Archive for the ‘कविता’ Category

‘मदर्स डे’ पर प्रसिद्ध कवि डॉ. कुंअर बेचैन की कविता – ‘मां’

मई 9, 2010

आज अमेरिका और कनाडा आदि देशों में मदर्स-डे मनाया जा रहा है. उसके उपलक्ष में प्रसिद्ध कवि ‘डॉ. कुंअर बेचैन’ जी की ‘मां’ पर लिखी एक कविता-

मां’

डॉ. कुंअर बेचैन

कभी उफनती हुई नदी हो,  कभी नदी का उतार हो मां
रहो किसी भी दिशा-दिशा में,  तुम अपने बच्चों का प्यार हो मां

नरम-सी बांहों में खुद झुलाया,  सुना के लोरी हमें सुलाया
जो नींद भर कर कभी न सोई,  जनम-जनम की जगार हो मां

भले ही दुख को छुपाओ हमसे,   मगर हमें तो पता है सब कुछ
कभी थकन हो, कभी दुखन हो,  कभी बदन में बुखार हो माँ

जो तुमसे बिछुड़े, मिले हैं कांटे,  जो तुम मिलीं तो मिलीं हैं कलियाँ
तुम्हारे बिन हम सभी हैं पतझर,  तुम्हीं हमारी बहार हो मां

हरेक मौसम की आफ़तों से,  बचा लिया है उढ़ा के आँचल
हो सख्त जाड़े में धूप तुम ही,  तपन में ठंडी फुहार हो मां

ये सारी दुनिया है एक मंदिर,  इसी ही मंदिर की आरती में
हो धर्मग्रंथों के श्लोक-सी तुम,  हृदय का पावन विचार  हो मां

न सिर्फ मैं ही वरन् तुम्हारे,  ये प्यारे बेटे, ये बेटियां सब
सदा-सदा ही ऋणी रहेंगे,  जनम-जनम का उधार हो मां

कि जब से हमने जनम लिया है,  तभी से हमको लगा है ऐसा
तुम्हीं हमारे दिलों की धड़कन,  तुम्हीं हृदय की पुकार हो मां

तुम्हारे दिल को बहुत दुखाया,  खुशी ज़रा दी, बहुत रुलाया
मगर हमेशा हमें क्षमा दी,  कठोर को भी उदार हो मां

कहा है जो  कुछ यहां बड़ों ने,  ‘कुंअर’ उसे कुछ यूं कह रहा है
ये सारी दुनिया है इक कहानी,  तुम इस कहानी का सार हो मां

– डॉ. कुंअर बेचैन –
२ एफ – ५१, नेहरू नगर, ग़ाज़ियाबाद, उ.प्र., भारत

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प्राण शर्मा की लघु-कथा और तेजेंद्र शर्मा की कविता

जुलाई 22, 2009

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प्राण शर्मा की लघु-कथा
पिंजरे के पंछी
—प्राण शर्मा

चंद्र प्रकाश के चार साल के बेटे को पंछियों से बेहद प्यार था। वह अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहता। ये सभी पंछी उसके घर के आंगन में जब कभी आते तो वह उनसे भरपूर खेलता। उन्हें जी भर कर दाने खिलाता। पेट भर कर जब पंछी उड़ते तो उसे बहुत अच्छा लगता।

एक दिन बेटे ने अपने पिता जी से अपने मन की एक इच्छा प्रकट की। – “पिता जी, क्या चिड़िया, तोता औ कबूतर की तरह मैं नहीं उड़ सकता?”
“नहीं।” पिता जी ने पुत्र को पुचकारते हुए कहा।
“क्यों नहीं?”
“क्योंकि बेटे, आपके पंख नहीं हैं।”
“पिता जी, क्या चिड़िया, तोता और कबूतर मेरे साथ नहीं रह सकते हैं? क्या शाम को मैं उनके साथ खेल नहीं सकता हूं?”
“क्यों नहीं बेटे? हम आज ही आपके लिए चिड़िया, तोता औ कबूतर ले आएँगे।
जब जी चाहे उनसे खेलना। हमारा बेटा हमसे कोई चीज़ माँगे और हम नहीं लाएँ, ऐसा कैसे हो सकता है?”

शाम को जब चन्द्र प्रकाश घर लौटे तो उनके हाथों में तीन पिंजरे थे – चिड़िया, तोता और कबूतर के। तीनों पंछियों को पिंजरों में दुबके पड़े देखकर पुत्र खुश न हो सका।
बोला- “पिता जी, ये इतने उदास क्यों हैं?”
“बेटे, अभी ये नये-नये मेहमान हैं। एक-दो दिन में जब ये आप से घुल मिल जाऐंगे तब देखना इनको उछलते-कूदते और हंसते हुए?” चन्द्र प्रकाश ने बेटे को तसल्ली देते हुए कहा।

दूसरे दिन जब चन्द्र प्रकाश काम से लौटे तो पिंजरों को खाली देखकर बड़ा हैरान हुए। पिंजरों में न तो चिड़िया थी और न ही तोता और कबूतर। उन्होंने पत्नी से पूछा-“ये चिड़िया, तोता और कबूतर कहाँ गायब हो गये हैं?”
“अपने लाडले बेटे से पूछिए।” पत्नी ने उत्तर दिया।
चन्द्र प्रकाश ने पुत्र से पूछा-“बेटे, ये चिड़िया, तोता औ कबूतर कहाँ हैं?”
“पिता जी, पिंजरों में बंद मैं उन्हें देख नहीं सका। मैंने उन्हें उड़ा दिया है।” अपनी भोली ज़बान में जवाब देकर बेटा बाहर आंगन में आकर आकाश में लौटते हुए पंछियों को देखने लगा।

—प्राण शर्मा

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मेरी तुकबंदियां

तेजेंद्र शर्मा

मैं
और मेरी तुकबंदियां
हर शाम, एक दूसरे से
बातें करते हैं

मैं जानता हूं
ज़माने को कुछ नहीं
लेना देना
मेरी तुकबंदियों से।

वे मुझे लुभाती हैं
मेरा बिस्तर, मेरा तकिया
बन कर पहुंचाती हैं आराम
देती हैं रज़ाई की गर्माहट।

जेठ की तपती लू जैसे उलाहने
दुनिया भर की शिक़ायतें
नाराज़गियां, दबाव
ठण्डी बयार हैं तुकबंदियां।

उन्हें नहीं पसन्द
तो क्या हुआ..
ये मेरी अपनी हैं।
बनाती हैं मुझसे एक अबूझ रिश्ता

रात को तारों की तरह टिमटिमाती।
भोर के सूरज के साथ
जगाती हैं. चाय की प्याली बन जाती हैं।
नहीं रचतीं ढोंग महानता का
रहती हैं ख़ुश अपने आप में।

मेरी तुकबंदियां।

-तेजेंद्र शर्मा

प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़ल

दिसम्बर 26, 2008

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प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़लः

चूल्हा-चौका, कपड़ा-लत्ता ख़ौफ़ है इनके बहने का
तूफ़ानों का ख़ौफ़ नहीं है ख़ौफ़ है घर के ढहने का

सब से प्यारा, सब से न्यारा जीवन मुझ को क्यों न लगे
शायद ही कोई सानी है दुनिया में इस गहने का

बेशक सब ही कोशिश कर लें बेहतर रहने की लेकिन
आएगा ऐ दोस्त सलीका किसी किसी को रहने का

जाने क्या क्या सीखा उससे जिस जिससे अंजान थे हम
खूब तजरबा रहा हमारा संग दुखों के रहने का

इतना भी कमज़ोर बनो क्यों दीमक खाई काठ लगो
मीत तनिक हो साहस तुम में दुख तकलीफ़ें सहने का

बात कोई मन की मन में ही कैसे क्यों कर रह जाए
दिल वालों की महफ़िल में जब वक्त मिले कुछ कहने का

‘प्राण’ कभी तो अपनी खातिर ध्यान ज़रा दे जीवन पर
एक यही तो घर है तेरा कुछ आराम से रहने का

‘प्राण’ शर्मा

रश्मि प्रभा जी की कविता

दिसम्बर 18, 2008

आओ पीछे लौट चलें……

joybrains-photostream-boatस्वर्गीय महाकवि सुमित्रा नंदन पंत की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद की सुपुत्री रश्मि प्रभा को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है फिर भी उन्हीं के शब्दों में उनका परिचय पढ़िएः

मैं रश्मि प्रभा…सौभाग्य मेरा कि मैं कवि पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद rashmi-prabha-1की बेटी हूँ और मेरा sumitranandan_pantनामकरण स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पन्त ने किया और मेरे नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियाँ मेरे नाम की…”सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन” , शब्दों की पांडुलिपि मुझे विरासत मे मिली है. अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते…मेरा मन जहाँ तक जाता है, मेरे शब्द उसके अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन, ये शब्द ही मेरा सुकून हैं…”

आओ पीछे लौट चलें……

बहुत कुछ पाने की प्रत्याशा में

हम घर से दूर हो गए !

जाने कितनी प्रतीक्षित आँखें

दीवारों से टिकी खड़ी हैं –

चलो उनकी मुरझाई आंखों की चमक लौटा दें !

सूने आँगन में धमाचौकड़ी मचा दें

– आओ पीछे लौट चलें………..

आगे बढ़ने की चाह में

हम रोबोट हो गए

दर्द समझना,स्पर्श देना भूल गए !

दर्द तुम्हे भी होता है,

दर्द हमें भी होता है,

दर्द उन्हें भी होता है

– बहुत लिया दर्द, अब पीछे लौट चलें……….

पहले की तरह,

रोटी मिल-बांटकर खाएँगे,

एक कमरे में गद्दे बिछा

इकठ्ठे सो जायेंगे …

कुछ मोहक सपने तुम देखना,

कुछ हम देखेंगे –

आओ पीछे लौट चलें…………………

रश्मि प्रभा

सीमा गुप्ता की दो कविताएं

दिसम्बर 10, 2008

सीमा गुप्ता की दो कविताएं

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मृगतृष्णा

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
seema-gupta-1ढूँढ़ा तुमको तकदीरों में
चन्दा की सब तहरीरों में
हाथों की धुँधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम

इन आंखों की तस्वीरों में

कैसी ये ………………….

अम्बर के झिलमिल तारों में
सावन में रिमझिम फुहारों में
लहरों के उजले किनारों में
तुमको पाया तुमको पाया

प्रेम-विरह अश्रुधारों में

कैसी ये…………………….

ढूँढ़ा तुमको दिन रातों में
ख्वाबों ख्यालों जज्बातों में
उलझे से कुछ सवालातों में
बसते हो तुम बसते हो तुम

साँसों की लय में बातों में

कैसी ये……………………..

ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम

हर्फ बने जब उठी दुआयें

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी

“यादें”

सीमा गुप्ता

बहुत रुला जाती हैं , दिल को जला जातीं हैं ,
नीदों मे जगा जाती हैं , कितना तड़पा जातीं हैं ,
“यादें” जब भी आती हैं ”

भीगे भीगे अल्फाजों को , लबों पर लाकर ,
दिल के जज्बातों को , फ़िर से दोहरा जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं ”

खाली अन्ध्यारे मन के , हर एक कोने में ,
बीते लम्हों के टूटे मोती , बिखरा जाती हैं ,
“यादें जब भी आती है ”

हम पे जो गुजरी थी , उन सारी तकलीफों के ,
दिल मे दबे हुए , शोलों को भड़का जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं ”

कितना सता जाती हैं , दीवाना बना जाती हैं ,
हर जख्म दुखा जाती हैं , फिर तन्हा कर जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं”

प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़ल

नवम्बर 21, 2008

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प्राण शर्मा जी की एक ग़ज़लः

परखचे अपने उड़ाना दोस्तो आसां नहीं
आपबीती को सुनाना दोस्तो आसां नहीं

ख़ूबियां अपनी गिनाते तुम रहो यूं ही सभी
ख़ामियां अपनी गिनाना दोस्तो आसां नहीं

देखने में लगता है यह हल्का फुल्का सा मगर
बोझ जीवन का उठाना दोस्तों आसां नहीं

रूठी दादी को मनाना माना कि आसान है
रूठे पोते को मनाना दोस्तो आसां नहीं

तुम भले ही मुस्कुराओ साथ बच्चों के मगर
बच्चों जैसा मुस्कुराना दोस्तो आसां नहीं

दोस्ती कर लो भले ही हर किसी से शौक से
दोस्ती सब से निभाना दोस्तो आसां नहीं

आंधी के जैसे बहो या बिजली के जैसे गिरो
होश हर इक के उड़ाना दोस्तो आसां नहीं

कोई पथरीली जमीं होती तो उग आती मगर
घास बालू में उगाना दोस्तो आसां नहीं

एक तो है तेज पानी और उस पर बारिशें
नाव कागज़ की बहाना दोस्तो आसां नहीं

आदमी बनना है तो कुछ ख़ूबियां पैदा करो
आदमी ख़ुद को बनाना दोस्तों आसां नहीं

प्राण शर्मा

नाम लिखा था रेत पर – लावण्या शाह

नवम्बर 18, 2008

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नाम लिखा था रेत पर,
हवा का एक झोंका आया
आ कर, उसको मिटा गया!
हवाओं पे लिख दूँ हलके हाथों से दुबारा, क्या मैं, उनका नाम ?
ओ पवन, तू ही ले जा !
यह संदेसा मेरा उन तक, पहुंचा आ !
कह देना जा कर उनसे
तुम आए हो वहीँ से जो था, उनका गाँव !
तेरी भी तो कुछ खता, अरी बावरी पवन
कुछ पल को रूक जा !
रेतों से अठखेली कर, लुटाये तुने ,
मुझ बिरहन के पैगाम !
तू वापिस लौट के आना
मेरा भी पता बताना,
हाँ , साथ उन्हें भी लाना !
अब , इन्तेज़ार रहेगा तेरा ,
चूड़ी को, झूमर को,पायल को और बिंदी को !
मेरे जियरा से छाए बादलों के संग संग
सहमी हुई है आस !

– लावण्या

दीवाली के दीप जले – ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

अक्टूबर 27, 2008

दीपक की ज्योति की भांति आप सभी के जीवन भी सदैव उज्वलित रहें।
दीपावली के अवसर पर आप सब को शुभकामनाएं !

महावीर शर्मा

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‘दीवाली के दीप जले’ – रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

कालजयी शायर रघुपति सहाय श्रीवास्तव ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी की एक ग़ज़ल

दे रहा हूं जिसका शीर्षक हैः “दीवाली के दीप जले”। फ़िराक़ गोरखपुरी को उनकी

कृति ‘गुले-नग़मा’ के लिए १९६० में साहित्य अकादमी पुरस्कार और १९६९ में

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले

धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के
लहराये वो आंचल धानी दीवाली के दीप जले

नर्म लबों ने ज़बानें खोलीं फिर दुनिया से कहन को
बेवतनों की राम कहानी दीवाली के दीप जले

लाखों-लाखों दीपशिखाएं देती हैं चुपचाप आवाज़ें
लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले

निर्धन घरवालियां करेंगी आज लक्ष्मी की पूजा
यह उत्सव बेवा की कहानी दीवाली के दीप जले

लाखों आंसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार
कहता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले

कितनी मंहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आंसू
उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले

मेरे अंधेरे सूने दिल का ऐसे में कुछ हाल न पूछो
आज सखी दुनिया दीवानी दीवाली के दीप जले

तुझे खबर है आज रात को नूर की लरज़ा मौजों में
चोट उभर आई है पुरानी दीवाली के दीप जले

जलते चराग़ों में सज उठती भूके-नंगे भारत की
ये दुनिया जानी-पहचानी दीवाली के दीप जले

भारत की किस्मत सोती है झिलमिल-झिलमिल आंसुओं की
नील गगन ने चादर तानी दीवाली के दीप जले

देख रही हूं सीने में मैं दाग़े जिगर के चिराग लिये
रात की इस गंगा की रवानी दीवाली के दीप जले

जलते दीप रात के दिल में घाव लगाते जाते हैं
शब का चेहरा है नूरानी दीवाले के दीप जले

जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार
रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले

रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे
चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले

जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अंधेर
चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले

कितनी उमंगों का सीने में वक़्त ने पत्ता काट दिया
हाय ज़माने हाय जवानी दीवाली के दीप जले

लाखों चराग़ों से सुनकर भी आह ये रात अमावस की
तूने पराई पीर न जानी दीवाली के दीप जले

लाखों नयन-दीप जलते हैं तेरे मनाने को इस रात
ऐ किस्मत की रूठी रानी दीवाली के दीफ जले

ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है
धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले

बरस-बरस के दिन भी कोई अशुभ बात करता है सखी
आंखों ने मेरी एक न मानी दीवाली के दीप जले

छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज फ़िराक़ सुनाता है
ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले

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दीपा जोशी की दो कविताएं

अक्टूबर 6, 2008

नाम : दीपा जोशी
जन्मतिथि : 7 जुलाई 1970
स्थान : नई दिल्ली

शिक्षा : कला व शिक्षा स्नातक, क्रियेटिव राइटिंग में डिप्लोमा और रेडियो राइटिंग में PG.

कार्यक्षेत्र : भारतवर्ष के हृदय ‘दिल्ली’ में सूचना व प्रसारण मंत्रालय में कार्यरत।

मासिक पत्रिकाओं व हिन्दी दैनिक में कुछ लघु लेखों व कविताओं का प्रकाशन।

अंग्रेज़ी में कुछ रचनाओं का प्रकाशन।

अन्य रुचि : संगीत सुनना व गुनगुनाना
dineshdeepa@yahoo.com

ब्लॉगः अल्प विराम
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आँसू

ये सच है कि
ये आँसू हैं
हमारे दोस्त हर दम
कभी गम तो कभी खुशी से
कर देते है आँखें नम

करते कभी
इनकी नमी से
वफा का एहसास
दो चाहने वाले मन
तो कभी
बेरूखी पर किसी की
बह उठते
दुख का सागर बन

माना कि
ये हैं मूक
पर इनकी आहों में भी
असर होता है
बहें जब दुआऍ बनकर
खंजर भी बेअसर होता है

रखना सहेज कर इनको
ताउम्र साथ निभायेंगें
छोड़ देंगें साथ
जब सभी अपने
ये ही है जो बाँहों का सहारा देंगें
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अश्रु नीर

यह नीर नहीं
चिर स्‍नेह निधि
निकले लेन
प्रिय की सुधि

संचित उर सागर
निस्‍पंद भए
संग श्‍वास समीर
नयनों में सजे

युग युग से
जोहें प्रिय पथ को
भए अधीर
खोजन निकले

छलके छल-छल
खनक-खन मोती बन
गए घुल रज-कण
एक पल में

दीपा जोशी

प्राण शर्मा जी की दो रचनाएं

सितम्बर 21, 2008

प्राण शर्मा जी की दो रचनाएं :


प्राण शर्मा जी की रचनाएं पढ़ते हुए ऐसा लगने लगता है जैसे रचनाएं बोल रही हों।
प्राण जी एक दार्शनिक हैं और दर्शन जैसी गूढ़ रहस्यपूर्ण बातों को सरस और सरल
भाषा में लिखतें है जिससे पढ़ने वालों को समझने में परेशानी नहीं होती।
उनकी दो रचनाएं दे रहा हूं जिनमें दर्शन का व्यावहारिक पक्ष भी देखा जा सकता है
और उनका जीवन-दर्शन भी अन्तर्निहित हैः

पंछी

इस तरफ़ और उस तरफ़ उड़ता हुआ पंछी
जाने क्या क्या ढूंढता है मनचला पंछी।

छूता है आकाश की ऊंचाईयां दिन भर
सोच में डूबा हुआ इक आस का पंछी।

ढूंढता है हर घड़ी छाया घने तरू की
गर्मियों की धूप में जलता हुआ पंछी।

आ ही जाता है कभी सैयाद की ज़द में
एक दाने के लिए भटका हुआ पंछी।

बिजलियों का शोर था यूं तो घड़ी भर का
घोंसले में देर तक सहमा रहा पंछी।

था कभी आज़ाद औरों की तरह लेकिन
बिन किसी अपराध के बन्दी बना पंछी।

हाय री! मजबूरियां लाचारियां उसकी
उड़ न पाया आसमां में परकटा पंछी।

भूला अपनी सब उड़ानें, पिंजरे में फिर भी
एक नर्तक की तरह नाचा सदा पंछी।

बन नहीं पाया कभी इन्सान भी वैसा
जैसा बर्खुरदार सा बन कर रहा पंछी।

छोड़ कर तो देखिए इक बार आप इसको
फड़ फड़ा कर वेग से उड़ जाएगा पंछी।

देखते ही रह गई आंखें ज़माने की
राम जाने किस दिशा में उड़ गया पंछी।

-प्राण शर्मा

ग़ज़लः

ज़िन्दगी को ढूंढने निकला हूं मैं
ज़िन्दगी से बेख़बर कितना हूं मैं

चैन है आराम है हर चीज़ का
अपने घर में दोस्तों अच्छा हूं मैं

मुझ से ही क्यों भेद है मेरे ख़ुदा
हर किसी जैसा तेरा बंदा हूं मैं

मानता हूं आप सब के सामने
तजुरबों में दोस्तों बच्चा हूं मैं

क्यों भला अभिमान हो मुझ को कभी
दीये सा जलता कभी बुझता हूं मैं

-प्राण शर्मा