Archive for the ‘संस्मरण’ Category

ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंजी हिन्दी

अगस्त 15, 2008

यू.के. की डायरी सेः

स्वतन्त्रता-दिवस पर भारत और विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों को हार्दिक
शुभकामनाएं।
महावीर शर्मा

‘ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंजी हिन्दी’

(लंदन – 28 जून) ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक बार फिर गूंजी हिन्दी। ब्रिटिश सरकार के आंतरिक सुरक्षा राज्य मन्त्री टोनी मैक्नलटी ने शुक्रवार की शाम सुप्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास कुइयां जान के लिये 14वां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिये स्थापित पद्मानंद साहित्य सम्मान से यॉर्क की उषा वर्मा को सम्मानित किया।

कथा यू.के. द्वारा हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित सम्मान समारोह में ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नलटी ने हिन्दी में अपने भाषण की शुरूआत की। उन्होंने कहा कि राजा और रानियां, मन्त्री और प्रधान मन्त्री भुला दिये जाते हैं, लेकिन साहित्य को लोग याद रखते हैं। आज हम शेक्सपीयर को ज़रूर जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि उस समय के राजा या प्रधान मन्त्री कौन थे। उन्होंने कहा कि लेखकों और दार्शिनिकों ने हमारे इतिहास और सभ्यता का निर्माण किया। हम राजनेताओं ने नहीं।

टोनी मैक्नलटी ने अपने बचपन का हवाला देते हुए कहा कि उसके पिता चौदह साल की उम्र में आयरलैण्ड से लन्दन आकर बस गये थे। उस समय अंग्रेज़ी का ठीक उच्चारण न कर पाने कि लिये आयरिश लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता था। लेकिन आज हम सभी जानते हैं कि आयरलैण्ड की परम्परा और संस्कृति किसी से भी कम नहीं है। उन्होंने ब्रिटेन में बसे एशियाई लेखकों की चर्चा करते हुए कहा कि हम अंग्रेज़ भले ही उनकी भाषा न समझें लेकिन हमें उनकी भावना और उत्साह का आदर करना चाहिए क्योंकि वे बड़ी संस्कृतियों के वारिस हैं। आज उनकी नई पीढ़ी पूरब और पश्चिम की संस्कृति के बीच दुविधाग्रस्त खड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि राजनेताओं के लिये सबसे अधिक ख़ुशी का क्षण वह होता है जब वे साहित्य का आनन्द उठाते हैं। कारण कि साहित्य किसी देश राष्ट्र, भाषा, जाति जैसी सभी सीमाओं से लांघ कर पूरी मानवता की बात करता है। इसीलिये मैं कथा यू.के. के काम की सराहना करता हूं और संरक्षक के रूप में इससे जुड़ा हूं।

लेबर पार्टी की काउन्सलर ज़कीया ज़ुबैरी ने इस बात पर चिन्ता प्रकट की कि एशियाई समाज की नई पीढ़ी अपनी मातृ भाषाओं से लगातार दूर होती जा रही है। ब्रिटेन में पहली पीढ़ी के आप्रवासी ही अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि यह एशियाई लोगों की घर घर की कहानी है कि उनके बच्चे लगातार उनकी संस्कृति से दूर जा रहे हैं। हमारे लेखकों को इस बारे में भी सोचना चाहिए। कथा यू.के. ने उन उम्दा किताबों को सम्मानित करती रही है जिन पर भारतीय आलोचकों ने ठीक से ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार कथा यू.के. ने उस श्रेष्ठ साहित्य को सम्मानित किया है जो किसी वजह से हाशिये पर चला गया था।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि ब्रिटिश संसद में हिन्दी की बात करके हम सच्चे अर्थों में विश्व बंधुत्व की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने टोनी मैक्नलटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा, कि उन्होंने हिन्दी को स्वीकृति दे कर, ब्रिटेन की लोकतांत्रिक परम्परा को आगे बढ़ाया है। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन में बसे हिन्दी प्रेमियों के लिये, भारतीय प्रकाशकों के सहयोग से, कथा यू.के. द्वारा एर बुक क्लब शुरू करने की सूचना दी। इसके माध्यम से यहां के हिन्दी पाठकों को श्रेष्ठ हिन्दी पुस्तकें घर बैठे उपलब्ध हो सकेंगी।

साक्षात्कार और रचना समय के संपादक हरि भटनागर ने नासिरा शर्मा कि पुरस्कृत कृति कुइयांजान का परिचय देते हुए कहा, “कुइयांजान मनुष्य की आदिम प्यास – एक तरह से मनुष्य की जिजीविषा – जद्दोजहद का पर्याय है – लेखिका ने इसी जिजीविषा को उपन्यास की विषयवस्तु बनाया है और इसी के बहाने वह भारतीय समाज की अंतरंग जीवन झांकी प्रस्तुत करती है। अपने कहन में उपन्यास सुख-दुख, प्यार-मुहब्ब्त, विडम्बना का एक ज्वलन्त रचनात्मक दस्तावेज़ है जिसके बयान में कहीं अश्रुगलित भावुकता नहीं, कहीं चीख़-पुकार नहीं। उपन्यास अपनी जातीय परम्परा की एक कड़ी है – एक रचनात्मक इतिहास है। अपने शिल्प में यह उपन्यास आधुनिक गद्य लेखन का ऐसा नमूना है जिसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट से लेकर मुंशी प्रेमचन्द, निराला और हरिशंकर परसाई के गद्य शिल्प का विकसित नव्यरूप देखा जा सकता है।”

इस अवसर पर अपने आभार वक्तव्य में नासिरा शर्मा ने कहा, कि कुइयां जान हमारी परम्परा और रिश्तों की प्यास की बात करत है। पानी रिश्तों को प्रभावित करता है। मैनें इस उपन्यास में मौसम की ख़ुशबू और बदबू को दिखाने की कोशिश की है। तेजेन्द्र शर्मा ने मेरे लिये एक ऐसा नया रास्ता खोला जिससे ज़िन्दगी और मुहब्बत की दोबारा शुरूआत हो सकती है। मैनें अपने शहर इलाहाबाद पर चार उपन्यास लिखे लेकिन उस शहर ने मुझे कभी नहीं बुलाया। ब्रिटेन आने के लिये वीज़ा हासिल करने की प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए मुझे अहसास हुआ कि हम लेखक, दुनियां के सबसे मज़लूम और मुसीबतज़दा लोग हैं।

पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त करने वाली उषा वर्मा ने प्रवासी जीवन में हिन्दी लेखन की समस्याओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि निरन्तर लेखन में कई प्रकार की बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। लेखन की गाड़ी रुक रुक कर चलती है। ऐसे में जब हमारे साहित्य को पहचाना जाता है और उसकी प्रशंसा होती है तो मन में कहीं अच्छा तो लगता है। संघर्ष उदासी और आकांक्षाएं – सबको रचना में समेटना आसान नहीं होता। हम लेखक मनके दर्द को रचना में डालते हैं। ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई परिवारों के बीच काम करते हुए मुझे जो अनुभव हुए उन्हें ही मैने अपनी रचना का आधार बनाया है। उषा जी ने अपने बचपन की यादों को भी श्रोताओं के साथ बांटा और कथा यू.के. को धन्यवाद दिया।

लंदन में भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकार राकेश दुबे ने उषा वर्मा के पुरस्कृत कथा संग्रह कारावास का परिचय दिया। सनराइज़ रेडियो के प्रसारक रवि शर्मा ने कुइयां जान के अंशों का अभिनय पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकार श्री अजित राय ने नासिरा शर्मा के मानपत्र का पाठ किया वहीं मुंबई की मधुलता अरोड़ा ने उषा वर्मा का मानपत्र पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन डा. निखिल कौशिक ने किया।

बीबीसी हिन्दी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव के.सी. मोहन, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुमन्त मिश्र (मुंबई), कथा यू.के. के कोषाध्यक्ष रमेश पटेल, अमरदीप के संपादक जगदीश मित्तर कौशल, गीतांजलि (बरमिंघम) के अध्यक्ष डा. कृष्ण कुमार, सुप्रसिद्ध नाटककार इसमाइल चुनारा, भारतीय भाषा संगम के अध्यक्ष महेन्द्र वर्मा, ग़ज़लकार सोहन राही, इंदिरा आनंद, चंचल जैन, डा. वन्दना शर्मा, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, चित्रा कुमार, सहित कार्यक्रम में शामिल होने के लिये वेल्स, यॉर्क, बर्मिंघम एवं अन्य दूर दराज़ के शहरों से मीडिया, साहित्य, उद्योग एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रतिनिधि पहुंचे।

प्रेषकः तेजेन्द्र शर्मा
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मेरी पहली फिल्म –

अप्रैल 10, 2007

“एंग्लो-इस्टाईल से ऐसे डाइलाग मारती है कि विलन की तो बोलती बंद हो जाती है। जब तर्राटे का हाथ मारती है तो साला विलन सीधी तीसरी मंजिल की बुर्जी पर अटका हुआ ही नजर आता है। अबे महावीरा, 15 पुलिसियों की पकड़ में नहीं आती, ऐसी जम्प मारती है कि पुलिसिए साले भौंदुओं की तरै देखते ही रह जाते हैं। सीधी कोतवाली की छत पर पहुंच कर सीटी बजा कर ऐसे अंदाज से ‘हाय’ कहती है – क्या अदा है! और जान काउस के साथ तो ऐसी जोड़ी जमती है कि बस कयामत हो जाती है। अगर ये फिरंगी मुलक को छोड़ जाएं तो सच कह रिया हूं कि हिंदुस्तान का पहला पिराइम मिनिस्टर या तो जान काउस बनेगा या फिर नाडिया। इनके मुकालबे में और है ही कौन? अबे, आजकल नाडिया की ‘हंटर वाली’ फिलिम राबिन टाकिज के मंडुए में चल रही है, देखियो जरूर! और हाँ……….” हेमू बक्काल ज्यों ज्यों नाडिया के जलवे दिखाता, हम दोनों भाईयों की उत्सुक्ता तड़पाहट में बदलने लगी।

हेमू बक्काल का असली नाम तो हमीद था। एक दिन गिल्ली डंडा खेलते हुए फकीरा ने पिल्लू में से ऐसे ज़ोर से गिल्ली उचकाई कि निकल कर सीधी हमीद की दाईं आंख में फ़िट हो गई। एक बाजार बंद होने से उसका नाम हेमू बक्काल पड़ गया था।

मैं उस समय 10 वर्ष का था, मुर्ली भाई दो साल बड़े थे। मुर्ली भाई मिडिल स्कूल की छटी क्लास में, मैं और हेमू बक्काल प्राइमरी स्कूल की चौथी क्लास में थे। हेमू की उम्र 14 वर्ष की थी। 4 साल से चौथी क्लास की लक्षमण रेखा को उलांघ नहीं सका।

रोशनारा बाग में औरंगजेब की बहन की कब्र पर बैठे हुए हेमू बक्काल के प्रवचन से हम तो इतने प्रभावित हो गए कि स्कूल की परीक्षा नाडिया के दीदार के सामने ऐसी गौण हो गई जैसे तलाकशुदा अमेरिकन मिसेज़ वालिस सिंपसन के इश्क में प्रिंस एडवर्ड अष्टम को सारी दुनिया का राज तुच्छ लगा था।वैसे मुर्ली भाई का नाम शिव प्रसाद था पर उन्हें मुर्ली क्यों कहते हैं, इसका राज़ तो हमीदी-फरीदी जासूस भी नहीं मालूम कर सके। मुर्ली और मेरा रिश्ता ‘भाई’ का कम था, दोस्ती का नाता ज्यादा था। इसी लिए एक दूसरे के सब राज़ दोनों को पता होते थे। दोनों में इतना नज़दीकीपन था कि उसने मुझे अपनी खुफ़िया एस.पी.(सिग्रेट पियो) सोसाइटी की अपनी मेम्बरशिप की बात भी बता दी। दीना के तालाब के पास बरगद के पेड़ के खोखले में इस एस.पी.सोसाइटी की सिग्रेटों के पैकेट रखे जाते थे। मैं मुर्ली भाई ना कह कर केवल मुर्ली शब्द से ही संबोधन करता था जो वह बहुत पसंद करता था। कहता था कि यार जो प्यार ‘तू’शब्द कहने में है वो ‘आप’ शनाप
में नहीं।
जीजी (हमारी माँ) कृष्ण भगवान की अनन्य भक्त थीं। पिता जी के देहांत के बाद तो उनका अधिक समय पूजा-पाठ में ही लगता था। सूखा पड़ जाए, चाहे दीना के तालाब में झुलसती हुई धूप के मारे मेंढकों का टर्राना बंद हो जाए, सावन में झूले पड़ें ना पड़ें, पर हर एकादशी के दिन दालान में कीर्तन का आयोजन नहीं रुक सकता था। मकान के सारे किरायेदार और मोहल्ले की औरतों का झमघट और फिर प्रसाद तो अवश्य बटेगा ही।
मकान के किराया, कुछ पिता जी का छोड़ा हुआ पैसा और बड़े भैया की क्लर्की की नौकरी से हम दोनों की पढ़ाई सहित गुजारा हो ही जाता था। बड़े भैया ने दसवीं के बाद स्कूल को अलविदा कर दिया था। कहते थे कि ये दोनों भाई इंजीनियर और डाक्टर बन जायेंगे तो पिता जी वाले दिन फिर से वापस आजायेंगे।
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मैं रोशनारा बाग में बैठा था कि मुर्ली भाई हांफता हुआ आया और बोला, ” अबे, मैं ने..मैं..मैंने झल्ला कर कहा, ” कुछ बोलेगा भी या बकरी की तरह ‘मैं मैं’ मिमियाता रहेगा।” मुर्ली भाई ने साथ के पत्थर पर बैठ कर सांस ली और कहने लगा, ” मैंने तरकीब ढूंढ ली है।
” मैंने उसे पैनी निगाह से देखा और कहा, “क्या मुझे भी ‘एस.पी. सोसाइटी का मेम्बर बनाने के चक्कर में है। बड़े भाई से कह दिया तो तेरी हड्डी पसली निकाल कर हाथ में पकड़ा देंगे” मुर्ली भाई झल्ला कर बोला, ” मैंने फिलम देखने की तरकीब ढूंढ ली है…” मैं उछल कर वापस पत्थर पर जो बैठा तो कूल्हे की हड्डी ने ‘हाय राम’ की चीख निकलवा दी। मुर्ली ने जारी रखा, “एकादशी के दिन फिलम देखा करेंगे।” मैंने मुंह बिचका कर कहा, “क्यों मंडुए के मैनेजर छगन लाल की लड़की पटा ली है?” मुर्ली भाई ने अपना माथा पीट लिया,” उसकी बात मत कर। वो छगनिया नाक काट कर मुंह में ठूंस देगा” मैंने कहा,”तो क्या बहराम की गुफा में सुल्ताना डाकू का खुफिया खजाना मिल गया? सिनेमा
दिखाएगा! तेरा दिमाग धुरे से हट गया है जभी तो गलबलाए जा रहा है।” मेरे गाल पर जो तर्राटे का थप्पड़ पड़ा तो मेरी आंखों के आगे सारे देवता घूमने लगे। मुर्ली भाई झल्ला कर बोला,” हड़काए हुए कुत्ते की तरह भौंके जा रहा है, कुछ कहने भी देगा या नहीं? सुन। एकादशी के दिन जीजी के कीर्तन के प्रसाद का सामान हम दोनों ही तो लाते हैं। मैंने हिसाब किताब बैठा लिया है कि पांच आने का घपला किया जा सकता है।” मैंनै जरा दूर पत्थर पर बैठ कर कहा, “और तू सिनेमा देख ले और आकर मुझे कहानी सुना दे। यह नहीं चलेगा।”
” ये बात नहीं है। पहले दिन मैं टिकट लेकर इन्टरवैल तक देखूंगा और हाफ टाइम पर बाहर आकर ‘वापसी’ टिकट तुझे देदूंगा। अगली हाफ तू देख लियो। आकर फिर रोशनारा की कबर पर बैठ कर एक दूसरे को अपनी अपनी आधी कहानी सुनाएंगे, ऐसा लगेगा कि पूरी फिलम देख ली। अगली एकादशी पर पारी बदल लेंगे।”मेरी आंखों में ऐसी दिव्य-ज्योति आगई जैसे नाडिया मेरे सामने खड़ी हो। लेकिन एकदम मायूसी के साथ नाडिया गुम हो गई। मैंने कहा, “देख मुर्ली, पहले तो चोरी करना पाप है और फिर वह भी भगवान कृषन जी की चोरी!” मुर्ली असमंजस में पड़ गया। फिर संभल कर बोला, “तू तो बस निरा किताबी कीड़ा है। मुझे तो लगता है कि धरम-करम में तो तुझे बिस्वास ही नहीं है। तेरी अक्कल पर तो ‘तूर’ पहाड़ का पत्थर पड़ गया है जिस को ‘मूसा’ ने मूत कर जला दिया था। बड़े ज्ञान की बात बताता हूं। देख कृषन भगवान भी तो मक्खन चुराने के लिए लोगों की मटकियां फोड़ डालते थे। तू ही बता कि कृषन भगवान जी कभी पाप कर सकते थे? – नहीं ना! अगर पाप होता तो जीजी उनकी पूजा करती कहीं?” मैंने काटा,” मगर वह तो मक्खन चुराते थे, सिनेमा के लिए पैसे थोड़े ही चुराते थे!”
मुर्ली भाई ने तुरुप फेंकी, “तू बड़ा होकर एम.इया भी पास करले पर बुद्धू का बुद्धू ही रहेगा। चोरी चाहे केलों की हो या कलाकंद की या फिर मक्खन की चोरी ही कहलायेगी। दूसरे, उस जमाने में इकन्नी दुअन्नी के सिक्के या सिनेमा नहीं होते थे। उनका पैसा गाय, दूध, मक्खन कपड़ा वगैरह होते थे। आपस में अदल बदला कर काम चलाते थे। तू जब छटी क्लास में पहुंचेगा, तुझे पता लग जाएगा कि ‘बार्टर सिस्टम’ क्या होता है।”
ऐसा लगा जैसे मेरे ज्ञान-चक्षु खुल गए हों, दिव्य-ज्योति के प्रकाश में ऐसा लग रहा था कि नाडिया ने बड़े प्यार से कह रही हो कि विरह के दिन बीत गए हैं।
भगवान कृष्ण जी की कृपा से प्लान फलीभूत हो गई। मुर्ली की जेब में 5 आने उथल-पुथल कर रहे थे। जैसे जैसे मंडुए की तरफ कदम बढ़ते जा रहे थे, दिल की धौंकनी ऐसे चल रही थी जैसे किसी फुर्तीले चोर के पीछे किसी मोटी तौंद वाले हांफते हुए हवालदार के दिल की धौंकनी चल रही हो।
मुर्ली भाई सिनेमा हाल में पहुंच गया। मेरे दिल में बड़ी तिलमिलाहट हो रही थी। इंटरवैल तक इधर उधर घूमता रहा। मुर्ली भाई बाहर निकला तो वायदे के मुताबिक ‘वापसी’ का टिकट देना चाह रहा था कि टिकट हाथ से छुट ही नहीं रहा था, कुछ कहते हुए घिग्घी बन रही थी, आंखें ऊपर को स्थिर! मैंने कहा, “अच्छा, दिल में बेइमानी आगई ना। पूरी फिलम देखने के लिए सारे वादे इरादे बदल गए, देख फजीता कर दूंगा ….”
पीछे से जो कड़क आवाज़ आई, ” टिकट इसे नहीं मुझे दे।” बड़े भाई साहब की आवाज़ सुन कर मेरा नीचे का दम नीचे और ऊपर का दम ऊपर जैसे सांप सूंघ गया हो। पीछे को मुड़ कर देखा तो गर्दन मुड़ी की मुड़ी रह गई। बड़े भाई ने वापसी टिकट फाड़ कर फेंक दिया। घर चलने का इशारा दे कर आगे आगे चल दिए। मैं दिल ही दिल में संकटमोचन हानुमानाष्टक को दोहराए जा रहा था, “कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुम से नहीं जात है टारो?” तो कभी प्रार्थना करता “हरि बिन तेरो कौन सहाई….” या रटता ‘जल तू जलाल तू आई बला को टाल तू।’ दिल ही दिल में संकल्प कर लिया कि हर एकादशी में आधे दिन का उपवास करूंगा पर प्रभू आज यह संकट टाल दो, कभी सिनेमा के लिए आपके प्रसाद में से चोरी नहीं करूंगा! फिर उसी समय आधे उपवास का विचार बदल कर उपवास डबल कर दिया कि पूरे दिन का उपवास किया करूंगा। नाडिया की फिल्म भी नहीं देखूंगा पर हे दीनदयाल आज इस बला से नजात दिला दे।
इसी गुनताड़े में घर पहुंच गए। अंदर जाकर घुसे ही थे तो तड़ातड़ एक मेरे और एक मुर्ली भाई के गाल पर भरपूर तमाचा पड़ा तो दोनों बिलबिला गए – मुंह से चीख के साथ ऐसी आवाज़ निकली जैसे किसी बड़े पतीले में दाल में छौंक लग गया हो। वह तो जीजी सामने
आ गईं नहीं तो बत्तीसी बाहर आजाती। ये दूध के दांत भी नहीं थे कि चलो फिर से आजायेंगे। खैर, बात यहीं तक ही रही। बड़े भाई कुछ कहे बिना सीधे ऊपर के कमर में चले गए। वहां से शोर आरहा था जैसे दीवार पर कोई हथौड़ा मार रहा हो। जीजी ऊपर पहुंची तो जोर से कहा,
“दोनों यहां आओ।” ऊपर जा कर देखा तो बड़े भाई ने जोर जोर से दोनों हाथों को दीवार पर पटक पटक कर लहूलुहान कर लिए थे। हम दोनों को गले से लिपटा लिया। रोते रोते कह रहे थे, “नालायकों, आइंदा कभी भी चोरी ना करना। मुझे तुम्हारे दोस्त राकेश ने सब कुछ बता दिया था। वह बाग में तुम्हारे पीछे ही बैठा सुन रहा था।” हम सब ही रो रहे थे। जीजी साड़ी के पल्ले से मुंह को ढकते हुए तेजी से नीचे जा कर घर के मंदिर में फूट फूट कर रो रही थी। बड़े भाई की हथेलियां दो तीन दिन में काम चलाऊ हो गईं।
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एक महीना बीत गया। फिल्म का भूत भी उतर सा गया था। इस बार एकादशी रविवार के दिन थी। हम दोनों प्रसाद का सामान खरीद कर ले आए थे। गर्मी के मारे दोनों ने ही कमीज उतार दिये और नीचे भी बस घुट्टना पहने हुए थे। लगभग साढ़े ग्यारह बज रहे थे। बड़े भाई की कड़कती हुई आवाज ने चौंका दिया, “दोनों क्या बनियान और घुट्टने में ही चलोगे? ढंग के कपड़े तो पहन लो।” घबरा के दोनों एक ही सुर में बोले,”कहां जाना है बड़े भइया?”
बड़े भाई मुस्करा रहे थे,” रोज स्कूल जाते हुए राबिन टाकीज़ के जंबो साइज़ का बोर्ड नहीं दिखाई देता। नाडिया और जान कावस की फिल्म ‘तूफ़ान मेल’ लगी है।”
मुस्कराते हुए सवा रुपए वाली तीन टिकटें हवा में हिला रहे थे!
मेरी पहली फिल्म – तूफान मेल

महावीर शर्मा

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