगली दबा लेंगे आप. नयी पीढ़ी की न तो अपनी भाषा है और न ही अपना लिबास ही. और तो और बड़ों के प्रति आदर और सत्कार की भावना भी उनमें मर सी गयी है. भारत को आज़ादी मिले कितने साल हो गये हैं लेकिन गरीबी वहीँ की वहीं है. लोग अब भी बेचैन हैं. किसी को सुख-शांति नहीं है. मंहगाई का बोलबाला है. गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है. पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं. धक्के खाने पड़ रहे हैं उन्हें. कोई काम आसानी से नहीं बनता है. रिश्वत का दैत्य मुंह खोले खडा है. क्या आप वो दिन भूल गये हैं जब आपको अपने पासपोर्ट के लिए दौड़-धूप  करनी पड़ी थी. रिश्वत  देने के लिए आप क्लर्क से लड़ पड़े थे. उससे हाथा-पाई होते-होते बची थी आपकी. सब कुछ जानते-समझते हुए भी आप सच्चाई से आँखें मूंदते हैं. यहाँ की सुख-सुविधाओं से मैं अपने बच्चों को वंचित नहीं होने दूंगी. मैं ही क्या कोई माँ ऐसा नहीं होने देगी. लोग इस देश में आने के लिए तरसते हैं. आप हैं कि —————-”

बोलते -बोलते सुषमा उठ खड़ी होती है और किचन में चाय बनाने  के लिए चली जाती है. आज पहली  बार मैंने उसे अपने दिल का गुबार निकालते हुए देखा. उसकी बातों से मैं इतना गुमसुम हो गया कि मुझे इतनी खबर भी नहीं रही कि बच्चे उठकर कब ऊपर चले गये. मुझे उसका आभास तभी होता है जब सुषमा किचन से उन्हें आवाज़ देती है-

” सरला, दिनेश और उमेश नीचे आओ .चाय तैयार है.”

सरला, दिनेश और उमेश नीचे आते हैं. सुषमा टेबल पर चाय,बिस्कुट, सैंडविच  आदि सजा देती है. तीनों बच्चे मुझे अब तक कुर्सी में धंसा देखकर मेरे पास आते हैं और गुदगुदी करने लगते हैं, “उठो न पापा, चाय ठंडी हो रही है .”

इतने में मैं देखता हूँ कि सुषमा भी मेरे पास खड़ी है और बड़े प्यार-मनुहार से कह रही है- “अगर आप इस देश से इतना ही तंग आ गये हैं तो एक दिन यहाँ से हम चले जायेंगे. बस बच्चों की शिक्षा पूरी और अपने पैरों पर उन्हें खड़ा हो जाने दें.”

मैं सोचने लगता हूँ कि सुषमा कितनी होशियार बनती है ! आज वो बच्चों की शिक्षा पूरी और उनको अपने पैरों पर खड़ा हो जाने की बात करती है, कल उनके ब्याहों के बहाने बनाने लगेगी. और फिर उनके बाल-बच्चों के——–.

-प्राण शर्मा