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यू.के. से डॉ. गौतम सचदेव की लघुकथा

अप्रैल 28, 2010

दान और दानी

डॉ. गौतम सचदेव

सेठ धनीराम अपनी माता जी की पहली बरसी के उपलक्ष्य में ग़रीबों में कम्बल बाँट रहे थे । ख़बर सुनते ही उनके घर के बाहर सैकड़ों की भीड़ जमा हो गई । सेठ जी ने सबसे लाइन बनाने को कहा, लेकिन कोई इसके लिये तैयार नहीं हुआ । जब उन्होंने धमकी दी कि सिर्फ़ लाइन में लगने वालों को ही कम्बल दिये जाएँगे, तब जाकर धक्का-मुक्की करते लोगों ने उनका कहना माना । सेठ जी को चूँकि केवल एक सौ एक कम्बल ही बाँटने थे, इस लिये उन्होंने आगे खड़े एक सौ एक लोगों को नम्बर लगी पर्चियाँ थमा दीं । कई लोग शोर मचाने लगे कि हम सबसे पहले आये थे, हमें भी पर्ची दो । हमें लाइन में लगने की सज़ा क्यों दे रहे हैं ? काफ़ी हो-हल्ला करने के बाद भी जब उन लोगों को नम्बर वाली पर्चियाँ नहीं मिलीं, तो वे बड़े निराश हुए, लेकिन वे इस आशा में फिर भी खड़े रहे कि शायद सेठ जी का विचार अब भी बदल जाये ।

सेठ धनीराम के नौकर ने कम्बल लाकर रख दिये थे । सेठ जी ने कम्बल बाँटने शुरू किये । ज्योंही लाइन में खड़ा पर्चीधारी आगे बढ़कर नम्बर वाली पर्ची दिखाता, त्योंही सेठ जी उससे पर्ची लेते और कम्बल पकड़ा देते । कम्बल पाने वाले उनको और उनकी दिवंगत माता जी को दुआएँ देते जा रहे थे । कोई कहता – जुग जुग जियो दाता । कोई आसमान की ओर हाथ उठाकर कहता – परमात्मा आपको लम्बी उमर दे । कोई उनकी माता जी के लिये प्रार्थना करता – भगवान उन्हें स्वर्ग में निवास दे । सेठ जी पुण्य की इस कमाई को लूट-लूटकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे ।

ज्योंही आख़िरी कम्बल बँटा, त्योंही न जाने किधर से चार-पाँच लट्ठधारी गुंडे आये और छीना-झपटी करने लगे । जो लोग कम्बल लेते ही चले गये थे, वे तो बच गये, लेकिन शेष कितने ही कमज़ोर और बेसहारा लोगों के कम्बल छिन गये । भगदड़ मच गई और असहाय सेठ जी हक्के-बक्के होकर देखते रह गये ।

सेठ धनीराम के घर के पास ही ऊनी कपड़ों की एक दुकान थी । दुकानदार ने आनन-फ़ानन बाहर यह लिखकर एक बोर्ड लगा दिया – ‘हम कम्बल ख़रीदते हैं’ । जिन कम्बलधारियों के कम्बल बच गये थे, उनमें से कई ने इधर-उधर देखने और तसल्ली करने के बाद कि कहीं गुंडे तो नहीं खड़े, दुकान पर जाकर दस-दस रुपये में कम्बल बेच दिये ।   शाम को अँधेरा होने पर वही लट्ठधारी गुंडे आये और दुकान के पिछले दरवाज़े से चुपचाप अंदर घुस गये । उन्होंने दुकानदार को दिन में छीने हुए कम्बल सौंपे, इनाम लिया और चलते बने । दुकानदार के पास साठ-सत्तर कम्बल पहुँच चुके थे ।

अगले दिन उसी दुकानदार ने ‘सेल’ लगाई और वही कम्बल पचास-पचास रुपये में बेचने लगा । लेकिन यह क्या ! अभी वह दो-चार कम्बल ही बेच पाया था कि ग्राहक आने बंद हो गये । दरअस्ल लोगों में यह बात फैलते देर नहीं लगी थी कि दुकानदार कीड़ों द्वारा खाये कम्बल बेच रहा है, जिन में पचासों छेद हैं । दुकानदार एक तो सेठ धनीराम को पहले ही गालियाँ दे रहा था कि उन्होंने मुझसे कम्बल क्यों नहीं ख़रीदे । अब छेदों वाले कम्बलों को ख़रीदकर पछताने की बजाय वह उन्हें ज़ोर-ज़ोर से कोसने लगा – बड़े धर्मात्मा बनने चले हैं ! सड़े हुए कम्बल देकर दानी बन रहे हैं ! भला दान में क्या ऐसी चीज़ें दी जाती हैं ?

बेचारे धनीराम क्या जानें कि उन्होंने अपने जिस मित्र की दुकान से कम्बल ख़रीदे थे, उसने उन्हें पूरे दाम लेकर ऐसे छलनी कम्बल बेचे थे ।

डॉ. गौतम सचदेव

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यू.के. से डॉ. गौतम सचदेव की दो लघुकथाएं

मार्च 3, 2010

उपद्रवी
डॉ. गौतम सचदेव

किंग्स क्रॉस स्टेशन से बाहर निकलते ही रविन्दर सिंह बायें मुड़कर उस लगभग ख़ाली और छोटी-सी गली की ओर चल पड़ा, जहाँ उसने एक खंभे के सहारे अपनी साइकिल खड़ी की थी और हर रोज़ की तरह ज़ंजीर और ताले के द्वारा उसे खंभे से बाँध दिया था । चूँकि लंदन में साइकिल चोर ताला लगा होने पर भी प्रायः उसका अगला पहिया ही चुराकर ले जाते हैं, इस लिये रविन्दर ने अगला पहिया उतारकर पिछले के आगे रखा था और फिर दोनों पहियों में ताले वाली ज़ंजीर डाली थी । साइकिल को उसी स्थान पर छोड़कर वह रोज़ गाड़ी से केम्ब्रिज जाया करता था और पढ़ाई करने के बाद शाम को गाड़ी से ही लौटता था । वह एक फ़िल्मी गीत गुनगुना रहा था और मस्ती भरे क़दमों से ताल देता हुआ चल रहा था ।

साइकिल के पास पहुँचकर वह ज्योंही ताला खोलने के लिये झुका, उसके कानों में आवाज़ आई – एइ हालोवीन । जब तक रविन्दर मुड़कर देखता कि आवाज़ कसने वाला कौन है, उसके कानों से एक और फ़िक़रा टकराया – व्हाइ हैव यू मेड अ डोम ऑन द हैड (सिर पर गुम्बद क्यों बनाया है) ? रविन्दर समझ गया कि नस्लपरस्त आवारागर्द लड़के हैं, जो एशियाइयों पर अपमानजनक फ़िक़रे उछालते रहते हैं । उनकी ओर बिना देखे उसने चुपचाप ताला खोला और फिर साइकिल के अगले पहिये को यथास्थान फ़िट करने में जुट गया ।

अचानक किसी ने उसकी पीठ पर ठोकर मारी और वह औंधे मुँह गिरते-गिरते बचा । रविन्दर उठकर खड़ा हो गया । तीन गोरे लड़के उसके सामने खड़े थे । स्किनहेड्स के जीते-जागते नमूने, मुंडित मस्तक गुंडे, जिनकी आँखों से लगता था कि शरारत करना उनकी मनपसंद हॉबी है । एक के मुँह में सिगरेट थी, दो की उँगलियों में । “हैलो पाकी पिग” कहते हुए एक गुंडे ने हाथ मारकर रविन्दर की पगड़ी उछाल दी । इससे पहले कि रविन्दर अपनी पगड़ी उठाता, दूसरे गुंडे ने सिगरेट आगे बढ़ाकर उसे जलाना चाहा, जबकि तीसरे गुंडे ने उसे अड़ंगी देकर गिरा दिया । रविन्दर अब भी उनसे उलझना नहीं चाहता था । वह चुपचाप उठकर अपनी पगड़ी की ओर जाने लगा ।
गुंडों के लिये पगड़ी तब तक फ़ुटबॉल बन चुकी थी और फ़ुटपाथ तक पहुँच चुकी थी।
तड़ाक ।

मझोले क़द के लेकिन गठे हुए शरीर वाले रविन्दर का इस्पाती हाथ पगड़ी से खेलने वाले गुंडे के गाल पर पड़ा । यह देखकर बाक़ी दोनों गुंडे रविन्दर को पीटने के लिये हुँकारते हुए आगे बढ़े । रविन्दर ताले वाली ज़ंजीर को कुशल खिलाड़ी की तरह घुमाने लगा । एक गुंडे की कनपटी पर ताले ने बहुत गहरा घाव किया । उसने दूसरी बार ज़ंजीर को घुमाकर दूसरे गुंडे के जबड़े के पेंच ढीले कर दिये । अपने साथियों की यह हालत देखकर ज्योंही तीसरा गुंडा रविन्दर को मारने के लिये आगे बढ़ा, ज़ंजीर का भरपूर वार उसके माथे पर भी पड़ा । तीनों गुंडे घायल बाघों की तरह रविन्दर पर एक साथ झपटे, लेकिन वह ज़ंजीर को इस तरह घुमा रहा था, जैसे सुदर्शन चक्र हो । तब तक सामने के फ़्लैट वाले ने पुलिस को फ़ोन कर दिया था । पलक झपकते ही पुलिस वहाँ पहुँच गई, जिसने चारों को गिरफ़्तार कर लिया ।

चारों को मजिस्ट्रेट के आगे पेश करते हुए पुलिस ने बताया कि रविन्दर सार्वजनिक स्थान पर उपद्रव मचा रहा था और उसने एक ख़तरनाक हथियार से तीन राहगीरों को गम्भीर चोटें पहुँचाई हैं । पुलिस ने यह भी कहा कि हमें रविन्दर के मानसिक रूप से स्वस्थ होने में सन्देह है ।

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प्रतिकार
डॉ. गौतम सचदेव

नरेन्द्र डबल डेकर बस के ऊपरी तल्ले में अकेला बैठा लन्दन के दृश्य देखता जा रहा था । दो गोरी लड़कियाँ अपने जूतों से ठक-ठक करतीं ऊपर आईं और आकर नरेन्द्र के पीछ वाली सीट पर बैठ गईं । उन्होंने आते ही नरेन्द्र में ऐसी दिलचस्पी लेना शुरू किया, जैसी शैतान बच्चे चिड़ियाघर में कोई विचित्र जानवर देखने पर लेते हैं । वे उसे छेड़ने और उसका मज़ाक़ उड़ाने लगीं । नरेन्द्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की और पहले की तरह चुपचाप खिड़की के बाहर देखता रहा । लड़कियों को और मज़ा आया । एक ने उसके कन्धे को थपथपाया और ठठाकर हँसने लगी । दूसरी ने सीट के नीचे से अपना पैर आगे बढ़ाते हुए जूते से नरेन्द्र की टाँग पर ठोकर मारी । नरेन्द्र को बुरा लगा । उसने मुँह घुमाकर लड़कियों से पूछा – तुम्हें क्या तक़लीफ़ है ? लड़कियों को उसका सवाल सुनकर और मज़ा आया । उन दोनों में जो ज़रा बड़े क़द वाली और मुटल्ली-सी थी, उसने जवाब देने की बजाय सवाल दाग़ा – क्या तुम कॉकरोच नहीं हो ? इसके साथ ही दूसरी लड़की ने कहा – ज़मीन पर लेटकर टाँगें चलाओ न, बैठे क्यों हो ? यह कहकर दोनों लड़कियों ने नरेन्द्र को सीट से घसीटकर गिराना चाहा ।

दोनों लड़कियों ने यह नहीं देखा कि स्टॉप पर बस रूकी थी और दो-तीन सवारियाँ सीढ़ियों से ऊपर आ रही थीं । नरेन्द्र ने ख़ुद को उन लड़कियों से छुड़ाया और उठकर एकदम अगली सीट पर जा बेठा । लड़कियों के साथ हुई हाथापाई में न जाने कैसे उसके हाथ एक लड़की की घड़ी आ गई थी । उसे अच्छा लगा और उसने चुपचाप घड़ी जेब में रख ली । अगला स्टॉप आने पर लड़कियों ने बस रुकवाने के लिये घंटी बजाई । जब वे सीढ़ियाँ उतरने लगीं, तो दोनों ने पहले नरेन्द्र को कॉकरोच कहा, फिर दो उँगलियों उठाकर अश्लील इशारा किया और छलाँग लगाते हुए बस से बाहर कूद गईं ।

नरेन्द्र को अपनी नपुंसकता पर ग़ुस्सा आया, लेकिन इस बात की ख़ुशी भी हुई कि चलो, बेइज़्ज़ती करवाकर भी घड़ी तो मिल गई । दो-तीन स्टॉप बाद जब वह उतरने के लिये खड़ा हुआ, तो बजाय निकास द्वार की ओर जाने के सीधा ड्राइवर की ओर बढ़ गया और उसे घड़ी देते हुए बोला – यह शायद किसी सवारी की है । ऊपर की सीट पर पड़ी थी ।

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