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‘मेरी प्यारी बेटी’ – महावीर शर्मा

दिसम्बर 2, 2009

‘मेरी प्यारी बेटी’
-महावीर शर्मा

साभार:  ‘कादम्बिनी’ मार्च २००६ (‘एक बेटी का अभागा पिता’ के नाम से)

लन्दन
15 जुलाई, 2005

मेरी प्यारी बेटी
मेरे इस पत्र की तिथि देख कर तुम सोचती होगी कि इससे दो दिन पहले ही तो फ़ोन पर बात हुई थी,फिर यह पत्र क्यों?… बेटी, इस पत्र में जो कुछ लिख रहा हूं, वह फोन पर सम्भव नहीं था। इस पत्र की प्रेरणा मुझे दो बातों से मिली। सुबह सड़क पर गिरे कुछ काग़ज़ मिले जिन में किसी पिता के मर्म-स्पर्शी उद्‌गार भरे थे। ऐसा लगा जैसे कि उसकी आत्मा उन्हीं काग़ज़ों के पुलिंदे के इर्द-गिर्द भटक रही हो। दूसरे, स्वः पं० नरेन्द्र शर्मा की इन पंक्तियों को पढ़ कर हृदय विह्वल हो उठा:
‘ सत्य हो यदि, कल्प की भी कल्पना कर, धीर बांधूँ,
किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये, यह योग साधूँ !
जानता हूँ, अब न हम तुम मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
….. कितना साम्य था उन फेंके हुए काग़ज़ों के शब्दों और इस कविता की पंक्तियों में! बेटी, इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन और कैनेडा की राजधानी औटवा की दूरी ने तुम सब को देखने की अभिलाषा को जैसे किसी अन्जान वादी में भटका दिया हो – मैं स्वास्थ्य के कारण और तुम कार्य-वश तथा अवकाश के अभाव के कारण, दोनो ही अपने अपने शहर को नहीं छोड़ पाते।

तुम जिस प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थीं, उसी के पास वुडसाइड पार्क ट्यूब स्टेशन के साथ वुडसाइड एवेन्यू पर प्रायः घूमने जाता हूं जहां दोनो ओर सुन्दर वृक्षों की शृंखला है और रास्ते में वही स्कूल तुम्हारे बचपन की यादें ताज़ा करता रहता है। उसी समय पर एक पुलिस ऑफिसर भी प्रतिदिन गश्त पर मिल जाता है। बड़ा मिलनसार और स्वभाव से हंस-मुख है। वह मजाकिया भी है। आज रोज़ की तरह सुबह सैर के लिये उसी वुडसाइड एवेन्यू पर जा रहा था कि काग़ज़ों के एक पुलिंदे पर पाँव की हल्की-सी ठोकर लगी। मैं वहीं रुक गया। अपनी छड़ी से उसे हिलाया और झुक कर उठा लिया। देख ही रहा था कि इस में क्या है, वही पुलिस ऑफिसर भी पास आ गयाः‘ हैलो सीनियर! क्या कोई खज़ाना मिल गया है?” वह मुस्कुरा कर बोला।

पैन्शनर (सीनियर सिटीज़न) होने के नाते वह मुझे मज़ाक में सीनियर ही कह कर सम्बोधित करता था। मैं ने भी परिहास की भाषा में उत्तर दियाः ‘ आप ही देख कर बताओ कि कहीं किसी आतंकवादी का रखा हुआ बम तो नहीं है?’ पुलिंदे को देख कर हंसते हुए
कहने लगाः ‘ लोग wildes-letter-1.jpgइतने सुस्त और लापरवाह हो गये हैं कि रद्दी के काग़ज़ बराबर में रखे हुए डस्ट बिन (कूड़े-दान) तक में भी नहीं डाल सकते ! लाओ, मैं ही डाल देता हूं।” मैं उन काग़ज़ों को अपने हाथों में उलट-पलट ही रहा था कि देखा पत्रों के साथ एक विवाह प्रमाण-पत्र भी था। मैं ने उसका ध्यान इस की ओर आकर्षित किया। कुछ क्षणों के लिये तो वह स्तब्ध रह गया। उसके चेहरे पर आर्द्रता का भाव झलक उठा, “ये किसी की धरोहर है। मैं इसे पुलिस-स्टेशन में जमा करवा दूंगा।” मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई। मैंने उन पत्रों को देखने की इच्छा प्रकट की तो उसने कहा कि यह बंडल क्योंकि तुम्हें ही मिले हैं, तुम पुलिस-स्टेशन जा कर देख सकते हो और यदि छः मास तक किसी ने भी इसके स्वामित्व का दावा नहीं किया तो हो सकता है कि यह तुम्हारी ही संपत्ति मानी जाए।

उत्सुकतावश मैं दोपहर के समय पुलिस-स्टेशन चला गया। संयोगवश स्वागत-कक्ष में वही ऑफिसर ड्यूटी पर था। औपचारिक कार्यवाही के पश्चात मैं एक एकांत कोने में बैठ कर पढ़ता रहा। बेटी! ये मुड़े-तुड़े पुराने साधारण से दिखनेवाले काग़ज़ एक हृदय-स्पर्शी पत्रों का एक संग्रह था जिस में कुछ पत्र प्रथम विश्वयुद्ध में युद्धस्थल से किसी सैनिक ‘राइफलमैन जॉर्ज वाइल्ड‘ ने अपनी इकलौती प्यारी बेटी ‘ऐथल ’ के नाम लिखे थे। कैसी विडंबना है! उसके उद्‌गार, उसके अरमान, उसकी सिसकती वेदना- आज भग्न-स्वप्न की तरह सड़क के किनारे इन काग़ज़ों में सिसक रहे थे! पत्र, पेंसिल से पीले काग़ज़ों पर लिखे हुए थे। इन पत्रों में आतताइयों का वर्णन था। वह अभागा सैनिक ऐसे स्थान पर था, जिसे ‘नो मैन्सलैण्ड’ कहा जाता था, जहां केवल चूहे थे। औषधियों का अभाव था, बीमारियों का बाहुल्य था और वे वनस्पतियां थीं जो फुंसी-फोड़े, अंधौरी और ददौरी आदि के अतिरिक्त कुछ नहीं देती थीं।

वह अपनी बेटी को सांत्वना देते हुए लिखता है- ‘ मेरी बेटी! तुम भाग्यशाली हो। उन व्यक्तियों की ओर दृष्टि डाल कर देखो जिनके पिता, भाई, पति, पुत्र-पुत्री… युद्ध की वीभत्स-घृणित-भूख को मिटा ना सके। इसीलिये ही कहता हूं कि तुम कितनी भाग्यवान हो कि अभी भी तुम्हारा पिता इन पत्रों को लिखने के लिये जीवित है।’

बेटी ऐथल को अपने अंतिम पत्र में लिखता है- ‘मैं हर समय घर लौटने का स्वप्न देखता रहता हूं कि तुम और शारलौट (उनकी पत्नी) दरवाज़े पर मेरी बाट निहारते होंगे और मैं गले लगा कर, रो-रो कर अपने दमित उद्‌गार और उन यातना भरे क्षणों को खुशियों के आँसुओं के सैलाब में बहा दूं! किन्तु ईश्वर ही जानता है कि भविष्य में तुम से मिलने की यह आकांक्षा पूरी हो सकेगी या नहीं। मैं सदैव आशान्वित जीवन में जीता हूं।’

किंतु दुर्भाग्य और आशा के युद्ध में दुर्भाग्य ही जीत गया। 19 नवम्बर 1917 के दिन शत्रु के एक लड़ाकू-वायुयान के आक्रमण में घायल होने के कारण फ्रांस में न. 63, ‘केज़ुअलटी क्लीयरिंग स्टेशन’ में भर्ती हो गया। डॉक्टर और सर्जन उसे बचा न सके। 10 दिन के बाद अपनी प्यारी बेटी और प्रिया शारलॉट से मिलने की अधूरी अभिलाषा अपने साथ ले कर इस वैषम्य भरे संसार से 39 वर्ष की आयु में सदैव के लिये विदा ले ली!

उनकी पत्नी को युद्ध कार्यालय की ओर से एक औपचारिक सूचना मिली कि तुम्हारे पति जो लन्दन रेजिमेण्ट की 9वीँ बटालियन में सैनिक था, के शव को बेल्जियम में ‘हैरिंगे मिलिट्री कब्रिस्तान‘ में अंतिम संस्कार सहित दफ़ना दया गया।

इन पत्रों के साथ एक अखबार की कतरन भी थी जिसमें पश्चिमी रण-स्थल का नक्शा था। साथ ही था जॉर्ज वाइल्ड तथा शारलॉट एलिज़ाबेथ हॉकिन्स के विवाह का प्रमाण-पत्र जिसके अनुसार उन दोनो का विवाह 8 जुलाई 1900 में लन्दन के चेल्सी क्षेत्र में सेंट सिमंस चर्च में समपन्न हुआ था।

आज इन अमूल्य लेख्य-पत्रों को ठोकरों में स्थान मिला। पुलिस ने साल्वेशन आर्मी और अन्य संस्थाओं से संपर्क किया है किंतु इन दु:ख भरे दस्तावेज़ों के उत्तराधिकारी की खोज में अभी सफलता नहीं मिली।

(बेटी, कभी कभी न जाने क्यों मेरे मन में नकारात्मक विचार आ जाते हैं कि क्या मेरे पत्रों का भी यही हाल होगा ?)

प्यार भरे आशीर्वाद सहित
तुम्हारे डैडी

यह पत्र मिलते ही मेरी बेटी ने फौरन् ही टेलीफोन किया और कहा, ‘डैडी, जिस प्रकार आपने लंदन के वातावरण में भी मुझे इस योग्य बना दिया कि आपके हिंदी में लिखे पत्र पढ़ सकती हूं और समझ भी सकती हूं, उसी प्रकार मैं आपके नाती को हिंदी भाषा सिखा रही हूं ताकि बड़ा हो कर वह भी अपने नाना जी के पत्र पढ़ सके। आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं। मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!’

सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!

महावीर शर्मा

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(नोट: काफी भाग-दौड़ के बाद ये पत्र जार्ज की तीसरी पीढ़ी के व्यक्ति तक पहुंचा दिए गए.)

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कहानी: ‘आनंदवादी’ – महावीर शर्मा

अगस्त 26, 2009

आनंदवादी

-महावीर शर्मा

मैं  बहुत हँसता था। हँसना, हँसाना और आनंद के भौतिक पहलूको ही जीवन का आधार मानता था। कहा करता था – सृष्टि की उत्पत्ति जब आनंद-विभु से ही हुई है तो आनंद में ही निवास करना जीवन का सार है। लोग ब्रह्म-आनंद की बात करते तो बात काट देता कि इस अमूर्त,काल्पनिक अव्यावहारिक शून्यमनस्कता का समक्ष-आनंद के सामने कोई क्रियात्मक मूल्य नहीं है।गर्व से कहता था मैं आनंदवादी हूं। काव्य-कहानियों में निराशा और जीवन का नकारात्मक पहलू मुझे साहित्य में प्रदूषण की भांति लगता था।

आराम कुर्सी पर बैठे हुए हाथ में पकड़ी हुई पुस्तक का पन्ना उलटते हुए अनायास ही मस्तिष्क के किसी कोने में छुपी हुई अतीत की स्मृतियों ने ३५ वर्ष पुराने टाईम-ज़ोन में धकेल दिया। पुस्तक के पन्नों में शब्द लुप्त से हो गए। ऐसा लगा जैसे इन पन्नों में चल- चित्र की रीलें चल रही हो। मेरी हँसी, मेरी मुस्कान, आनंद-विभु से बनी हुई सृष्टि –  सब ‘झबिया’ की गोद में नन्हे से ‘ललुआ’ की पथराई आँखों से ढुलके हुए दो आँसुओं में समाये जा रहे हों।

पुरानी घटनाएं सजीव हो उठी। दिल्ली का वही पुल तो है जिसके नीचे सड़क के दोनों ओर फुटपाथों पर एक ओर ११ और दूसरी ओर १० व्यक्ति जीवन- यातना भुगत रहे हैं। शयनागार, रसोई, कारोबारालय, चौपाल – सभी कुछ इसी में समाये हुए हैं। ना दरवाज़े हैं, ना खिड़की हैं, ताले का तो प्रश्न ही नहीं होता। इन लोगों की जाति क्या है? ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय,शूद्र या दलित वर्ग में तो यह लोग आ नहीं सकते। जाति-वर्गित लोगों को तो लड़ाई झगड़ा करने का, ऊंच और नीच दिखाने का, फूट डलवा कर देश में दंगा फ़साद करवाने का और फिर अवैध युक्तियों से अपने बैंक बैलेंस को फुलाने का, अनेक सामाजिक, असामाजिक, वैध या अवैध अधिकार हैं।

इन २१ व्यक्तियों को तो ऐसा एक भी अधिकार नहीं है तो इनकी जाति कैसे हो सकती है! तो फिर ये लोग कौन हैं? इनके नाम हैं – भिखारी, कोढ़ी, लंगड़ा, अंधा, भूखा-नंगा, अपंग, भुखमरा, कंगला, और गरीब होने के कारण इनके तीन नाम और भी हैं क्योंकि कहते हैं,
“गरीबी तेरे तीन नाम: लुच्चा, गुंडा, बेईमान!!”

हां, उन्हीं लोगों के बीच में जो बैठी हुई जवान सी औरत है, उसका नाम है ‘झबिया’। उसकी गोद में जो नन्हा सा बालक है, उसे ये लोग ‘ललुआ’ कह कर पुकारते हैं। पिता का नाम ना ही पूछा जाए तो उचित होगा क्योंकि कभी कभी कुछ विषम स्थिति में असली नाम बताना किसी गोपनीय मृत्यु-दण्ड जैसे अंजाम तक भी पहुंचा सकता है।
झबिया की क्या मजाल है कि कह सके कि उसकी गोद में इस हड्डियों के ढांचे पर पतली सी खाल का आवरण लिए हुए नन्हे से बच्चे का पिता नगर के प्रतिष्ठित नेता का जवान सुपुत्र है।
*** *** *** ***

उस दिन अमावस्या की रात थी जब वह अपनी चमचमाती सी कार खड़ी करके बाहर निकला था तो झबिया ने केवल इतना ही कहा था,
“साब, भूकी हूं, कुछ पैसे दे दो। भगवान आपका भला करे!”
शराब का हलका सा नशा, अंधी जवानी का जोश और नेतागीरी के आगे गिड़गिड़ाता हुआ कानून -बस उसने झबिया को घसीट कर कार में खींच लिया। झबिया ने तो केवल भूखे पेट भरने को दो रोटी के लिए कुछ पैसे मांगे थे, ना कि यह मांगा था कि अपने उदर में उसका बच्चा लेकर उसको भी भूख से मरता देखती रहे!

गर्मियों की चिलचिलाती हुई धूप, बरसात की तूफानी बौछारें और कंपकंपा देने वाली सर्दियां इन पुलों के नीचे रहने वाले बिन वोटों के नागरिकों के जीवन को अगले मौसम को सौंप कर चल देती हैं।
इस बार तो ठण्ड ने कई वर्षों का रिकार्ड तोड़ डाला। ये कंपकंपाते हुए अभागे बिजली के खम्बों की रोशनी पर टकटकी लगाए हुए हैं। शायद इतनी दूर से बिजली के बल्ब से ही कुछ गर्मी उन तक पहुंच जाए!

हिमालय की पर्वत-शृंखलाओं से शिशिर ऋतु की डसने वाली बर्फीली शीत लहर गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से टक्कर खाती हुई हार मानकर खिसियाई बिल्ली की तरह इन जीवित लाशों पर टूट पड़ी। इन निरीह निस्सहाय अभागों ने बचाव के लिए कुछ यत्न करने का प्रयास किया जैसे कंपकंपी, चिथड़े, कोई फटी पुरानी गुदड़ी या फिर एक दूसरे से सट कर बैठ जाना। इससे अधिक वे कर भी क्या सकते थे? सभी के दांत ठण्ड से कटकटा रहे थे जैसे सर्दी ध्वनि का रूप लेकर अपने प्रकोप की घोषणा कर रही हो। कुछ शोहदे बिगड़ैल छोकरे राह चलते हुए छींटाकशी से अपना ओछापन दिखाने से नहीं मानते :
“ऐसा लगता है जैसे मृदंग या पखावज पर कोई ताल चगुन पर बज रही है।”

इन ठिठुरे हुए बेचारों के कानों के पर्दे सर्दी के कारण जम चुके हैं, कुछ सुन नहीं पाते कि ये छोकरे क्या कुछ कहकर हँसते हुए चले गए। यदि सुन भी लेते तो क्या करते? बस अपने भाग्य को कोस कर मन मसोस कर रह जाते!

झबिया की गोद में ललुआ ठिठुर कर अकड़ सा गया है, ना ठीक तरह से रो पाता है, ना ही ज्यादा हिल-डुल पाता है। माँ उसे सर्दी से बचाने के लिए अपने वक्ष का कवच देकर जोर से चिपका लेती है। ललुआ माँ के दूध-रहित स्तनों को काटे जा रहा है। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से हार कर बड़े आवेग से एक बार फिर यह बर्फानी हवा का झोंका इन पराजित निहत्थों पर भीषण प्रहार कर अपनी खीज उतार रहा है।

एक गाड़ी इस हवा के झोंके की तीव्र गति को पछाड़ती हुई सड़क पर पड़े हुए बर्फीली पानी पर सरसराती हुई चली जाती है। कार के पहियों से उछलती हुई छुरी की तरह बर्फीली पानी की बौछारों से इन लोगों के दातों की कटकटाहट भयंकर नाद का रूप ले लेती हैं। ललुआ ने अकस्मात ही झबिया के वक्ष को काटना, चूसना बंद कर दिया, आंखें खुली पड़ी हैं, माँ की ओर टिकी हुई हैं जैसे पूछ रहा हो,
“माँ, मुझे क्यों पैदा किया था?”

झबिया उसे हिलाती-डुलाती है किंतु ललुआ के शरीर में कोई हरकत नहीं है। वह दहाड़ कर चीख़ उठती है। सभी की आंखें उसकी ओर घूम जाती हैं, बोलना चाहते हैं पर बोलने की शक्ति तो शीत-लहर ने छीन ली है!!

पुस्तक के पन्नों पर ऐसा लग रहा है जैसे ललुवा पथराई आंखों से ढुलके हुए दो आंसू को गिराते हुए कह रहा होः “मेरी आंखों में डाल कर ज़रा हँस कर तो दिखाओ!! तुम तो आनंदवादी हो! अरे, तुम क्या जानो कि जीवन की गहराईयों की तह में कितनी पीड़ा है!”

मैंने पुस्तक साथ की मेज़ पर रख दी और आंखें मूंद लीं!!!

महावीर शर्मा

15वां कथा यू.के. सम्मान समारोह

जुलाई 14, 2009

10 जुलाई 2009

15th Katha UK -samman samaroh

बैठे हुए  बाएं से: मोहन राणा, ज़कीया ज़ुबैरी, टोनी मैकनल्टी, मधु अरोड़ा, श्रीमती मोहन राणा।

खड़े हुएः आनंद कुमार, तेजेन्द्र शर्मा, विभाकर बख़्शी, के.सी. मोहन, रवि शर्मा, इंदिरा, अजित राय

लंदन 10 जुलाई 2009

ब्रिटेन के सांसद और पूर्व आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नल्टी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में आयोजित एक गरिमामय समारोह में हिन्दी के सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल को उनकी अनुपस्थिति में 15वां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। किसी कारणवश मोरवाल पुरस्कार लेने लंदन नहीं आ सके। यह सम्मान मोरवाल के नवीनतम उपन्यास रेत (राजकमल प्रकाशन) के लिये दिया गया। उनकी ओर से यह सम्मान उनके मित्र और दिल्ली के सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय ने प्राप्त किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिये स्थापित ‘पद्मानंद सम्मान’ ब्रिटिश हिन्दी कवि मोहन राणा को उनके ताज़ा कविता संग्रह धूप के अन्धेरे में (सूर्यासेत्र प्रकाशन) के लिये प्रदान किया। इस सम्मान का यह दसवां साल है।

टोनी मैक्नल्टी ने लंदन एवं ब्रिटेन के अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आए एशियाई लेखकों और ब्रिटिश साहित्य प्रेमियों  को संबोधित करते हुए कहा कि भाषा संगीत की तरह होती है। यदि आप किसी दूसरे की भाषा समझते हैं तो आप ज़िन्दगी की लय को समझ सकते हैं। दूसरों की भावनाओं को समझ सकते हैं। भाषा में आप सपने रच सकते हैं। इस तरह भाषा के माध्यम से आप मनुष्यता तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने हिन्दी में अपना भाषण शुरू करते हुए कहा की भाषाओं के माध्यम से हम सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि आपकी पहचान होती है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में बसे एशियाई समुदाय के बीच भाषा और साहित्य के माध्यम से संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

हाउस ऑफ़  लॉर्डस में भारतीय मूल  के सांसद लॉर्ड तरसेम किंग ने कहा कि ब्रिटेन जैसे देश में सारी भाषाएं एक दूसरे की पूरक हैं। अंग्रेज़ी जानना हिन्दी का विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. भाषा और साहित्य के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं के बीच समन्वय का काम कर रही है।

लेबर पार्टी की काउंसलर और कथा यू.के. की सहयोगी संस्था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष ज़कीया ज़ुबैरी ने भगवानदास मोरवाल के पुरस्कृत उपन्यास ‘रेत’ का परिचय देते हुए कहा कि लेखक ने काफ़ी शोध के बाद एक ऐसी कथा पेश की है जिसका समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाना चाहिये। इस उपन्यास में कंजर जाति की स्त्रियों के जीवन संघर्ष का ऐसा प्रमाणिक चित्रण है कि पाठक चकित रह जाता है।

Award Mohan Rana

लंदन में  नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका कपिल मोहता ने कहा  कि कथा यू.के. को अब ब्रिटेन के साथ साथ युरोप, अमरीका और अन्य देशों में भी अपनी गतिविधियों की नेटवर्किंग करनी चाहिये। भारतीय उच्चायोग में मंत्री समन्वय आसिफ़ इब्राहिम ने कहा कि भाषा एवं संस्कृति के बिना जीवन अधूरा है। इसे बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये। उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी आनंद कुमार ने कथा यू.के. के प्रयासों की सराहना करते हुए विदेशों में हिन्दी के नाम पर हो रही गतिविधियों में गंभीरता और गुणवत्ता लाने की वक़ालत की।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने 15 वर्षों की कथा-यात्रा को याद करते हुए कहा कि मुंबई से शुरू हो कर हम ब्रिटेन की संसद तक पहुंचे हैं। अब हम अपनी गतिविधियों को नया विस्तार देना चाहते हैं। कथा यू.के. आने वाले दिनों में विदेशों में और भारत में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है। इससे विश्व स्तर पर हो रहे निजि प्रयासों की नई नेटवर्किंग सामने आएगी।

इस अवसर पर मोहन राणा ने सम्मान स्वीकार  करते हुए अपनी नई कविताओं  का पाठ किया। पुरस्कृत उपन्यास रेत उपन्यास पर सुशील सिद्धार्थ एवं मोहन राणा के काव्य संकलन धूप के अन्धेरे में पर गोबिन्द प्रसाद के आलेखों का पाठ किया गया। इंदु शर्मा की पुत्री दीप्ति कुमार ने भगवानदास मोरवाल और ललित मोहन जोशी ने मोहन राणा का परिचय दिया। मधु अरोड़ा (मुंबई) ने कथा यू.के. 15 वर्षों की यात्रा का विवरण दिया। सरस्वती वंदना जटानील बैनरजी ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन किया सनराइज़ रेडियो के लोकप्रिय कलाकार रवि शर्मा ने।

कथा यू.के. के इस आयोजन में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती एवं  अंग्रेज़ी भाषा के लेखक बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूर्व पद्मानंद सम्मान विजेता डा. गौतम सचदेव, दिव्या माथुर एवं गोविन्द शर्मा के अतिरिक्त समारोह की गरिमा बढ़ाने के लिये मौजूद थे सर्वश्री मधुप मोहता, प्रो. अमीन मुग़ल, प्रो. जगदीश दवे, बलवन्त जानी (भारत), के.सी. मोहन (प्रलेस – पंजाबी), डा. इतेश सचदेव (सोआस विश्विद्यालय), कैलाश बुधवार, डा. नज़रूल इस्लाम, अचला शर्मा, वेद मोहला, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार एवं इन्द्र स्याल, इलाहबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर नारायण सक्सेना, अनुज अग्रवाल (सूर्यास्त्र प्रकाशन), डा. हबीब ज़ुबैरी, महेन्द्र दवेसर, जय वर्मा, डा. महीपाल वर्मा, विभाकर बख़्शी एवं रमेश पटेल।

दीप्ति कुमार,  (संयोजककथा यू.के. सम्मान समिति)

27 Romilly Drive, Carpenders Park, WD19 5EN (UK).

Tel: 00-44-7868738403

प्रेषक: महावीर शर्मा

पुष्पा भार्गव के काव्य संग्रह ‘लहरें’ का लोकार्पण

जून 22, 2009

Lehren Front Cover

रविवार ३१ मई २००९ को काव्य धारा लन्दन के विशेष कार्यक्रम में पुष्पा भार्गव के काव्य संग्रह ‘लहरें’ का विमोचन भारतीय उच्चायोग की संस्कृति मंत्री तथा नेहरू केंद्र की निर्देशिका श्री मती मोनिका कपिल मोहता के कर-कमलों द्वारा बोम्बे पैलेस, लन्दन में हुआ. इस आयोजन का संचालन काव्य धारा के मुख्य सचिव श्री मोडगिल ने किया. इस अवसर पर लन्दन के जानेमाने साहित्यकार, लेखक, कवि और विभिन्न संस्थाओं के अध्यक्ष तथा काव्य धारा के सभी सदस्य व पदाधिकारी उपस्थित थे.

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बाएं से दायें: प्रेम मोडगिल, मधुप मोहता, मोनिका कपिल मोहता, पुष्पा भार्गव

आयोजन की व्यवस्था बहुत ही सुन्दर और सुरुचिपूर्ण रूप से की गई थी. स्वागत और परिचय के पश्चात कार्यक्रम का आरम्भ सरस्वती वन्दना के साथ दीप जला कर किया गया.

संस्कृति मंत्री श्री मती मोनिका कपिल मोहता और लन्दन के विख्यात लेखक और कवि डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने दीप प्रज्जलित किया. तत्पश्चात काव्य धारा की सदस्या कवयित्री उर्मिला भारद्वाज ने कविता पाठ करके पुष्प भार्गव का अभिनन्दन किया.

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बाएं से दायें: प्रेम मोडगिल, मधुप मोहता, मोनिका कपिल मोहता,

पुष्पा भार्गव, उषा राजे सक्सेना, कमलेश भार्गव

कार्यक्रम के बीच डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने काव्य संग्रह ‘लहरें’ के ऊपर अपना बहुत ही प्रभावशाली वक्तव्य दिया. इसके उपरान्त हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा और लन्दन की जानीमानी लेखिका व कवयित्री श्री मती उषा राजे सक्सेना ने पुष्पा भार्गव के सामाजिक व साहित्यिक कार्यों की प्रसंशा करते हुए उनके काव्य संग्रह की भरसक सराहना की.  इस आयोजन में पुष्पा भार्गव के गीतों पर आधारित नृत्यों का प्रदर्शन शमा डांस कम्पनी द्वारा किया गया जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

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पुष्पा भार्गव के गीतों पर आधारित ‘शमा डांस कम्पनी’ द्वारा नृत्य-प्रदर्शन

काव्य संग्रह के विमोचन के पश्चात श्री मती मोहता ने पुष्पा भार्गव के अतियन्त सुन्दर काव्य संग्रह ‘लहरें’ की प्रसंशा करके उनको उनकी सफलता के लिए अनेकानेक बधाईयाँ दीं.

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जया भार्गव द्वारा कविता-पाठ

इस अवसर पर श्री मती पुष्पा भार्गव की पोती जया भार्गव ने कविता-पाठ किया जिसकी सभी ने बहुत प्रसंशा की.

इस आयोजन में भारतीय उच्चायोग के उच्च अधिकारी और प्रसिद्ध कवि श्री मधुप मोहता भी उपस्थित थे. इसके अतिरिक्त लन्दन के जानेमाने कवि सोहन ‘राही’, भारतेंदु विमल, तोषी अमृता व हिन्दी अधिकारी श्री आनंद कुमार, ‘लहरें’ के चित्रक श्री बजरंग माथुर एम. बी. ई., शमा डाँस कम्पनी की आर्टिस्टिक डायरेक्टर श्री मती सुषमा मेहता, भारतीय संस्थाओं के अध्यक्ष, नृत्यकला की आर्टिस्टिक डायरेक्टर बीथिका राहा, हिन्दू वेलफ़ेयर एसोसिएशन एसेक्स के चेयरमेन श्री बलदेव गोयल एम. बी. ई. इत्यादि उपस्तिथ थे. अंत में स्वादिष्ट प्रितिभोजन के बाद आयोजन समाप्त हुआ.

प्रेषक: महावीर शर्मा

सुन्दर ग़ज़लों और कविताओं के लिए नीचे दिए ब्लॉग पर क्लिक कीजिए:
महावीर

आतंक के युद्ध में जीत!!!

नवम्बर 30, 2008

shaheed

आतंक के युद्ध में जीत!!!

यह सब से बड़ा आतंकी हमला था। १० आतंकियों को मार कर आतंक के खिलाफ यह जंग जीत ली है – गर्व की बात है!
१९९३ के बम विस्फोट में, संसद पर हमले में, दिल्ली में, जयपुर में – जहां भी देखो कितनी ही जानें खो कर अंत में यही कहने में गर्व होने लगता है – ‘आतंकियों पर जीत’ और जय जयकार से आकाश गूंज उठता है।

बस, कुछ करना-धरना नहीं, केवल खोखली बातें :
“सरकार को यह करना चाहिए, वह करना चाहिए था, जो मैं कह रहा हूं वही करना चाहिए, मैंने तो पहले ही कह दिया था कि ये आतंकी फिर आएंगे ……” –

बस यहां ख़त्म हो जाती हमारी कर्मभूमि की सीमा! वागाडंबर और वाग्-युद्ध में हमें सिद्धि प्राप्त है!

१९९३ के बम-विस्फोट में, संसद पर हमले में, दिल्ली में, जयपुर में – जहां भी देखो कितनी ही जानें खो कर अंत में यही shok1कहने में गर्व होने लगता है और वही पुनरावृत्ति – ‘आतंकियों पर जीत’ और जय जयकार से आकाश गूंज उठता है। कितनी ही बार यही विजय-घोष का नारा सुनते आए हैं किंतु विजयश्री की श्रृंखला में अनेक निर्दोष लोगों की आत्माएं गोलियों से छिदे और विस्फोट की आग में झुलसते हुए शरीरों से विदा लेकर रोती रहीं। हमले का आकार और भीषणता का विस्तार होता रहा। मिडिया और अखबारों का व्यापार बढ़ जाता है। पान की दुकान पर, पार्कों में, हर जगह लोगों के झुंड इकट्ठे हो कर शासन-नीति, कूट-नीति, सरकारी-नीति पर बहस और दावेदारी के साथ एक दूसरे पर लांछन और आरोप लगा कर अपनी भड़ास निकालने का अवसर मिल जाता है।

मैं भी तो यही कर रहा हूं। ब्लॉग में अपनी भड़ास ही तो निकाल रहा हूं – अपनी शर्मिंदगी पर आवरण डालने की कोशिश में कहे देता हूं :-

“इस वाग्-युद्ध के अलावा हम क्या कर सकते हैं, यह तो सरकार का, पुलिस का, खुफिया एजेंसियों, डिज़ास्टर मैनेजमेंट विभाग का, कमांडो का कर्तव्य है। ड्यूटी ही तो कर रहे हैं हम – नारा लगा रहे हैं, लोगों में जागृति उत्पन्न कर रहे हैं।”

भैया, कुछ भी नहीं कर सकते तो फिरका-परस्ती मिटाने के लिए इतना तो कर सकते हो कि जब कोई पूछे –
“भाई साहब आप हिंदू हो?”
“नहीं”
“मुसलमान हो?”
“नहीं।”
“तो क्या सिख हो?”
“नहीं।”
” तो फिर लगता है पारसी या यहूदी होगे।”
“नहीं”
“अरे अब समझ गया। दलित हो तुम!”

” मैं बताता हूं। मैं क्या हूं! मैं हूं ‘भारतीय’ – केवल ‘भारतीय’ जिसका मुझे गर्व है।
दुनिया के किसी भी भाग में चला जाऊं, मैं जन्म-जन्मांतर से ‘भारतीय’ हूं। “

महावीर
**********************

‘नीरज त्रिपाठी’ ने जयपुर में विस्फोट पर एक कविता में अपना रोष कुछ शब्दों में व्यक्त किया था जो आज भी लागू होते हैं।

जब भी यही हुआ था, आज फिर उसकी पुनरावृत्ति और कल भी कौन जाने………?
यह पंक्तियां उसी दिन स्वयं ही लुप्त हो जाएंगी जिस दिन ‘आतंकवाद’ शब्द मानव की जबान पर आते ही उबकाई आने लगेः-

नीरज त्रिपाठी की कविता की कुछ पंक्तियां :-

मिट गया सिंदूर हाथ मेंहदी है अभी भी
राख है वो आज मासूमियत उसकी हँसी
सुलगेगी बस अब जिंदगी भर जिंदगी
वो जहाँ जब भी जो चाहेंगे करेंगे
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

था लगा मन में वो कुछ सपने संजोने
था क्या पता हैं पापियों के हम खिलौने
बम फटे और साथ में अरमान उसके
बहन खोयी भाई खोये खोये हैं बेटे किसी ने
कैसे मरे कितने मरे दो चार दिन चर्चा करेंगे
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

शर्ट के टुकड़े मिले हैं लाल गायब
लाश भी मिलती नही कुछ को चहेतों की
सरकार ने तो कर दिया है काम अपना
एक कमेटी थोड़ा शोक थोड़ा पैसा
ये धमाके कल हुए थे आज भी और कल भी होंगे
हम नपुंसक थे नपुंसक हैं नपुंसक ही रहेंगे

नीरज त्रिपाठी

‘लिख चुके प्यार के गीत बहुत’

सितम्बर 10, 2008

कविता पुरानी है किंतु कुछ शब्दों में संशोधन करके यहां दुबारा लिख रहा हूं। पुरानी
टिप्पणियां भी यथावत् नीचे दी गई हैं।

*** *** *** ***

लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

तू तो सृष्टा है रे पगले कीचड़ में कमल उगाता है,
भूखी नंगी भावना मनुज की भाषा में भर जाता है ।
तेरी हुंकारों से टूटे शत्‌ शत्‌ गगनांचल के तारे,
छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे।

छोड़ो रम्भा का नृत्य सखे, अब शंकर का विषपान लिखो।।

उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्‍वान लिखो।।

मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।

महावीर शर्मा

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क़ातिल सिसकने क्यूं लगा – ग़ज़ल

अगस्त 31, 2008

क़ातिल सिसकने क्यूं लगा – ग़ज़ल

ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में संपूर्ण और स्वतंत्र होता है। यह आवश्यक नहीं कि ग़ज़ल के एक शे’र का दूसरे शे’र के साथ समविषयक हो। हाँ, ग़ज़ल के सारे अशा’र एक ही बहरो-वज़न में होने चाहिए।

सोगवारों* में मिरा क़ातिल सिसकने क्यूं लगा
दिल में ख़ंजर घोंप कर, ख़ुद ही सुबकने क्यूं लगा

(*सोगवारः- मातम/शोक करने वाले)

आइना देकर मुझे, मुंह फेर लेता है तू क्यूं
है ये बदसूरत मिरी, कह दे झिझकने क्यूं लगा

गर ये अहसासे-वफ़ा जागा नहीं दिल में मिरे
नाम लेते ही तिरा, फिर दिल धड़कने क्यूं लगा

दिल ने ही राहे-मुहब्बत को चुना था एक दिन
आज आंखों से निकल कर ग़म टपकने क्यूं लगा

जाते जाते कह गया था, फिर न आएगा कभी
आज फिर उस ही गली में दिल भटकने क्यूं लगा

छोड़ कर तू भी गया अब, मेरी क़िस्मत की तरह
तेरे संगे-आसतां पर सर पटकने क्यूं लगा

ख़ुश्बुओं को रोक कर बादे-सबा ने यूं कहा
उस के जाने पर चमन फिर भी महकने क्यूं लगा।

महावीर शर्मा

ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंजी हिन्दी

अगस्त 15, 2008

यू.के. की डायरी सेः

स्वतन्त्रता-दिवस पर भारत और विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों को हार्दिक
शुभकामनाएं।
महावीर शर्मा

‘ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंजी हिन्दी’

(लंदन – 28 जून) ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक बार फिर गूंजी हिन्दी। ब्रिटिश सरकार के आंतरिक सुरक्षा राज्य मन्त्री टोनी मैक्नलटी ने शुक्रवार की शाम सुप्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास कुइयां जान के लिये 14वां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिये स्थापित पद्मानंद साहित्य सम्मान से यॉर्क की उषा वर्मा को सम्मानित किया।

कथा यू.के. द्वारा हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित सम्मान समारोह में ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नलटी ने हिन्दी में अपने भाषण की शुरूआत की। उन्होंने कहा कि राजा और रानियां, मन्त्री और प्रधान मन्त्री भुला दिये जाते हैं, लेकिन साहित्य को लोग याद रखते हैं। आज हम शेक्सपीयर को ज़रूर जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि उस समय के राजा या प्रधान मन्त्री कौन थे। उन्होंने कहा कि लेखकों और दार्शिनिकों ने हमारे इतिहास और सभ्यता का निर्माण किया। हम राजनेताओं ने नहीं।

टोनी मैक्नलटी ने अपने बचपन का हवाला देते हुए कहा कि उसके पिता चौदह साल की उम्र में आयरलैण्ड से लन्दन आकर बस गये थे। उस समय अंग्रेज़ी का ठीक उच्चारण न कर पाने कि लिये आयरिश लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता था। लेकिन आज हम सभी जानते हैं कि आयरलैण्ड की परम्परा और संस्कृति किसी से भी कम नहीं है। उन्होंने ब्रिटेन में बसे एशियाई लेखकों की चर्चा करते हुए कहा कि हम अंग्रेज़ भले ही उनकी भाषा न समझें लेकिन हमें उनकी भावना और उत्साह का आदर करना चाहिए क्योंकि वे बड़ी संस्कृतियों के वारिस हैं। आज उनकी नई पीढ़ी पूरब और पश्चिम की संस्कृति के बीच दुविधाग्रस्त खड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि राजनेताओं के लिये सबसे अधिक ख़ुशी का क्षण वह होता है जब वे साहित्य का आनन्द उठाते हैं। कारण कि साहित्य किसी देश राष्ट्र, भाषा, जाति जैसी सभी सीमाओं से लांघ कर पूरी मानवता की बात करता है। इसीलिये मैं कथा यू.के. के काम की सराहना करता हूं और संरक्षक के रूप में इससे जुड़ा हूं।

लेबर पार्टी की काउन्सलर ज़कीया ज़ुबैरी ने इस बात पर चिन्ता प्रकट की कि एशियाई समाज की नई पीढ़ी अपनी मातृ भाषाओं से लगातार दूर होती जा रही है। ब्रिटेन में पहली पीढ़ी के आप्रवासी ही अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि यह एशियाई लोगों की घर घर की कहानी है कि उनके बच्चे लगातार उनकी संस्कृति से दूर जा रहे हैं। हमारे लेखकों को इस बारे में भी सोचना चाहिए। कथा यू.के. ने उन उम्दा किताबों को सम्मानित करती रही है जिन पर भारतीय आलोचकों ने ठीक से ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार कथा यू.के. ने उस श्रेष्ठ साहित्य को सम्मानित किया है जो किसी वजह से हाशिये पर चला गया था।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि ब्रिटिश संसद में हिन्दी की बात करके हम सच्चे अर्थों में विश्व बंधुत्व की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने टोनी मैक्नलटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा, कि उन्होंने हिन्दी को स्वीकृति दे कर, ब्रिटेन की लोकतांत्रिक परम्परा को आगे बढ़ाया है। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन में बसे हिन्दी प्रेमियों के लिये, भारतीय प्रकाशकों के सहयोग से, कथा यू.के. द्वारा एर बुक क्लब शुरू करने की सूचना दी। इसके माध्यम से यहां के हिन्दी पाठकों को श्रेष्ठ हिन्दी पुस्तकें घर बैठे उपलब्ध हो सकेंगी।

साक्षात्कार और रचना समय के संपादक हरि भटनागर ने नासिरा शर्मा कि पुरस्कृत कृति कुइयांजान का परिचय देते हुए कहा, “कुइयांजान मनुष्य की आदिम प्यास – एक तरह से मनुष्य की जिजीविषा – जद्दोजहद का पर्याय है – लेखिका ने इसी जिजीविषा को उपन्यास की विषयवस्तु बनाया है और इसी के बहाने वह भारतीय समाज की अंतरंग जीवन झांकी प्रस्तुत करती है। अपने कहन में उपन्यास सुख-दुख, प्यार-मुहब्ब्त, विडम्बना का एक ज्वलन्त रचनात्मक दस्तावेज़ है जिसके बयान में कहीं अश्रुगलित भावुकता नहीं, कहीं चीख़-पुकार नहीं। उपन्यास अपनी जातीय परम्परा की एक कड़ी है – एक रचनात्मक इतिहास है। अपने शिल्प में यह उपन्यास आधुनिक गद्य लेखन का ऐसा नमूना है जिसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट से लेकर मुंशी प्रेमचन्द, निराला और हरिशंकर परसाई के गद्य शिल्प का विकसित नव्यरूप देखा जा सकता है।”

इस अवसर पर अपने आभार वक्तव्य में नासिरा शर्मा ने कहा, कि कुइयां जान हमारी परम्परा और रिश्तों की प्यास की बात करत है। पानी रिश्तों को प्रभावित करता है। मैनें इस उपन्यास में मौसम की ख़ुशबू और बदबू को दिखाने की कोशिश की है। तेजेन्द्र शर्मा ने मेरे लिये एक ऐसा नया रास्ता खोला जिससे ज़िन्दगी और मुहब्बत की दोबारा शुरूआत हो सकती है। मैनें अपने शहर इलाहाबाद पर चार उपन्यास लिखे लेकिन उस शहर ने मुझे कभी नहीं बुलाया। ब्रिटेन आने के लिये वीज़ा हासिल करने की प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए मुझे अहसास हुआ कि हम लेखक, दुनियां के सबसे मज़लूम और मुसीबतज़दा लोग हैं।

पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त करने वाली उषा वर्मा ने प्रवासी जीवन में हिन्दी लेखन की समस्याओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि निरन्तर लेखन में कई प्रकार की बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। लेखन की गाड़ी रुक रुक कर चलती है। ऐसे में जब हमारे साहित्य को पहचाना जाता है और उसकी प्रशंसा होती है तो मन में कहीं अच्छा तो लगता है। संघर्ष उदासी और आकांक्षाएं – सबको रचना में समेटना आसान नहीं होता। हम लेखक मनके दर्द को रचना में डालते हैं। ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई परिवारों के बीच काम करते हुए मुझे जो अनुभव हुए उन्हें ही मैने अपनी रचना का आधार बनाया है। उषा जी ने अपने बचपन की यादों को भी श्रोताओं के साथ बांटा और कथा यू.के. को धन्यवाद दिया।

लंदन में भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकार राकेश दुबे ने उषा वर्मा के पुरस्कृत कथा संग्रह कारावास का परिचय दिया। सनराइज़ रेडियो के प्रसारक रवि शर्मा ने कुइयां जान के अंशों का अभिनय पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकार श्री अजित राय ने नासिरा शर्मा के मानपत्र का पाठ किया वहीं मुंबई की मधुलता अरोड़ा ने उषा वर्मा का मानपत्र पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन डा. निखिल कौशिक ने किया।

बीबीसी हिन्दी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव के.सी. मोहन, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुमन्त मिश्र (मुंबई), कथा यू.के. के कोषाध्यक्ष रमेश पटेल, अमरदीप के संपादक जगदीश मित्तर कौशल, गीतांजलि (बरमिंघम) के अध्यक्ष डा. कृष्ण कुमार, सुप्रसिद्ध नाटककार इसमाइल चुनारा, भारतीय भाषा संगम के अध्यक्ष महेन्द्र वर्मा, ग़ज़लकार सोहन राही, इंदिरा आनंद, चंचल जैन, डा. वन्दना शर्मा, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, चित्रा कुमार, सहित कार्यक्रम में शामिल होने के लिये वेल्स, यॉर्क, बर्मिंघम एवं अन्य दूर दराज़ के शहरों से मीडिया, साहित्य, उद्योग एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रतिनिधि पहुंचे।

प्रेषकः तेजेन्द्र शर्मा
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कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़

अगस्त 5, 2008

कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़:
देवी नागरानी जी का
नया
ग़ज़ल-संग्रह “दिल से दिल तक”

श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल-संग्रह “ग़म में भीगी ख़ुशी” और “चराग़े-दिल” प्रकाशित हो चुके हैं। तीसरे ग़ज़ल-संग्रह “दिल से दिल तक” का विमोचन महरिष ‘गुंजार समिति’ द्वारा आयोजित किए गए समारोह में ११ मई २००८ रविवार के दिन आर.डी. नेशनल कालेज, मुम्बई के कॉन्फ़्रेंस रूम में संपन्न हुआ था।

अपनी संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के कारण देवी जी संवेदनशील रचनाकार कही जा सकती हैं। देवी जी अपने इस नये ग़ज़ल- संग्रह में ग़ज़लों को कुछ इस अंदाज़ से कहती हैं कि पाठक पूरी तरह उन में डूब जाता है। विचारों के बिना भाव खोखले दिखाई देते हैं। इस संग्रह में भावों और विचारों का सुंदर सामंजस्य होने के कारण यह पुस्तक सारगर्भित बन गई है।

शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूंढता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भांति परिचित हैं। ज़िन्दगी अक्सर सीधी-सादी नहीं हुआ करती। उन्होंने लंबे संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई हैः

जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं.

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.

नारी से जुड़े हुए गंभीर सवालों को उकेरने और समझाने के लिए उनके पारदर्शी प्रयास से ग़ज़लों के फलक का बहुत विस्तार हो गया है। फिर भी स्त्री-मन की तड़प, चुभन और अपने कष्टों से झूझना, समाज की रुग्ण मानसिकता आदि स्थितियों की परतें खोल कर रख देना तथा अपनी रचनाओं की अंतरानुभूति के साथ पाठकों को बहा ले जाती हैं:

कैसी दीमक लगी है रिश्तों की
रेज़े देवी है भाईचारों के

नारी के जीवन की पीड़ा, संघर्ष और अस्तित्व की पहचान भी कराती हैं:

“ये है पहचान एक औरत की
माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी.”

ग़ज़ल कहने की अपनी अलग शैली के कारण देवी जी की ग़ज़लों की रंगत कुछ और ही हो जाती है। अतीत का अटूट हिस्सा हो कर यादों के साथ पहाड़ जैसे वर्तमान को भी देख सकते हैं:

कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.

उनकी शब्दावली, कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़ देखिएः

मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती.

वो सोच अधूरी कैसे सजे
लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़े न कभी.

आज की शा‘इरी अपने जीवन और वक्त के बीच गुज़रते हुए तरक्की कर रही है। समय की यातना से झूझती है, टकराती है और कभी कभी लाचार हालत में तड़प कर रह जाती हैः

ज़िदगी से जूझना मुशकिल हुआ इस दौर में
ख़ुदकुशी से ख़ुद को लेकिन मैं बचाकर आई हूँ

वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.

उनकी ग़ज़लों के दायरे का फैलाव सुनामी जैसी घटनाओं के समावेश करने में देखा जा सकता है, जिसमें आर्द्रता है, मानवीयता हैः

सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फ़िज़ाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपके-चुपके से कफ़न लाया.

आज धर्म के नाम पर इंसान किस तरह पिस रहा है। धनलोलुपता के कारण धर्म के रक्षक ही भक्षक बन कर धर्म और सत्य को बेच रहे हैं। इस ग़ज़ल के दो मिस्रों को देखिएः

मौलवी पंडित खुदा के नाम पर
ख़ूब करते है तिजारत देखलो

दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.

निम्नलिखित पंक्तियों में अगर ग़ौर से देखा जाए तो यह आईना उनके अंदर का आईना है या वक्त का या फिर महबूब का जिसके सामने खड़े होकर वो अपने आप को पहचानतीं हैं :

मुझको सँवरता देखके दर्पण
मन ही मन शरमाया होगा.

इन अशा‘र में गूंजती हुई आवाज़ उनकी निजी ज़िन्दगी से जुड़ी हुई है। कितनी ही यातनाएं भुगतनी पड़े, पर वे हार नहीं मानती, बस आगे बढ़ती जाती हैं:

पाँव में मजबूरियों की है पड़ी ज़ंजीर देवी
चाल की रफ़्तार लेकिन हम बढ़ाकर देखते हैं.

हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.

जीवन के लंबे अथक सफ़र पर चलते चलते देवी जी ज्यों ही मुड़ कर अतीत में देखती हैं तो बचपन के वो क्षण ख़ुशी देकर दूर कहीं अलविदा कहते हुए विलीन हो गयाः

वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.

आशा है कि देवी नागरानी जी का यह ग़ज़ल-संग्रह ग़ज़ल साहित्य में अपना उचित स्थान पायेगा। हार्दिक शुभकामनाओं सहित

महावीर शर्मा

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‘दिल से दिल तक”
मूल्य़ – रुपये 150/- $5
Publisher: Devi Prakashan
9-D, Corner View Society
15/33 Road, Bandra,
Mumbai – 400 050

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2

जुलाई 22, 2008

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” भाग 2

सूचनाः देखने वालों के अनुरोध पर ‘मुशायरे का यह रूप अगले कुछ दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है। ‘यू.के. की डायरी’ के अंतर्गत ‘ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंज उठी हिन्दी’ शीघ्र ही किसी आगामी पोस्ट में दिखाई जाएगी।
***********************

आदरणीय प्रधान जी, कवियों, कवियत्रियों और श्रोतागण को आपके सेवक (महावीर शर्मा) और श्री प्राण शर्मा जी का नमस्कार।

‘बरखा-बहार’ पर १५ जुलाई २००८ के मुशायरे का अभी भी ख़ुमार बाक़ी है। आज जो गुणवान कवि और कवियत्रियां अपना अमूल्य समय देकर रचनाओं से इस कवि-सम्मेलन की शोभा बढ़ा रहे हैं, उन्हें मैं विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूं। आप सभी श्रोताओं का हार्दिक स्वागत है।

यहां यह कहना उचित होगा कि यह कवि-सम्मेलन हमारे यू.के. के प्रितिष्ठित कवि, लेखक, समीक्षक और ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की ही प्रेरणा और सुझाव से आयोजित किया किया गया है जिनका मार्गदर्शन पग-पग पर मिलता रहा है। आप ग़ज़ल की दुनिया में एक जाने माने उस्ताद हैं। ‘अभिव्यक्ति’ में उनका एक सारगर्भित लेख “उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल”‘ नए ग़ज़ल-प्रेमयों को सही मार्ग दर्शाता है।
प्राण शर्मा जी की दो पुस्तकें ‘सुराही’ और ‘ग़ज़ल कहता हूं’ प्रकाशित हो चुकी हैं। “सुराही” एक मुक्तक-संग्रह है। ‘बच्चन’ जी की ‘मधुशाला’ की परंपरा को आगे बढ़ाने में जो योग दिया है, सराहनीय है। लेकिन प्राण शर्मा जी के नए प्रयोगों में पुराने प्रयोगों से भिन्न हैं, उनके काव्य में मौलिकता है।आप की ग़ज़लें मुशायरों, आकाशवाणी और अनेक जालघरों की रौनक़ बढ़ाते रहे हैं।

मैं शर्मा जी को सादर आमंत्रित करता हूं कि अपनी रचना प्रस्तुत करें :
(श्रोतागण खड़े होकर तालियों से उनका स्वागत कर रहे हैं और वे माइक पर आगए
हैं)
प्राण शर्मा जीः
श्री महावीर जी का मैं बहुत आभारी हूं जिन्हों ने कवि सम्मेलन में शामिल कर, अहमद अली ‘बर्क़ी’ आज़मी, देवमणि पांडेय, द्विजेन्द्र ‘द्विज’, समीर लाल ‘समीर’, पारुल, रज़िया अकबर मिर्ज़ा, डॉ. मुंजु लता, नीरज गोस्वामी, राकेश खंडेलवाल, नीरज त्रिपाठी, रंजना भाटिया ‘रंजू’, सतपाल ‘ख़्याल’ जैसे गुणी कवियों और कवियत्रियों के साथ पढ़ने का सुनहरा मौक़ा दिया है। भाईयो और बहनों मैं अपना एक ग़ज़लनुमा गीत सुनाने से पहले “सुराही” में से एक मुक्तक सुनाना चाहता हूं।

(कवियों और कवियत्रियों का समवेत् स्वरः- “इर्शाद”

अर्ज़ किया हैः

सौंधी हवाओं की मस्ती में जीने का कुछ और मज़ा है
भीगे मौसम में घावों को सीने का कुछ और मज़ा है
मदिरा का रस दुगना-तिगना बढ़ जाता है मेरे प्यारे
बारिश की बूंदा-बादी में पीने का कुछ और
मज़ा है।

(शायरों समेत श्रोतागण की वाह वाह से हॉल गूंज उठता है।)
अब मैं आपके सामने एक ग़ज़लनुमा गीत पेश करता हूं।

शीर्षक है “बदलियाँ” –

आस्मां में घुम घुमा कर आ गई हैं बदलियां
जल-तरंगों को बजाती छा गई हैं बदलियां

नाज़ और अन्दाज़ इनके झूमने के क्या कहें
कभी इतराई कभी बल खा गई हैं बदलियां

पेड़ों पे पिंगें चढ़ी हैं प्यार की मनुहार की
हर किशोरी के हृदय को भा गई हैं बदलियां

साथ उठी थी सभी मिलकर हवा के संग संग
राम जाने किस तरह टकरा गई हैं बदलियां

इक नज़ारा है नदी का जिस तरफ़ ही देखिए
पानियों को किस तरह बरसा रही हैं बदलियां

भीगते हैं बारिशों के पानियों में झूम कर

बाल-गोपालों को यूं हर्षा गई हैं बदलियां

उठ रही हैं हर तरफ़ से सौंधी सौंधी ख़ुशबुएं
बस्तियां जंगल सभी महका गई हैं बदलियां

याद आएगा बरसना ‘प्राण’ इनका देर तक
गीत रिमझिम के रसीले गा गई हैं बदलियां

(ग़ज़ल ख़त्म होते ही सारा हॉल तालियों से गूंज रहा है।)

वाह! बहुत ख़ूब।
उठ रही हैं हर तरफ़ से सौंधी-सौंधी ख़ुशबुएं
बस्तियां जगल सभी महका गई हैं बदलियां।

(वाह! वाह! के साथ तालियों से हॉल गूंज उठा है।)

***

आज हमें बेहद खुशी है कि हमारे दरमियान जनाब डॉ. अहमद अली बर्क़ी आज़मी साहेब मौजूद हैं। आपको शायरी का फ़न विरसे में मिला है। आप मशहूर शायर जनाब बर्क़ साहेब के बेटे हैं जो जनाब नूह नारवी के शागिर्द थे। जनाब नूह नारवी साहेब दाग़ देहलवी के शागिर्द थे।
डॉ. बर्क़ी साहेब ने फ़ारसी में पी.एच.डी. हासिल की है और आजकल ऑल इंडिया रेडियो में ऐक्स्टर्नल सर्विसिज़ डिवीज़न के पर्शियन (फ़ारसी) सर्विस में ट्रांस्लेटर/अनाउंसर/ब्रॉडकास्टर की हैसियत से काम कर रहे हैं। आप का तआरुफ़ आज की ग़ज़ल
में देखा जा सकता है।

मैं जनाब डॉ. अहमद अली ‘बर्क़ी’ साहेब से दरख़्वास्त करता हूं कि माइक पर आकर अपने कलाम से इस मुशायरे की शान बढ़ाएं :

जनाब अहमद अली ‘बर्क़ी’:

खिल उठा दिल मिसले ग़ुंचा आते ही बरखा बहार
ऐसे मेँ सब्र आज़मा है मुझको तेरा इंतेज़ार

आ गया है बारिशोँ मेँ भीग कर तुझ पर निखार
है नेहायत रूह परवर तेरी ज़ुल्फ़े मुश्कबार

जलवागाहे हुस्ने फितरत है यह दिलकश सबज़ाज़ार
सब से बढकर मेरी नज़रोँ मे है लेकिन हुस्ने यार

ज़िंदगी बे कैफ है मेरे लिए तेरे बग़ैर
गुलशने हस्ती मेँ मेरे तेरे दम से है बहार

है जुदाई का तसव्वुर ऐसे मेँ सोहाने रूह
आ भी जा जाने ग़ज़ल मौसम है बेहद साज़गार

ग़ुचा वो गुल हंस रहे हैँ रो रहा है दिल मेरा

इमतेहाँ लेती है मेरा गर्दिशे लैलो नहार

साज़े फ़ितरत पर ग़ज़लख़्वाँ है बहारे जाँफेज़ा
क़ैफ़—ओ— सरमस्ती से हैँ सरशार बर्क़ी बर्गो बार

(श्रोतागण खड़े होकर तालियों से ‘बर्क़ी’ साहेब के धन्यवाद और दाद का इज़हार कर रहे हैं।)
जनाब डॉ. बर्क़ी साहेब आपकी शिरकत के लिए हम सभी तहे दिल से ममनून और शुक्रगुज़ार हैं। उम्मीद है कि आगे होने वाले मुशायरों में भी आपकी राहनुमाई मिलती रहेगी।
***

“छ्म छम छम दहलीज़ पे आई मौसम की पहली बारिश
गूंज उठी जैसे शहनाई मौसम की पहली बारिश”

मुम्बई से प्रतिष्ठित लोक-प्रिय कवि , मंच संचालक जिनके दो प्रकाशित संग्रह ‘दिल की बातें’ और ‘खुशबू की लकीरें’ ,फ़िल्म ‘पिंजर’, ‘हासिल’ और ‘कहां तुम’ के अलावा सिरियलों के गीतकार, संपादित संस्कृतिक निर्देशिका ‘संस्कृति संगम में मुम्बई के रचनाकारों को एक जुट करने का अदम्य कार्य समपन्न होने का सेहरा आपके ही सर सजाया गया है।

मैं देख रहा हूं कि आपकी उत्सुकता बढ़ती जारही है। लीजिए आपका सस्पेंस दूर किए देते हैं। देखिए श्री देवमणि पांडेय जी मंच पर आगए हैं और माइक संभाल लिया है। हॉल तालियों से गूंज गया है।

श्री देवमणि पांडेयः

मौसम की पहली बारिश

छ्म छम छम दहलीज़ पे आई मौसम की पहली बारिश

गूंज उठी जैसे शहनाई मौसम की पहली बारिश

जब तेरा आंचल लहराया
सारी दुनिया चहक उठी
बूंदों की सरगोशी तो
सोंधी मिट्टी महक उठी

मस्ती बनकर दिल में छाई मौसम की पहली बारिश

रौनक़ तुझसे बाज़ारों में
चहल पहल है गलियों में
फूलों में मुस्कान है तुझसे
और तबस्सुम कलियों में

झूम रही तुझसे पुरवाई मौसम की पहली बारिश

पेड़-परिन्दें, सड़कें, राही
गर्मी से बेहाल थे कल

सबके ऊपर मेहरबान हैं
आज घटाएं और बादल

राहत की बौछारें लाई मौसम की पहली बारिश

आंगन के पानी में मिलकर
बच्चे नाव चलाते हैं
छत से पानी टपक रहा है
फिर भी सब मुस्काते हैं

हरी भरी सौग़ातें लाई मौसम की पहली बारिश

सरक गया जब रात का घूंघट
चांद अचानक मुस्काया
उस पल हमदम तेरा चेहरा
याद बहुत हमको आया

कसक उठी बनकर तनहाई मौसम की पहली बारिश

(हॉल तालियों से एक बार फिर गूंज गया है।)

क्या बात हैः
मस्ती बनकर दिल में छाई मौसम की पहली बारिश

***

आज हमारे हमारे बीच २००७ के बेस्ट हिंदी ब्लॉग का इण्डीब्लॉगीज़ अवॉर्ड और तरकश स्वर्ण कमल, २००६ से सम्मानितउडन तश्तरी ब्लॉग के चिट्ठाकार श्री समीर लाल ‘समीर’ जी विद्यमान हैं। आप जबलपुर, भारत में जन्मे थे। चार्टर्ड एकाउंटैंसी पास करने के बाद, अब ९ वर्षों से कनाडा में बैंक में टैक्नोलॉजी सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं। आपके टैक्नोलॉजी पर कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदी काव्य में रुचि होने से कविता पढ़ने और लिखने का शौक उनकी कविताओं और लेखन में स्पष्ट लक्षित होता है। भारत, अमेरिका, कनाडा में अनेकों कवि सम्मेलनोंमें शिरकत की है। आपकी पुस्तक ‘बिखरे मोती’ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है।

मैं श्री समीर लाल जी को आमंत्रित करता हूं और विनती है कि अपनी रचना प्रस्तुत करें।

(लोग तालियों से समीर जी का स्वागत कर रहे हैं)

श्री समीर लाल ‘समीर’ जीः

पहले बारिश पर एक दोहा सुनें:

बारिश बरसत जात है, भीगत एक समान,
पानी को सब एक हैं, हिन्दु औ’ मुसलमान.

(कवि और कवियत्रियों का सम्वेत स्वरः वाह! बहुत सुंदर!)

अब एक गीत:

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

सांस सावनी बयार, बन के कसमसाती है
प्रीत की बदरिया भी ,नित नभ पे छाती है

इस बरस तो बरखा का ,तुमहि से तकाजा है
मीत तुम चले आओ ,ज़िन्दगी बुलाती है

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

खिल उठे हैं फूल फूल, भ्रमर गुनगुनाते हैं
रिम झिमी फुहारों की, सरगमें सुनाते हैं

उमड़ घुमड़ के घटा, भी तो यही कहती है
साज बन के आ जाओ, रागिनि बुलाती है.

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

झूम रही है धरा ,ओढ़ के हरी ओढ़नी
किन्तु है पिपासित बस ,एक यही मोरनी

इससे पहले दामिनी ,नभ से दे उलाहने
प्रीत बन चले आओ, प्रेयसि बुलाती है

बारिशों का मौसम है प्रिय! तुम चले आओ..

–समीर लाल ‘समीर’

(कवि और कवियत्रियों के साथ साथ श्रोताओं की तालियों से गूंजने लगा है।)
***

मैं डॉ. मंजुलता सिंह जी को मंच पर आने के लिए आमंत्रित करते हुए निवेदन करता हूं कि मंच पर आकर अपनी कविता
सुनाएं।

गोल्ड मेडलिस्ट डॉ. मंजुलता सिंह जी जिन्हों ने लखनऊ विश्व विद्यालय से एम.ए. और पी.एच.डी प्राप्त करके विभिन्न कॉलेजों में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत रहीं और सन् २००० में दिल्ली विश्व विद्यालय में रीडर के पद से निवृत्ति लेकर हिंदी साहित्य की सेवा कर रहीं है। उनकी कविताएं हस्ताक्षर पर पढ़ सकते हैं। आपकी ७ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।

लीजिए, डॉ. सिंह माइक के सामने आगई हैं और स्वागत में लोगों लोग खड़े होकर तालियो से उनका स्वागत कर रहे हैं। तालियो से हॉल गूंज रहा है …. यह कहना असंगत ना होगा कि मंजुलता जी की सुपुत्री रचना सिंह जी भी बधाई की पात्र हैं। हमें मंजुलता जी से मिलवाने का श्रेय रचना जी को ही जाता है।

डॉ. मंजुलता सिंह जी :–

मेरी कविता है ‘बरसात’

कैसे भूलूँ वे बरसातें
कैसे भूलूँ तुम्हारी बांतें ।

जब सावन को हम तुम तरसे
तब नैनो से मेघा बरसे
कैसे भूलूँ तुम्हारी यादें

कैसे भूलूँ वे बरसातें

उठा बवंडर धरती प्यासी
मेघा तुम फिर भी ना बरसे

कैसे भूलूँ तुम्हारी बांतें ।
कैसे भूलूँ वे बरसातें

कितनी सुंदर पंक्तियां हैं-
उठा बवंडर धरती प्यासी
मेघा तुम फिर भी ना बरसे

(हॉल तालियों से एक बार फिर गूंज गया है।)
***

आज हमारे मध्य एक ऐसे कवि हैं जिन्हें कवित्व के गुण विरासत में मिले हैं और उन गुणों का विस्तार उनकी ग़ज़लों, कविताओं, लेखों और सभी रचनाओं में देखा जा सकता है। आप हैं श्री द्विजेन्द्र ‘द्विज’ जी जो सुविख्यात ग़ज़लकार स्वर्गीय श्री मनोहर लाल ‘साग़र’ जी के सुपुत्र हैं। ‘साग़र’ साहिब के नाम से स्वतः ही नतमस्तक हो जाता है।’साग़र’ साहेब की रचनाएं ग़ज़ल-एक प्रयास पर देखी जा सकती हैं।
श्री ‘द्विज’ जी ने हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय के सेन्टर फ़ॉर पोस्ट्ग्रेजुएट स्टडीज़ और धर्मशाला से अंग्रेज़ी साहित्य में सनातकोत्तर डिग्री प्राप्त की। आपकी रचनाएं भारत की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। कई राष्ट्र एवं राज्य स्तरीय कवि सम्मेलनों, मुशायरों में भाग लेते रहे हैं और रचनाएं आकाशवाणी से प्रसारित हुई हैं। आपका ग़ज़ल-संग्रह ‘जन-गण-मन’ २००३ में प्रकाशित हुआ था।

श्री द्विजेन्द्र ‘द्विज’ जी को मंच पर आने का मेरा विनम्र आग्रह स्वीकार करें और अपनी ग़ज़ल सुनाएँ :

श्री द्विजेन्द्र ‘द्विज’ :

मैं आपके सामने एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूं।

(कवि और कवियत्रियों का समवेत् स्वरः ‘इर्शाद’)

नग़्मगी नग़्मासरा है और नग़्मों में गुहार
तुम जो आओ तो मना लें हम भी ये बरखा बहार

‘पी कहाँ है, पी कहाँ है, पी कहाँ है, पी कहाँ’
मन—पपीहा भी यही तो कह रहा तुझ को पुकार

पर्वतों पे रक़्स करते बादलों के कारवाँ
बज उठा है जलतरंग अब है फुहारों पर फुहार

पर्वतों से मिल गले रोये हैं खुल कर आज ये
इन भटकते बादलों का इस तरह निकला ग़ुबार

नद्दियों, नालों की सुन फ़िर आज है सरगम बजी
रुह का सहरा भिगो कर जाएगी बरखा बहार

बैठ कर इस पालकी में झूम उठा मेरा भी मन
झूमते ले जा रहे हैं याद के बादल—कहार

झूमती धरती ने ओढ़ा देख लो धानी लिबास
बाद मुद्दत के मिला बिरहन को है सब्रो—क़रार

बारिशों में भीगना इतना भी है आसाँ कहाँ
मुद्दतों तपती ज़मीं ने भी किया है इन्तज़ार

आसमाँ ! क्या अब तुझे भी लग गया बिरहा का रोग?
भेजता है आँसुओं की जो फुहारें बार—बार

तेरी आँखों से कभी पी थी जो इक बरसात में
मुद्दतें गुज़रीं मगर उतरा नहीं उसका ख़ुमार

वो फुहारों को न क्यों तेज़ाब की बूँदें कहें
उम्र भर है काटनी जिनको सज़ा—ए—इन्तज़ार

भीगना यादों की बारिश में तो नेमत है मगर
तेरी बिरहा की जलन है मेरे सीने पर सवार

इस भरी बरसात ने लूटा है जिसका आशियाँ
वो इसे महशर कहेगा, आप कहियेगा बहार.

महशर= प्रलय का दिन

वाह!
नग़्मगी नग़्मासरा है और नग़्मों में गुहार
तुम जो आओ तो मना लें हम भी ये बरखा बहार

(श्रोतागण खड़े हो कर तालियां बजा कर अपनी दाद दे रहे हैं)
***

भारत के ‘बोकारा स्टील सिटी’ से भारतीय संगीत स्नातकोत्तर ‘पारुल’ जी जब अपनी कविताएं संगीत के स्वरों में ढाल कर प्रस्तुत करती हैं तो श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते हैं। पारुल…चाँद पुखराज का जालघर से अनेक महान गायकों के स्वरों को हमारे कानों में रस घोलने का श्रेय आपको जाता है।

मैं पारुल जी को मंच पर आने के लिए आमंत्रित करता हूं और मधुर स्वरों में अपनी रचना प्रस्तुत करें।

( पारुल जी मंच पर आगई हैं और हॉल तालियों से गूंज रहा है। सभी उनकी स्वर-लहरी को सुनने के लिए बेताब हैं)

पारुल जीः-

झर झर नीर झरे बरखा बन
अपलक नयन निहारें बाट
आस बसा के हिय हमारे
कंत सिधारे तुम किस धाम

कुंज कुंज मे तुम्हे पुकारूँ
बूंद बूंद मे तुम्हे निहारूँ
विरह वेदना मे अकुलाये
मीत सिधारे तुम किस धाम

तुम बिन झूला कौन झुलाये
तुम बिन कजरी किसे सुहाये
ऐसा निर्मम रास रचाकर
सखा सिधारे तुम किस धाम

घन गरजे कजरा घुल जाये
श्यामल मेघ मल्हारें गायें
आँचल ओट जलाये सावन
सजन सिधारे तुम किस धाम

(हॉल में एक भावातिरेक वातावरण छा गया है। स्वर बंद हो गए हैं किंतु कानों में उनके स्वर अभी भी गूंज रहे हैं। पारुल जी के मुख से जैसे ही ‘धन्यवाद’ शब्द निकला तो ऐसा लगा जैसे लोग सम्मोहनवत् तंद्रा से जाग उठे हों और तालियों से हॉल फिर से गूंज उठा है।)
***

‘हंसता हुआ नूरानी चेहरा’! आप पहचान गए होंगे – नीरज गोस्वामी जिनकी रचनाओं में एक विशेष सौंदर्य झलकता है, जिसका रहस्य है कि वे कभी अपने गुरू या उस्ताद को नहीं भूलते। नीरज उनके उद्गारों की जालघरीय किताब है।

अहंकार रहित, जीवन से संतुष्ट, हर हाल में हंसते रहने वाले इंजिनियरिंग स्नातक नीरज गोस्वामी, स्वांतःसुखाय के लिए एशिया, यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया महाद्वीपों के अनेक देशों के भ्रमण के बाद अभी भी कौन जाने उनके पांव कितने और देशों की सीमाएं पार करेंगे।
अधिकांश जीवन-काल जयपुर में गुज़ारने के बाद अब भूषण स्टील, मुम्बई में असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्य-रत हैं।

लीजिए वह हंसता हुआ चेहरा माइक के सामने है। नीरज जी, आप से निवेदन है कि अपनी रचना प्रस्तुत करें।

नीरज गोस्वामी जीः

(हॉल तालियों से गूंज रहा है और नीरज जी ने चश्मा ठीक करते हुए शुरू कर दिया है):

तू अगर बाँसुरी सुना जाए
मेरे दिल को करार आ जाए

कोई बारिश बुझा नहीं सकती
आग जो चाँदनी लगा जाए

इक दिये —सा वजूद है मेरा
तेरी राहों में जो जला जाए

लौटती है बहार गुलशन में
फिर ख़िज़ाँ से भी क्यूँ डरा जाए?

याद तेरी नदी पहाड़ों की
राह में जो पड़े बहा जाए

हमने माना कि दौड़ है जीवन
पर कहीं तो कभी रुका जाए!

दिल का क्या ऐतबार है ‘नीरज’!
क्या ख़बर कब ये किस पे आ जाए

नीरज

वाह! नीरज जी, बहुत ख़ूबसूरत!
इक दिये —सा वजूद है मेरा
तेरी राहों में जो जला जाए

***

अमेरिका के ‘वाशिंग्टन हॉस्पिटल सेंटर, वाशिंग्टन डी.सी. से थोड़ा समय निकाल कर गुणी गीतकार श्री राकेश खंडेलवाल जी मंच पर आरहे हैं। राजस्थान के भरतपुर शहर की गलियों में गूंजते हुए बृज के रसिया और करौली तथा कैलादेवी की ओर जाते हुए भक्तों के लांगुरियां लोक गीतों को सुनते सुनते अपने आप ही इनका काव्य में रुझान हो गया था। भरतपुर की हिंदी साहित्य समिति में उपलब्ध साहित्य और कवि सम्मेलनोक्त ने इस रुचि को और बढ़ा दिया था। आगरा विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान कई कवि सम्मेलनों और आकाशवाणी के माध्यम ने इनको निरंतर लिखने को उत्साहित किया। आप १९८३ से यू.एस.ए. से गीत कलश द्वारा अपने गीतों से लोगों के दिलों में ऐसी छाप छोड़ जाते हैं कि पाठक दीर्घ काल तक उनके गीतों को गुनगुनाता रहता है। अमेरिका में भी बड़े २ साहित्यिक समारोहों में उनका योगदान सराहनीय है।

(लीजिए राकेश जी माइक पर आगए हैं और लोग खड़े होकर तालियों से उनका स्वागत कर रहे हैं।)

श्री राकेश खंडेलवाल जीः

गगन के नील पत्रों पर घटाओं के हैं हस्ताक्षर
किसी के काजरी नयनों की कोई श्याम छाया है

ये घिर कर आये हैं बदरा या उमड़े भाव हैं मन के
किसी का रात सा आँचल हवा ने या उड़ाया है

झुलसती आस को यह तॄप्ति का सन्देश है कोई
कि जिसकी चाह लेकर प्राण में धरती तरसती है

अंधेरों की यह परछाईं पड़ी आषाढ़ के नभ पर
किसी के नैन विरही में कोई नदिया संवरती है

किसी चातक के सपनों को मिला है शिल्प क्या कोई
किसी ने स्वाति के नक्षत्र को फिर से पुकारा है

ये घिर कर आये हैं बदरा किसी के मरुथली आँगन
भ्रमों के या किसी आभास ने फिर से लुभाया है

ये घिर कर आये हैं बदरा बिना सावन तो क्या कारन
किसी ने आज फिर दरबार में मल्हार गाया है

पिया के गांव के पाहुन गगन के मार्ग से आये
किसी ने मेघदूतम आज फिर से गुनगुनाया है

राकेश खंडेलवाल

(लोग एक बार फिर खड़े होकर तालियां बजा रहे हैं, वह देखिए पीछे से लोग उनकी यह पंक्ति गा गा कर मस्त हो रहे हैं- किसी के नैन विरही में कोई नदिया संवरती है)

क्या बात है! श्री राकेश खंडेलवाल जी
पिया के गांव के पाहुन गगन के मार्ग से आये
किसी ने मेघदूतम आज फिर से गुनगुनाया है

***

ग़म की तपिश से यारो थी सुर्ख लाल आंखें
ठंडक मिली है दिल को कुछ आंख आज तर है

अब मैं हिमाचल निवासी श्री सतपाल ‘ख़्याल’ जी को मंच पर आने के लिए आमंत्रित करता हूं। आप यद्यपि पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन अंतःकरण में बैठा हुआ भावुक कवि आपकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। आपके गुरू श्री द्विजेन्द्र ‘द्विज’ और आपने आज की ग़ज़ल ब्लॉग के माध्यम से आज के ग़ज़लकारों को एक जगह प्रकाशित करने के इस सुनहरे सपने को साकार बनाने का सफल प्रयास सराहनीय है।

श्री सतपाल ‘ख़्याल’ जी

कच्चा मकान उसपे बरसात का भी डर है
छ्त सर पे गिर न जाए सहमी हुई नज़र है

तपती हुई ज़मी की सुन ली है आसमां ने
बरसा है अपनी धुन मे हर कोना तर-बतर है

भीगे लिबास में से झलका बदन जो उसका
उसपे सब आशिकों की ठहरी हुई नज़र है

ग़म की तपिश से यारो थी सुर्ख लाल आंखें
ठंडक मिली है दिल को कुछ आंख आज तर है

टूटा है कहर उसपे सैलाब में घिरा जो
उसका ख्याल किसको जो शख्स दर-बदर है.

वाह! बहुत ख़ूब।

(श्रोताओं की ज़ोर ज़ोर से तालियां बज रही हैं, ‘ख़्याल’ साहिब वापस अपने स्थान पर बैठ गए हैं।)
***

जो लोग विज्ञान और रोग-चिकित्सा से संबंध रखते हैं, उनका साहित्य से भी गहरा लगाव होता है।
आज हमारे सामने एक विज्ञान की विद्यार्थी, अस्पताल में कार्य-रत कवियत्री जो अस्पताल में रोगियों की स्थिति बचपन, यौवन तथा
बुढ़ापे को हर रोज़ नज़दीक से देख कर उनके जीवन की गहराईयों को खोजती रहती हैं, और इन्हीं संवेदनाओं से एक कवियत्री “राज़” ने जन्म लिया जिसे साहित्य से प्रगाढ़ प्रेम हो गया और वह हैं रज़िया अकबर मिर्ज़ा “राज़” गुजरात से। वैसे तो आप उनकी रचनाएं Razia786’s Weblog पर देखते रहते होंगे लेकिन आज यहां अन्य कवियों के बीच उनकी कविता का आनंद लीजिएः

रज़िया जी मंच पर आगई हैं।

(काफ़ी देर तक तालियां बजती रहीं और अब बंद होने पर भी कानों में यह आवाज़ अभी भी गूंज रही है।)

लीजिए,

रज़िया मिर्ज़ा “राज़”:-

बरख़ा

देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)
आसमान से बरसा पानी.. देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

पत्ते पेड़ हुए हरियाले
पानी-पानी नदियां नाले।
धरती देख़ो हो गई धानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

मेंढक ने जब शोर मचाया।
मुन्ना बाहर दौड़ के आया।
हंसके बोली ग़ुडीया रानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

बिज़ली चमकी बादल गरज़े।
रिमझिम रिमझिम बरख़ा बरसे।
आंधी आई एक तुफ़ानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

कोयल की कुउ,कुउ,कुउ सुनकर।
पपीहे की थर,थर,थर भरकर।
”राज़”हो गई है दीवानी।

देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

(वाह! श्रोता-गण मस्ती में ‘देखो आई रुत मस्तानी’ ‘राज़’ जी के साथ साथ तालियों से ताल देते हुए खुद भी गा रहे हैं। हॉल में मस्ती का वातावरण छा गया है। ‘राज़’ जी धन्यवाद देते हुए मंच से उतर रही हैं।)
***

आपके सामने रंजना भाटिया जी आरही हैं जिनको हम सब स्नेहावश रंजू के नाम से पुकारते हैं। बहुत छोटी सी आयु से ही लिखना शुरू कर दिया था। इनके लेख और कविताएं अनेक पत्रों और पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। आपका हिंदी साहित्य से विशेष लगाव रहा है। आप कविताओं और बच्चों का विषय लेकर दो पुस्तकों के प्रकाशन में संलग्न हैं वैसे तो आप उनकी कविताएं उनके ब्लॉग कुछ मेरी कलम से में पढ़ते ही रहते हैं, आज इस मंच पर उनकी रचना का आनंद लीजिए।

(तालियों से हॉल गूंज रहा है और सब उत्सुकता से उनकी ओर देख रहे हैं। )

रंजना भाटिया ‘रंजू’ जी

बरस आज तू किसी सावन की बादल की तरह
मेरी प्यासे दिल को यूँ तरसता क्यूँ है

है आज सितारों में भी कोई बहकी हुई बात
वरना आज चाँद इतना इठलाता क्यूँ है

लग रही है आज धरती भी सजी हुई सेज सी
तू मुझे अपनी नज़रो से पिला के बहकता क्यूँ है

दिल का धडकना भी जैसे हैं आज कोई जादूगिरी
हर धड़कन में तेरा ही नाम आता क्यूँ है

बसी है मेरे तन मन में सेहरा की प्यास सी कोई
यह दिल्लगी करके मुझे तडपाता क्यूँ है
रंजू

वाह!
बसी है मेरे तन मन में सेहरा की प्यास सी कोई
यह दिल्लगी करके मुझे तड़पाता क्यूं है

***
हास्य-रस कवि नीरज त्रिपाठी खरामा खरामा चले आरहे हैं।
जन्म नवाबों के शहर लखनऊ में हुआ और आजकल निज़ामों के शहर हैदराबाद में एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत हैं। ईश्वर उस कंपनी का भला करे, क्योंकि वो कहा करते है :

‘करते करते काम अगर तुम थक जाओ
कार्यालय में कुर्सी पर चौड़े हो जाओ।’

आजकल उन्हें उम्रेरिया हो गया है कि मिलते ही पूछते हैं कि उनकी उम्र कितनी
लगती है! फिर कह ही गएः
‘एक बात सताने लगी प्रतिदिन प्रतिपल
बच्चे बुलाने लगे नीरज अंकल’

लीजिए, अब मंच पर पहुंच गये हैं। नीरज त्रिपाठी जी, लीजिए माइक संभालिए ।लोगों को ज़्यादा इंतज़ार ना करवाएं।

‘नीरज त्रिपाठी जी :


महावीर जी को एक कविता भेजी थी – ‘हम गधे हैं’, पर पता लगा यह मुशायरा तो बरखा-बहार पर आयोजित किया गया है। तो सज्जनों आपके सामने एक कविता प्रस्तुत है जिसका शीर्षक हैः ‘पढ़ाई और बरसात’।
(तालियों से नीरज जी का स्वागत हो रहा है , कुछ शोर भी है)

पढ़ाई और बरसात

जब भी मेरे मन में पढ़ाई के विचार आते थे
जाने क्यों आकाश में काले बादल छा जाते थे

मेरे थोड़ा-सा पढ़ते ही गगन मगन हो जाता था
पंख फैला नाचते मयूर मैं थककर सो जाता था

पाठयपुस्तक की पंक्तियाँ लोरियाँ मुझे सुनाती थीं
छनन छनन छन छन बारिश की बूँदें आती थीं

टर्र टर्र टर्राते मेंढक ताल तलैया भर जाते थे
रात-रात भर जाग-जाग हम चिठ्ठे खूब बनाते थे

बरखा रानी के आते ही पुष्प सभी खिल जाते थे
कैसे भी नंबर आ जाएँ हरदम जुगत लगाते थे

पूज्यनीय गुरुदेव हमारे जब परिणाम सुनाते थे
आँसुओं की धार से पलकों के बाँध टूट जाते थे

पास होने की आस में हम पुस्तक पुन: उठाते थे
फिर गगन मगन हो जाता फिर नाचने लगते मयूर
फिर से बादल छा जाते थे

(तालियों का शोर और ऊपर से लोग ठहाके मार रहे हैं, नीरज जी ने तो मुशायरे का
वातावरण ही बदल दिया।)
लगे रहो नीरज भाई, पास होने के लिए नंबर लाने की जुगत लगाते रहो, नैय्या पार हो ही जाएगी।

***

नीरज त्रिपाठी जी की कविता-पाठ के ही साथ साथ आज का मुशायरा समाप्त हो……….नहीं नहीं मुशायरा अभी समाप्त नहीं हो रहा है। दरवाज़े पर देखियेगा, जनाब ‘चांद’ शुक्ला हदियाबादी आ रहे हैं। अचम्भा हो रहा है कि आज उनके हाथ में मोबाईल नहीं है। याद हो, १५ जुलाई के मुशायरे में एक ज़रूरी काम की वजह से वो अपने कलाम के बीच में चले गये थे।
आईये चाँद साहेब, पिछले कलाम की किश्त बाक़ी है, हमें खुशी है कि आज आप आगये हैं।

(चाँद साहेब माईक पर आगये हैं)
जनाब ‘चाँद’ शुक्ला हदियाबादी


दोस्तों, पिछली बार राडियोसबरंग पर एक रिकॉर्डिंग की वजह से जाना पड़ गया था जिसके लिए मैं आप से मुआफ़ी चाहता हूं। बरसात पर कुछ अशा’र आपके सामने पेश कर रहा हूं :

यह अब के काली घटाओं के गहरे साये में
जो हमपे गुजरी है ऐ “चाँद ” हम समझते हैं

जब पुराने रास्तों पर से कभी गुज़रे हैं हम
कतरा कतरा अश्क बन कर आँख से टपके हैं हम

तुन्द हवाओं तुफानो से दिल घबराता है
हलकी बारिश का भीगा पन अच्छा लगता है

अपने अश्कों से मैं सींचुगा तेरे गुलशन के फूल
चार सु बूए मोहबत को मैं फैला जाऊँगा

जो पूरी कायनात पे बरसाए चाँदनी

ऐसा भी किया के उसको दुआएं न दीजिये

तेरी बातों की बारिश मैं भीग गया था
फ़िर जा कर तन मन का पौदा हरा हुया था

तपते सहराओं में देखा है समुन्द्र मैंने

मेरी आंखों में घटा बन के बरसता क्या है

ऐ घटा मुझको तू आँचल में छुपा कर लेजा
सुखा पत्ता हूँ मुझे साथ उडा कर लेजा

(लोगों की तालियों से हॉल गूंज उठा है।)

********************************

“वो आए घर हमारे ख़ुदा की कुदरत है,

कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।”

आप हमारी ख़ुशी का अन्दाज़ा नहीं लगा सकते जब हमें पता लगा कि अरब इमारत के शारजाह शहर से पूर्णिमा वर्मन जी इस मुशायरे में चार चांद लगाने के लिए आरही हैं। पूर्णिमा जी का परिचय किसी भी शब्दों का मुहताज नहीं है जिनकी ख्याति विश्व के कोने कोने में फैली हुई है। विश्व-विख्यात “अभिव्यक्ति” और “अनुभूति” के लेखक और कवि आज भी उनके गुणगान करने से तृप्त नहीं हो पाते। कोई भी ऐसी स्तरीय पत्र-पत्रिका नहीं जो उनकी क़लम से अछूती रह गई हो। उपमाएं और अलंकार उनकी रचनाओं में सजीव हो जाती हैं।

लीजिए, पूर्णिमा जी मंच पर आगई हैं।

(श्रोतागण खड़े होकर उनका स्वागत कर रहे हैं। अन्य कवि।कवियत्रियां भी तालियों से उनके आगमन पर ख़ुशी का इज़हार कर रहे हैं)

पूर्णिमा वर्मन जीः

घिरा गगन

मुदित मगन

मन मयूर नाचे!

ग्राम नगर सभी डगर

बूँदों की टपर-टपर

चपला की जगर मगर

रात्रि पत्र बाँचे!

पवन हुई मदिर-मदिर

वन पल्लव पुष्प रुचिर

जुगनू के बाल मिहिर

भरते कुलांचे!

हरित चुनर श्यामल तन

वर्षा ऋतु चितरंजन

इंद्रधनुष का कंगन

सतरंगा साजे!

दूर हुई कठिन अगन

धरती की बुझी तपन

कोकिल-शुक-पिक-खंजन

बोल कहें साँचे

बारिश की यह सरगम

पानी की यह छम-छम

सावन का यह मौसम

साल भर विराजे

-पूर्णिमा वर्मन

(श्रोताओं की तालियों से हॉल गूंज उठा है, पूर्णिमा जी सभी का धन्यवाद देते हुए मंच से जा रही हैं पर लोगों की तालियों का शोर कम नहीं हो रहा है)

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आप गुणी कवि/कवियत्रियों की मनभावन रचनाओं और ग़ज़लों से विभोर हो रहे हैं। अब आपके सामने कनाडा से मनोशी चैटर्जी मंच पर आरही हैं जिनके ‘हाइकू’ आपके दिलों में जिज्ञासा उत्पन्न कर देंगे कि सागर की गहराई जैसे भाव ५-७-५ अक्षरों के ‘हाइकू’ में कैसे भर दिए गए हैं! मनोशी जी का नाम ज़बान पर आते ही उनके ब्लॉग ‘मानसी’ और ‘संगीत’ स्वतः ही आंखों के सामने आ जाते हैं। उनके ब्लॉग ‘संगीत’ में शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों को आरंभ से लेकर उनकी बारीकियों तक सरल रूप में सिखाने की दक्षता देखी जा सकती है। उनकी ग़ज़लें आकाशवाणी पर प्रसारित हो चुकी हैं।

लीजिए, मनोशी जी माईक पर आगई हैं।

मनोशी चैटर्जीः

मैं आपके सामने कुछ ‘हाईकू’ पेश कर रही हूं :

बादल संग

आंख मिचौली खेले

पागल धूप

प्रकोपी गर्मी

मचा उत्पात अब

शांत हो भीगी

हल्की फुहार

रिमझिम के गीत

रुके न झड़ी

रोये पर्बत

चूम कर मनाने

झुके बदरा

बदरा तले

मेंढक की मंडली

जन्मों की बातें

झुका के सर

चुपचाप नहाये

शर्मीले पेड़

ओढ़ कम्बल

धरती आसमान

फूट के रोये


मानोशी चैटर्जी

(श्रोता वाह! वाह! कहते हुए ज़ोर ज़ोर से तालियां बजा रहे हैं।)

महावीर शर्माः-

इस मुशायरे/कवि-सम्मेलन में जिन कवियों और शायरों ने अपनी अनमोल रचनाएं और अमूल्य समय देकर इसे सफल बनाने में योगदान दिया है, उसके लिए हम आभारी हैं और हार्दिक धन्यवाद करते हैं। आशा है कि आप इसी तरह आगामी कवि-सम्मेलनों में योगदान देते रहेंगे।
मुशायरा चाहे किसी हॉल में हो, पार्क में हो या ब्लॉग पर हो, श्रोताओं, दर्शकों या पाठकों के बिना मुशायरा एक शेल्फ़ पर पड़ी किताब बन कर रह जाती है। इस ब्लॉग पर आने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद।

शुभकामनाओं सहित
महावीर शर्मा
प्राण शर्मा