Archive for the ‘प्राण शर्मा’ Category

यू. के. से प्राण शर्मा की दो लघु कथाएँ

सितम्बर 2, 2009

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मजबूरी

-प्राण शर्मा

बचपन  में सरोज जब अपने साथियों को काजू-मेवे खाते हुए देखता तो उसके मुंह में पानी भर आता. उसका मन करता कि वो भी जी भर कर काजू-मेवे खाए. काजू-मेवे वो खा नहीं सकता था.उसके माँ-बाप गरीब थे. इतने गरीब के वे अपने बेटे के लिए मूंगफली भी नहीं खरीद सकते थे. दोस्तों से काजू-मेवा मुफ्त में लेकर खाना सरोज के लिए भीख मांगने के बराबर था. कोई उसपर तरस खा कर काजू-मेवे के कुछ दाने दे,ये भी उसको मंज़ूर नहीं था. एक दिन सोहन ने काजू के कुछ दाने उसको दिए थे लेकिन उसने न कह दिया था.

बचपन बीता यौवन आया. सरोज की काजू-मेवे खाने की चाह पूरी न हो सकी . गरीबी उसे घेरे रही.

बुढापे का प्रवेश हुआ. गरीबी ने सरोज का पीछा नहीं छोडा.

एक दिन सरोज घर लौट रहा था. उसकी नज़र एक बोर्ड पर पड़ी. लिखा था-” एक रूपये की लोटरी टिकेट खरीदो और अपनी गरीबी भगाओ.” उस की जेब में एक रुपया ही था.  पढ़ कर वो बढ़ गया..कुछ कदम बढ़ा ही था, वो  मुड़ पडा. मन मारकर उसने ज़ेब से एक रुपया निकाला और लोटरी का टिकेट खरीद लिया.

सरोज की लोटरी लग गयी. खुशी को वो बर्ताश्त नहीं कर सका. हार्ट अटैक से उसे अस्पताल में दाखिल होना पड़ा. ठीक हुआ तो हार्ट स्पेशलिस्ट ने उसे डाएटिशियन के पास भेज दिया.

चूँकि सरोज को कोलेस्ट्राल भी था, इसलिए डाएटिशियन ने उसे ऐसा डाएट चार्ट बना कर दिया जिसमें चिकनी चीज़ों की साथ-साथ काजू-मेवे खाना उसके लिए बिलकुल वर्जित था.

उसने पढ़ा तो वो मन मार कर रह गया.

ज़ेब में ढेर सारे रुपयों -पैसों के होने पर  भी सरोज  काजू-मेवे नहीं खा सकता था.

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संतोष

-प्राण शर्मा

बेटे ने माँ से कहा-” मुझे साइकिल लेकर दो. स्कूल आते-जाते थक जाता हूँ
मैं. बहुत लंबा रास्ता है.”

माँ को बेटे की मांग जायज़ लगी. उसने साइकिल खरीदने में देर नहीं लगाई. बेटे से बोली-” खुश है न अब ?”

” खुश हूँ.” बेटे ने संतोष प्रकट किया.

कुछ दिनों के बाद बेटा फिर माँ से बोला-“मेरे कई साथी ऑटो रिक्शा में स्कूल
आते-जाते हैं. मेरे लिए ऑटो रिक्शा लगवा दो न माँ?”

माँ ने सोचा कि लंबा रास्ता है. बेचारा बेटा साइकिल चलाते-चलाते थक जाता होगा. सही कहता है वो. माँ ने ऑटो रिक्शा लगवा दी.

“अब तो खुश है न.?” माँ ने पुचकारते हुए बेटे से पूछा.
” बहुत खुश.” बेटे ने झूम कर कहा.

कुछ दिनों के बाद बेटा फिर माँ से बोला “मेरे कुछ मित्र हैं. वे अपने-अपने पिता जी की कार में स्कूल आते-जाते हैं. मुझे भी पिता जी की कार में स्कूल आना-जाना है. तुम कार खरीद दो न”.

माँ को गुस्सा आया. गुस्से में उसने ऑटो रिक्शा बंद करवा दिया और साइकिल भी बेच दी. बेटे से बोली – “अब तू पैदल ही स्कूल आये-जाएगा.”

-प्राण शर्मा

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दिव्या माथुर की रचनाओं
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महावीर

“शिष्टता” और “जंगल में जनतंत्र” – प्राण शर्मा और आचार्य संजीव ‘सलिल’ की लघुकथाएँ

अगस्त 19, 2009

लघुकथा

शिष्टता

प्राण शर्मा

किसी जगह एक फिल्म की शूटिंग हो रही थी. किसी फिल्म की आउटडोर शूटिंग हो वहां दर्शकों की भीड़ नहीं उमड़े, ये मुमकिन ही नहीं है. छोटा-बड़ा हर कोई दौड़ पड़ता है उस स्थल को जहाँ फिल्म की आउटडोर शूटिंग हो रही होती है. इस फिल्म की आउटडोर शूटिंग के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ. दर्शक भारी संख्या में जुटे. उनमें एक अंग्रेज भी थे. किसी भारतीय फिल्म की शूटिंग देखने का उनका पहला अवसर था.

पांच मिनटों के एक दृश्य को बार-बार फिल्माया जा रहा था. अंग्रेज महोदय उकताने लगे. वे लौट जाना चाहते थे लेकिन फिल्म के हीरो के कमाल का अभिनय उनके पैरों में ज़ंजीर बन गया था.

आखिर फिल्म की शूटिंग पैक अप हुई. अँगरेज़ महोदय हीरो की ओर लपके. मिलते ही उन्होंने कहा-” वाह भाई, आपके उत्कृष्ट अभिनय की बधाई आपको देना चाहता हूँ.”

एक अँगरेज़ के मुंह से इतनी सुन्दर हिंदी सुनकर हीरो हैरान हुए बिना नहीं रह सका.

उसके मुंह से निकला-“Thank you very much.”

” क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप भारत के किस प्रदेश से हैं?

” I am from Madya Pradesh.” हीरो ने सहर्ष  उत्तर  दिया.

” यदि मैं मुम्बई आया तो क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?

” Of course”.

” इस के पहले कि विदा लूं आपसे मैं एक बात पूछना चाहता हूँ. आपसे मैंने आपकी भाषा में प्रश्न किये किन्तु आपने उनके उत्तर अंगरेजी में दिए. बहुत अजीब सा लगा मुझको.”

” देखिये, आपने हिंदी में बोलकर मेरी भाषा का मान बढ़ाया, क्या मेरा कर्त्तव्य नहीं था कि अंग्रेजी में बोलकर मैं  आपकी भाषा का मान बढ़ाता?”

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लघुकथा

जंगल में जनतंत्र

आचार्य संजीव सलिल

जंगल में चुनाव होनेवाले थे. मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे.- ‘ जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये. सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये.’

‘ मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद. आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ. ‘ भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया. मंत्री जी खुश हुए.


तभी उल्लू ने आकर कहा- ‘अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं. हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी’ और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया.

विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी.

समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे – ‘जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद. ‘

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महावीर शर्मा की
ग़ज़ल और कविता:
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‘महावीर’

प्राण शर्मा और देवी नागरानी की लघु कथाएँ.

अगस्त 12, 2009

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लघुकथा

‘मुराद’

-प्राण शर्मा

सीता देवी ख़ुशी से फूली नहीं  समायी जब उसके कानों में उसके भांजे मोहन के ये शब्द  पड़े -“मौसीजी, वैष्णो देवी के दर्शन करने की लिए तैयार हो जाइये .  “परसों ही हम निकल पड़ेंगे. देखिये ये  टिकटें.”

सीता देवी भले ही ६५ पार कर चुकी थी और जवानों सा दमख़म नहीं था उसमें अब लेकिन वैष्णो देवी का नाम सुनते ही वह उछल पड़ी और भांजे को अपनी बांहों में भर लिया उसने .

कटरा से लेकर वैष्णो देवी  की गुफा तक का रास्ता लम्बा है. जयमाता का घोष करते हुए सीता देवी ने भांजे मोहन के साथ चढ़ाई शुरू कर दी. चेहरों पर उत्साह था दोनो के. थोड़ा रास्ता तय हुआ ही था कि सीता देवी की सांसे फूलने लगी . मोहन ने देखा तो वह घबरा उठा. घबराहट में ही बोला-        ” मौसी जी, हम वापस चलते हैं. आपके लिए मैं टट्टू की सवारी का इन्तेजाम करता हूँ”.

” टट्टू पर सवार  होकर ही देवी के द्वार मैं पहुँची तो क्या पहुँची ? मुझे तो पैदल चल कर ही वहां पहुंचना है.” सीता देवी नहीं मानी और जयमाता का लम्बा हुंकारा लेकर चढाई शुरू कर दी उसने.

मौसी और भांजा दोनों निर्विघ्न वैष्णो देवी के द्वार पर  पहुंचे.  मौसी सीता देवी की इच्छा-शक्ति पर भांजे मोहन की आँखों में आर्श्चय झलकने लगा.

प्राण शर्मा

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लघुकथा

“पत्थर दिल”

– देवी नागरानी

रमेश कब कैसे, किन हालात के कारण इतना बदल गया यह अंदाजा लगाना उसके पिता सेठ दीनानाथ के लिये मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगा । अपने घर की दहलीज पार करके उसके बंगले के सामने खड़े होकर सोचते रहे जो मान सम्मान, इज्ज़त उम्र गुजा़र कर पाई आज वहीं अपने बेटे की चैखट पर झुकेगी, वो भी इसलिये कि उसकी पत्नी राधा मरन-शैया पर लेटी अपने बेटे का मुंह देखने की रट लगाये जा रही थी – मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा ।

दरवाजे पर लगी बेल बजाते ही घर की नौकरानी ”कौन है” के आवाज़ के साथ उन्हें न पहचानते हुए उनका परिचय पूछ बैठी.

”मैं रमेश का बाप हूँ, उसे बुलाएं”  और वह चकित मुद्रा में सोचती हुई अंदर संदेश लेकर गई और तुरंत ही रोती सी सूरत लेकर लौटी.  जो उत्तर वह लाई थी वह तो उसके पीछे से आती तेज़ तलवार की धार जैसी उस आवाज में ही उन्हें सूद समेत मिल गया.

”जाकर उनसे कह दो यहां कोई उनका बेटा – वेटा नहीं रहता । जिस गुरबत में उन्होने मुझे पाला पोसा, उसकी संकरी गली की बदबू से निकल कर अब मैं आजा़द आकाश का पंछी हो गया हूँ. मैं किसी रिश्ते – विश्ते को नहीं मानता. पैसा ही मेरा भगवान है. अगर उन्हें जरूरत हो तो कुछ उन्हें भी दे सकता हूँ जो उनकी पत्नी की जान बचा पायेगा शायद ………….!!” और उसके आगे वह कुछ न सुन पाया. खामोशियों के सन्नाटे से घिरा दीनानाथ लड़खड़ाते कदमों से वापस लौटा जैसे किसी पत्थर दिल से उनकी मुलाकात हुई हो ।

देवी नागरानी

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प्राण शर्मा और आचार्य संजीव ‘सलिल’ की लघु कथाएँ

जुलाई 29, 2009

।।लघुकथा ।।

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जन नायक

प्राण शर्मा

अपने आपको प्रतिष्ठित समझने वाले गुणेन्द्र प्रसाद के मन में एक अजीब-सी लालसा जागी, यदि बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, मोहन दास कर्म चंद गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, लाला लाजपत राय, भगत सिंह आदि को क्रमशः लोकमान्य महामना, महात्मा, लौहपुरुष, चाचा, नेता जी, शेरे पंजाब और शहीदे आज़म की उपाधियों से विभूषित किया जा सकता है तो उन्हें क्यों नहीं? तीस सालों के सामाजिक जीवन में उन्होंने जन-सेवा की है, कई संस्थाओं को धनराशि दी है, भले ही सच्चाई के रास्ते पर वे कभी नहीं चले हैं। आख़िर वे क्या करते ! उनका पेशा ही झूठ को सच और सच को झूठ करने वाला है यानी वकालत का है।


विचार-विमर्श के लिए गुणेन्द्र प्रसाद जी ने अपने कर्मचारियों को बुलाया। निश्चित हुआ कि गुणेन्द्र प्रसाद जी को ‘जन नायक’ की उपाधि से विभूषित किया जाना चाहिए। इसके लिए रविवार को एक विशाल जनसभा के आयोजन का फैसला किया गया। प्रचार-प्रसार का बिगुल बज उठा। घोषणा की गयी की जनसभा में हर आनेवाले को पाँच सौ ग्राम का शुद्ध खोये के लड्डुओं का डिब्बा दिया जायेगा ।


छोटा-बड़ा हर कोई जनसभा में पहुँचा। गुणेन्द्र प्रसाद की ख़ुशी का पारावार नहीं रहा जब उन्हें “जननायक” सर्वसम्मति से चुना गया। ये अलग बात है की आजतक किसी ने भी उन्हें “जन नायक” की उपाधि से संबोधित नहीं किया है।

प्राण शर्मा

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।। लघुकथा ।।

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मुखौटे

आचार्य संजीव ‘सलिल’

मेले में बच्चे मचल गए- ‘पापा! हमें मुखौटे चाहिए, खरीद दीजिए.’ हम घूमते हुए मुखौटों की दुकान पर पहुंचे. मैंने देखा दुकान पर जानवरों, राक्षसों, जोकरों आदि के ही मुखौटे थे. मैंने दुकानदार से पूछा- ‘क्यों भाई! आप राम, कृष्ण, ईसा, पैगम्बर, बुद्ध, राधा, मीरा, गांधी आदि के मुखौटे क्यों नहीं बेचते?’


‘कैसे बेचूं? राम की मर्यादा, कृष्ण का चातुर्य, ईसा की क्षमा, पैगम्बर की दया, बुद्ध की करुणा, राधा का समर्पण, मीरा का प्रेम, गाँधी की दृष्टि कहीं देखने को मिले तभी तो मुखौटों पर अंकित कर पाऊँगा. आज-कल आदमी के चेहरे पर जो गुस्सा, धूर्तता, स्वार्थ, हिंसा, घृणा और बदले की भावना देखता हूँ उसे अंकित कराने पर तो मुखौटा जानवर या राक्षस का ही बनता है. आपने कहीं वे दैवीय गुण देखे हों तो बताएं ताकि मैं भी देखकर मुखौटों पर अंकित कर सकूं.’ -दुकानदार बोला.


मैं कुछ कह पता उसके पहले ही मुखौटे बोल पड़े- ‘ अगर हम पर वे दैवीय गुण अंकित हो भी जाएँ तो क्या कोई ऐसा चेहरा बता सकते हो जिस पर लगकर हमारी शोभा बढ़ सके?’ -मुखौटों ने पूछा.

मैं निरुत्तर होकर सर झुकाए आगे बढ़ गया.

आचार्य संजीव ‘सलिल’

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प्राण शर्मा की लघु-कथा और तेजेंद्र शर्मा की कविता

जुलाई 22, 2009

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प्राण शर्मा की लघु-कथा
पिंजरे के पंछी
—प्राण शर्मा

चंद्र प्रकाश के चार साल के बेटे को पंछियों से बेहद प्यार था। वह अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहता। ये सभी पंछी उसके घर के आंगन में जब कभी आते तो वह उनसे भरपूर खेलता। उन्हें जी भर कर दाने खिलाता। पेट भर कर जब पंछी उड़ते तो उसे बहुत अच्छा लगता।

एक दिन बेटे ने अपने पिता जी से अपने मन की एक इच्छा प्रकट की। – “पिता जी, क्या चिड़िया, तोता औ कबूतर की तरह मैं नहीं उड़ सकता?”
“नहीं।” पिता जी ने पुत्र को पुचकारते हुए कहा।
“क्यों नहीं?”
“क्योंकि बेटे, आपके पंख नहीं हैं।”
“पिता जी, क्या चिड़िया, तोता और कबूतर मेरे साथ नहीं रह सकते हैं? क्या शाम को मैं उनके साथ खेल नहीं सकता हूं?”
“क्यों नहीं बेटे? हम आज ही आपके लिए चिड़िया, तोता औ कबूतर ले आएँगे।
जब जी चाहे उनसे खेलना। हमारा बेटा हमसे कोई चीज़ माँगे और हम नहीं लाएँ, ऐसा कैसे हो सकता है?”

शाम को जब चन्द्र प्रकाश घर लौटे तो उनके हाथों में तीन पिंजरे थे – चिड़िया, तोता और कबूतर के। तीनों पंछियों को पिंजरों में दुबके पड़े देखकर पुत्र खुश न हो सका।
बोला- “पिता जी, ये इतने उदास क्यों हैं?”
“बेटे, अभी ये नये-नये मेहमान हैं। एक-दो दिन में जब ये आप से घुल मिल जाऐंगे तब देखना इनको उछलते-कूदते और हंसते हुए?” चन्द्र प्रकाश ने बेटे को तसल्ली देते हुए कहा।

दूसरे दिन जब चन्द्र प्रकाश काम से लौटे तो पिंजरों को खाली देखकर बड़ा हैरान हुए। पिंजरों में न तो चिड़िया थी और न ही तोता और कबूतर। उन्होंने पत्नी से पूछा-“ये चिड़िया, तोता और कबूतर कहाँ गायब हो गये हैं?”
“अपने लाडले बेटे से पूछिए।” पत्नी ने उत्तर दिया।
चन्द्र प्रकाश ने पुत्र से पूछा-“बेटे, ये चिड़िया, तोता औ कबूतर कहाँ हैं?”
“पिता जी, पिंजरों में बंद मैं उन्हें देख नहीं सका। मैंने उन्हें उड़ा दिया है।” अपनी भोली ज़बान में जवाब देकर बेटा बाहर आंगन में आकर आकाश में लौटते हुए पंछियों को देखने लगा।

—प्राण शर्मा

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मेरी तुकबंदियां

तेजेंद्र शर्मा

मैं
और मेरी तुकबंदियां
हर शाम, एक दूसरे से
बातें करते हैं

मैं जानता हूं
ज़माने को कुछ नहीं
लेना देना
मेरी तुकबंदियों से।

वे मुझे लुभाती हैं
मेरा बिस्तर, मेरा तकिया
बन कर पहुंचाती हैं आराम
देती हैं रज़ाई की गर्माहट।

जेठ की तपती लू जैसे उलाहने
दुनिया भर की शिक़ायतें
नाराज़गियां, दबाव
ठण्डी बयार हैं तुकबंदियां।

उन्हें नहीं पसन्द
तो क्या हुआ..
ये मेरी अपनी हैं।
बनाती हैं मुझसे एक अबूझ रिश्ता

रात को तारों की तरह टिमटिमाती।
भोर के सूरज के साथ
जगाती हैं. चाय की प्याली बन जाती हैं।
नहीं रचतीं ढोंग महानता का
रहती हैं ख़ुश अपने आप में।

मेरी तुकबंदियां।

-तेजेंद्र शर्मा

प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़ल

दिसम्बर 26, 2008

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प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़लः

चूल्हा-चौका, कपड़ा-लत्ता ख़ौफ़ है इनके बहने का
तूफ़ानों का ख़ौफ़ नहीं है ख़ौफ़ है घर के ढहने का

सब से प्यारा, सब से न्यारा जीवन मुझ को क्यों न लगे
शायद ही कोई सानी है दुनिया में इस गहने का

बेशक सब ही कोशिश कर लें बेहतर रहने की लेकिन
आएगा ऐ दोस्त सलीका किसी किसी को रहने का

जाने क्या क्या सीखा उससे जिस जिससे अंजान थे हम
खूब तजरबा रहा हमारा संग दुखों के रहने का

इतना भी कमज़ोर बनो क्यों दीमक खाई काठ लगो
मीत तनिक हो साहस तुम में दुख तकलीफ़ें सहने का

बात कोई मन की मन में ही कैसे क्यों कर रह जाए
दिल वालों की महफ़िल में जब वक्त मिले कुछ कहने का

‘प्राण’ कभी तो अपनी खातिर ध्यान ज़रा दे जीवन पर
एक यही तो घर है तेरा कुछ आराम से रहने का

‘प्राण’ शर्मा

प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़ल

नवम्बर 21, 2008

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प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़लः

परखचे अपने उड़ाना दोस्तो आसां नहीं
आपबीती को सुनाना दोस्तो आसां नहीं

ख़ूबियां अपनी गिनाते तुम रहो यूं ही सभी
ख़ामियां अपनी गिनाना दोस्तो आसां नहीं

देखने में लगता है यह हल्का फुल्का सा मगर
बोझ जीवन का उठाना दोस्तों आसां नहीं

रूठी दादी को मनाना माना कि आसान है
रूठे पोते को मनाना दोस्तो आसां नहीं

तुम भले ही मुस्कुराओ साथ बच्चों के मगर
बच्चों जैसा मुस्कुराना दोस्तो आसां नहीं

दोस्ती कर लो भले ही हर किसी से शौक से
दोस्ती सब से निभाना दोस्तो आसां नहीं

आंधी के जैसे बहो या बिजली के जैसे गिरो
होश हर इक के उड़ाना दोस्तो आसां नहीं

कोई पथरीली जमीं होती तो उग आती मगर
घास बालू में उगाना दोस्तो आसां नहीं

एक तो है तेज पानी और उस पर बारिशें
नाव कागज़ की बहाना दोस्तो आसां नहीं

आदमी बनना है तो कुछ ख़ूबियां पैदा करो
आदमी ख़ुद को बनाना दोस्तों आसां नहीं

प्राण शर्मा

प्राण शर्मा जी की दो ग़ज़लें

अक्टूबर 20, 2008

प्राण शर्मा जी की दो ग़ज़लें

यारों से मुंह को मोड़ना कुछ तो ख़याल कर
बरसों की यारी तोड़ना कुछ तो ख़याल कर

अपनों से गांठ तोड़ना यूं ही सही मगर
गैरों से गांठ जोड़ना कुछ तो ख़याल कर

जग का ख़याल कर भले ही रात दिन मगर
घर का ख़याल छोड़ना कुछ तो ख़याल कर

उनके भी दिल धड़कने दे दिल की तरह तेरे
नित डालियां झंझोड़ना कुछ तो ख़याल कर

माना कि ज़िन्दगी से परेशान है तू पर
पत्थर से सर को फोड़ना कुछ तो ख़याल कर

जो कर गए हैं काम जहां में बड़े बड़े
नाम अपना उन से जोड़ना कुछ तो ख़याल कर

हाथों में तेरा हाथ लिया है किसी ने दोस्त
झटका के हाथ दौड़ना कुछ तो ख़याल कर

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केवल फूल भला लगता है तेरा धोका है प्यारे
एक तराशा पत्थर भी तो सुंदर होता है प्यारे

ये एक बार उतर जाए तो लोगों का उपहास बने
मर्यादा जैसे नारी के तन का कपड़ा है प्यारे

सब कुछ ही धुंधला दिखता है तुझ को इस सुंदर जग में
लगता है तेरी आंखों में कुछ कुछ कचरा है प्यारे

दुख घेरे रहता है मन को सिर्फ़ इसी का रोना है
वर्ना हर इक के जीवन में सब कुछ अच्छा है प्यारे

रंग नया है, ढंग नया है, सोच नई और बात नई
तू भी बदल अब तो यह सारा आलम बदला है प्यारे

हर बाज़ार भरा देखा है आते जाते लोगों से
फिर भी हर इक का कहना है ख़ाली बटुवा है प्यारे

‘प्राण’ शर्मा

प्राण शर्मा जी की दो रचनाएं

सितम्बर 21, 2008

प्राण शर्मा जी की दो रचनाएं :


प्राण शर्मा जी की रचनाएं पढ़ते हुए ऐसा लगने लगता है जैसे रचनाएं बोल रही हों।
प्राण जी एक दार्शनिक हैं और दर्शन जैसी गूढ़ रहस्यपूर्ण बातों को सरस और सरल
भाषा में लिखतें है जिससे पढ़ने वालों को समझने में परेशानी नहीं होती।
उनकी दो रचनाएं दे रहा हूं जिनमें दर्शन का व्यावहारिक पक्ष भी देखा जा सकता है
और उनका जीवन-दर्शन भी अन्तर्निहित हैः

पंछी

इस तरफ़ और उस तरफ़ उड़ता हुआ पंछी
जाने क्या क्या ढूंढता है मनचला पंछी।

छूता है आकाश की ऊंचाईयां दिन भर
सोच में डूबा हुआ इक आस का पंछी।

ढूंढता है हर घड़ी छाया घने तरू की
गर्मियों की धूप में जलता हुआ पंछी।

आ ही जाता है कभी सैयाद की ज़द में
एक दाने के लिए भटका हुआ पंछी।

बिजलियों का शोर था यूं तो घड़ी भर का
घोंसले में देर तक सहमा रहा पंछी।

था कभी आज़ाद औरों की तरह लेकिन
बिन किसी अपराध के बन्दी बना पंछी।

हाय री! मजबूरियां लाचारियां उसकी
उड़ न पाया आसमां में परकटा पंछी।

भूला अपनी सब उड़ानें, पिंजरे में फिर भी
एक नर्तक की तरह नाचा सदा पंछी।

बन नहीं पाया कभी इन्सान भी वैसा
जैसा बर्खुरदार सा बन कर रहा पंछी।

छोड़ कर तो देखिए इक बार आप इसको
फड़ फड़ा कर वेग से उड़ जाएगा पंछी।

देखते ही रह गई आंखें ज़माने की
राम जाने किस दिशा में उड़ गया पंछी।

-प्राण शर्मा

ग़ज़लः

ज़िन्दगी को ढूंढने निकला हूं मैं
ज़िन्दगी से बेख़बर कितना हूं मैं

चैन है आराम है हर चीज़ का
अपने घर में दोस्तों अच्छा हूं मैं

मुझ से ही क्यों भेद है मेरे ख़ुदा
हर किसी जैसा तेरा बंदा हूं मैं

मानता हूं आप सब के सामने
तजुरबों में दोस्तों बच्चा हूं मैं

क्यों भला अभिमान हो मुझ को कभी
दीये सा जलता कभी बुझता हूं मैं

-प्राण शर्मा

देवी नागरानी एक संवेदन शील कवियित्री – प्राण शर्मा

अगस्त 10, 2008

देवी नागरानी एक संवेदन शील कवियित्री
-प्राण शर्मा

‘प्रतिभाशाली और श्रेष्ट कवि कौन है?’ के उत्तर में गुरु ने कहा की प्रतिभाशाली और श्रेष्ट कवि वह है जिसके पास विपुल भाषा का भंडार हो, जिसके पास संसार का अनुभव ही अनुभव हो, जिसमें सॉफ-सुथरी कविता कहने की निपुणता हो, और जिसको छंदों- बहरों का पूरा ग्यान हो. पूछने वाले में संतुष्टि की लहर दौड़ गयी.

देवी नागरानी एक ऐसी सशक्त कवियित्री हैं, जिसमें उपरोक्त चारों विशेषताएँ हैं. उनका भाषा पर अधिकार भी है, उनको संसार का अनुभव भी है, उनमें सॉफ-सुथरी कविता कहने की क्षमता भी है और उन्हें छंदों- बहरों का पूरा ग्यान भी है. उनमें इन्ही विशेषताओं एवं गुणों के कारण हिंदी और उर्दू के मूधन्यि साहित्यकारों डा॰. कमल किशोर गोयनका, आर. पी शर्मा “महर्षि” , अहमद वसी, अंजना सँधीर, दीक्षित दनकौरी, मरियम ग़ज़ाला, हसन माहिर और अनवरे इस्लाम ने उनके चरागे-दिल की ग़ज़लों को भरपूर सराहा है. उनकी शायरी के बारे में जनाब अनवरे इस्लाम का कथन वर्णननीय है -” मैने पाया की वे (देवी नागरानी) महसूस करके फ़िक्र के साथ शेर कहती हैं, आपकी फ़िक्र में दिल की मामलेदारियों के साथ ग़मे ज़माना और उसके तमाम मसाइल शेरों में ढलकर ‘रंगे-रुख़े-बुताँ’ की तरह हसीन हो जाते हैं क्योंकि वे ग़म में भी ख़ुशी के पहलू तलाश करना जानती हैं –

ज़िंदगी अस्ल में तेरे ग़म का है नाम
सारी ख़ुशियाँ है बेकार अगर ग़म नहीं

चराग़े-दिल के पश्चात देवी नागरानी का नया ग़ज़ल-संग्रह है- “दिल से दिल तक” ग़ज़ल-संग्रह की लगभग सभी ग़ज़लें मैने पढ़ी है. प्रसन्नता की बात है कि देवी नागरानी ने ग़ज़ल की सभी विशेषताओं का निर्वाह बख़ूबी किया है. मैने अपने लेख ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ में लिखा है-” अच्छा शेर सहज भाव स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छन्द के सम्मिलन का नाम है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दीख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईँट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर के विचार से शब्द-सौंदर्या तथा लय का माधुर्या प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है.”

चूँकि देवी नागरानी के पास भाषा है, भाव है और छन्दों-बेहरों का ग्यान है, उनकी ग़ज़लों में लय भी है, गेयता भी है और शब्द सौंदर्या भी है. वे उपयुक्त शब्दों के अनुसार छन्दों का और उपयुक्त छंदो के अनुसार शब्दों का प्रयोग करने में प्रवीण हैं, इसलिए उनके एक-एक शेर में माधुर्य और सादगी निहित है. अपनी ग़ज़लों में देवी नागरानी एक कुशल राजगीर की तरह कौशलता दिखाती है. उन्होने अपने मन के आँगन को यादों से ख़ूब सजाया है. बिल्कुल वैसे ही जैसे एक माली उध्यान को फूलों से सजाता है. उनके अनगिनत शेर ऐसे हैं जिन्हें गुनगुनाने को जी करता हैं. मसलन-

मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती

वक्त़ किसका कहाँ हुआ ‘देवी’
कल हमारा था अब तुम्हारा है.

हमको ढूंढो न तुम मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं

वफ़ा मेरी नज़र अंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का ज़िक्र कल जिनकी ज़ुबाँ पर था

हस्ती ही मेरी तन्हा,
इक द्वीप सी रही है

चारों तरफ़ है पानी,
फिर भी बची हुई है.

भरोसा करने से पहले ज़रा तू सोचती देवी
कि सच में झूठ कितना उस फ़रेबी ने मिलाया है
देवी

नागरानी एक कुशल कवियित्री हैं. यूँ तो ‘दिल से दिल तक’ में सुख के भाव भी बिखरे हैं लेकिन दुख के भाव कुछ ज़्यादा ही व्यक्त हुए हैं. उनके शब्दों में-

ग़म तो हर वक्त साथ साथ रहे
ग़म कहीं अपना रुख़ बदलते हैं.

यहां मैं महादेवी वर्मा की दो पंक्तियां कहना चाहूँगा जिनके शब्दों से दर्द उसी तरह टपकता है जैसे देवी नागरानी जी के शेरों से –

मैं नीर भरी दुख की बदली
उमड़ी कल थी मिट आज चली.

मानव-जीवन में सुख-आगमन पर दुख भरे शेर भी मीठे लगते हैं, महान अँग्रेज़ी कवि शैले की इस पंक्ति की तरह-

Our sweetest songs are those
That tell of saddest thoughts.

परिणाम स्वरूप देवी नागरानी के अधिकांश शेर सर पर चढ़ कर बोलते ही नहीं, दिल में भी उतरते चले जाते हैं.
प्राण शर्मा
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नामे किताबः दिल से दिल तक,
शायराः देवी नागरानी, पन्नेः १४४, मूल्यः १५०, प्रकाशकः लेखक