Archive for the ‘प्राण शर्मा’ Category

यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघु कथाएं

जुलाई 19, 2010

दाता दे दरबार विच

प्राण शर्मा

पंडित नरदेव जी नगर के प्रसिद्ध भजन गायक हैं. बहुत व्यस्त रहते हैं. खूब डिमांड है
उनकी. भजन गा गा कर यानि प्रभु का नाम ले लेकर उन्होंने अपना भव्य मकान
खड़ा कर लिया है. महीने में एक दिन वे भजन गायकी का कार्यक्रम अपने घर में भी
रखते हैं. श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है. उनके बड़े कमरे में बैठने को जगह नहीं मिलती है.
एक बार मेरा मित्र मुझे पंडित नरदेव जी के घर ले गया था. उनका कीर्तन चल
रहा था. वे अपनी भजन मंडली के साथ भजन पर भजन गाये जा रहे थे. क्या
सुरीली आवाज़ थी उनकी! सुन-सुन कर श्रद्धालु जन प्रेम भाव से झूम रहे थे और
साथ ही साथ धन की बरखा भी कर रहे थे. धन की बरखा होते देख कर पंडित
नरदेव जी का भजन गाने का उत्साह दुगुना-तिगुना हुआ जा रहा था. हर
भजन की समाप्ति पर वे कहते – श्रद्धालुओ, ऐसी संगत बड़े भाग्य से मिलती है .
वातावरण में भक्ति की उफान लेती धारा को देख कर पंडित नरदेव जी ने अपने
अति लोकप्रिय भजन का सुर अलापा —
‘तन, मन, धन सब वार दे अपने दाता दे दरबार विच’.
धुन बड़ी प्यारी थी, मंत्रमुग्ध कर देने वाली. सुन कर पाषाण ह्रदय भी पिघल गये.
श्रद्धालु जन तन, मन तो नहीं वार पाए लेकिन धन वारने में कोई पीछे नहीं हटा. शायद
ही किसीकी जेब बची थी. देखा देखी मेरी जेब भी नहीं बच पाई.
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आकांक्षा

प्राण शर्मा

“अरी ,क्या हुआ जो वो पैंसठ साल का बूढ़ा खूसट है ! है तो करोड़पति न ! !
एकाध साल में बेचारा लुढ़क जाएगा. उसकी सारी की सारी संपत्ति की तू ही तो – – – तब ऐश और आराम से रहना. इंग्लॅण्ड हो या इंडिया कौन छैल–छबीला करोड़ों कीजायदाद की मालकिन का हाथ मांगने को तैयार नहीं होगा ? देखोगी, तुझसे शादी करने के लिए हजारों लड़के ही भागे आयेंगे .”

तीस साल की आकांक्षा को माँ का सुझाव बुरा नहीं लगा.
दूसरे दिन ही अग्नि के सात फेरों के बाद वो बूढ़े खूसट की अर्धांगिनी बन गयी.
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यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

जून 8, 2010

‘राज़ ‘

– प्राण शर्मा

धर्मपाल ने टेलिफ़ोन का चोगा उठाकर सतपाल का फ़ोन नंबर मिलाया.फ़ोन की लाइन अंगेज थी.” पता नहीं कि लोग फोन पर क्या- क्या बातें करते हैं? घंटों ही लगा देते हैं.किसी और को बातकरने का मौक़ा ही नहीं देते  हैं.” खीझ कर उसने फोन पर चोगा पटक दिया.

कमरे में इधर-उधर चक्कर लगा कर धर्मपाल ने फिर सतपाल को फोन किया.दूसरी ओर से फ़ोन की घंटी बजी.धर्मपाल के चेहरे पर सब्र का प्याला छलका.

” कौन ? “दूसरी और से सतपाल की आवाज़ थी.

” मैं धर्मपाल  बोल रहा हूँ. सतपाल, तुम बड़े अजीब किस्म के आदमी हो. एक राज़ को तुमने कुछ ही दिनों  में  यारों-दोस्तों में उगल दिया. क्या उसे तुम अपने दिल में नहीं रख सकते थे ? “

” किस राज़ को उगल दिया मैंने ?

” वही यशपाल का राज़ कि वो किसी और ब्याही औरत से छिप- छिप कर इश्क लड़ाता है.अभी-अभी वो मुझसे लड़ कर गया है. बहुत गुस्से में था.”

” भाई, तुमने तो मुझे यशपाल का राज़ बताया ही नहीं था. राज़ तो योगराज और सुधीर ने मुझे बताया था.धर्मपाल , पकड़ना है तो उन्हें पकड़ो.” सतपाल ने फ़ोन के बेस  पर चोगा रख दिया.

धर्मपाल ने फ़ोन पर योगराज को पकड़ा ” योगराज , तुमने ये हंगामा क्या बरपा कर दिया है?”

” कैसा हंगामा,भाई.समझा नहीं.” योगराज ने हैरानगी ज़ाहिर की.

” क्या तुम एक राज़ को अपने दिल में नहीं रख सकते थे?”

” किस राज़ को ? जरा खोल कर बात करो.

” वही यशपाल वाला राज़ कि वो छिप-छिप कर किसी ब्याही औरत से रंगरलियाँ मनाता है.उसका राज़ तुमने सतपाल को खोल दिया और उसने कई यारों-दोस्तों  को.मुझे तुमसे ये आशा कतई नहीं थी.”

” देखो धर्मपाल, तुम मुगालते में हो. तुमने तो ये राज़ मुझसे कहा ही नहीं तो खफा क्यों होते हो ? राज़ तो मुझे सुधीर ने बताया था. पकड़ना है तो उसे पकड़ो.”

योगराज ने भी फ़ोन के बेस पर चोगा पटक दिया.

धर्मपाल को याद आया कि राज़ उसने सुधीर को ही  बताया था. उसने उसको पकड़ना मुनासिब समझा. फ़ोन लगने पर सुधीर की पत्नी बोली – ” कौन ?

” भाभी जी, मैं धर्मपाल बोल रहा हूँ. क्या सुधीर घर में है? “

” जी, नहीं. कुछ मेहमान आने वाले हैं. उनके लिए मीठा – नमकीन लेने गये हैं.आने वाले ही हैं.आप कुछ देर के बाद फ़ोन कर लीजिये .ठहरिये, वो आ गये हैं. लीजिये, उनसे बात कीजिये.”

”  सुधीर.”

” बोल रहा हूँ , धर्मपाल.”

” तुम अच्छे हमराज़ निकले हो ! एक राज़ को तुम अपने पेट के किसी कोने में दबा कर नहीं रख सके.”

” कौन सा राज़, मेरे यार ?”

” वही यशपाल का किसी ब्याही औरत से लुक-लुक  कर मिलने वाला राज़.”

” अरे यार, इसे तुम राज़ कहते हो ?  इश्क-विश्क के चक्कर को तुम राज़ समझते हो .ये रोग भी कहीं छिपाने से छिपता  हैं? देखो, धर्मपाल, तुमने मुझसे यशपाल का राज़ बताया. बताया न ?

” बताया.”

” राज़ था तो उसे राज़ ही रहने देते.- – – मैं गलत तो नहीं कह रहा हूँ ? – – – – चुप क्यों हो गये हो ?  – – – – बोलो न?”

धर्मपाल को दूसरी ओर से टेलिफ़ोन के बेस पर चोगा रखने की आवाज़ सुनायी दी.

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सुरक्षाकर्मी

– प्राण शर्मा

रामस्वरूप और राजनारायण कई सालों से पुलिस विभाग में काम कर रहें हैं. उनके काम को सराहते हुए विभाग ने उन्हें उद्योगपति पी.के.धर्मा की सुरक्षा में तैनात कर दिया.

पी.के. धर्मा वही उद्योगपति हैं जो हर साल देश की प्रमुख पार्टी को एक करोड़ रुपयों की धनराशि चन्दा के रूप में देते हैं. गत मास किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन पर गोली चला कर हमला किया था. गोली उनके सर के दस-ग्यारह मीटर ऊपर होकर निकल गयी थी. उनको कोई जानी नुक्सान नहीं हुआ था.

मीडिया ने उक्त घटना को पी.के. धर्मा का स्टंट बताया. सरकार  ने इसकी छानबीन करवाई. छानबीन पर लाखों रूपए खर्च हुए. जल्द ही एक सौ पृष्ठों की रिपोर्ट छपी. रिपोर्ट का सारांश था – ” चूँकि पी.के. धर्मा सैंकड़ों संस्थाओं को चन्दा देते हैं इसलिए वे कई ईर्ष्यालु संस्थाओं की हिटलिस्ट में हैं. वे सरकारी सुरक्षा व्यवस्था के पूरे हक़दार हैं.”

पी.के. धर्मा की सुरक्षा में तैनात रामस्वरूप और राजनारायण को तीन महीने भी नहीं बीते थे कि उन्हें और उनके परिवार को जान से मार देने के धमकी भरे पत्र और फ़ोन आने लगते हैं. हिम्मती हैं इसलिए कुछ दिनों तक दोनो ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन रोज़ – रोज़ के धमकी भरे पत्रों और फ़ोनों से वे घबरा जाते हैं. अपनी चिंता कम और परिवार वालों की चिंता उन्हें ज्यादा है. अपनी और अपने परिवार वालों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए उन्होंने पूरा विवरण अपने विभाग को भेज दिया.

विभाग ने उनकी दरखास्त को नामंजूर कर दिया. जवाब में लिखा था – ” आप सुरक्षाकर्मी हैं. आपको सुरक्षा की क्या आवश्यकता है ? “

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यू.के. से प्राण शर्मा की कहानी – तीन लँगोटिया यार

मई 5, 2010

तीन लँगोटिया यार
– प्राण शर्मा

राजेंद्र ,राहुल और राकेश लँगोटिया यार हैं. तीनों के नाम ” र ” अक्षर से शुरू होते हैं. ज़ाहिर है कि उनकी राशि तुला है. कहते हैं कि जिन लोगों की राशि एक होती है उनमें बहुत समानताएँ  पायी जाती हैं. राजेंद्र,राहुल और राकेश में भी बहुत समानताएँ हैं. ये दीगर बात है कि राम और रावण की राशि भी एक थी यानी तुला थी, फिर भी दोनो में असमानताएं थीं. राम में गुण ही गुण थे और रावण में अवगुण ही अवगुण. एक उद्धारक था और दूसरा संहारक. एक रक्षक था और दूसरा भक्षक.

यदि राजेन्द्र, राहुल और राकेश में समानताएँ हैं तो कोई चाहने पर भी उन्हें असमानताओं में तबदील नहीं कर सकता है. सभी का मानना है  कि उनमें समानताएँ हैं तो जीवन भर समानताएँ ही रहेंगी. इस बात की पुष्टि कुछ साल पहले चंडीगढ़ के जाने-माने ज्योतिषाचार्य महेश चन्द्र ने भी की थी. राजेंद्र, राहुल और राकेश के माथों की रेखाओं को देखते ही उन्होंने कहा था- “कितनी अभिन्नता है तुम तीनों में! भाग्यशाली हो कि विचार, व्यवहार और स्वभाव में तुम तीनों ही एक जैसे हो..जाओ बेटो, तुम तीनों की मित्रता अटूट रहेगी. सब के लिए उदाहरण बनेगी तुम तीनों की मित्रता.”

राजेंद्र, राहुल और राकेश की अटूट मित्रता के बारे में ज्योतिषाचार्य महेश चन्द्र के भविष्यवाणी करने या नहीं करने से कोई अंतर नहीं पड़ता था क्योंकि उनकी मित्रता के चर्चे पहले से ही घर-घर में हो रहे हैं. मोहल्ले के सभी माँ-बाप अपनी-अपनी संतान को राजेंद्र,राहुल और राकेश के नाम ले-लेकर अच्छा बनने की नसीहत देते हैं, समझाते हैं-“अच्छा इंसान बनना है तो राजेंद्र,राहुल और राकेश जैसा मिल-जुलकर रहो. उन जैसा बनो और उन जैसे विचार पैदा करो. किसीसे दोस्ती हो तो उन जैसी.”

राजेंद्र ,राहुल और राकेश एक ही स्कूल और एक ही कॉलिज में पढ़े. साथ-साथ एक ही बेंच पर बैठे. बीस की उम्र पार कर जाने के बाद भी वे साथ-साथ उठते-बैठते  हैं.हर जगह साथ-साथ आते-जाते हैं. कन्धा से कन्धा मिलाकर चलते हैं. मुस्कराहटें बिखेरते हैं. रास्ते में किसीको राम-राम और किसी को जय माता की कहते हैं. बचपन जैसी  मौज-मस्ती अब भी बरकरार है उनमें. कभी किसीकी तोड़-फोड़ नहीं करते हैं वे. मोहल्ले के सभी बुजुर्ग लोग उनसे खुश हैं. किसीको कोई शिकायत नहीं है उनसे. मोहल्ले भर की सबसे ज़्यादा चहेती  मौसी आनंदी का तो कहना है- “कलयुग में ऐसे होनहार और शांतिप्रिय बच्चे, विश्वास नहीं होता  है .

है आजकल के युवकों में उन के जैसी खूबियाँ? आजकल के युवकों को समझाओ तो आँखें दिखाते हैं. पढ़ाई न लिखाई और शर्म भी है उन्होंने बेच खाई.

माँ-बाप की नसीहत के बावजूद मोहल्ले के कुछेक लड़के शरारतें करने से बाज़ नहीं आते हैं. ऊधम मचाना उनका रोज़ का काम है . जब से राजेन्द्र,राहुल और राकेश की अटूट मित्रता के सुगंध घर-घर में फैली है तब से उनके गिरोह का का पहला मकसद है उनकी मित्रता की अटूटता को छिन्न-भिन्न करना. इसके लिए उन्होंने कई हथकंडे अपनाए हैं. लेकिन हर हथकंडे में उनको असफलता का सामना करना पड़ा है. फिर भी वे निराश नहीं हुए हैं.उनके हथकंडे जारी हैं.

चूँकि राजेंद्र, राहुल और राकेश की चमड़ियों के रंगों में असमानता है यानि राजेंद्र का रंग गोरा है ,राहुल का रंग भूरा है और राकेश का रंग काला है, इसलिए इन शरारती लड़कों को उनके रंगों को लेकर उन्हें आपस में लड़वाने की सूझी है. तीनो को आपस में लड़वाने का काम गिरोह के मुखिया सरोज को सौंपा गया है. ऐसे मामलों में वो एक्सपर्ट माना जाता है.

एक दिन रास्ते में राजेंद्र मिला तो सरोज ने मुस्कराहट बिखेरते हुए उसे गले से लगा लिया. दोनो में बातों का सिलसिला शुरू हो गया. इधर-उधर की कई बातें हुई उनमें. अंत में बड़ी आत्मीयता और शालीनता से सरोज बोला -“अरे भईया ,तुम दूध की तरह गोरे  – चिट्टे हो. किन भूरे-काले से दोस्ती किये बैठे हो ? तुम्हारी दोस्ती उनसे रत्ती भर नहीं मिलती  है. आओ हमारी संगत में. फायदे में रहोगे.”
जवाब में राजेंद्र ने अपनी आँखें ही तरेरी थीं. सरोज मुँह लटका कर मुड़ गया था.

जब राहुल और राकेश को  इस बात का पता राजेंद्र से लगा तो तीनो ही झूमकर एक सुर में गा उठे–“आँधियों के चलने से क्या पहाड़ भी डोलते हैं?”

शायद ही ऐसी शाम होती जब राजेंद्र,राहुल और राकेश की महफ़िल नहीं जमती. शायद ही ऐसे शाम होती जब तीनों मिलकर अपने- अपने नेत्र शीतल नहीं करते. शाम के छे बजे नहीं कि वे नमूदार हुए नहीं. गर्मियों में रोज गार्डेन और सर्दियों में फ्रेंड्स कॉर्नर  रेस्टोरंट में. घंटों ही साथ-साथ बैठकर बतियाना उनकी आदत में शुमार है. कहकहों और ठहाकों के बीच कोई ऐसा विषय नहीं होता है जो उनसे अछूता रहता हो. उनके नज़रिए में वो विषय ही क्या जो बोरिंग हो और जो खट्टा,मीठा और चटपटा न हो.

आज के दैनिक समाचार पत्र ” नयी सुबह” में समलिंगी संबंधों पर प्रसिद्ध लेखक रोहित यति का एक लंबा लेख है. काफी विचारोत्तेजक है. राजेंद्र ,राहुल और राकेश ने उसे रस ले-लेकर पढा है. उन्होंने सबसे पहले इसी विषय पर बोलना बेहतर समझा है.

“जून के गर्म-गर्म महीने में ऐसा गर्म विषय होना ही चाहिए डिस्कस करने के लिए. मैं कहीं गलत तो नहीं कह रहा हूँ?” राजेंद्र के इस कथन से सहमत होता राकेश कहता है- ” तुम ठीक कहते हो. ये मैटर, ये सब्जेक्ट हर व्यक्ति को डिस्कस करना

चाहिए. लेख आँखें खोलने वाला है . उसमें कोई ऐसी बात नहीं जिससे किसीको एतराज़ हो. सच तो ये है कि इस प्रक्रिया से कौन नहीं गुज़रता है ? मैं हैरान होता हूँ

आत्मकथाओं को लिखने वालों पर कि वे किस चतुराई से इस सत्य को छिपा जाते हैं. क्या कोई आत्मकथा लिखने वाला इस प्रक्रिया से नहीं गुज़रता है? अरे,उनसे तो वे लोग सच्चे और ईमानदार हैं जो सरेआम कबूल करते हैं कि वे समलिंगी सम्बन्ध रखते हैं.” राकेश अपनी राय को इस ढंग से पेश करता है कि राजेंद्र और राहुल के ठहाकों से आकाश गूँज उठता है. आस-पास के बेंचों पर बैठे हुए लोग उनकी ओर देखने लगते हैं लेकिन राजेंद्र,राहुल और राकेश के ठहाके जारी रहते हैं. ठहाकों में राहुल याद दिलाता है -” तुम दोनो को क्या वो दिन याद है जिस दिन हम तीनों नंगे-धड़ंगे बाथरूम   में घुस गये थे. घंटों एक -दूसरे पर पानी भर-भरकर पिचकारियाँ चलाते रहे थे. कभी किसी अंग  पर और कभे किसी अंग पर. ऊपर से लेकर नीचे तक कोई हिस्सा नहीं छोड़ा था हमने. कितने बेशर्म हो गये थे हम. क्या-क्या छेड़खानी नहीं की थी हमने उस समय!”

” सब याद है प्यारे राहुल जी . पानी में छेड़खानी का मज़ा ही कुछ और होता है. “राकेश जवाब में रोमांचित होता हुआ राहुल का हाथ चूमकर कहता है.
” मज़ा तो असल में हमें नहाने के बाद आया था , राजेंद्र राकेश से मुखातिब होकर बोलता है,” जब तुम्हारी मम्मी ने धनिये और पनीर के परांठे खिलाये थे हमको. क्या लज्ज़तदार परांठे थे ! उनकी सुगंध अब भी मेरे  मन में समायी हुई है. याद है कि घर के दस जनों के परांठे हम तीनों ही खा गये थे. सब के सब इसी ताक में बैठे रहे कि कब हम उठें और कब वे खाने के लिए बैठे . बेचारों की हालत देखते ही बनती थी “.
” उनके पेटों में चूहे जो दौड़ रहे थे , भईया ,भूख की मारे मोटे-मोटे चूहे .” राहुल के संवाद में कुछ इस तरह की नाटकीयता थी कि राजेंद्र और राकेश की हँसी के फव्वारे  फूट पड़ते हैं.
” उस दोपहर हम घोड़े बेचकर क्या सोये थे कि चार बजे के बाद जागे थे . गुल्ली- डंडे का मैच खेलने नहीं जा सके थे हम. अपना- अपना माथा पीटकर रह गये थे.” रुआंसा होकर राकेश कहता है-
” बचपन के दिन भी क्या खूब थे !”  घरवालों के चहेते थे हम . पूरी  छूट  थी हमको . कभी किसी की मार नहीं थी. किसीकी प्रताड़ना नहीं थी. पंछियों की तरह आजाद  थे हम .” राजेंद्र की इस बात का प्रतिवाद करता है राहुल- “माना कि आप पर किसी की मार नहीं थी, किसी की प्रताड़ना नहीं थी लेकिन आप दोनो ही जानते हैं कि मेरे चाचा की मुझपर  मार भी थी और प्रताड़ना भी. छोटा होने के नाते पिता जी उनको भाई से ज्यादा बेटा मानते हैं और वे पिता जी के प्यार का नाजायज फायदा उठाते हैं. उनके गुस्से का नजला मुझपर ही गिरता  है .

एक बात मैंने आपको कभी नहीं बताई. आज बताता हूँ. एक दिन मेरे चाचा ने मुझे इतना पीटा कि मैं  अधमरा हो गया.  हुआ यूँ  कि उन्होंने अपने एक मित्र को एक कौन्फिडेन्शल लेटर भेजा मेरे हाथ. उनके मित्र का दफ्तर घर से दूर था.तपती दोपहर थी. मैं भागा-भागा उनके दफ्तर पहुंचा. मेरे पहुँचने से पहले मेरे चाचा का मित्र किसी काम के सिलसिले में कहीं और जा चुका था. सोच में पड़ गया  कि मैं अब क्या करूँ? पत्र वापस ले जाऊं या चाचा के दोस्त के दफ्तर में छोड़ दूं? आखिर मैं पत्र छोड़कर लौट आया”.
” फिर क्या हुआ?” राजेंद्र और राकेश ने जिज्ञासा में पूछा.
” फिर वही हुआ जिसकी मुझे आशंका थी. ये जानकार कि मैं कौन्फिडेन्शल लेटर किसी और के हाथ थमा आया हूँ ,चाचा की आँखें लाल-पीली हो गयीं. वे मुझपर बरस पड़े. एक तो कहर की गर्मी थी, उस पर उनकी डंडों की मार . मेरी दुर्गति कर दी उन्होंने. घर में बचाने वाला कोई नहीं था.छोटा भाई खेलने के लिए गया हुआ था.पिता जी काम पर थे और माँ किसी सहेली के घर में गपशप मारने के लिए गयी हुई थीं.”
” आह! ”  राजेंद्र और राकेश की आँखों में आंसू छलक जाते हैं.
“कल की बात सुन लीजिये. आप जानते ही हैं कि मेरे चाचा नास्तिक हैं आजकल वे इसी कोशिश में हैं कि मैं भी किसी तरह नास्तिक बन जाऊं. मुझे समझाने लगे -” भतीजे,मनुष्य का धर्म ईश्वर को पूजना नहीं है. ईश्वर का अस्तित्व है ही कहाँ कि उसको पूजा जाए. पूजना है तो अपने शरीर को पूज. इस हाड़-मांस की देखभाल करेगा तो स्वस्थ रहेगा. स्वस्थ रहेगा तो तू लम्बी उम्र पायेगा. मेरी बात समझे कि नहीं समझे? ले,तुझे एक तपस्वी की आप बीती सुनाता हूँ उसे सुनकर तेरे विचार अवश्य बदलेंगे, मुझे पूरा विश्वास है”.
थोड़ी देर के लिए अपनी बात को विश्राम देकर राहुल कहना शुरू करता है- “चाचा ने जबरन मुझे अपने पास बिठाकर तपस्वी की आपबीती सुनायी. वे  सुनाने लगे-” भतीजे, एक तपस्वी था. तप करते-करते वो सूखकर कांटा हो गया था. एक राहगीर ने उसे झंझोड़ कर उससे पूछा- प्रभु, आप ये क्या कर रहे हैं?
” तपस्या कर रहा हूँ. आत्मा और परमात्मा को एक करने में लगा हुआ हूँ.”. तपस्वी ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया.
” प्रभु, अपने शरीर की ओर तनिक ध्यान दीजिये. देखिये,सूखकर काँटा हो गया है. लगता है कि आप कुछ दिनों के ही महमान हैं इस संसार के. ईश्वर का तप करना छोड़िये और अपने शरीर की देखभाल कीजिये.”
तपस्वी ने अपने शरीर को देखा. वाकई उसका हृष्ट-पुष्ट शरीर सूखकर काँटा हो गया था. उसने तप करना छोड़ दिया. वो जान गया कि ईश्वर होता उसका शरीर यूँ दुबला-पतला नहीं होता, हृष्ट-पुष्ट ही रहता. भतीजे, इंसान समेत धरती पर जितनी जातियाँ हैं, चाहे वो मनुष्य जाति हो या पशु जाति ,किसी की भी उत्पत्ति ईश्वर ने नहीं की है. हरेक की उत्पत्ति कुदरती तरीकों से ही मुमकिन हुई है. हमारा रूप ,हमारा आकार और हमारा शरीर सब कुछ कुदरत की देन है,ईश्वर की नहीं.”

” सभी नास्तिक ऐसे ही उल्टी-सीधी बातें करके औरों को नास्तिक बनाते हैं,” राजेंद्र बोल पड़ता है, ” तुम्हारे चाचा ने फिर कभी ईश्वर के प्रति तुम्हारी आस्था को ठेस पहुंचाने की कोशिश की तो उन्हें ये प्रसंग जरूर सुनाना- ” चाचा,आप जैसा ही एक नास्तिक था. ईश्वर है कि नहीं ,ये जांच करने के लिए वो जंगल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया, भूखा ही. ये सोचकर कि अगर ईश्वर है तो वो अवश्य ही उसकी भूख मिटाने को आएगा.
नास्तिक देर तक भूखा बैठा रहा. उसे रोटी खिलाने के लिए ईश्वर नहीं आया. उसने सोचा कि वो आयेगा भी कैसे?उ सका अस्तित्व हो तब न? अचानक नास्तिक ने देखा कि डाकुओं का एक गिरोह उसके पेड़ के नीचे आकर लूट का मालवाल आपस में बांटने लगा है.

मालवाल बाँट लेने के बाद डाकुओं को भूख लगी,जोर की. कोई राहगीर अन्न की पोटली भूल से पेड़ के नीचे छोड़ गया था. उनकी नज़रें पोटली पर पड़ीं.पोटली में भोजन था. उनके चेहरों पर खुशियों की लहर दौड़ गयी. वे भोजन पर टूट पड़े. अनायास एक डाकू चिल्ला उठा-” ठहरो,ये भोजन हमें नहीं खाना चाहिए. मुमकिन है कि इसमें विष मिला हो और हमारी हत्या करने को किसीने साजिश रची हो. अपने साथी की बात सुनकर अन्य डाकुओं में भी शंका जाग उठी. सभी इधर-उधर और ऊपर-नीचे देखने लगे..एक डाकू को पेड़ की घनी डाली पर बैठा एक व्यक्ति नज़र आया. वो चिल्ला उठा-” देखो,देखो,वो इंसान छिप कर बैठा है. सभी डाकुओं की नज़र ऊपर उठ गयीं. सभीको एक घनी डाली पर बैठा एक व्यक्ति दिखाई दिया. सभी का शक विश्वास में तब्दील हो गया कि यही धूर्त है कि जिसने भोजन में विष मिलाया है. सभी शेर की तरह गर्जन कर उठे-
” कौन है तू? ऊपर बैठा क्या कर रहा है?”
” मैं नास्तिक हूँ . यहाँ बैठकर मैं ईश्वर के होने न होने की जांच कर रहा हूँ, भूखा रहकर. मैं ये देखना चाहता हूँ कि अगर संसार में ईश्वर है तो वो मुझ भूखे को कुछ न कुछ खिलाने के लिए अवश्य आयेगा यहाँ.”

नास्तिक ने सच -सच कहा लेकिन डाकू उसका विश्वास कैसे कर लेते ? वे चिल्लाने लगे-” झूठे,पाखंडी और धूर्त. नीचे  उतर .”
नास्तिक नीचे उतरा ही था कि उसकी शामत आ गयी.तमाचे पर तमाचा उसके गालों पर पड़ना  शुरू हो गया. एक डाकू अपनी दायीं भुजा में उसकी गर्दन दबाकर उसे आतंकित करते हुए पूछने लगा-” बता,ये पोटली किसकी है? तू किसका जासूस है? किसने तुझे हमारी ह्त्या करने के लिए भेजा है?”
” ये मेरी पोटली नहीं है.” नास्तिक गिड़ गिड़ाया. मेरा विश्वास कीजिये कि मैं किसीका जासूस नहीं हूँ . मैं आप सबके पाँव पड़ता हूँ . मैं निर्दोष हूँ. मुझपर दया कीजिये. मुझे छोड़ दीजिये .”
“अगर ये भोजन तेरा नहीं है और तूने इसमें विष नहीं मिलाया है तो पहले तू इसे खायेगा..ले खा.” एक डाकू ने एक रोटी उसके मुँह में ठूंस दी.पलक  झपकते ही नास्तिक अजगर की तरह उसे निगल गया.

डाकुओं से छुटकारा पाकर नास्तिक  भागकर  सीधा मंदिर  में गया. ईश्वर की मूर्ति के आगे नाक रगड़ कर दीनता भरे स्वर में बोला -” हे भगवन ,तेरी महिमा  अपरम्पार है.तूने मेरी आँखों पर पड़े नास्तिकता के परदे को हटा दिया है. मेरी तौबा ,फिर कभी तेरी परीक्षा  नहीं लूँगा.”

” लेकिन राजेंद्र,ईश्वर के अस्तित्वहीन होने के बारे में मेरे चाचा की एक और दलील है. वो ये कि इस ब्रह्माण्ड का रचयिता अगर ईश्वर है तो उसका भी रचयिता कोई होगा. वो कौन है? वो दिखाई क्यों नहीं देता है?” राहुल ने गंभीरता में कहा .

” तुम अपने चाचा की ये बात रहने दो कि अगर ईश्वर है तो उसका भी रचयिता कोई होगा. एक शंका कई शंकाओं को जन्म देती है. सीधी सी बात है कि धरती ,आकाश,बादल ,नदी,पहाड़.सागर,सूरज,चाँद,सितारे,पंछी,जानवर  इतना सब कुछ किसी इंसान की उपज तो है नहीं. किसी अलौकिक शक्ति की उपज है. उस अलौकिक शक्ति का नाम ही ईश्वर है. रही बात कि वो दिखाई क्यों नहीं देता तो हवा और गंध  भी दिखाई कहाँ देते हैं.? उनके अस्तित्व को नास्तिक क्यों नहीं नकारते हैं ? अरे भाई, इस संसार में कोई नास्तिक-वास्तिक नहीं है. संकट आने पर नास्तिक भी ईश्वर के नाम की माला अपने हाथ में ले लेता है . वो भी उसके रंग में रंगने लगता है. दोस्तो, ईश्वर के रंग में रंगने से मुझे याद आया है कि वह भी मुझ जैसा है.”

“मतलब ?” राहुल और राकेश कौतूहल  व्यक्त करते हैं.
” कल रात को मुझको सपना आया . मैंने देखा कि मेरे चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश था . वो प्रकाश था ईश्वर के रंग-रूप का. वाह,क्या रंग-रूप था ! गोरा -चिट्टा .मेरे जैसा .”

बताते-बताते राजेंद्र के मुख पर मुस्कान फैल जाती है.
” गोरा-चिट्टा ,तुम्हारे जैसा ? राहुल प्रतिवाद  करता है.
” सच कहता हूँ. ईश्वर रंग-रूप बिलकुल  मेरे जैसा है. ”
” अरे भाई, उसका रंग गोरा-चिट्टा नहीं है , भूरा है, मेरे जैसा..मेरे सपने में तो ईश्वर कई बार आ चुका है. मैंने हमेशा उसको भूरा देखा है. ”
” तुम मान क्यों नहीं लेते कि वो गोरा-चिट्टा है.?”
” तुम भी क्यों नहीं मान लेते कि वो भूरा है?”
” गोरे-चिट्टे को भूरा कैसे मान लूं मैं ?”
” गलत. बिलकुल गलत. तुम दोनो ही गलत कहते हो.”  राकेश जो अब तक खामोश बैठा राजेंद्र और राहुल की बातें सुन रहा था भावावेश में आकर बोल उठता  है ,” तुम दोनो की बातों में रंगभेद की बू आ रही है. तुम मेरे रंग को तो खारिज  ही कर रहे हो . मेरी बात भी सुनो. न तो वो गोरा है और न ही भूरा. वो तो काला है ,काला. बिलकुल मेरे रंग जैसा. मैं भी सपने में ईश्वर को कई बार देख चुका हूँ. अलबत्ता  रोज ही उसको देखता  हूँ .  क्या तुम दोनों के पास उसके गोरे या भूरे होने का कोई प्रमाण है?  नहीं है न?  मेरे पास प्रमाण है उसके  काले होने का . भगवान् कृष्ण काले थे. अगर ईश्वर गोरा या भूरा है तो कृष्ण को भी गोरा  या भूरा होना चाहिए था.
राकेश के बीच में पड़ने से मामला गरमा  जाता  है. तीनों की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है. अपनी-अपनी बात पर तीनों अड़ जाते हैं. कोई तस से मस नहीं होता है. राजेंद्र राहुल का कंधा झकझोर कर कहता है- तुम गलत कहते हो ” और राकेश दोनों के कंधे  झकझोर कर कहता है- ” तुम दोनो ही गलत कहते हो .”
ईश्वर का कोई रंग हो या ना हो लेकिन होनी अपना रंग दिखाना शुरू कर देती है. विनाश काले विपरीत बुद्धि . अज्ञान ज्ञान पर हावी हो जाता है. जोश का अजगर होश की मछली  निगलने लगता है. राहुल ,राजेंद्र और राकेश की रक्त वाहिनियों में उबाल आ जाता है.

देखते ही देखते तीनों का वाक् युद्ध हाथापाई में तब्दील हो जाता है. हाथापाई घूंसों में बदल जाती है. घूसों के वज्र बरसने की भयानक गर्जना सुनकर आसपास के पेड़ों पर अभी-अभी लौटे परिंदे आतंकित होकर इधर-उधर उड़ जाते हैं. परिंदे तो उड़ जाते हैं लेकिन तमाशबीन  ना जाने कहाँ-कहाँ से आकर इकठ्ठा हो जाते हैं . तमाशबीन  राजेंद्र, राहुल और राकेश की ओर से बरसते  घूसों का आनंद यूँ लेने लगते हैं जैसे मुर्गों  की जंग  हो. कई तमाशबीन तो आग में घी का काम करते हैं. अपने-अपने रंग के अनुरूप वे ईश्वर का रंग घोषित करके तीनों को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.
शुक्र हो कुछ शरीफ  लोगों का. उनके बीच में पड़ने से राजेंद्र ,राहुल और राकेश में युद्ध थमता है. तीनों ही लहूलुहान हैं. क्योंकि तीनों ही दोस्ती के लिए खून बहाने का कलेजा रखते हैं. लंगोटिए यार जो हैं .
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यू.के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

अप्रैल 14, 2010


मेहमान
-प्राण शर्मा

घर में आये मेहमान से मनु ने आतिथ्य धर्म निभाते हुए पूछा-” क्या पीयेंगे,ठंडा या गर्म?”
” नहीं, कुछ भी नहीं.” मेहमान ने अपनी मोटी गर्दन हिला कर कहा.
” कुछ तो चलेगा?”
” कहा न, कुछ भी नहीं.”
” शराब?”
” वो भी नहीं.”
” ये कैसे हो सकता है, मेरे हजूर? आप हमारे घर में पहली बार पधारे हैं. कुछ तो चलेगा ही.”
मेहमान इस बार चुप रहा.
मनु दूसरे कमरे में गया और शिवास रीगल की मँहगी शराब की बोतल उठा लाया. शिवास रीगल की बोतल को देखते ही मेहमान की जीभ लपलपा उठी पर उसने पीने से इनकार कर दिया, मनु के बार-बार कहने पर आखिर मेहमान ने एक छोटा सा पैग लेना स्वीकार कर ही लिया. उस छोटे से पैग का नशा उस पर कुछ ऐसा तारी हुआ कि देखते ही देखते वो आधी से ज्यादा शिवास रीगल की मँहगी शराब की
बोतल खाली कर गया. मनु का दिल बैठ गया.
झूमता-झामता मेहमान रुखसत हुआ. गुस्से से भरा मनु मेज पर मुक्का मारकर चिल्ला उठा-

” मैंने तो इतनी मँहगी शराब की बोतल उसके सामने रख कर दिखावा किया था. हरामी आधी से ज्यादा गटक गया. गोया उसके बाप का माल था.”
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मैं भी मुँह में जबान रखता हूँ
-प्राण शर्मा

चूँकि कुछ लोगों का हाज़मा ठीक नहीं रहता है और दूसरों की खुशियाँ वे पचा नहीं पाते हैं इसलिए पहुँच जाते हैं डा.नवीन के पास. डा. नवीन भी उनकी कुछ इधर की और कुछ उधर की बातों का खूब रस लेते हैं. इलाक़े में नये-नये हैं. अपनी सर्जरी चलानी है इसलिए उनको कईयों की गोसिप भी सुननी पड़ती है. उनको अपनी सर्जरी में बैठे-बैठे ही पता चल जाता है की किसकी बेटी या किसका बेटा आजकल किसके इश्क के चक्कर में है?

खरबूजा खरबूजे को देख कर रंग पकड़ता है. डा. नवीन भी उन जैसे बन गये हैं जो इधर -उधर की बातें करके रस लेते हैं. जब कभी वे किसी रास्ते या पार्टी में मुझ जैसे घनिष्ठ बने मित्र से मिल जाते हैं तो अपने नाम को पूरी तरह से चरितार्थ करते हैं यानी कोई न कोई नवीन बात सुनाये बिना नहीं रह पाते हैं.

कल शाम की ही बात थी. अपनी सर्जरी के बाहर डा. नवीन मिल गये. जल्दी में थे.फिर भी एक किस्सा सुना ही गये. कहने लगे-
“कुछ लोग अजीब किस्म के होते हैं. उन्हें अपनी चिंता कम और दूसरों की चिंता ज्यादा सताती है. सुबह एक रोगी बैठते ही बोला-
” डाक्टर साब, अभी-अभी जो रोगी आपसे मिलकर गया है, उसे रोग-वोग कुछ नहीं है. अच्छा-भला है. बेईमान बहाना-वहाना कर के आपसे सिक नोट ले जाता है .”
” अच्छा, आपके बारे में भी वो यही बात कह कर गया था .”
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प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

जनवरी 20, 2010

वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर
आप सब को शुभकामनाएं

अखबार
– प्राण शर्मा

भरत उच्च शिक्षा के लिए यू.के. में आया था .पंजाब यूनीवर्सिटी से उसने अंग्रेज़ी में एम.ए. कर रखी थी. यूँ तो वो पढ़ा-लिखा था लेकिन यहाँ के रीति-रिवाजों से अनजान था. उसके आने के कुछ दिनों के बाद ही उसके चाचा हरिकृष्ण ने उसको समझा दिया था- “भरत, इस देश की दो बातों को हमेशा याद रखना. पहली ये कि अगर तुमने
चाय के लिए एक बार न कह दी तो अँगरेज़ दुबारा तुमसे चाय पीने के लिए नहीं पूछेगा. वो वैसे भी नहीं पूछता है. दूसरी बात, उससे पढ़ने के लिए कभी अखबार नहीं माँगना. ये यू.के. है, यू.के. भारत नहीं .
एक दिन भरत ट्रेन में सफ़र कर रहा था. उसके साथ वाली खाली सीट पर एक अँगरेज़ आकर बैठ गया था. उसके हाथ में तीन-चार अखबार थे . भरत देखकर हैरान हो गया. वो अपने दिल ही दिल में कह उठा-” इतने सारे अखबार !”
अँगरेज़ ने चाय का आर्डर दिया. चाय पीने के साथ-साथ वो एक अखबार पढ़ने लगा. दूसरे अखबार उसने अपनी दायीं बगल में रख लिए.
भरत को अपने चाचा की समझाई दो बातें याद नहीं रहीं. चाय पीने की तो उसकी कोई इच्छा नहीं थी लेकिन अखबार को पढने की इच्छा उसमें जाग उठी. वो अँगरेज़ से पूछ बैठा -“क्या मैं आपका एक अखबार पढ़ सकता हूँ? ”
अँगरेज़ ने सुना-अनसुना कर दिया.
भरत को लगा कि अँगरेज़ अखबार में व्यस्त होने के कारण उसको सुन नहीं पाया है. वो उससे फिर पूछ बैठा-“क्या मैं आपका एक अखबार पढ़ सकता हूँ? ”
अँगरेज़ ने टेढ़ी नज़रों से भरत को घूरा. वो अँगरेज़ का घूरना समझा नहीं. अखबार पढ़ने की तीव्र लालसा में उसने एक बार और अँगरेज़ से बड़ी नम्रता में पूछा -” क्या मैं आपका एक अखबार पढ़ सकता हूँ? ”
” नहीं, पढ़ने की इतनी ही इच्छा है तो अपना अखबार खरीदो और पढ़ो.” अँगरेज़ भरत पर बिफर उठा.
भरत अपनी मूर्खता पर दिल ही दिल में हंसने लगा.
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नेकी कर और कुँएँ में डाल
– प्राण शर्मा

दयाराम जी को देख कर कोई भी कह सकता था कि वे दया की मूर्ति थे. बेचारे हर एक की मुसीबत में काम आते. कई यार-दोस्त उनकी दया पर निर्भर थे.
वे कभी मिलते तो सभी कह उठते-” दयाराम जी, आपकी दया अपम्पार है. आप कितने दयावान हैं. आप तो हमारे लिए भगवान् हैं, भगवान्. संकट में आपका ही सहारा है. हम सब आपके ऋणी हैं. आपका ऋण कई जन्मों तक हम उतार नहीं पायेंगे. कभी हमें भी आप अपनी सेवा करने का मौक़ा दीजिये.
दयाराम जी की धर्मपत्नी को कैंसर हो गया. उसने चारपाई को ऐसा पकड़ा कि वो उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी. उसकी लम्बी बीमारी से दयाराम जी आर्थिक और मानसिक रूप से टूटने लगे. वे टूटते गये और यार-दोस्त एक-एक करके ये कह कर” दयाराम जी, आपकी पत्नी कैंसर की मरीज़ है. आज नहीं तो कल उसका मरना निश्चित
है. चिंता करनी छोड़िये. भाग-दौड़ और सेवा करने से कोई लाभ नहीं होगा” पीठ दिखाते गये. धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधकों ने भी जो उनपर निर्भर थे, कहना शुरू कर दिया-
” हमारी संस्थाएं दान लेती हैं,देती नहीं.
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यू. के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

जनवरी 13, 2010

ये  इंग्लॅण्ड है,माई ब्रोदर

–प्राण शर्मा

गोपीनाथ से लन्दन जाने वाली कोच छूट गयी थी. एक अन्य कोच ड्राईवर ने बड़ी शिष्टता से उसको अगली कोच का समय बताया.

गोपीनाथ को लगा कि उसने उस ड्राईवर को पहले भी कहीं देखा था. उसने भेजे पर जोर दिया.याद आते ही उसने बड़े प्यार से पूछा–

” भाई साहिब, आपने क्या भारत में पंजाब रोडवेज में भी काम किया था ?”

”  जी हाँ, मैं पंजाब रोडवेज में बस कन्डक्टर था.”

” क्या आपको याद है कि पांच साल पहले किसी यात्री से दिल्ली जाने वाली बस छूट गयी थी.उसने आपसे अगली बस के टाइम के बारे में पूछा था . आपने उसको ऊपर से नीचे घूरते हुए बड़ी बेरुखी से कहा था–

” पढ़े- लिखे लगते हो .वो सामने बोर्ड पर टाइम लिखा है. जाकर पढ़ लो.”

”  वो भारत की बात भारत में ही रहने दो. ये इंग्लॅण्ड है, माई ब्रोदर.”

–प्राण शर्मा

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बहु नंबर वन

प्राण शर्मा

जब रमा ससुराल ब्याही आयी तो गली की दो ” शुभ  चिन्तक” महिलायें ललिता पवार और शशिकला की भाँति उसके आसपास मंडराने लगी. एक उसकी चाची होने का अधिकार जताती और दूसरी मौसी होने का. दोनो ही रमा को उसकी सास के खिलाफ कुछ न कुछ भड़काती . वो उनकी बातों को एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकाल देती.

धीरे-धीरे प्यारी, दुलारी और अति आज्ञाकारी रमा शुभ चिन्तक चाची और मौसी की आँखों में काला अक्षर भैंस के बराबर हो गयी . वो उनकी नज़रों में ” बहु नंबर वन ” बनी रहती बशर्ते वह उनके इशारों पर नाचती और अपनी सास को नचवाती .

रमा अब फिर चाची और मौसी की नज़रों में बहु नंबर वन बन गयी है.

दोनो की अपनी-अपनी बहु आ चुकी है. उनकी बहुओं ने गली की कई महिलाओं के बहकावे में उनकी नाकों में दम कर रखा है.

–प्राण शर्मा

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प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

अक्टूबर 28, 2009


अधजल गगरी छलकत जाए

– प्राण शर्मा

कमाल मेरा नया नया दोस्त बना था. दसवीं में तीन बार फ़ेल था. बेकारी में घूम रहा था. एक दिन मिला तो उसने अपने नाना, दादा की तारीफ़ें करनी शुरू दीं. कहने लगा-“मेरे चाचा जी एम .ए. और पी.एच .डी थे. सरकारी विभाग में सीनिअर ऐडवाईज़र थे. पांच हजार रूपये उनकी मंथली इनकम थी. मैं तब की बात कर रहा हूँ जब भारत के दो टुकड़े नहीं हुए थे. मेरे मामा जी रईस थे, रईस. कई राजे-महाराजे और नवाब उनका हुक्का भरा करते थे. मेरे दादा जी की योग्यता का कहना ही क्या! वे अंग्रेजी बोलते थे तो अँगरेज़ वाह, वाह कह उठते थे.  कई दांतों तले उँगलियाँ दबा लेते थे और कई पानी-पानी हो जाते थे. नाना जी इतने सुन्दर थे कि अंग्रेज युवतियां गोपियों की तरह उनके आगे-पीछे मंडराती थी. खूबियाँ ही खूबियाँ थी मेरे सम्बन्धियों में. “

” कोई खूबी अपनी भी सुनाओ, कमाल.”  सुनते ही कमाल कोई बहाना बनाकर भाग उठा.

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दादी

-प्राण शर्मा

कुछ महीने पहले गाँव से आई दादी ने अपने दस साल के पोते को अपने पास बिठाकर पूछा-

” तू कितना अच्छा ,कितना आज्ञाकारी है! है न ?”

” हाँ”. पोते ने उत्तर दिया.”

” मेरी एक छोटी सी बात मानेगा ?”

” मानूंगा.”

” मुझे तू क्या कहकर पुकारता है ?”

” दादी माँ .”

” अब से तू मुझे ग्रैंड मम कहकर पुकारा कर.”

” वो क्यों?”  पोते ने जिज्ञासा में पूछा.

” ये आजकल का फैशन है, बेटे. सभी बच्चे अब माँ को

मम और दादी माँ को ग्रैंड मम कहते हैं.

पोता अपनी दादी का चेहरा देखने लगा.

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प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

अक्टूबर 21, 2009

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प्रेमिका

-प्राण शर्मा

अनुरागी और मधुरिमा के बीच इन्टरनेट पर रोज़ ही प्रेम-वार्तालाप होना शुरू हो गया. प्रेम-वार्तालाप में वे दोनो इतना खो जाते कि उन्हें खाने-पीने की कोई सुध नहीं रहती. मधुरिमा प्यारी-प्यारी और मधुए-मधुर बातें करती. इश्क के रटे  हुए शेर सुनाती. अनुरागी भी  कुछ कम नहीं थे. प्रेम करने के वे सब गुर जानते थे. कोलेज के दिनों में वे एक-एक करके तीन लड़कियों से प्रेम की पींग चढ़ा चुके थे. साथियों में रांझा के नाम से विख्यात थे वे. मधुरिमा को देखा तो कभी था नहीं उन्होंने लेकिन जब वे उसकी सुन्दरता की भूरी-भूरी प्रशंसा करते -” मधुरिमा, बातें करने में आप कितनी मधुर हैं , देखने में कितनी सुन्दर हैं शायद ही आप जैसा कोई संसार में हैं ” तो मधुरिमा खिल-खिल जाती.

एक दिन मधुर-मधुर बातों के बीच मधुरिमा ने अपने मन की बात कह सुनायी- ” मेरे मन के राजा अनुरागी जी ,आपसे मैं  ब्याह रचाना चाहती हूँ . “जवाब में अनुरागी ने कहा – “ये तो नामुमकिन है. आपकी और मेरी उम्र में बहुत फर्क है. मैं ठहरा बाल-बच्चों वाला और आप ——- “.  मधुरिमा ने अनुरागी की बात को काट कर तुंरत कहा – “तो क्या हुआ, मैं कौन सी कुंवारी हूँ. मैं भी बाल – बच्चों वाली हूँ.”
अनुरागी ने मधुरिमा को बहुत समझाया लेकिन वह कब मानने वाली थी और अनुरागी से ब्याह रचाने की जिद पर अड़ी रही.
अनुरागी चिंता के सागर में गोते लगाने लगे – ऐ भगवान, मुझे बचा. मेरी तौबा अब प्रेम-वेम से. कैसी मुसीबत मोल ले ली है मैंने!
एक दिन मधुरिमा ने कह दिया- ” मुझको  यू.के का वीजा मिल गया है. मैं सबकुछ छोड़- छाड़ कर आपके पास आ रही हूँ “.
सुनकर अनुरागी के पसीने छूट गये. रात की नींद उड़ गयी उनकी. सारी रात करवटें लेते हुए बीती उनकी.
सुबह अनुरागी ने डरते -डरते अपनी पत्नी साहिबा को सारा वृत्तांत सुनाया .
” वो आपसे शादी रचाने आ रही है तो क्या हुआ? सौतन का स्वागत है.”
” पत्नी हो तो ऐसी !” अनुराग पत्नी की प्रशंसा अपने मन में करने ही लगा था कि उसके  कानों में पत्नी के ये शब्द पड़े-
“मधुरिमा कोई और नहीं, मैं ही थी. अपने दफ्तर से मैं ही आपसे चैट करती थी.”

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जूता बनाम जूती

-प्राण शर्मा

श्रीमान लाल और श्रीमती लाल  का कवि-सम्मेलनों में आना-जाना लगा रहता है. उनकी कवितायें कैसी भी हों लेकिन गवैयों जैसा स्वर पाया है दोनों ने. दोनो की खूब मांग है. न कभी टैक्स का भुगतान और न ही घर में दाल-भात बनाने की चिंता. दोनो की पाँचों उँगलियाँ घी में.

आज सुबह ही श्रीमान लाल और श्रीमती लाल अलग-अलग कवि-सम्मलेन से घर लौटे थे. दोनो को लम्बे सफ़र की थकान थी. श्रीमान लाल हाथ-मुँह धोकर गुसलखाने से बाहर निकले तो अपने जूतों को देख कर घरवाली से बोले – “लो, जूते पर जूता फिर चढ़ा हुआ है.”

पत्नी अपने जूतों को भी देखकर बोल उठी- “पतिदेव जी, अकेला आपका जूता ही नहीं, देखिये मेरी  जूती भी जूती पर चढ़ी हुई है..”

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जूते पर जूता चढ़ने का यह अर्थ है कि व्यक्ति फिर यात्रा की तैयारी में है.
एक उर्दू की शायरा शबाना यूसफ ने लिखा है:

अभी तो पहले सफ़र की थकान है पावों में
कि फिर से जूती पे जूती मेरी चढ़ी हुई है.

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अगला अंक: २८ अक्टूबर २००९

प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं
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प्राण शर्मा और देवी नागरानी की लघुकथाएं

अक्टूबर 7, 2009

लघुकथा-

खट्टे संतरे
प्राण शर्मा

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रमेश बड़े शौक़ से खाने के लिए साफ़ सुथरे और चमचम करते संतरे सुबह सब्जी मंडीसे खरीद कर लाया था. उसकी आदत है रात को रोटी खाने के बाद दो-तीन संतरे लेने की. रोटी खाने के बाद दो-तीन संतरे लेने से सुबह खुलकर पखाना आता है, ऎसी उसकी मान्यता है.

रात को भोजन करने के पश्चात रमेश से पहला संतरा चखा नहीं गया. नींबू से भी ज्यादा खट्टा था वो. गुस्से में उसने थाली में पटक दिया उसको, क्या करता वो? इतना खट्टा संतरा उसने पहले कभी चखा नहीं था.

रमेश ने दूसरा संतरा चखा. वह और भी खट्टा निकला. मुंह बना कर उसने उसको भी थाली में पटक दिया.

रमेश ने तीसरा संतरा चखा. उफ़, वो भी खट्टा. दांत किचकिचाते हुए उसने तीसरा संतरा भी थाली में दे मारा.

थोड़ी देर के बाद रमेश को लगा कि थाली में पड़े तीनों संतरे अपनी दुर्दशा से आहत होकर एक स्वर में उससे कह रहे हैं  “साब, आपने हमें थाली में इस तरह क्यों फ़ेंक दिया है?”  “इसलिए मैंने फ़ेंक दिया है तुम्हें थाली में क्योंकि तुम तीनों ही नींबू से ज्यादा खट्टे हो. देखो, तुम तीनों की एक फाड़ी ने ही मेरे दांत खट्टे करके रख दिए.”
“साब, अगर हम खट्टे हैं तो हमारा क्या कुसूर है?
कसूर तो उनका है जिन्होंने हमें उगाया है और सींचा है.”

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लघुकथा-

‘पत्थर दिल’
देवी नागरानी

devi_nangraniरमेश कब कैसे, किन हालात के कारण इतना बदल गया यह अंदाजा लगाना उसके पिता सेठ दीनानाथ के लिये मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगा । अपने घर की दहलीज पार करके उसके बंगले के सामने खड़े होकर सोचते रहे – जो मान सम्मान, इज्ज़त उम्र गुजा़र कर पाई, आज वहीं अपने बेटे की चौखट पर झुकेगी, वो भी इसलिये कि उसकी पत्नी राधा मृत्यु-शैया पर लेटी अपने बेटे का मुंह देखने की रट लगाये जा रही थी – मजबूरन यह कदम उठाना पड़ा। दरवाजे पर लगी बेल बजाते ही घर की नौकरानी ”कौन है” के आवाज़ के साथ उन्हें न पहचानते हुए उनका परिचय पूछ बैठी.

“मैं रमेश का बाप हूँ, उसे बुलाएं.” वह चकित मुद्रा में सोचती हुई अंदर संदेश लेकर गई और तुरंत ही रोती सी सूरत लेकर लौटी. जो उत्तर वह लाई थी वह तो उसके पीछे से आती तेज़ तलवार की धार जैसी उस आवाज में ही उन्हें सूद समेत मिल गया.

“जाकर उनसे कह दो यहां कोई उनका बेटा-वेटा नहीं रहता । जिस गुरबत में उन्होने मुझे पाला पोसा, उसकी संकरी गली की बदबू से निकल कर अब मैं आजा़द आकाश का पंछी हो गया हूँ. मै किसी रिश्ते-विश्ते को नहीं मानता. पैसा ही मेरा भगवान है. अगर उन्हें जरूरत हो तो कुछ उन्हें भी दे सकता हूँ जो उनकी पत्नी की जान बचा पायेगा शायद ………….!!” और उसके आगे वह कुछ न सुन पाया. खामोशियों के सन्नाटे से घिरा दीनानाथ लड़खड़ाते कदमों से वापस लौटा जैसे किसी पत्थर दिल से उनकी मुलाकात हुई हो ।
देवी नागरानी
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प्राण शर्मा की कहानी- ‘पराया देश’

सितम्बर 9, 2009

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(लावण्या जी और समीर जी के अनुरोध पर प्राण शर्मा जी लम्बी कहानी ‘पराया देश’ प्रस्तुत है. यह कहानी ‘कादम्बिनी’ के दीवाली विशेषांक नवम्बर १९८३ में प्रकाशित हुई थी. ‘उषा राजे सक्सेना’, ‘रमाकांत भारती’ और ‘हिमांशु जोशी’ के प्रवासी कथा-संकलनों में यह कहानी भी शामिल हैं.)

मस्तिष्क को झंझोड़ देने वाली कहानी जिसमें स्वदेश के लिए एक प्रवासी की तड़प है, हर सुविधा के बावजूद अकेलेपन का अहसास है. इसी कशमकश और छटपटाहट के भावों को कलम के जादूगर प्राण शर्मा ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त किये हैं. पाठक पढ़ कर कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध हो जाता है.
मेरे दो शेर प्राण शर्मा जी, कहानी के नायक और प्रवासियों के लिए अर्पित हैं:
अपने ग़मों की ओट में यादें छुपा कर रो दिए
घुटता हुआ तन्हा, कफ़स में दम निकलता जाए है।

हर तरफ़ ही शोर है, ये महफ़िले-शेरो-सुख़न
अजनबी इस देश में हम तो अकेले हो गए !
महावीर शर्मा
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पराया देश

– प्राण शर्मा

टाइल हिल लेन के बस स्टाप से अन्य यात्रियों में एक अधेड़ उम्र की अंग्रेज महिला मेरी बस में चढ़ी. टिकेट लेते समय उसने मुझसे कहा कि वो दो स्टापों के बाद ” हर्सल  कामन ” के स्टाप पर उतरना चाहती है. कह कर वो इत्मीनान से एक खाली सीट पर बैठ गयी . मैं बस दौड़ाने लगा.

पिछले कुछ सालों से इंग्लॅण्ड के सभी शहरों की बसों में कंडक्टर की सेवाएँ समाप्त  कर दी गयी हैं. यात्रियों को टिकेट देने का काम अब ड्राईवर ही अपनी सीट पर बैठा-बैठा करता है. यात्रियों को चढ़ाना-उतारना, उन्हें टिकेट देना, बस को चलाना यानि कि पूरी बस का संचालन करना अब ड्राईवर की ही जिम्मेदारी है. बड़ी सावधानी का काम है. इसलिए उनकी  वीकली वेज  भी अच्छी है.

हर्सल  कामन तक के  रास्ते में  बस पकड़ने वाला कोई और यात्री नज़र नहीं आया मुझको. मैं भूल ही गया कि उस महिला को हर्सल कामन पर उतारना था. बस तेज स्पीड से दौड़ने लगी.
” ड्राईवर, बस रोको, मुझे ये स्टाप चाहिए.” उस महिला ने चिल्ला कर कहा. मेरे कानों के परदे जैसे फट गए. मुझको अपनी गलती का अहसास हुआ. मैंने देखा कि हर्सल कामन का
स्टाप पीछे छूट गया था. अब तो अगला स्टाप आनी वाला था. मैंने तुंरत बस रोकी. बड़े विनय से उस महिला को सोरी कहा. इंग्लॅण्ड की परम्परा है कि सोरी कहने से दूसरा व्यक्ति शांत हो जाता है लेकिन वो महिला शांत की बजाय मुझ पर बरस पड़ी. लगी लेने मेरे यूनिफार्म और बस के नंबर. डर के मारे मेरे पसीने छूटने लगे sad-male05कि कहीं वो “पर्सोनल” से मेरी शिकायत नहीं
कर दे. मैं  गिड़गिड़ा कर उस से क्षमा मांगने लगा. लेकिन वो लाल-पीली हुए जा रही थी. कुछ यात्री भी उसका साथ दे रहे थे. खुद को असहाय पाकर मैंने बड़ी नम्रता से कहा- “मैडम, हम सब इंसान है. गलती किससे  नहीं होती है?” वो मुझे “यू ब्लैक बास्टर्ड ” और ” पाकी” कहती हुई क्रोध से तिलमिलाती हुई बस से उतर गयी.

बस “पूल मेडो” के बस अड्डे पर पहुँची. मेरा चालीस मिनट का ब्रेक था. चाय पीने के लिए मैं कैंटीन चला आया. चाय का प्याला लेकर हरबंस सिंह के पास जा बैठा. सारी घटना उसे सुनाई. उस महिला का मुझको “ब्लैक बास्टर्ड” और ” पाकी”  कहना हरबंस सिंह  को मज़ाक लगा. मुझ पर हंस कर वो दूर जा बैठा और अन्य साथियों से गपशप मारने लगा.

“हम लोगों का जमीर मर गया  है” सोचते हुए मैं मन ही मन में रुआंसा हो गया. नीचे आकर अन्य मनस्क सा ‘पूल मेडो’ का चक्कर लगाने लगा. मैं उस घटना को भूलना चाह रहा था लेकिन भूल नहीं पा रहा था. उस महिला का अशिष्ट और जला-भुना व्यवहार और उस पर हरबंस सिंह की उपेक्षा मुझी बार-बार कचोट रही थी. यहाँ अँगरेज़ युवकों का हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी लोगों को ” पाकी” कहना आम है. लेकिन आज एक भद्र और सभ्य दिखने वाली महिला के मुख से ऐसे घिनौने शब्द सुनकर मैं विचलित हुए बिना नहीं रह सका. मन-मस्तिष्क में असंख्य सुईयों का चुभना मैंने महसूस किया. बड़ी कठिनाई से दोबहर के दो बजे मैंने ड्यूटी समाप्त की. ओवर टाइम लिया हुआ था. उसे वापस कर घर पहुंचा. मैं धड़ाम से कुर्सी में जा धंसा.

बच्चे स्कूल में थे. सुषमा भी काम पर थी. कुर्सी में धंसा-धंसा मैं छत को निहारने लगा. न जाने कब गहरी सोच में डूब गया मैं. इंग्लॅण्ड में क्या रखा है? इससे तो अच्छा अपना भारत देश ही है. माना कि वहां कुछ आर्थिक विषमताएं हैं लेकिन कोई ‘ब्लैक बास्टर्ड’ या ‘पाकी’ कहने वाला तो नहीं है. जहाँ मान  नहीं, इज्ज़त नहीं, वहां रहना ही क्यों? ये धन, ये गाड़ियां किस काम की? आपमान का जीवन भोगने से तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना अच्छा है. किसी ने सच कहा है कि पराये देश में सुख और आराम से जीने से अपने देश की गरीबी और मौत कहीं ज्यादा अच्छी है.

सोलह साल पहले मैं और मेरी पत्नी अटल इरादा लेकर भारत से इंग्लॅण्ड में आये थेकि यहाँ पांच साल रह कर,खूब धन कमाकर भारत लौट जायेंगे. खूब धन कमा लिया है लेकिन दोनो अभी तक यहीं पड़े हैं दोनो, ब्लैक बास्टर्ड और पाकी सुनने के लिए. भारत वापस जाने के लिए पत्नी से कई बार तकरार भी होती है. मेरी बात का कोई असर नहीं होता है,  न पत्नी के सामने और न ही बेटों-बेटी  के सामने. किसी ने सच ही कहा है कि पति का जोर तब तक ही पत्नी पर है जब तक औलाद बड़ी न हो जाए.

भारत में भाई-बहन, यार-दोस्त आदि सभी याद करते हैं. लिखते हैं- “अब तो भारत लौट आओ ,कितना समय हो गया है तुम सबको विदेश में रहते हुए…. लगता है, तुम लोगों ने अपना देश भुला दिया है. “क्या करूँ, मैं भारत जाने को तैयार हूँ लेकिन सुषमा भारत जाने की नेक सलाह पर नाक-भौं चढ़ा लेती है. हर बार वो टका सा जवाब देती है–” हमें नहीं जाना भारत. यहीं सुखी हैं हम. आप भी खूब हैं, लोग कितना खर्च करके अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लॅण्ड में भेजते हैं और एक आप हैं कि यहाँ पढ़ रहे अपने बच्चों को उखाड़ कर भारत ले जाना चाहते हैं. सरला अगले साल “ऐ लेवल” करके यूनीवर्सिटी में चली जायेगी. उमेश और दिनेश भी पढ़ाई में अच्छे है. भारत में वे न इधर के रहेंगे और न ही उधर के. आपभारत जाना चाहते हैं तो शौक से जाइये. हम यहीं अच्छे हैं.” सरला, उमेश और दिनेश भी अपनी माँ की बात में “हाँ” मिलाने लगते हैं. उमेश तो उछल कर कहता है -“पापा, हम इंडिया नहीं जाएँगे, नहीं जायेंगे. वहां तो मक्खियाँ ही मक्खियाँ हैं . मक्खियों में आप जाकर रहिये.

इंग्लॅण्ड के टी.वी. पर भारत के पिछड़े इलाकों की गरीबी और गंदगी दिखा-दिखा कर ये अँगरेज़ हमारे बच्चों में भारत के प्रति कितनी हेयता की भावना पैदा कर रहे हैं. भारत सरकार न जाने क्यों इन लोगों को भारत के पिछड़े  इलाकों की तस्वीरें लेने देती हैं? पिछड़े इलाके सही लेकिन ज़मीर तो ऊंचा है .

” अरे, बेटे, भारत तो स्वर्ग है, स्वर्ग. सुन्दरता का दूसरा नाम है भारत. चलो, मेरे साथ. मैं दिखाऊंगा तुम्हें उसकी सुन्दरता.”

” लेकिन पापा, अँग्रेज कौम का खाना-पीना, रहना-सहना और उठाना-बैठना सलीके का है. कितनी सफाई इस कौम में. भारत के लोग गंदे हैं, गंदे. आपने ही तो एक बार कहा था कि भारत में कई लोग दीवारों से सट-सट कर पेशाब करना शुरू कर देते हैं. “उमेश का अंतिम वाक्य सुनकर सरला और दिनेश के हंसी का फव्वारा फूट पड़ता है.

मैं उनकी हंसी पर ध्यान न देकर कहता हूँ- “ये मत भूलो कि हम भारतीय हैं. हम यहाँ हजारों साल रह लें लेकिन रंग से भारतीय ही रहेंगे. अँगरेज़ हम कभी न बन पायेंगे और न ही अँगरेज़ लोग हमें अँगरेज़ के रूप में स्वीकार करेंगे. हम प्रवासी भारतीय ही कहलवाएंगे. यहाँ की संस्कृति, यहाँ की सभ्यता के प्रभाव हम अपना सब कुछ खो रहे हैं . अँगरेज़ लोग लगभग दो सौ वर्ष भारत में रहे लेकिन वे भारतीय रंग में नहीं रंगे. हम हैं कि कुछ ही सालों में अँग्रेजी रंग में रंग गए हैं. भारतीय नवयुवक तो अब अपने नामों से ही घृणा करने लगे हैं. कोई जानी है और कोई स्टीवन. आनंद अपने को एंडी कहलवाता है. हरि अपना नाम हैरी बताता है और कपूर अपने को कूपर कहलवाना अधिक पसंद करता है. बेटो,ये मत समझना कि मैं कोई उपदेश दे रहा हूँ. मैं तुम को समझा रहा हूँ, एक बाप की हैसियत से. अपना देश अपना होता है और पराया देश पराया. मेरी इस बात को समझोगे तो फायदे  में रहोगे. भारत में रह कर अँगरेज़ इस बात को समझे. आप भी समझो”.

मेरी किसी बात का असर न तो बच्चों पर पड़ता है और न ही पत्नी पर. सब की एक ही रट है कि वे भारत नहीं जायेंगे. इंग्लॅण्ड में रहेंगे सदा के लिए. सरला उल्टे मुझे ही समझाने लगती है-“पापा, आप भारत जाकर, कुछ सालों में ही आपको खाने-पीने के लाले पड़ जायेंगे. यहाँ फिर दौड़े आयेंगे आप.”

कुछ सोच कर वो मुझसे प्रश्न करती है-“आप यहाँ किसलिए आये थे” ? खुद ही उसका उत्तर देने लगती है- “धन के लिए न. धन कमा लिया तो इसका मतलब ये तो नहीं कि आप बोरिया-बिस्तर बांधकर नौ-दो ग्यारह हो जाएँ यहाँ से. ये तो स्वार्थ हुआ न. जिस देश ने आपको खाने के लिए भोजन दिया, रहने के लिए घर दिया, घूमने के लिए गाड़ी दी, धन से आपकी तिजोरी भर दी, उस देश से चले जाना, विमुख हो जाना, क्या आप इसको उचित समझते हैं?”

मैं कुछ कह नहीं पाता  हूँ. मुझे निरुत्तर देखकर सरला फूली नहीं समाती है. इन गोरों के चिमचों को कैसे समझाया जाए कि पराया देश तो पराया देश देश ही है. सदा के लिए पराये देश में टिकना अपनी सभ्यता और संस्कृति से हाथ धोना है. लेकिन ये बच्चे मानते ही नहीं हैं. मेरे ही नहीं सब के बच्चों का यही हाल है. अपने को ब्लैक बास्टर्ड और पाकी कहलवाना सहन कर लेंगे पर अपने देश में बसना इन्हें पसंद नहीं. कभी-कभी पत्नी और बच्चों की बातों से इतना तंग आ जाता हूँ कि सोचता हूँ कि मैं अकेला ही भारत लौट जाऊं. फिर सोचता हूँ कि अगर अकेला भारत मैं लौट गया तो वहां सगे-संबन्धी और यार-दोस्त पूछेंगे कि पत्न्नी-बच्चे कहाँ छोड़ आये? इसी उलझन और कश्मकाश में भारत लौटने का इरादा टाल जाता हूँ. वर्ना यहाँ के भेद भरे जीवन में रखा ही क्या है. हाल के रिपोर्ट के अनुसार इंग्लॅण्ड में रंगभेद  की समस्या इतनी जटिल हो रही है कि यहाँ की पुलिस भी अब अपराध के मामले में एशियन और काले लोगों से ज़्यादा पूछताछ करती है.

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आती है. मेरी विचार-श्रृंखला टूट जाती है. थकी नज़रों से मैं घड़ी देखता हूँ. सवा चार बज रहे हैं. सुषमा और बच्चे लौंज में प्रवेश करते हैं. मुझे कुर्सी में अस्तव्यस्त सा धंसा देखकर शुष्मा मुझसे पूछती है-

“बड़े उखड़े -उखड़े हो .क्या तबीअत ठीक नहीं?”

” कुछ नहीं.” मैं अनमने भाव से कहता हूँ.

” कुछ तो जरूर है?” अपना बैग टेबल पर रखते हुए वह फिर मुझसे पूछती है.

” कहा न, कुछ नहीं ”

” आप कुछ छिपा रहे हैं. बताएं न, क्या बात है ?” वह कोट उतार कर पास वाली कुर्सी पर बैठ जाती है और कुछ क्षणों तक मेरा उतरा हुआ चेहरा पढ़ते हुए कहती है- “लगता है कि आज फिर किसी पैसेंजर से आपकी तू-तू , मैं-मैं हो गयी है.

” हाँ.” मैं रुंधे स्वर में स्वीकार करता हूँ.”

” क्या बात हुई?”

मैं सारी घटना सुषमा को सुनाता हूँ. सुनते ही वो जोर खिलखिलाकर हंस पड़ती है-

“आप तो यूँ ही छोटे सी बात को दिल से लगा लेते हैं..” उसका इस तरह से हंसना मुझे अच्छा नहीं लगता है. मैं घायल शेर की तरह बिफर पड़ता हूँ- “तुम हर बात को टाल जाती हो. अंग्रेजियत क्या हुई कि तुम लोग मानसिक रूप से गुलाम हो गए हो उसके. तुम लोगों की सोच मर गयी है. मैं अब भी कहता हूँ कि इस देश में ज़्यादा दिन टिकना ठीक नहीं है. वह और टाइम था जब यहाँ हर एक को काम मिलता था. अब लाखों बेकार हैं. गोरों को नौकरियां मिलती नहीं, हमारे बच्चों को कहाँ से मिलेंगी? गोरों को पहले ही हमसे चिढ़ है कि हमारे पास दो-दो कारें हैं, रहने को अपना घर है और अच्छा बैंक बैलेंस है. एक बार हालत खराब हो गए, साम्प्रदायिक दंगे छिड़ गए तो हम सब को अपनी-अपनी कमाई यहीं छोड़कर भागना पड़ेगा. तब हमें अपना देश याद आएगा. मेरी बात अपने पल्ले बांधो. बच्चों को लेकर हम भारत चलते  हैं.”

सुषमा गुस्से भरी नज़रों से मेरी ओर देखती है. सदा की तरह इस बार भी उस पर मेरी बात का असर नहीं पड़ता है. वो असंयत होकर कहती है- “तौबा, इतनी भावुकता! आप भारत की संस्कृति ओर सभ्यता की बात करते हैं, सब संस्कृतियाँ और सभ्यताओं का मेल-जोल  हो रहा है अब. हमारी तरह हजारों-लाखों लोग यही सोच कर इंग्लॅण्ड में आये थे कि धन कमाकर पांच सालों में वे लौट जायेंगे. सुविधाएँ पाकर सभी यहाँ रह गए हैं. रही भेद-भाव की बात, सो मैं आपसे पूछती हूँ कि भारत इससे अछूता है? क्या वहां साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते? वहां तो एक प्रांत के लोग दूसरे प्रांत के लोगों से भी मिल-जुल कर नहीं रहते हैं. आपस में इतना अलगाव है कि मराठी अपना मकान पंजाबी को किराये पर देने के लिए तैयार नहीं है और पंजाबी मराठी को नहीं. कौन है वहां सच्चा भारतीय? सभी साम्प्रदायिक हैं. सभी प्रांतीयता के संकुचित दायरे में बंधे हैं. आये दिन वहां से किसी न किसी साम्प्रदायिक दंगे की खबर सुनने में आती है. यहाँ कभी कोई छोटी सी घटना हो भी जाती है तो आप शोर मचाने लगते हैं. आप भारत में गणित के अध्यापक थे. हिसाब लगाकर बताईये कि यहाँ पर साम्प्रदायिक दंगे अधिक होते हैं या वहां पर? अब भारत में जाइये और देखिये वहाँ पर अंग्रेजियत के चमत्कार. दांतों तले उंगली दबा लेंगे आप. नयी पीढ़ी की न तो अपनी भाषा है और न ही अपना लिबास ही. और तो और बड़ों के प्रति आदर और सत्कार की भावना भी उनमें मर सी गयी है. भारत को आज़ादी मिले कितने साल हो गये हैं लेकिन गरीबी वहीँ की वहीं है. लोग अब भी बेचैन हैं. किसी को सुख-शांति नहीं है. मंहगाई का बोलबाला है. गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है. पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं. धक्के खाने पड़ रहे हैं उन्हें. कोई काम आसानी से नहीं बनता है. रिश्वत का दैत्य मुंह खोले खडा है. क्या आप वो दिन भूल गये हैं जब आपको अपने पासपोर्ट के लिए दौड़-धूप  करनी पड़ी थी. रिश्वत  देने के लिए आप क्लर्क से लड़ पड़े थे. उससे हाथा-पाई होते-होते बची थी आपकी. सब कुछ जानते-समझते हुए भी आप सच्चाई से आँखें मूंदते हैं. यहाँ की सुख-सुविधाओं से मैं अपने बच्चों को वंचित नहीं होने दूंगी. मैं ही क्या कोई माँ ऐसा नहीं होने देगी. लोग इस देश में आने के लिए तरसते हैं. आप हैं कि —————-”

बोलते -बोलते सुषमा उठ खड़ी होती है और किचन में चाय बनाने  के लिए चली जाती है. आज पहली  बार मैंने उसे अपने दिल का गुबार निकालते हुए देखा. उसकी बातों से मैं इतना गुमसुम हो गया कि मुझे इतनी खबर भी नहीं रही कि बच्चे उठकर कब ऊपर चले गये. मुझे उसका आभास तभी होता है जब सुषमा किचन से उन्हें आवाज़ देती है-

” सरला, दिनेश और उमेश नीचे आओ .चाय तैयार है.”

सरला, दिनेश और उमेश नीचे आते हैं. सुषमा टेबल पर चाय,बिस्कुट, सैंडविच  आदि सजा देती है. तीनों बच्चे मुझे अब तक कुर्सी में धंसा देखकर मेरे पास आते हैं और गुदगुदी करने लगते हैं, “उठो न पापा, चाय ठंडी हो रही है .”

इतने में मैं देखता हूँ कि सुषमा भी मेरे पास खड़ी है और बड़े प्यार-मनुहार से कह रही है- “अगर आप इस देश से इतना ही तंग आ गये हैं तो एक दिन यहाँ से हम चले जायेंगे. बस बच्चों की शिक्षा पूरी और अपने पैरों पर उन्हें खड़ा हो जाने दें.”

मैं सोचने लगता हूँ कि सुषमा कितनी होशियार बनती है ! आज वो बच्चों की शिक्षा पूरी और उनको अपने पैरों पर खड़ा हो जाने की बात करती है, कल उनके ब्याहों के बहाने बनाने लगेगी. और फिर उनके बाल-बच्चों के——–.

-प्राण शर्मा