Archive for the ‘कहानी’ Category

“मेरा बेटा लौटा दो!!”

मार्च 28, 2007

“मेरा बेटा लौटा दो!!”-
(एक सत्य घटना पर आधारित कहानी)

महावीर शर्मा

लखनऊ में खटीक समुदाय की बस्ती से दूर जंगल में रामू की माँ चिलला चिल्ला कर दहाड़ रही थी, ” मेरा बेटा लौटा दो! मेरे रामू को लौटा दो!” रामू के बापू और साथियों ने जंगल का चप्पा चप्पा छान डाला, पर बालक का कोई पता नहीं चला। रामू की माँ का हाल बेहाल हो
रहा था। पति ने अपनी मैली सी धोती के पल्ले से आंखों से गिरते आंसुओं को पोंछा। पत्नी को
दिलासा दे कर,घर लौट आए।

रात हो चुकी थी। बाहर जरा सा भी खड़का सा सुनाई देता तो रामू की माँ दौड़ कर दरवाजे पर कहती ‘मेरा रामू आगया!” बस मृग-तृष्णा का छलावा दोनों के साथ खेल खेलता रहता।
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। रामू सारे दिन काम से थका हारा खटिया में लेट गया। आंखें बंद की तो उस भयानक रात की घटना किसी हॉरर फ़िल्म की तरह आंखों की पलकों के पीछे चल रही थी।

‘उमंगों से भरे वर्ष 1947 ने इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया था। इनसान का वीभत्स रूप भी देखा था। इनसान के मस्तिष्क, हृदय और आत्मा के बिगड़ते हुए संतुलन को भी देखा था। धर्म के नाम पर सीमा के दोनों ओर “हर हर महादेव” और “अल्लाह हू अकबर” के नारों
की गूंज में बालकों, स्त्रियों यहां तक बूढ़ों तक को निर्दयता से बलि दी जा रही थी। उसी वर्ष तो हमारे रामू ने इस लहू से भरी लाल रंग की धरती पर जन्म लिया था।

‘गरीबी की चादर ओढ़े इकलौते रामू के साथ सुख-दुख के मिले-जुले जीवन के दिन बीत रहे थे। रामू के भविष्य के लिए न जाने कितने मनसूबे बनाते थे। भौंरिया तो काम के समय भी रामू को सीने से चिपकाए रहती थी। रात को अपनी गोद में ही सीने से लगा कर सोती थी। यही झुग्गी हमारे महल से कम नहीं लगती थी जब आंगन में एक बरस के नन्हें से रामू की किलकारी में जीवन के सारे दुख समा जाते।

एक अंधेरी रात में हवा नें आंधी का रूप धारण कर लिया था। इस आंधी और किवाड़ के में हार जीत की बाज़ी लगी हुई थी। यूं तो ऐसी तेज़ हवाओं के तो हम आदी हो चुके थे। भौंरिया रामू को गोद में चिपकाए हुए सो गई थी। सारे दिन के जिस्म-तोड़ काम ने शरीर को इतना थका दिया था कि किवाड़ की खड़खड़ाहट और तेज़ हवा की सांय सांय भी हमारी नींद को उखाड़ ना सकी।

अचानक से किवाड़ खुले और एक ही झपट्टे में एक खूंख्वार भेड़िया रामू को गोद से छीन कर जंगल की ओर भाग गया। ये सब इतनी फुर्ती से हुआथा कि हम दोनों हड़बड़ा कर खड़े तक भी ना हो पाए थे। हम चीखने चिल्लाने लगे, दौड़ कर भेड़िये के पीछे भागे, शोर सुन कर
बस्ती के लोग अपनी लालटैन ले लेकर साथ हो लिए, पर भेड़िया रामू को ले कर दूर बीहड़ जंगल में लापता हो गया था।
भौंरिया तो बेटे के वियोग में पागल सी हो गई थी। हम दोनों हर रोज़ दूर दूर तक इस जंगल की कांटों भरी झाड़ियों को हटा हटा कर ढूंढते रहते, हाथ कांटों से लहूलुहान हो जाते थे। जितना प्रयत्न करते, सफलता उतनी ही दूर हो जाती। भौंरिया के धैर्य का बांध टूट गया। पागलों की
तरह जंगल में इधर उधर भाग भाग कर दहाड़ दहाड़ कर चिल्लाती -‘ अरे भेड़िये, मेरे लाल को वापस दे दे। तुझे मानस का मांस ही चाहिए ना? ले मैं सामने खड़ी हूं, मेरे अंग अंग को नोच कर खा जा पर मेरे रामू को लौटा दे!’साथ में आए मुखिया ने कहा, ‘ रामू की माँ! भेड़िये और मानव
का तो पुराना बैर है, रामू तो भेड़िये का कभी का आहार बन चुका होगा।’ भौंरिया फूट फूट कर रो पड़ी।’
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इस घटना को 6 वर्ष बीत गए। लोग रामू को भूल से गए। रामू के माँ और बापू ने दिल पर पत्थर रख अपनी रोज की दिनचर्या को सामान्य बनाने का प्रयत्न करते रहते।

दोनों काम से हारे थके सांय झुग्गी के बाहर बैठे हुए थे। रामू के बापू ने बीड़ी सुलगाई ही थी कि सामने वाली बुढ़िया लाठी टेकती हुई मुस्करा कर दोनों के सामने बैठ गई।
अरे, दोनों के लिए बड़ी खुसखबरी ले कर आई हूं। दुनिया चाहे ना माने पर मेरा दिल तो यही गवाही देवे है कि वह रामू ही है।’
दोनों सकते में आगए। कुछ क्षणों तक तो बुढ़िया का मुंह ही तकते रहे, कुछ समझ नहीं आ रहा था। रामू की माँ एक दम तेजी से कहने लगी,’ताई, पहेलियां मत बुझा, मेरा हिया फटा जा रहा है, साफ साफ बता कहां है वो?’
‘अरी मैं ठीक से बैठ तो जाऊं। रामू के बापू, जरा एक बीड़ी तो सुलगाइयो।’
बीड़ी का सुट्टा लगा कर बुढ़िया ने कहना शुरू किया,’ तू तो जाने ही है कि तेरा ताऊ अखबार बांच लेवे है। बता रहे थे कि छापे में लिखा था कि कुछ वकत हुआ, बलरामपुर के अस्पताल में एक बच्चा भरती हुआ है जिसकी चाल-ढाल, आदतें, हाव-भाव ही नहीं हाथ पैर तक के भी
भेड़िये की तरह हैं।’

दोनों सवेरे ही बलरामपुर के अस्पताल पहुंच गए। एक नर्स से बात हुई, अपनी दारुण-कथा सुनाई। नर्स उनके हाव-भाव को आंकने की कोशिश कर ही थी। दोनों रो रहे थे। दोनों को वहीं बैठा कर, अंदर जा कर डाक्टर को बताया कि एक दम्पति इस बालक के माता-पिता होने का दावा कर रहे हैं। नर्स ने यह भी कहा कि यह भी हो सकता है कि यह दोनों एक घड़न्त कहानी बना कर अखबार वालों से इस कहानी को भुनाने की कोशिश कर रहे हों।
डाक्टर ने दोनों को बुला कर सीधा प्रश्न किया, ‘तुम किस आधार पर कहते हो कि यह तुम्हारा ही बेटा है?” भौंरिया भावों के बहाव में रोती हुई कहने लगी, ‘डाक्टर जी, मेरा दिल कहता है कि वह मेरा रामू ही है।’ डाक्टर कुछ कहना चाह रहा था कि रामू के बापू ने कहा,
‘मालिक ! रामू के माथे पर जनम का निसान है और उसकी दाईं जांघ पर जनम का नीला निसान भी है।’डाक्टर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘जाओ, नर्स के साथ जाकर अपने रामू से मिल लो पर उससे सतर्क रहना।’

देखते ही भौंरिया की ममता उमड़ पड़ी। बालक को गले से लगा लिया। नर्स विस्मित हो गई कि वही रामू जिसको पकड़ने के लिए एक युद्ध सा करना पड़ता था,चुपचाप इस औरत के गले लगा हुआ था। रामू का बापू धोती के पल्ले से खुशी के आंसू पोंछ रहा था। अब ग़ौर से देखा तो दोनों का हृदय द्रवित हो गया। घुटनों और हाथों में गट्ठे पड़े हुए थे। गर्दन के पीछे दांतों के निशान थे। बोलने के नाम पर केवल भेड़ियों की तरह हुवा-हुवा करता। साथ ही रखे हुए कटोरे में मुंह डाल कर जानवरों की तरह ही पीता था। नर्स ने कहा,’ अब इसकी दवा का समय है, तुम बाहर बैठो, मैं अभी आती हूं। ‘

नर्स को दोनों ने 6 वर्ष पहली घटना विस्तार से सुनाई। नर्स का दिल भी पिघल सा गया। नर्स ने बताया,’1954 के इसी साल में थोड़े समय की बात है, इस बालक को लखनऊ के स्टेशन के थर्ड-क्लास वेटिंग-रूम में देखा गया था। लोग इस से डरते थे। बड़ी कठिनाई से इसे पकड़ कर
17 जनवरी को यहां लाया गया था।’
दोनों की उत्सुक्ता बढ़ रही थी, ‘वह कैसा लगता था उस वकत?’ नर्स जारी रही, ‘वह मानव की संगत पसंद नहीं करता था। हां, चिड़ियाघर में ले जाते तो भेड़ियों को देख कर उत्तेजित हो जाता था। खाने की वस्तुओं को टुकड़े टुकड़े कर डालता हे।हड्डियों को घंटों तक चबाता रहता था। इसी लिए डाक्टर कहते हैं कि लगता है इसे भेड़ियों ने पाला था। कोई भी नहीं कह सकता था वह किसी भी रुप से मानवीय हो। सिर पर गुथे हुए बाल जटाएं बन चुकी थीं, चारों हाथ पैरों से जानवरों की तरह ही चलता था। ज्यों ही कपड़े पहनाते तो फाड़ डालता। रात को भेड़ियों की तरह ‘हुवाने’ की आवाज़ें करता। हंसना तो जानता ही न था। हां, रात के समय उसकी आंखें चमकती थीं। मांस को दूर से ही सूंघ कर पहचान लेता था।’

‘जब वह आया था, कच्चा मांस और फल खाता था। अब यहां दूसरे रोगियों को देख देख कर पकाई हुई सब्जियां और रोटी भी खाने लगा है। बिजली के इलाज से इसे लाभ हुआ है। पहले हाथ पैरों को फैलाता तक नहीं था पर अब पहले से अच्छा है।’ दोनों सुन कर आंसुओं को थाम ना सके।
नर्स ने कहा, ‘उसका पूरा हाल ना ही सुनो तो अच्छा होगा। इसे तुम घर ले जाकर संभाल नहीं पाओगे। यहां देखभाल, दवा, इलाज की उचित व्यवस्था है। बस आकर जब भी चाहो, देख जाया करो।’ दोनों इस से सहमत थे।

रामू मानवीय गुणों को पूरी तरह स्वीकार ना कर पाया। मां बाप १४ वर्षों तक नियम पूर्वक अस्पताल में जाकर अपने ममत्व को सींचते रहे। रामू की हालत बिगड़ने लगी। दवा और इलाज का असर खत्म हो गया। 20 अप्रेल 1968 की रात रामू की अंतिम रात बन गई। कुछ
मानवीय और कुछ पशु-पालित भेड़ियों के गुणों का समन्वित रूप साथ ले कर आंखें हमेशा के लिए बंद कर ली।

बेटे की चिता से अस्थियां इकट्ठी की, भीगी आंखों से राख के पात्र को सीने से लगाया। जाकर उसी बीहड़ जंगल की हवा में अस्थि-विसर्जित करते हुए हुए कहा, “ऐ भेड़ियों, हम तुम्हारे ऋणी हैं। हमारे रामू को तुम्हीं ने तो पाला था!!”
महावीर शर्मा


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हिमालय अदृष्य हो गया – महावीर शर्मा

जुलाई 4, 2006

“हिमालय अदृष्य हो गया!”

लेखकः महावीर शर्मा

सोमवार ११ सितम्बर,१८९३। अमेरिका स्थित शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन में गेरुए वस्त्र धारण किए हुए एक ३० वर्षीय भारतीय युवक सन्यासी ने, जिसके हाथ में भाषण के लिए ना कोई कागज़ था, ना कोई पुस्तक, चार शब्दों “अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों” से श्रोताओं को संबोधित कर चकित कर डाला। ७००० श्रोताओं की १४००० हथेलियों से बजती हुई तालियों से ३ मिनट तक चारों दिशाएं गूंजती रही। अमेरिका निवासी सदैव केवल “लेडीज़ एण्ड जेंटिलमेन” जैसे शब्दों से ही संबोधित किए जाते थे।
यह थे स्वामी विवेकानंद जिन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय आध्यात्मिक तत्वनिरूपण कर जन-समूह एवं विभिन्न धर्मों के ज्ञान-विद प्रतिनिधियों के मन को मोह लिया था। अंतिम अधिवेशन में वक्ताओं,विभिन्न देशों और धर्मों के प्रतिनिधियों , श्रोताओं का धन्यवाद देते हुए जिस प्रकार प्रभावशाली भाषण को समाप्त किया, लोग आनंद-विभोर हो उठे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू-धर्म केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही नहीं, अपितु इस में भी विश्वास करता है कि समस्त धर्म सत्य और यथा-तथ्यों पर आधारित हैं।
* * * * *
लगभग नौ वर्ष पश्चातशुक्रवार, ४ जुलाई १९०२ के दिन अमेरिका-निवासी १८५वां स्वतंत्रता-दिवस धूम-धाम से मनाते हुए २ लाख व्यक्ति शैनले-पार्क, पिट्सबर्ग में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का भाषण सुन रहे थे, उसी दिन जिस सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने ११ सितंबर १८९३ में अमेरिका में ज्ञान-दीप जला कर सत्य के प्रकाश से लोगों के ह्रदयों को आलोकित किया था—

भारत के पश्चिमी बंगाल के कोलकात्ता नगर के समीप हावड़ा क्षेत्र में हुगली नदी के दूसरे तीर पर स्थित बेलूर मठ में सूर्यास्त के साथ साथ स्वामी विवेकानंद सदैव के लिए नश्वर शरीर त्याग कर ‘महा-समाधि’ लेकर महा-प्रयाण की ओर अग्रसर थे।

स्वामी विवेकानंद प्रातः ही उठ गए थे। साढ़े आठ बजे मंदिर में जाकर ध्यान-रत हो गए। एक घण्टे के पश्चात एक शिष्य को कमरे के सारे द्वार और खिड़कियां बंद करने को कह कर लगभग डेढ़ घण्टे उस बंद कक्ष में भीतर ही रहे। लगभग डेढ़ घण्टे बाद माँ काली के भजन गाते हुए नीचे आगए। स्वामी जी स्वयं ही धीमी आवाज में कुछ कह रहे थेः “यदि एक अन्य विवेकानंद होता तो वह ही समझ पाता कि विवेकानंद ने क्या किया है। अभी आगामी समय में कितने विवेकानंद जन्म लेंगे।” पास में ही स्वामी प्रेमानंद इन शब्दों को सुन कर सतब्ध से रह गए। भोजन के पश्चात स्वामी जी प्रतिदिन की भांति ब्रह्मचारियों को ३ घण्टे तक संस्कृत-व्याकरण सिखाते रहे।
आज स्वामी जी के चेहरे पर किसी गंभीर चिंता के लक्षण प्रगट हो रहे थे। अन्य स्वामी तथा शिष्य-गण देखकर भी उनसे पूछ ना सके। सांय ४ बजे एक अन्य स्वामी के साथ पैदल ही घूमने चले गए। लगभग १ मील चल कर वापस मठ पर चले आए। ऊपर, अपने कक्ष में जाकर अपनी जप-माला मंगवाई। एक ब्रह्मचारी को बाहर प्रतीक्षा करने के लिए कह कर धयानस्थ हो गए। पौने आठ बजे एक ब्रह्मचारी को बुलाकर कमरे के दरवाज़े और खिड़कियां खुलवा कर फ़र्श पर अपने बिस्तर पर लेट गए। शिष्य पंखा झलते हुए सवामी जी के पांव दबाता रहा।
दो घण्टे के पश्चात स्वामी जी का हाथ थोड़ा सा हिला, एक हलकी सी चीख़ के साथ एक दीर्घ-श्वास! सिर तकिये से लुढ़क गया- एक और गहरा श्वास !! भृकुटियों के बीच आंखें स्थिर हो गईं। एक दिव्य-ज्योति सब के ह्रदयों को प्रकाशित कर, नश्वर शरीर छोड़ कर लुप्त हो गई।
शिष्य उनकी शिथिल स्थिर मुखाकृति देख कर डर सा गया। बोझल ह्रदय के साथ दौड़ कर नीचे एक अन्य स्वामी को हड़बड़ाते हुए बताया। स्वामी ने समझा कि स्वामी विवेकानंद समाधि में रत हो गए हैं। उनके कानों में श्री राम कृष्ण परमहंस का नाम बार बार उच्चारण किया, किंतु स्वामी जी का शरीर शिथिल और स्थिर ही रहा, उसमें कोई गति का चिन्ह नहीं दिखाई दिया।
कुछ ही क्षणों में डॉक्टर महोदय आगए। जिस सन्यासी ने अनेक व्यक्तियों के ह्रदयों में दैवी-श्वास देकर जीवन का रहस्य बता कर अर्थ-पूर्ण जीवन-दान दिया , आज उस भव्यात्मा के शरीर में डॉक्टर की कृत्रिम-श्वासोच्छवास में गति नहीं दे सकी। स्वामी विवेकानंद ३९ वर्ष, ५ मास और २४ दिनों के अल्प जीवन-काल में अन्य-धर्मान्ध व्यक्तियों द्वारा हिंदु-धर्म के विकृत-रूप के प्रचार से प्रभावित गुमराह लोगों को हिंदु-धर्म का यथार्थ मर्म सिखाते रहे।
स्वामी ब्रह्मानंद स्वामी जी के गतिहीन शरीर से लिपट गए। एक अबोध बालक की तरह फफक फफक कर रो पड़े। उनके मुख से स्वतः ही निकल पड़ाः
“हिमालय अदृष्य हो हो गया है!”
प्रातः स्वामी जी के नेत्र रक्तिम थे और नाक, मुख से हल्का सा रक्त निकला हुआ था।

तीन दिन पहले २ जुलाई को स्वामी जी ने निवेदिता को दो बार आशीर्वाद देकर आध्यात्मिकता का सत्य-रूप दिखाया था और आज वह उसी दिव्य-ज्योति में समाधिस्थ थी। कक्ष के दरवाजे पर थपक सुन कर ध्यानस्थ निवेदिता ने आंखें खोली और द्वार खोल दिया। एक ब्रह्मचारी सामने खड़ा हुआ था, आंखों में अश्रु निकल रहे थे। भर्राये हुए स्वर से बोला, “स्वामी जी रात के समय—” कहते कहते उसका गला रुंध गया, पूरी बात ना कह पाया। निवेदिता स्तब्ध सी शून्य में देखती रह गई जैसे अंग-घात हो गया हो। जिब्हा बोलने की चेष्टा करने का प्रयास करते हुए भी निश्चल रही। फिर स्वयं को संभाला और मठ की ओर चलदी।
स्वामी जी के शरीर को गोद में रख लिया। दृष्टि उनके शरीर पर स्थिर हो गई, पंखे से हवा देने लगी और उन्माद की सी अवस्था में वो समस्त सुखद घटनाएं दोहराने लगी जब स्वामी जी ने इंग्लैंड की धरती से निवेदिता को भारत की परम-पावन धरती में लाकर एक नया सार्थक जीवन दिया था।
मृत-शरीर नीचे लाया गया। भगवा वस्त्र पहना कर सुगंधित पुष्पों से सजा कर शुद्ध- वातावरण को बनाए रखने के लिए अगर बत्तियां जलाई गईं। शंख-नाद से चारों दिशाएं गूंज उठी। लोगों का एक विशाल समूह उस सिंह को श्रद्धाञ्जली देने के लिए एकत्रित हो गया। शिष्य, ब्रह्मचारी, अन्य स्वामी-गण, और सभी उपस्थित लोगों की आंखें अश्रु-भार संभालने में अक्षम थे। निवेदिता एक निरीह बालिका की भांति दहाड़ दहाड़ कर रो रही थी। उसने स्वामी जी के कपड़े को देखा और विषादपूर्ण दृष्टि लिए स्वामी सदानंद से पूछा, “क्या यह वस्त्र भी जल जाएगा ? यह वही वस्त्र है जब मैंने उन्हें अंतिम बार पहने हुए देखा था। क्या मैं इसे ले सकती हूं ? ”

स्वामी सदानंद ने कुछ क्षणों के लिए आंखें मूंद ली, और तत्पश्चात बोले,
“निवेदिता, तुम ले सकती हो। ”
निवेदिता सहम सी गई, ऐसा कैसे हो सकता था? वह यह वस्त्र एक याद के रूप में जोज़फ़ीन को देना चाहती थी। उसने वस्त्र नहीं लिया।

चमत्कार था या संयोग-कौन जाने ?

निवेदिता को जिस वस्त्र को लेने की इच्छा थी, जलती हुई चिता से उसी वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा हवा से उड़कर उसके पांव के पास आकर गिर पड़ा। वस्त्र को देख, वह विस्मित हो गई। छोटे से टुकड़े को श्रद्धापूर्वक बार बार मस्तक पर लगाया। उसने यह स्वमी जी का दिया हुआ अंतिम उपहार जोज़फ़ीन के पास भेज दिया जिसने दीर्घ काल तक उसे संजोए रखा।
उस चिता की अग्नि-शिखा आज भी स्वामी जी के अनुपम कार्यों में निहित, विश्व में भारतीय अंतश्चेतना, अंतर्भावनाशीलता और सदसद् विवेक का संदेश दे, भटके हुए को राह दिखा रही है!
“ईश्वर को केवल मंदिरों में ही देखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा ईश्वर उन लोगों से अधिक प्रसन्न होते हैं जो जाति, प्रजाति, रंग, धर्म, मत, देश-विदेश पर ध्यान ना देकर निर्धन, निर्बल और रोगियों की सहायता करने में तत्पर रहते हैं। यही वास्तविक ईश्वर-उपासना है। जो व्यक्ति ईश्वर का रूप केवल प्रतिमा में ही देखता है, उसकी उपासना प्रारंभिक एवं प्रास्ताविक उपासना है। मानव-ह्रदय ही ईश्वर का सब से बड़ा मंदिर है।”

महावीर शर्मा

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