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सुकवि प्राण शर्मा की ‘सुराही’ – एक ईमानदार और स्वस्थ दिशा-बोधक कृति

जून 16, 2008

सुकवि प्राण शर्मा की ‘सुराही’ – एक ईमानदार और स्वस्थ दिशा-बोधक कृति

– डॉ० कुँवर बेचैन

भारतीय साहित्य में काव्य के क्षेत्र में मुक्तक परम्परा बहुत पुरानी है। कारण यह है कि प्रबंध काव्य में कवि को किसी बाहरी कथावस्तु पर आश्रित रह कर सृजन करना होता है जब कि मुक्तक काव्य में कवि को अपनी निजी अनुभूतियों को नितांत अपनी तरह व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होती है। प्रबंध में कवि को अपनी निजी अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिये भी कथावस्तु के किसी विशेष प्रसंग की तलाश करनी पड़ती। या कोई नया प्रसंग बनाना पड़ता है। मुक्तक में किसी मध्यस्थ की तलाश नहीं करनी पड़ती। उसमें तो यदि कोई मध्यस्थ होता भी है तो वह केवल शब्द ही होता है। लेकिन इनमे भी शब्द और अर्थ, शब्द और भाव, शब्द एवं विचार का सम्बंध शरीर और आत्मा एक साथ हैं। आत्मा ‘फुर्र’ हुई तो सरीर निष्प्राण रह जायेगा। इसी लिए मुक्तकों में भी सभी कावञ-विधाओं की कतरह शब्द औ भाव एक दूसरे में ऐसे गुंथे होते हैं जैसे शरीर और आत्मा।

इसी मुक्तक-परंपरा में दोहों, चतुष्पदियों, रुबाइयों तथा कवित्त-सवैयों का प्रमुख स्थान रहा है। लेकिन सभी में चतुष्पदियों का लेखन इतनी अधिक मात्रा में हुआ कि ‘मुक्तक’ शब्द के उच्चारण से ही किसी ‘चतुष्पदी’ का आभास होने लगता है। यही नहीं मुक्तक ‘चतुष्पदी’ का ही दूसरा नाम हो गया। भारत के मूल निवासी और अब इंगलैंड में रह रहे सुकवि श्री प्राण शर्मा इसी मुक्तक काव्य की परम्परा के प्रमुख कवि हैं। वैसे मुक्तकों में समान्यतः अलग-अलग विचारों को और अलग-अलग भावानुभूतियों को अलग-अलग मुक्तकों में कहा जाता है। यूं समझिये कि प्रत्येक मुक्तक की विषय-वस्तु अलग होती है। किंतु सुखद आश्चर्य है कि प्राण शर्मा जी ने अपनी चतुष्पदियों में एक ही विषय को विभिन्न कोणों से अभिव्यक्त किया है और उनके ये भाव-विचार जब शृंखलाबद्ध होकर उनके मुक्तकों में आते हैं तब इन मुक्तकों की क्रमबद्धता एक भाव-कथा या विचार-कथा बन जाती है और इस प्रकार उनकी मुक्तक-रचना मुक्तक काव्य का आनंद तो देती ही है, साथ ही प्रबंध-रचना के काव्य-सौंदर्य की ओर भी पाठक का ध्यान आकृष्ट करती है। उनका ‘सुराही’ काव्य इसका एक सन्दर और महत्वपूर्ण उदाहरण है।

यह सूचना देते हुए हर्ष होता है कि 14 जून 2008 के दिन ब्रिटेन की’हर मेजेस्टी महारानी एलिज़ाबेथ’ के जन्म-दिवस पर श्रीमती वन्दना सक्सेना पूरिया को ब्रिटिश ट्रेड एवं भारत में पूंजी निवेशन के लिए ओ.बी.ई (O.B.E) से सम्मानित किया गया जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए। श्रीमती पूरिया जी जानी मानी लेखिका श्रीमती उषा राजे सक्सेना और श्री के.बी.एल सक्सेना जी की सुपुत्री हैं। श्रीमती पूरिया जी का जीवनी संबंधी लेख आगामी पोस्टों में प्रकाशित किया जाएगा।
‘महावीर’ ब्लॉग परिवार की ओर से श्रीमती पूरिया जी को अनेकानेक बधाई।

‘सुराही’ में कवि ने ‘सुरा’ के महत्व को प्रतिपादित किया है, ऐसा लगता है किंतु सजग और सहृदय पाठक जानते हीहैं कि कवि यदि वास्तव में कवि है तो वह शुद्ध अभिधात्मक नहीं होता। वह लक्षणा, व्यंजना और प्रतीक आदि के महत्व को जानता है और इन सब का अन्योक्ति-परक प्रयोग भी करता चलता है। प्राण शर्मा के मुक्तक, विशेषकर सुराही के मुक्तक कुछ इसी प्रकार की अभिव्यक्ति-संपदा के मालिक हैं। ‘सुराही’ केवल सुराही नहीं है जिसमें केवल ‘सुरा’ ही भरी है वरन् वह ऐसी ‘सुरा’ है, ऐसी प्रेम-सुरा है, ऐसी भक्ति-सुरा है जिसके पीने से सारे छल-कपट एक तरफ हो जाते हैं औरपस सुरा को पीने वाला इन सबको एक किनारे करता हुआ अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होकर निरंतर प्रेम-सुधा बरसाता हुआ चलता रहता है और तब वह ‘राही’ नहीं ‘सु-राही’ बन जाता है, एक अच्छा राही जो घनानन्द की
भाषा में कह उठता हे –

‘अति सूधौ सनेह कौ मारग है
जहाँ नैकु सयानप, बांक नहीं।’

अतः श्री प्राण शर्मा का ‘सुराही’ काव्य ‘सुरा-ही’ नहीं हे वरन् वह ‘सु-राही’ है जो उनका अनुसरण कर रहा है जिन्होंने प्रेम का मार्ग दिखाया औरऐसे व्यक्तियों के लिये अनुकरणीय बन रहा है जो इस प्रेम-पथ पर आ खड़े हुए हैं। उनके लिये इस ‘सुराही’ का सोमरस उस शराब के तरह जो ठीक से पकी नहीं है, जलाने वाला नहीं है, ईर्ष्या-द्वेष में झुलसाने वाला नहीं है, झगड़ों में उलझाने वाला नहीं है वरन् वह ‘सोम’ (चन्द्रमा) की शीतलता और उसकीचाँदनी में स्नान कराने वाला रस हे। रस प्रत्येक इन्द्रिय की प्यास है और रस प्यास को तृप्त करता है, यदि वही जलाने वाला हो गया तो फिर वह रस कहाँ रहा? इसीलिये वह एक मुक्तक में यह कहते हैं –

बेतुका हर गीत गाना छोड़ दो
शोर लोगों में मचाना छोड़ दो
गालियां देने से अच्छा है यही
सोमरस पीना-पिलाना छोड़ दो

क्योंकि प्राण शर्मा जानते हैं कि जिसने ‘सोमरस’ पिया, जिसने प्रेम-रस का पान कर लिया वह भला गाली कैसे दे सकता है? झगड़ा कैसे कर सकता है? प्राण शर्मा के लिये तो ‘सोमरस’ ज़िनदगी का पर्याय है, आत्मा की अनुकृति है, ज्ञान का रूप है। यही नहीं वह मदभरे संगीत की छलकन और मदुर गान की अनुगूँज है जो तन-मन और आत्मा को नहलाने में सक्षम है। कवि ने ‘सुराही’ काव्य के प्रथम मुक्तक में यही घोषणा कर दी है –

ज़िन्दगी है, आत्मा है, ज्ञान है
मदभरा संगीत है औ’ गान है
सारी दुनिया के लिये यह सोमरस
साक़िया, तेरा अनूठा दान है

ज़िन्दगी सोमरस है, ज्ञान सोमरस है, संगीत और गान भी सोमरस हैं। एक-एक बूँद रस लेकर पीकर देखो तो …….। सारी व्यक्तिगत चिंताएँ काफ़ूर हो जायेंगी, ज़िन्दगी को जीने का सलीका आ जायेगा, आत्मा का परमात्मा-जगत में पदार्पण होने लगेगा, ज्ञान के आलोक में हम प्रकाशित होने लगेंगे, संगीत हमारे हृदय में नयी तरंगें भर देगा और गान हमें एक नयी ‘लय’ में ले जायेगा और ‘प्रलय’ से बचायेगा। यही संदेश है प्राण शर्मा की ‘सुराही’ का। जैसे मधुशाला में शराब पिलाने वाल ‘साक़िया’ है और पीने वाले रिंद हैं ऐसे ही संसार की मधुशाला में जो प्रेम छलकाने वाले हैं वे ‘साक़िया’ ही हैं और जो प्रेम पाकर झूमने वाले हैं वे ‘रिंद’ हैं।

सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विचार करें तो समाज में बड़ी वषमता हैं। कोई ऊंचा, कोई नीचा; कोई बहुत अमीर है, तो कोई बहुत निर्धन! कहने को ही ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ है। किंतु यदि ‘साक़ी’ सच्चा और ईमानदार है तो वह सबको बराबरी का दर्जा देगा। कवि ने ‘साक़ी’ के प्रतीक से आज के राजनितिज्ञों को दिशा-निर्देश देते हुए ये दितनी सुन्दर पंक्तियां कही हैं –

सबको बराबर मदिरा का प्याला आयेगा
इक जैसा ही मदिरा को बाँटा जायेगा
इसका ज़्यादा, उसको कम मदिरा ऐ साक़ी
मधुशाला में ऐसा कभी न हो पायेगा

हमारे समाज में कितने ही लोग, लाखों-करोड़ों लोग अभी ऐसे हैं जिन्हें वह जीवन-स्तर नहीं मिला जिनके वे हक़दार हैं। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी आवश्यक आवश्यक्ताओं की पूर्ति करने से वे वंचित रहे। उनहें यदि कहीं शरण मिली भी तो वहां, जहां दीवारों पर ‘काले धब्बे’ थे, जैसे वे काले धब्बे न होकर उनके हिस्से में आया वह गहन अँधेरा था जिसे लोगों ने दुर्भाग्यवश ‘दुर्भाग्य’ की संज्ञा दी। जबकि इसमें भाग्य का इतना हस्तक्षेप नहीं था जितना कि उजालों के व्यवस्थापकों का। ईश्वर और भाग्य को दोष देकर उन्होंने आम आदमीका ध्यान अपने उस दुष्कृत्य से हटा दिया जिसके वास्तविक दोषी वे ख़ुद थे। इन्होंने अभावग्रस्त लोगों को केवल ‘मकड़ी के जाले’ दिये। ‘मकड़ी के जाले’ अर्थात समस्याओं का जाल दे दिया जिसमें वे उलझते चले गये। वही रोटी की समस्या। इस संसार की मधुशाला में जहाँ सब पर छलकना था, सबको बराबरी का दर्जा मिलना था, कहाँ मिला? साक़ी (राजनीतिज्ञों एवं व्यवस्थापकों) ने बाँटने में गड़बड़ी की, पक्षपात किया। कितने ही ‘मद्यप’ अपने ख़ाली गिलास लिये खड़े के खड़े रह गये। अभावग्रस्तों को कुछ नहीं मिला। उनके हिस्से में ‘काले धब्बे’ और ‘मकड़ जाल’ को तकते रहने की सज़ा मिली। सुकवि प्राण शर्मा ने इस व्यथा-कथा को बड़े ही सुन्दर शब्दों में सांकेतिक प्रतीकों में इस प्रकार कहा है कि देखते ही बनता है –

दीवारों पर धब्बे काले तकते-तकते
कोनों में मकड़ी के जाले तकते-तकते
इस निर्धन मद्यप ने दिल पर पत्थर रखकर
रात गुज़ारी खाली प्याले तकते – तकते

सचमुच प्राण शर्मा की यह कृति, उनके मुक्तक बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं और ‘चिंता’ को ‘चिणतन’ तक ले जाकर उसे इक सही दिशा देते हैं, ऐसी दिशा जहाँ केवल भाव या विचार कल्पना में ही न रह जाये, वरन् उसे कार्यान्वित करने का संकल्प हो और सब को ‘समभाव’ से देखने का मनोरथ हो। ऐसी स्वस्थ दिशा-बोधक कृति को जो आम आदमी की व्यथा-कथा कहते हुए उसके ‘शुभ’ की चिंता में निमग्न है, मेरा प्रणाम!

– २ एफ-५१, नेहरू नगर
ग़ाज़ियाबाद (उ०प्र०) भारत
फोनः ०१२०-२७९३०५७, २७९३२४८

प्रेषकः महावीर शर्मा
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पाठकों के रसास्वादन के लिए ‘सुराही’ के कुछ चुने हुए मुक्तक (क़ता) प्रस्तुत हैं : –

ज़िंदगी है, आत्मा है, ज्ञान है
मदभरा संगीत है औ’ गान है
सारी दुनिया के लिए ये सोमरस
साक़िया, तेरा अनूठा दान है

कौन कहता है कि पीना पाप है
कौन कहता है कि यह अभिशाप है
गुण सुरा के शुष्क जन जाने कहां
ईश पाने को यही इक जाप है।

क्या निराली मस्ती लाती है सुरा
वेदना पल में मिटाती है सुरा
मैं भुला सकता नहीं इसका असर
रंग कुछ ऐसा चढ़ाती है सुरा

क्या नज़ारे है छलकते प्याला के
क्या गिनाऊँ गुण तुम्हारी हाला के
जागते-सोते मुझे ऐ साक़िया
ख्वाब भी आते हैं तो मधुशाला के

साक़िया तुझको सदा भाता रहूं
तेरे हाथों से सुरा पाता रहूं
इच्छा पीने की सदा जिंदा रहे
और मयख़ाने तेरे आता रहूं

देवता था वो कोई मेरे जनाब
या वो कोई आदमी था लाजवाब
इक अनोखी चीज़ थी उसने रची
नाम जिसको लोग देते हैं शराब

मधु बुरी उपदेश में गाते हैं सब
मैं कहूं छुप-छुप के पी आते हैं सब
पी के देखी मधु कभी पहले न हो
खामियाँ कैसे बता पाते हैं सब

जब चखोगे दोस्त तुम थोड़ी शराब
झूम जाओगे घटाओं से जनाब
तुम पुकार उट्ठोगे मय की मस्ती में
साक़िया, लाता- पिलाता जा शराब

जब भी जीवन में हो दुख से सामना
हाथ साक़ी का सदा तू थामना
खिल उठेगी दोस्त तेरी जिंदगी
पूरी हो जाएगी तेरी कामना

बेझिझक होकर यहां पर आइए
पीजिए मदिरा हृदय बहलाइए
नेमतों से भरा है मधु का भवन
चैन जितना चाहिए ले जाइए

मैं नहीं कहता पियो तुम बेहिसाब
अपने हिस्से की पियो लेकिन जनाब
ये अनादर है सरासर ऐ हुज़ूर
बीच में ही छोड़ना आधी शराब

नाव गुस्से की कभी खेते नहीं
हर किसी की बद्दुआ लेते नहीं
क्रोध सारा मस्तियों में घोल दो
पी के मदिरा गालियां देते नहीं।

बेतुका हर गीत गाना छोड़ दो
शोर लोगों में मचाना छोड़ दो
गालियां देने से अच्छा है यही
सोम-रस पीना-पिलाना छोड़ दो

प्रीत तन-मन में जगाती है सुरा
द्वेष का परदा हटाती है सुरा
ज़ाहिदों, नफ़रत से मत परखो इसे
आदमी के काम आती है सुरा

बिन किए ही साथियों मधुपान तुम
चल पड़े हो कितने हो अनजान तुम
बैठकर आराम से पीते शराब
और कुछ साक़ी का करते मान तुम

ज़ाहिदों की इतनी भी संगत न कर
ना- नहीं की इतनी भी हुज्जत न कर
एक दिन शायद तुझे पीनी पड़े
दोस्त, मय से इतनी भी नफ़रत न कर

मस्तियाँ दिल में जगाने को चला
ज़िंदगी अपनी बनाने को चला
शेख जी, तुम हाथ मलते ही रहो
रिंद हर पीने- पिलाने को चला

दिन में ही तारे दिखा दे रिंद को
और कठपुतली बना दे रिंद को
ज़ाहिदों का बस चले तो पल में ही
उँगलियों पर वे नचा दें रिंद को

पीजिए मुख बाधकों से मोड़कर
और उपदेशक से नाता तोड़ कर
जिंदगी वरदान सी बन जाएगी
पीजिए साक़ी से नाता जोड़कर

मधु बिना कितनी अरस है जिंदगी
मधु बिना इसमें नहीं कुछ दिलक़शी
छोड़ दूं मधु, मैं नहीं बिल्कुल नहीं
बात उपदेशक से मैंने ये कही

मन में हल्की-हल्की मस्ती छा गई
और मदिरा पीने को तरसा गई
तू सुराही पर सुराही दे लुटा
आज कुछ ऐसी ही जी में आ गई

खोलकर आंखें चलो मेरे जनाब
आजकल लोगों ने पहने है नकाब
होश में रहना बड़ा है लाज़िमी
दोस्तों, थोड़ी पियो या बेहिसाब

ओस भीगी सी सुबह धोई हुई
सौम्य बच्चे की तरह सोई हुई
लग रही है कितनी सुंदर आज मधु
मद्यपों की याद में खोई हुई

मस्त हर इक पीने वाला ही रहे
ज़ाहिदों के मुख पे ताला ही रहे
ध्यान रखना दोस्तों इस बात का
नित सुरा का बोलबाला ही रहे

प्रेषकः महावीर शर्मा

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उषा राजे सक्सेना – एक संवेदनशील कहानीकार

जून 4, 2008

उषा राजे सक्सेना – एक संवेदनशील कहानीकार

नेहरू सैंटर, लंदन में ३० मई २००८ उषा राजे सक्सेना की कहानी संग्रह
‘वह रात और अन्य कहानियां’ के लोकार्पण के समय पर पढ़ा गया लेखः
– प्राण शर्मा

हिंदी कहानी में कुछ दशकों से कई रूप बदले हैं। उसे कभी नई कहानी, कभी प्रतीकात्मक कहानी, कभी सक्रिय कहानी, कभी सचेतन कहानी, कभी समांतर कहानी, कभी अकहानी और कभी प्रयोगवादी कहानी न जाने कितने आंदोलनों से गुज़रना पड़ा है। एक ऐसा वक़्त भी आया जब कहानी में अन्तर्वस्तु जैसा कुछ नहीं था। न कथानक और न ही किस्सागोई। यदि उसमें कुछ था तो केवल बौद्धिकता और दुरूहता। पठनीयता, मार्मिकता, गठन और सम्प्रेषणीयता जो कहानी के मुख्य गुण हैं, कहानी के एक सिरे से ही गायब हो गये। इसके अभाव में कहानी भटके हुए मुसाफ़िर की तरह लगने लगी। पाठक बस या ट्रेन में अपने सफ़र को सुखद बनाने के लिए बुकस्टाल से कहानी पत्रिका खरीदता लेकिन पढ़ने को उसे नीरस और दिलउबाऊ कहानियां मिलती। कहानीकार यह भूल गया कि कहानी वह होती है जिसमे पढ़ने वाली कोई बात हो, कोई किस्सा हो जो पढ़ने वाले को बांध ले।वह कहानी ही क्या जो मन को छू न सके। कहानी पढ़ कर लगने लगा कि जैसे कहानीकार ने कहानी पाठक की सन्तुष्टि के लिए नहीं बल्कि अपनी सन्तुष्टि के लिए लिखी है। परिणाम यह निकला कि कहानी पाठक से दूर हो गई और पाठक कहानी से दूर हो गया।

सुखद की बात यह है कि कुछेक सालों से कहानी में फिर से सजीवता आयी है। कहानी लेखक ऐसे-ऐसे विषय लेकर आ रहे हैं जिसमें कथावस्तु है, किस्सा गोई है। थोथे प्रयोगों के बोझ से मुक्त हो कर कहानी फिर से सांस लेने लगी है।

जीवंत विषयों को अपनी कहानियों में ढालने वाली ऐसी ही एक सशक्त कहानीकार हैं – उषा राजे सक्सेना। हाल ही में सामयिक प्रकाशन ने इनका कहानी संग्रह प्रकाशित किया है। कहानी संग्रह का नाम है – ‘वह रात और अन्य कहानियां’। संग्रह में दस कहानियां हैं, सब की सब मन को छूने वाली। वे हिंदी कथा साहित्य में लिखी जा रही अच्छी कहानियों से कतई कम नहीं हैं। सच तो यह है कि वे अंग्रेजी कथा साहित्य में लिखी जा रही अच्छी कहानियों से भी कतई कम नहीं है। ‘एलोरा’, डैडी’, ‘तीन तिलंगे’, ‘वह रात’ आदि कहानियों ने उषा राजे सक्सेना को उच्च श्रेणी के कहानीकारों में ला खड़ा किया है। जादू वह जो सर पर चढ़ कर बोलता है। उषा राजे सक्सेना की कहानियां सर पर चढ़ कर बोलती ही नहीं बल्कि दिल की गहराइयों में उतरती भी हैं।

उषा राजे सक्सेना ने लगन, परिश्रम और अभ्यास के बलबूते पर जो ऊंचा स्थान हिंदी कथा साहित्य में बनाया है, वह बहुत ही कम कहानीकार बना पाते हैं। चंद सालों में अच्छी से अच्छी कहानी देना उषा राजे सक्सेना की एक बड़ी उपलब्धि है। कुछ साल
पहले ही मैंने इनकी एक कहानी – ‘एक मुलाकात’ पढ़ी थी। कहानी क्या थी – एक जीतीजागती संवेदना थी। हालात पत्थर दिल को भी मोम जैसा बना देते हैं – कहानी का थीम था। कहानी का सजीव चित्रण मैं आज भी नहीं भूला हूं। आज भी वह मेरे मन पर अंकित है।

उषा राजे सक्सेना आज एक ऐसी कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कथा साहित्य को नयी से नयी कथावस्तु दी है, नयी से नयी भाषा दी है, नये से नये मुहावरे दिये हैं और नया सा नया शिल्प दिया है। इनकी कहानियों के विषय प्रायः यू.के. से जुड़े हुए हैं, मतलब यह है कि इनकी कहानियां ब्रिटेन के हर तबके के आदमी के जीवन का लेखा-जोखा है। इनकी कहानियों में ब्रिटेन के हर तबके के आदमी का सुख-दुख और उनकी आशा-निराशा है। ब्रतानवी परिवेश में लिखी गयी जितनी कहानियां इनकी हैं शायद ही किसी अन्य कहानीकार की हों।

‘एलोरा’ कहानी में जहां समाज में सर उठाकर चलने वाली एलोरा जैसा कैरेक्टर है ‘शर्ली सिम्पसन शतुरमुर्ग है’ कहानी में वही जीवन के सुख-दुख से समझौता करने वाली शर्ली सिम्पसन जैसा कैरेक्टर है। ‘सलीना तो शादी करना चाहती थी’ कहानी में जहां एक दूजे के लिए सलीना और बुखारी का त्याग है ‘रिश्ते’ कहानी में वही ज़िद्दी बाप-बेटी का बिछुड़ना और पुनर्मिलन है। ‘डैडी’ कहानी में जहां बरसों बाद मिले बाप-बेटी का सुखद संवाद है ‘अस्सी हूरें’ कहानी में वहीं आतंकवाद से उपजा दुखांत है। ‘तीन तिलंगे’ कहानी में जहां भविष्य को सुधारने का संकल्प करने वाले डोल मनी पर निर्वाह कर रहे तीन तिलंगों की आपबीती है ‘वह रात’ कहानी में वहीं दौलत के लिए एंजला की हवस है और मां की ममता को तरसते हए एनिस औ मार्क की छटपटाहट है।

‘वह रात —-‘ कहानी संग्रह की सभी कहानियों के पीछे उषा राजे सक्सेना का व्यापक अनुभव है। ढेरों सामाजिक चैरिटेबल कार्य करना, समय-समय पर लम्बी-लम्बी पानी विश्वयात्रा पर निकलना, विश्व सभ्यता और संस्कृति के विवध पहुलुओं को जानना और समझना, लंदन बोरो आफ् मर्टन के स्कूलों में मनोविज्ञान पढ़ाना और हिंदी के प्रचार-प्रसार में हमेशा करिबद्ध होना ये सभी अनुभव उषा राजे सक्सेना के कहानी लेखन में देखे जा सकते हैं।

उषा राजे सक्सेना आज कथा साहित्य में ऐसे मुकाम पर हैं जिसको पाने के लिए हर कथाकार सदैव आकांक्षी रहता है। उषा राजे सक्सेना की सभी कहानियों के विषय भिन्न हैं। उनमें विविधता है। कहीं दोहराव नहीं है। जिस कहानीकार की एक कहानी उसकी दूसरी कहानी से मेल खाती है, वह कहानी ही क्या?

उषा राजे सक्सेना एक सशक्त कहानीकार हैं । इनकी कहानियां युग और परिवेश की सच्ची इहचान है। इनकी कहानियां पाठक से रिश्ता जोड़ती हैं, उनमें संवेदना जगाती हैं। उषा राजे की कहनियों में अर मानवीय संवेदना का समावेश है तो उसका एकमात्र कारण उषा राजे सक्सेना के स्वभाव का संवेदनाशील होना है। ऐसी संवेदनशील कहानीकार की कहानियों के बारे में विद्वान लेखक शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव का कथन कितना सटीक है -“ब्रिटेन में एक नयी ऊंचाई देने में जिन कलमों का उल्लेखनीय भूमिक रही है उनमें एक सशक्त कलम है – उषा राजे सक्सेना की कलम——। एक बहु सांस्कृतिक, उन्मुकत, सम्पन्न और गतिशील समाज में व्यक्ति की पीड़ा क्या होती है, उसका रीतापन क्या होता है, सम्बंधों का तीतापन क्या होता है, एकांत का सुख और दुख कया होता है इन्हें जानने और समझने के लिए उषा राजे सक्सेना की कहानियों को ग़ौर से पढ़ने की ज़रूरत है।”

अंत में, कहानियों के बारे में पद्य में मेरी संक्षिप्त टिप्पणी है –

हर कतरा पानी है
‘वह रात’ की पुस्तक का
हर शब्द कहानी है
हर राज़ को खोलता है
हर शब्द कहानी का
सर चढ़ कर बोलता है
प्राण शर्मा

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पुस्तकः वह रात और अन्य कहानियाँ
लेखिकाः उषा राजे सक्सेना
प्रकाशकः सामायिक प्रकाशन (श्री महेश भारद्वाज)
3320-21
जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज- नई दिल्ली, भारत
मोबाइल. 919811607086
मूल्य 5 पाउँड या 10 अमेरिकन डालर
भारत-200 रुपए

वैलंटाइन के अंतिम दिन

फ़रवरी 17, 2008

‘वैलंटाइन के अंतिम दिन’
महावीर शर्मा

वैलंटाइन कारागार की कोठरी में फ़र्श पर बैठा हुआ था। जीवन के अंतिम दिनों को गिनते हुए आने वाली मौत की कल्पना से हृदय की धड़कनों की गति को संभालना कठिन हो रहा था। बाहर खड़े लोग खिड़की की सलाखों में से फूल बरसा रहे थे, उसकी रिहाई के नारों से चारों दिशाएं गूंज रही थीं। उसी समय सैनिकों की एक टुकड़ी ने आकर बिना चेतावनी दिए ही इन निहत्थे लोगों पर डंडों की वर्षा कर, भीड़ को तितर बितर कर दिया।

वैलंटाइन गहरी चिंता में सिर को नीचे किए बैठा हुआ था। अचानक दरवाज़ा खुला तो देखा कि कारापाल एक युवती के साथ कोठरी के अंदर प्रवेश कर रहे थे। कारापाल ने वैलंटाइन को अभिवादन कर नम्रता के साथ कहा, ‘पादरी, यह मेरी बेटी जूलिया है। आप विद्वान हैं। आप धर्म, गणित, विज्ञान, अर्थ-शास्त्र जैसे अनेक विषयों के भंडार हैं। अपने अंतिम दिनों में यदि आप जूलिया को इस असीम ज्ञान का कुछ अंश सिखा सकें तो आजीवन आभारी रहूंगा। सम्राट क्लॉडियस की क्रूरता को कौन नहीं जानता, मैं उसके नारकीय निर्णय में तो हस्तक्षेप नहीं कर सकता किंतु आप जब तक इस कारागार में समय गुजारेंगे, उस समय तक आपकी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।’

वैलंटाइन की भीगी आंखें जूलिया की आंखों से टकराईं किंतु जूलिया के चेहरे के भाव-चिन्हों में कोई बदलाव नहीं आया। जेलर ने बताया कि जूलिया आंशिक रूप से अंधी है। उसे बहुत ही कम दिखाई देता है। अगले दिन की सांय का समय निश्चित होने के बाद जूलिया और जेलर चले गए। दरवाज़ा पहले की तरह बंद हो गया। इसी प्रकार जूलिया हर शाम वैलंटाइन से शिक्षा प्राप्त करती रही।

उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
“मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।”

यह घटना तीसरी शताब्दी के समय की है। रोमन काल में सम्राट क्लॉडियस द्वितीय की क्रूरता से दूर दूर देशों के लोग तक थर्राते थे। उसकी महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं था। वह चाहता था कि एक विशाल सेना लेकर समस्त संसार पर रोमन की विजय-पताका फहरा दे। उसके समक्ष एक कठिनाई थी। लोग सेना में भर्ती होने से इंकार करने लगे क्योंकि वे जानते थे कि क्लॉडियस की वजय-पिपासा कभी समाप्त नहीं होगी, सारा जीवन विभिन्न देशों में युद्ध करते करते समाप्त हो जाएगा। अपने परिवार और प्रिय-जनों से एक बार विलग होकर कभी भी मिलने का अवसरनहीं मिलेगा।

इसी कारण, क्लॉडियस ने रोम में जितने भी विवाह होने वाले थे , रुकवा दिए। शादियां अवैध करार कर दी गईं। पति या पत्नी शब्द का अब कोई अर्थ नहीं रहा। जनता में चिंता की लहर दौड़ गई। यदि कोई विवाह करता पकड़ा जाता तो उसके साथ विवाह सम्पन्न करने वाले पादरी को भी कड़ा दण्ड दिया जाता। युवक उनकी इच्छा के विरुद्ध सेना में भर्ती कर लिए गए। कितनी ही युवतियों ने अपने प्रियतम के विरह में मृत्यु को गले लगा लिया।

प्रथा के अनुसार लड़के और लड़कियां अलग रखे जाते थे। 14 फरवरी के दिन विवाह की देवी ‘जूनो’ के सम्मान में नगर के सब व्यवसाय बंद कर दिए जाते थे। अगले दिन 15 फरवरी को ‘ल्यूपरकेलिया’ का उत्सव मनाया जाता और सांय के समय रोमन लड़कियों के नाम कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर एक

प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

बड़े बर्तन में रख दिए जाते। युवक बारी बारी एक पर्ची निकालते और उत्सव के दौरान वह उसी लड़की का साथी बना रहता। यदि साझेदारी प्यार में बदल जाती तो दोनों चर्च में जाकर विवाह-बंधन में बंध जाते। क्लॉडियस के इस निराधार कानून के कारण ल्यूपरकेलिया का यह त्यौहार समाप्त होगया।

वैलंटाइन ने प्रेमियों के दिलों में झांक कर उनकी व्यथा को देखा था। जानता था कि हृदयहीन क्लॉडियस का यह कानून अमानवीय था, प्रकृति के प्रतिकूल था, सृष्टि यहीं रुक जाएगी! पादरी होने के नाते, वैलंटाइन सेंट मेरियस के सहयोग से इस कानून की अवेहलना करते हुए अपने चर्च में गुप्त-रूप से युवक और युवतियों के विवाह करवाते रहे।

एक अंधेरी रात में जब चंद्रमा अपनी चांदनी के साथ शयन कर रहा था, झंझावात के साथ मूसलाधार वर्षा ने मानो सारे नगर को डुबोने की ठान ली हो। सेंट मेरियस उस रात कार्यवश कहीं दूर चले गए थे। वैलंटाइन मोमबत्ती के धीमे से प्रकाश में एक युवक और युवती के विवाह की विधि संपूर्ण ही कर पाए थे, क्लॉडियस के सैनिकों के पदचाप सुनाई दिये। वैलंटाइन ने दोनों को चर्च के पिछले द्वार से निकालने का प्रयत्न किया किंतु जब तक सैनिक आ चुके थे, दोनों वर-वधू को को एक दूसरे से अलग कर दिया गया। वे दोनों कहां गए, उनका क्या हुआ, कोई नहीं जानता।

वैलंटाइन को कारागार में डाल दिया। उसे मृत्यु-दण्ड की सज़ा दी गई। उसके जीवन लीला की समाप्ति के लिए
१४ फरवरी सन् 270 ई० का दिन निश्चित कर दिया गया।

एक दिन पहले जूलिया वैलंटाइन से मिली, आंखें रो रो कर सूज गई थीं। इतने दिनों में दोनो के दिलों में पवित्र प्रेम की लहर पैदा हो चुकी थी। उसी लहर ने उसके मनोबल को बनाए रखा। जूलिया के इन आंसुओं में दृष्टि के विकार भी बह गए थे। उसकी आंखें पहले से अधिक देखने के योग्य हो गईं। दोनों एक दूसरे से लिपट गए। वैलंटाइन ने मोमबत्ती की लौ को देख कर कहा,’ जूलिया,शमा की इस लौ को जलाए रखना। मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। एक दिन क्लॉडियस स्वयं अपने ही बनाये हुए कानून के जाल में फंस जाएगा। प्रेम कभी किसी का दास नहीं होता।’

थोड़ी देर के पश्चात जेल के दो सैनिकों ने आकर पादरी को प्रणाम किया और आदर सहित जूलिया को घर पहुंचा दिया।

वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही।

ज़िंदगी की अंतिम रात वैलंटाइन ने कुछ कोरे कागज़ और एक कलम मंगवाए। कागजों में कुछ लिखता और फिर मोमबत्ती की लौ में जला देता। केवल एक कागज़ बचा हुआ था। उस कोरे कागज़ को आंखों से लगाया, फिर दिल के पास दबाए रखा। कलम उठाई, उस में कुछ लिखा और नीचे लिखा – “तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित।” उसकी आंखों से दो आंसू ढुलक गए जो जमीन पर न गिर कर उस प्रेम-पत्र में समा गए। प्रहरी को बुला कर कहा, ‘ मेरे मरने के बाद यदि इस पत्र को जूलिया तक पहुंचा दो तो मरने के बाद भी मेरी आत्मा आभारी रहेगी।” प्रहरी के नेत्र सजल हो उठे, कहने लगा, ‘पादरी, आप का जीवन बहुत मूल्यवान है। अभी भी मैं कोई उपाय सोचता हूं जिससे आप को कारागार से निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाए। इस शुभ-कार्य में मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है।’
वैलंटाइन ने रोक कर कहा, “मेरे इस कार्य में कायरता की मिलावट की बात ना करो। मेरे बाद अनेक वैलंटाइन पैदा होंगे जो प्रेम की लौ जलाए रखेंगे।” प्रहरी ने कागज़ लेकर गीली आंखों को पोंछते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया।

अगले दिन नगर-द्वार के पास, जो आज उसकी स्मृति में पोर्टा वैलटीनी नाम से विख्यात है, अनगिनित लोगों की भीड़ थी। जनता के चारों ओर सशस्त्र सैनिक तैनात थे। सैनिक वैलंटाइन को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ कर मृत्यु-मंच पर ले आए। लोगों के नारों से गगन गूंज रहा था, जमीन आंसुओं से भीग गई थी। उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
‘ मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।” भीड़ में किसी युवक ने भर्राये हुए स्वर में कहा, ‘इस हृदय-विदारक घटना को सुन कर कौन सा पत्थर-दिल इनसान होगा जो शोक, खेद और संताप रहित इस
उत्सव को मना सकेगा।’ साथ ही एक बूढ़े ने युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,’प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।’

वैलंटाइन को मंच पर रखे हुए तख्ते पर लिटा दिया गया। चार जल्लाद हाथों में भारी भारी दण्ड लिए हुए थे। पांचवे जल्लाद के हाथ में एक पैनी धार का फरसा था। दण्डाधिकारी ने ऊंचे स्वर में वैलंटाइन से कहा,

‘वैलंटाइन, तुमने रोमन विधान की अवेहलना कर लोगों के विवाह करवा कर सम्राट क्लॉडियस का अपमान किया है। यह एक बहुत बड़ा अपराध है, पाप है जिसके लिए एक ही सज़ा है – निर्मम मृत्यु-दण्ड! तुम यदि अपने अपराध को स्वीकार कर लो तो फरसे से एक ही झटके से तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा और तुम्हारी मौत कष्टरहित होगी। यदि अपना अपराध स्वीकार नहीं करोगे तो इस बेरहमी से मारे जाओगे कि मौत के लिए याचना करोगे पर वो सामने नाच नाच कर तुम्हारे अपराध की याद दिलाती रहेगी।”

वैलंटाइन के मुख पर भय के कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहे थे। उसने दृढ़तापूर्वक कहा,

‘ मैंने कोई अपराध नहीं किया है। दो प्रेमियों को विवाह-बंधन में जोड़ना मेरा धर्म है, पाप नहीं है।” चारों ओर से एक ही आवाज़ आ रही थी – “वैलंटाइन निर्दोष है।”

दण्डाधिकारी का इशारा देखते ही चारों जल्लादों ने दण्ड को घुमा घुमा कर वैलंटाइन को मारना शुरू कर दिया। दर्शकों की चीखें निकल गई, कुछ तो इस दृश्य को देख कर मूर्छित होगए। जनता के हाहाकार, क्रंदन और चीत्कार के शोर के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता था। एक बार तो जल्लादों के पाषाण जैसे हृदय भी पिघलने लगे। थोड़ी ही देर में सब समाप्त हो गया। वैलंटाइन का निर्जीव शव रक्त से रंगा हुआ था।
वैलंटाइन का शव रोम के एक चर्च में दफना दिया गया जो आज ‘चर्च आव प्राक्सिडिस’ के नाम से प्रसिद्ध है।

जूलिया में इतना साहस न था कि वह इस अमानवीय वीभत्स दृश्य को सहन कर सके। वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही। उसी समय कारागार के प्रहरी ने आकर जूलिया को वैलंटाइन का लिखा पत्र देते हुए कहा, ‘पादरी ने कल रात यह पत्र आपके लिए लिखा था।’
प्रहरी आंखों को पोंछता हुआ चला गया। जूलिया ने पत्र खोला तो वैलंटाइन के अमोल आंसू के चिन्ह ऐसे दिखाई
दे रहे थे जैसे वैलंटाइन की आंखें अलविदा कह रही हों। बार बार पढ़ती रही जब तक आंसुओं से पत्र भीग भीग कर गल गया। पत्र के अंत में लिखा थाः
‘तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित!’

*** *** *** *** *** *** ***
महावीर शर्मा

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“मेरा बेटा लौटा दो!!”

मार्च 28, 2007

“मेरा बेटा लौटा दो!!”-
(एक सत्य घटना पर आधारित कहानी)

महावीर शर्मा

लखनऊ में खटीक समुदाय की बस्ती से दूर जंगल में रामू की माँ चिलला चिल्ला कर दहाड़ रही थी, ” मेरा बेटा लौटा दो! मेरे रामू को लौटा दो!” रामू के बापू और साथियों ने जंगल का चप्पा चप्पा छान डाला, पर बालक का कोई पता नहीं चला। रामू की माँ का हाल बेहाल हो
रहा था। पति ने अपनी मैली सी धोती के पल्ले से आंखों से गिरते आंसुओं को पोंछा। पत्नी को
दिलासा दे कर,घर लौट आए।

रात हो चुकी थी। बाहर जरा सा भी खड़का सा सुनाई देता तो रामू की माँ दौड़ कर दरवाजे पर कहती ‘मेरा रामू आगया!” बस मृग-तृष्णा का छलावा दोनों के साथ खेल खेलता रहता।
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। रामू सारे दिन काम से थका हारा खटिया में लेट गया। आंखें बंद की तो उस भयानक रात की घटना किसी हॉरर फ़िल्म की तरह आंखों की पलकों के पीछे चल रही थी।

‘उमंगों से भरे वर्ष 1947 ने इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया था। इनसान का वीभत्स रूप भी देखा था। इनसान के मस्तिष्क, हृदय और आत्मा के बिगड़ते हुए संतुलन को भी देखा था। धर्म के नाम पर सीमा के दोनों ओर “हर हर महादेव” और “अल्लाह हू अकबर” के नारों
की गूंज में बालकों, स्त्रियों यहां तक बूढ़ों तक को निर्दयता से बलि दी जा रही थी। उसी वर्ष तो हमारे रामू ने इस लहू से भरी लाल रंग की धरती पर जन्म लिया था।

‘गरीबी की चादर ओढ़े इकलौते रामू के साथ सुख-दुख के मिले-जुले जीवन के दिन बीत रहे थे। रामू के भविष्य के लिए न जाने कितने मनसूबे बनाते थे। भौंरिया तो काम के समय भी रामू को सीने से चिपकाए रहती थी। रात को अपनी गोद में ही सीने से लगा कर सोती थी। यही झुग्गी हमारे महल से कम नहीं लगती थी जब आंगन में एक बरस के नन्हें से रामू की किलकारी में जीवन के सारे दुख समा जाते।

एक अंधेरी रात में हवा नें आंधी का रूप धारण कर लिया था। इस आंधी और किवाड़ के में हार जीत की बाज़ी लगी हुई थी। यूं तो ऐसी तेज़ हवाओं के तो हम आदी हो चुके थे। भौंरिया रामू को गोद में चिपकाए हुए सो गई थी। सारे दिन के जिस्म-तोड़ काम ने शरीर को इतना थका दिया था कि किवाड़ की खड़खड़ाहट और तेज़ हवा की सांय सांय भी हमारी नींद को उखाड़ ना सकी।

अचानक से किवाड़ खुले और एक ही झपट्टे में एक खूंख्वार भेड़िया रामू को गोद से छीन कर जंगल की ओर भाग गया। ये सब इतनी फुर्ती से हुआथा कि हम दोनों हड़बड़ा कर खड़े तक भी ना हो पाए थे। हम चीखने चिल्लाने लगे, दौड़ कर भेड़िये के पीछे भागे, शोर सुन कर
बस्ती के लोग अपनी लालटैन ले लेकर साथ हो लिए, पर भेड़िया रामू को ले कर दूर बीहड़ जंगल में लापता हो गया था।
भौंरिया तो बेटे के वियोग में पागल सी हो गई थी। हम दोनों हर रोज़ दूर दूर तक इस जंगल की कांटों भरी झाड़ियों को हटा हटा कर ढूंढते रहते, हाथ कांटों से लहूलुहान हो जाते थे। जितना प्रयत्न करते, सफलता उतनी ही दूर हो जाती। भौंरिया के धैर्य का बांध टूट गया। पागलों की
तरह जंगल में इधर उधर भाग भाग कर दहाड़ दहाड़ कर चिल्लाती -‘ अरे भेड़िये, मेरे लाल को वापस दे दे। तुझे मानस का मांस ही चाहिए ना? ले मैं सामने खड़ी हूं, मेरे अंग अंग को नोच कर खा जा पर मेरे रामू को लौटा दे!’साथ में आए मुखिया ने कहा, ‘ रामू की माँ! भेड़िये और मानव
का तो पुराना बैर है, रामू तो भेड़िये का कभी का आहार बन चुका होगा।’ भौंरिया फूट फूट कर रो पड़ी।’
**** **** ****
इस घटना को 6 वर्ष बीत गए। लोग रामू को भूल से गए। रामू के माँ और बापू ने दिल पर पत्थर रख अपनी रोज की दिनचर्या को सामान्य बनाने का प्रयत्न करते रहते।

दोनों काम से हारे थके सांय झुग्गी के बाहर बैठे हुए थे। रामू के बापू ने बीड़ी सुलगाई ही थी कि सामने वाली बुढ़िया लाठी टेकती हुई मुस्करा कर दोनों के सामने बैठ गई।
अरे, दोनों के लिए बड़ी खुसखबरी ले कर आई हूं। दुनिया चाहे ना माने पर मेरा दिल तो यही गवाही देवे है कि वह रामू ही है।’
दोनों सकते में आगए। कुछ क्षणों तक तो बुढ़िया का मुंह ही तकते रहे, कुछ समझ नहीं आ रहा था। रामू की माँ एक दम तेजी से कहने लगी,’ताई, पहेलियां मत बुझा, मेरा हिया फटा जा रहा है, साफ साफ बता कहां है वो?’
‘अरी मैं ठीक से बैठ तो जाऊं। रामू के बापू, जरा एक बीड़ी तो सुलगाइयो।’
बीड़ी का सुट्टा लगा कर बुढ़िया ने कहना शुरू किया,’ तू तो जाने ही है कि तेरा ताऊ अखबार बांच लेवे है। बता रहे थे कि छापे में लिखा था कि कुछ वकत हुआ, बलरामपुर के अस्पताल में एक बच्चा भरती हुआ है जिसकी चाल-ढाल, आदतें, हाव-भाव ही नहीं हाथ पैर तक के भी
भेड़िये की तरह हैं।’

दोनों सवेरे ही बलरामपुर के अस्पताल पहुंच गए। एक नर्स से बात हुई, अपनी दारुण-कथा सुनाई। नर्स उनके हाव-भाव को आंकने की कोशिश कर ही थी। दोनों रो रहे थे। दोनों को वहीं बैठा कर, अंदर जा कर डाक्टर को बताया कि एक दम्पति इस बालक के माता-पिता होने का दावा कर रहे हैं। नर्स ने यह भी कहा कि यह भी हो सकता है कि यह दोनों एक घड़न्त कहानी बना कर अखबार वालों से इस कहानी को भुनाने की कोशिश कर रहे हों।
डाक्टर ने दोनों को बुला कर सीधा प्रश्न किया, ‘तुम किस आधार पर कहते हो कि यह तुम्हारा ही बेटा है?” भौंरिया भावों के बहाव में रोती हुई कहने लगी, ‘डाक्टर जी, मेरा दिल कहता है कि वह मेरा रामू ही है।’ डाक्टर कुछ कहना चाह रहा था कि रामू के बापू ने कहा,
‘मालिक ! रामू के माथे पर जनम का निसान है और उसकी दाईं जांघ पर जनम का नीला निसान भी है।’डाक्टर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘जाओ, नर्स के साथ जाकर अपने रामू से मिल लो पर उससे सतर्क रहना।’

देखते ही भौंरिया की ममता उमड़ पड़ी। बालक को गले से लगा लिया। नर्स विस्मित हो गई कि वही रामू जिसको पकड़ने के लिए एक युद्ध सा करना पड़ता था,चुपचाप इस औरत के गले लगा हुआ था। रामू का बापू धोती के पल्ले से खुशी के आंसू पोंछ रहा था। अब ग़ौर से देखा तो दोनों का हृदय द्रवित हो गया। घुटनों और हाथों में गट्ठे पड़े हुए थे। गर्दन के पीछे दांतों के निशान थे। बोलने के नाम पर केवल भेड़ियों की तरह हुवा-हुवा करता। साथ ही रखे हुए कटोरे में मुंह डाल कर जानवरों की तरह ही पीता था। नर्स ने कहा,’ अब इसकी दवा का समय है, तुम बाहर बैठो, मैं अभी आती हूं। ‘

नर्स को दोनों ने 6 वर्ष पहली घटना विस्तार से सुनाई। नर्स का दिल भी पिघल सा गया। नर्स ने बताया,’1954 के इसी साल में थोड़े समय की बात है, इस बालक को लखनऊ के स्टेशन के थर्ड-क्लास वेटिंग-रूम में देखा गया था। लोग इस से डरते थे। बड़ी कठिनाई से इसे पकड़ कर
17 जनवरी को यहां लाया गया था।’
दोनों की उत्सुक्ता बढ़ रही थी, ‘वह कैसा लगता था उस वकत?’ नर्स जारी रही, ‘वह मानव की संगत पसंद नहीं करता था। हां, चिड़ियाघर में ले जाते तो भेड़ियों को देख कर उत्तेजित हो जाता था। खाने की वस्तुओं को टुकड़े टुकड़े कर डालता हे।हड्डियों को घंटों तक चबाता रहता था। इसी लिए डाक्टर कहते हैं कि लगता है इसे भेड़ियों ने पाला था। कोई भी नहीं कह सकता था वह किसी भी रुप से मानवीय हो। सिर पर गुथे हुए बाल जटाएं बन चुकी थीं, चारों हाथ पैरों से जानवरों की तरह ही चलता था। ज्यों ही कपड़े पहनाते तो फाड़ डालता। रात को भेड़ियों की तरह ‘हुवाने’ की आवाज़ें करता। हंसना तो जानता ही न था। हां, रात के समय उसकी आंखें चमकती थीं। मांस को दूर से ही सूंघ कर पहचान लेता था।’

‘जब वह आया था, कच्चा मांस और फल खाता था। अब यहां दूसरे रोगियों को देख देख कर पकाई हुई सब्जियां और रोटी भी खाने लगा है। बिजली के इलाज से इसे लाभ हुआ है। पहले हाथ पैरों को फैलाता तक नहीं था पर अब पहले से अच्छा है।’ दोनों सुन कर आंसुओं को थाम ना सके।
नर्स ने कहा, ‘उसका पूरा हाल ना ही सुनो तो अच्छा होगा। इसे तुम घर ले जाकर संभाल नहीं पाओगे। यहां देखभाल, दवा, इलाज की उचित व्यवस्था है। बस आकर जब भी चाहो, देख जाया करो।’ दोनों इस से सहमत थे।

रामू मानवीय गुणों को पूरी तरह स्वीकार ना कर पाया। मां बाप १४ वर्षों तक नियम पूर्वक अस्पताल में जाकर अपने ममत्व को सींचते रहे। रामू की हालत बिगड़ने लगी। दवा और इलाज का असर खत्म हो गया। 20 अप्रेल 1968 की रात रामू की अंतिम रात बन गई। कुछ
मानवीय और कुछ पशु-पालित भेड़ियों के गुणों का समन्वित रूप साथ ले कर आंखें हमेशा के लिए बंद कर ली।

बेटे की चिता से अस्थियां इकट्ठी की, भीगी आंखों से राख के पात्र को सीने से लगाया। जाकर उसी बीहड़ जंगल की हवा में अस्थि-विसर्जित करते हुए हुए कहा, “ऐ भेड़ियों, हम तुम्हारे ऋणी हैं। हमारे रामू को तुम्हीं ने तो पाला था!!”
महावीर शर्मा


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दिल की गीता

जनवरी 18, 2007

‘दिल की गीता’

महावीर शर्मा

dilkigeeta.jpgघूमते घामते एक पुरानी किताबों की दुकान के भीतर चला गया। शेल्फ़ पर एक उर्दू की किताब पर निगाह अटक गई जिसकी जिल्द भी काफी पुरानी सी थी। कवर पर उर्दू में लिखा था:

‘दिल’ की गीता
उर्दू नज़्म में
ख़्वाजा दिल मुहम्मद एम.ए.

खोल कर पृष्ठों को उलट-पलटता रहा और पुस्तक लेकर सीधे घर आगया।

श्रीमद्भगवद्गीता के अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं, किंतु उर्दू में एक मुस्लिम विद्वान शायर की लेखनी से सारे १८ अध्यायों के प्रत्येक श्लोक का नज़्म और शेर-ओ-शायरी में अनुवाद पढ़ कर स्तब्ध सा रह गया! इस पुस्तक के लेखक थे ‘ख़्वाजा दिल मुहम्मद’ एम.ए. जो स्वयं बड़े विद्वान थे, जिन्हें विभिन्न भाषाओं का ज्ञान था। वे लाहौर (जो अब पाकिस्तान में है) में ‘इस्लामिया कॉलेज के प्रिंसिपल थे। ‘दिल’ साहब श्रीमद्बगवद्गीता से बहुत प्रभावित थे। इसे पढ़ कर विदित होता है कि गीता किसी एक धर्म-विशेष की धरोहर नहीं है बल्कि यह ज्ञान-संग्रह सार्वभौमिक है। ख़्वाजा साहब इस पुस्तक लिखने से पूर्व वर्षों तक वाराणसी के विद्वानों से गीता के विषय पर विचार-विमर्ष करते रहे। यह पुस्तक १९४० में लिखी गई थी। पुस्तक के आरम्भ में लिखा हैः- “पंजाब गवर्नमेंट ने अज़राह-ए-अदब नवाज़ी “दिल की गीता” पर मुसन्निफ़ को एक हज़ार रुपये का दर्जा अव्वल का जलील अलक़दर अतय्या बतौर इनाम इनायत फ़रमाया है।” (उस समय १००० रुपयों का वर्तमान समय में कितना मूल्य होगा, इससे अनुमान लगा सकते हैं कि कुछ सरकारी नौकरियों में २० रुपए मासिक मिलते थे।)

‘दिल’ साहब की ‘गीता’ के प्रति कितनी श्रद्धा है, पृष्ठ ३ पर ‘इरफ़ान की फूलमाला’ में लिखते हैं:-

“श्रीमद्भगवद्गीता दुनिया की क़दीम रूहानी किताबों में बेनज़ीर अहमियत रखती है।……… इनसान क्या है, रूह क्या है, परमात्मा क्या है, भक्ति और विसाले-बारी क्योंकर हासिल हो सकते है। इनसान के फ़रायज़ क्या हैं, निष्काम कर्म यानी बेलोश अमल का क्या दर्जा है। यह इरफ़ानी मज़मून संस्कृत के सात सौ श्लोकों में बयान किया गया है। हर श्लोक मार्फ़त का रंगीन फूल है। इन्हीं सात सौ फूलों की माला का नाम गीता है। ये माला करोड़ों इनसानों के हाथों में पहुंच चुकी है लेकिन ताहाल इस की ताज़गी , इस की नफ़ासत, इस की खुश्बू में कोई फ़र्क़ नहीं आया। यह फूल उस बाग़ से चुने गए हैं जिस का नाम गुलशने-बक़ा है। जिसे हयात ने सींचा है और जिस पर हुस्न की उस मलका का राज है जिस का नाम है हक़ीक़त!
इस फूल की माला में अजब ख़ुश्बू है और इस ख़ुश्बू में अजब तासीर। इस माला को पहनों तो दिल ओ दिमाग़ पर लाहूती ताअसरात छा जाते हैं और कायनात के ज़र्रे ज़र्रे में आफ़ताब झलकने लगते हैं। हर ख़ार फूल बन जाता है और हर फूल फ़िरदौस-ए- निगाह-आलम तमाम तजल्लीगाहे-रब्बानी नज़र आने लगता है। ……..दिल पर एक रूहानी सकून छा जाता है। और इस फूल माला की हर पत्ती किताब-ए-इरफ़ान का वर्क़ बन जाता है। आओ आज हम भी इस किताबे इरफ़ान के चंद औराक़ का मुताअला करें शायद हक़ीक़त के कुछ रमोज़ हम पर भी रौशन होने लगें।”

आगे २८ पृष्ठों में गीता के अनुसार परमात्मा, उसकी प्रकृति, आत्मा, तनासुख़, मादी दुनिया (प्रकृति), नजात के तीन रास्ते-कर्म मार्ग (राहे-अमल), भक्ति-मार्ग (राहे-इश्क़ व मुहब्बत), ज्ञान मार्ग (राहे-इरफ़ान) और पैग़ाम-ए-अमल आदि को गीता के श्लोकों को नज़्म में बहुत ही सुंदर अंदाज़ में अभिव्यक्त किये गए हैं। इस पुस्तक की एक और विशेषता है कि संस्कृत में जिस प्रकार १८ अध्यायों में श्लोकों का क्रम है, ‘दिल’ साहब ने उस क्रम-व्यवस्था को क़ायम रखा है। यदि अन्यत्र कोई श्लोक (शेर) प्रयोग किया है तो अध्याय और श्लोक के अंक भी लिखे हैं, उदाहरणार्थः- ७।४ अर्थात श्लोक ७, अध्याय ४ । प्रतिदर्शित्र के रूप में ७०० श्लोकों में से कुछ उर्दू के श्लोक (नज़्म में) देखिएः

संस्कृत में:-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

उर्दू में:- ७।४
तनज़्ज़ुल पे जिस वक़्त आता है धर्म,
अधर्म आके करता है बाज़ार गर्म,
यह अंधेर जब देख पाता हूं मैं
तो इनसाँ की सूरत में आता हूं मैं।।

संस्कृतः
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

उर्दूः ४७।२
तुझे काम करना है ओ मर्दे कार,
नहीं उसके फल पर तुझे अख़्तयार,
किए जा अमल और ना ढूंढ उस फल,
अमल कर अमल कर, ना हो बेअमल।।

संस्कृतः
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।

उर्दूः २३। २
कटे गी न तलवार से आत्मा,
जलेगी कहां नार से आत्मा,
ना गीली हो पानी लगाने से ये,
ना सूखे हवा में सुखाने से ये।।

संस्कृतः
एषा तेऽभिहिता सांख्येबुद्धिर्योगेत्विमांशृण।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।

उर्दूः ३९।२
ये तालीम थी सांख के ज्ञान से,
समझ योग की बात अब ध्यान से,
अगर योग में तुझ को हो इनहमाक
तो कर्मों के बन्धन से हो जाए पाक।।

संस्कृतः
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

उर्दूः १३।३
निको कार खाएं जो यग का बचा,
गुनाहों से करते हैं ख़ुद को रिहा,
जो पापी ख़ुद अपनी ही ख़ातिर पकाएं,
तो अपने ही पापों का भोजन वो खाएं।।

संस्कृतः
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।

उर्दूः ७।७
सुन अर्जुन नहीं कुछ भी मेरे सिवा,
न है मुझ से बढ़ कर कोई दूसरा,
पिरोया है सब कुछ मिरे तार में,
कि हीरे हूं जैसे किसी हार में।।

संस्कृतः
प्रवृत्ति च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं विद्यते।।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।

उर्दूः ७-८।१६
खबासत के पुतले, उन्हें क्या तमीज़
यह करने की है वह ना करने की चीज़
ना सत उन के अंदर ना पक़ीज़ापन,
मअर्रा है शाइस्तगी से चलन।।

वह कहते हैं झूटा है संसार सब
ना इसकी है बुनियाद कोई ना रब,
करें मर्द ओ ज़न मिल के जब मस्तियां
इन्हीं मस्तियों से हों सब हस्तियां।।

‘दिल’ साहब ने ‘गायत्री मन्त्र’ का भी अनुवाद किया है जिसकी खुशवन्त सिंह ने बड़ी प्रशंसा की है।

महावीर शर्मा


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“ मुहब्बत ” ?महावीर शर्मा

नवम्बर 21, 2006

“ मुहब्बत ” ?

मुहब्बत लफ़्ज़ सुनते ही हर दिल में एक ख़याली बिजली सी कौंध जाती है।
शायरों ने अपने अपने अंदाज़ में मुहब्बत का इज़हार किया है। तो मुलाहज़ा फ़रमाइयेः

बहज़ाद साहब मुहब्बत की पहचान इस अंदाज़ में कराते हैं;

"अश्कों को मिरे लेकर दामन पर ज़रा जांचो,
जम जाये तो ये खूँ है, बह जाये तो पानी है।"

मुहब्बत और मजबूरी का दामन और चोली का साथ है। इस बारे में;

"मजबूरी-ए-मुहब्बत अल्लाह तुझ से समझे,
उनके सितम भी सहकर देनी पड़ी दुआएं।"

आगे वो कहते हैं कि इश्क़ का ख़याल इबादत में भी पीछा नहीं छोड़ताः

"अब इस को कुफ़्र कहूं या कहूं कमाल-ए-इश्क़
नमाज़ में भी तुम्हारा ख़याल होता है?"

मुब्बत की हद्द कहां तक पहुंच जाती हैः

"जान लेने के लिये थोड़ी सी ख़ातिर करदी,
रात मुहं चूम लिया शमा ने परवाने का।"

ग़ालिब का ये शेर तो आपके ज़हन में न जाने कितनी बार गुज़रा होगाः

"इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।

अर्श मलसियानी का ये शेर शायद पसंद आयेः

"तवाज़ुन ख़ूब ये इश्क़-ओ-सज़ाए-इश्क़ में देखा,
तबियत एक बार आई, मुसीबत बार बार आई।"

सवाल पैदा होता है कि 'मुहब्बत' है कौन सी बला?
इक़बाल साहब के इस शेर पर ग़ौर कीजियेगाः

"मुहब्बत क्या है? तासीर-ए-मुहब्बत किस को कहते हैं?
तेरा मजबूर कर देना, मेरा मजबूर हो जाना।"

और अदम साहब भी ढूंढते नज़र आते हैं;

"वो आते हैं तो दिल में कुछ कसक मालूम होती है,
मैं डरता हूं कहीं इसको मुहब्बत तो नहीं कहते!"

उन्हें तसल्लीबख़्श जवाब नहीं मिलाः

"ऐ दोस्त मेरे सीने की धड़कन को देखना,
वो चीज़ तो नहीं है,मुहब्बत कहें जिसे!"

कहते हैं कि इश्क़ अंधा होता है, लेकिन इससे भी आगे हैः

"इश्क़ नाज़ुक है बेहद,
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता।"

एक ज़माना था कि इश्क़ के मारों की ज़ुबान पर दाग़ साहब का ये शहर बेसाख़्ता निकल जाता थाः

दिल के आईने में है तसवीर-ए-यार,
जब ज़रा गर्दन झुकाई, देख ली।"

मेरे बांके जवान दोस्तो, इस शेर को ज़रूर याद रखनाः

"मुहब्बत शौक़ से कीजे मगर इक बात कहता हूं,
हर ख़ुश-रंग पत्थर गौहर-ओ-नीलम नहीं होता।"

और ये भी याद रखना जैसा कि इक़बाल साहब ने ताक़ीद की हैः

"ख़ामोश ऐ दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा,
अदब पहला क़रीना है मुहब्बत के क़रीनों में।"

आखिर में फ़ैज़ साहब के इस शेर के साथ ख़त्म करता हूं जिसमें मानो सारी कायनात एक तरफ़ और मुहब्बत ???

"और क्या देखने को बाक़ी है,
आपसे दिल लगा के देख लिया!"

महावीर शर्मा

हिमालय अदृष्य हो गया – महावीर शर्मा

जुलाई 4, 2006

“हिमालय अदृष्य हो गया!”

लेखकः महावीर शर्मा

सोमवार ११ सितम्बर,१८९३। अमेरिका स्थित शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन में गेरुए वस्त्र धारण किए हुए एक ३० वर्षीय भारतीय युवक सन्यासी ने, जिसके हाथ में भाषण के लिए ना कोई कागज़ था, ना कोई पुस्तक, चार शब्दों “अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों” से श्रोताओं को संबोधित कर चकित कर डाला। ७००० श्रोताओं की १४००० हथेलियों से बजती हुई तालियों से ३ मिनट तक चारों दिशाएं गूंजती रही। अमेरिका निवासी सदैव केवल “लेडीज़ एण्ड जेंटिलमेन” जैसे शब्दों से ही संबोधित किए जाते थे।
यह थे स्वामी विवेकानंद जिन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय आध्यात्मिक तत्वनिरूपण कर जन-समूह एवं विभिन्न धर्मों के ज्ञान-विद प्रतिनिधियों के मन को मोह लिया था। अंतिम अधिवेशन में वक्ताओं,विभिन्न देशों और धर्मों के प्रतिनिधियों , श्रोताओं का धन्यवाद देते हुए जिस प्रकार प्रभावशाली भाषण को समाप्त किया, लोग आनंद-विभोर हो उठे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू-धर्म केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही नहीं, अपितु इस में भी विश्वास करता है कि समस्त धर्म सत्य और यथा-तथ्यों पर आधारित हैं।
* * * * *
लगभग नौ वर्ष पश्चातशुक्रवार, ४ जुलाई १९०२ के दिन अमेरिका-निवासी १८५वां स्वतंत्रता-दिवस धूम-धाम से मनाते हुए २ लाख व्यक्ति शैनले-पार्क, पिट्सबर्ग में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का भाषण सुन रहे थे, उसी दिन जिस सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने ११ सितंबर १८९३ में अमेरिका में ज्ञान-दीप जला कर सत्य के प्रकाश से लोगों के ह्रदयों को आलोकित किया था—

भारत के पश्चिमी बंगाल के कोलकात्ता नगर के समीप हावड़ा क्षेत्र में हुगली नदी के दूसरे तीर पर स्थित बेलूर मठ में सूर्यास्त के साथ साथ स्वामी विवेकानंद सदैव के लिए नश्वर शरीर त्याग कर ‘महा-समाधि’ लेकर महा-प्रयाण की ओर अग्रसर थे।

स्वामी विवेकानंद प्रातः ही उठ गए थे। साढ़े आठ बजे मंदिर में जाकर ध्यान-रत हो गए। एक घण्टे के पश्चात एक शिष्य को कमरे के सारे द्वार और खिड़कियां बंद करने को कह कर लगभग डेढ़ घण्टे उस बंद कक्ष में भीतर ही रहे। लगभग डेढ़ घण्टे बाद माँ काली के भजन गाते हुए नीचे आगए। स्वामी जी स्वयं ही धीमी आवाज में कुछ कह रहे थेः “यदि एक अन्य विवेकानंद होता तो वह ही समझ पाता कि विवेकानंद ने क्या किया है। अभी आगामी समय में कितने विवेकानंद जन्म लेंगे।” पास में ही स्वामी प्रेमानंद इन शब्दों को सुन कर सतब्ध से रह गए। भोजन के पश्चात स्वामी जी प्रतिदिन की भांति ब्रह्मचारियों को ३ घण्टे तक संस्कृत-व्याकरण सिखाते रहे।
आज स्वामी जी के चेहरे पर किसी गंभीर चिंता के लक्षण प्रगट हो रहे थे। अन्य स्वामी तथा शिष्य-गण देखकर भी उनसे पूछ ना सके। सांय ४ बजे एक अन्य स्वामी के साथ पैदल ही घूमने चले गए। लगभग १ मील चल कर वापस मठ पर चले आए। ऊपर, अपने कक्ष में जाकर अपनी जप-माला मंगवाई। एक ब्रह्मचारी को बाहर प्रतीक्षा करने के लिए कह कर धयानस्थ हो गए। पौने आठ बजे एक ब्रह्मचारी को बुलाकर कमरे के दरवाज़े और खिड़कियां खुलवा कर फ़र्श पर अपने बिस्तर पर लेट गए। शिष्य पंखा झलते हुए सवामी जी के पांव दबाता रहा।
दो घण्टे के पश्चात स्वामी जी का हाथ थोड़ा सा हिला, एक हलकी सी चीख़ के साथ एक दीर्घ-श्वास! सिर तकिये से लुढ़क गया- एक और गहरा श्वास !! भृकुटियों के बीच आंखें स्थिर हो गईं। एक दिव्य-ज्योति सब के ह्रदयों को प्रकाशित कर, नश्वर शरीर छोड़ कर लुप्त हो गई।
शिष्य उनकी शिथिल स्थिर मुखाकृति देख कर डर सा गया। बोझल ह्रदय के साथ दौड़ कर नीचे एक अन्य स्वामी को हड़बड़ाते हुए बताया। स्वामी ने समझा कि स्वामी विवेकानंद समाधि में रत हो गए हैं। उनके कानों में श्री राम कृष्ण परमहंस का नाम बार बार उच्चारण किया, किंतु स्वामी जी का शरीर शिथिल और स्थिर ही रहा, उसमें कोई गति का चिन्ह नहीं दिखाई दिया।
कुछ ही क्षणों में डॉक्टर महोदय आगए। जिस सन्यासी ने अनेक व्यक्तियों के ह्रदयों में दैवी-श्वास देकर जीवन का रहस्य बता कर अर्थ-पूर्ण जीवन-दान दिया , आज उस भव्यात्मा के शरीर में डॉक्टर की कृत्रिम-श्वासोच्छवास में गति नहीं दे सकी। स्वामी विवेकानंद ३९ वर्ष, ५ मास और २४ दिनों के अल्प जीवन-काल में अन्य-धर्मान्ध व्यक्तियों द्वारा हिंदु-धर्म के विकृत-रूप के प्रचार से प्रभावित गुमराह लोगों को हिंदु-धर्म का यथार्थ मर्म सिखाते रहे।
स्वामी ब्रह्मानंद स्वामी जी के गतिहीन शरीर से लिपट गए। एक अबोध बालक की तरह फफक फफक कर रो पड़े। उनके मुख से स्वतः ही निकल पड़ाः
“हिमालय अदृष्य हो हो गया है!”
प्रातः स्वामी जी के नेत्र रक्तिम थे और नाक, मुख से हल्का सा रक्त निकला हुआ था।

तीन दिन पहले २ जुलाई को स्वामी जी ने निवेदिता को दो बार आशीर्वाद देकर आध्यात्मिकता का सत्य-रूप दिखाया था और आज वह उसी दिव्य-ज्योति में समाधिस्थ थी। कक्ष के दरवाजे पर थपक सुन कर ध्यानस्थ निवेदिता ने आंखें खोली और द्वार खोल दिया। एक ब्रह्मचारी सामने खड़ा हुआ था, आंखों में अश्रु निकल रहे थे। भर्राये हुए स्वर से बोला, “स्वामी जी रात के समय—” कहते कहते उसका गला रुंध गया, पूरी बात ना कह पाया। निवेदिता स्तब्ध सी शून्य में देखती रह गई जैसे अंग-घात हो गया हो। जिब्हा बोलने की चेष्टा करने का प्रयास करते हुए भी निश्चल रही। फिर स्वयं को संभाला और मठ की ओर चलदी।
स्वामी जी के शरीर को गोद में रख लिया। दृष्टि उनके शरीर पर स्थिर हो गई, पंखे से हवा देने लगी और उन्माद की सी अवस्था में वो समस्त सुखद घटनाएं दोहराने लगी जब स्वामी जी ने इंग्लैंड की धरती से निवेदिता को भारत की परम-पावन धरती में लाकर एक नया सार्थक जीवन दिया था।
मृत-शरीर नीचे लाया गया। भगवा वस्त्र पहना कर सुगंधित पुष्पों से सजा कर शुद्ध- वातावरण को बनाए रखने के लिए अगर बत्तियां जलाई गईं। शंख-नाद से चारों दिशाएं गूंज उठी। लोगों का एक विशाल समूह उस सिंह को श्रद्धाञ्जली देने के लिए एकत्रित हो गया। शिष्य, ब्रह्मचारी, अन्य स्वामी-गण, और सभी उपस्थित लोगों की आंखें अश्रु-भार संभालने में अक्षम थे। निवेदिता एक निरीह बालिका की भांति दहाड़ दहाड़ कर रो रही थी। उसने स्वामी जी के कपड़े को देखा और विषादपूर्ण दृष्टि लिए स्वामी सदानंद से पूछा, “क्या यह वस्त्र भी जल जाएगा ? यह वही वस्त्र है जब मैंने उन्हें अंतिम बार पहने हुए देखा था। क्या मैं इसे ले सकती हूं ? ”

स्वामी सदानंद ने कुछ क्षणों के लिए आंखें मूंद ली, और तत्पश्चात बोले,
“निवेदिता, तुम ले सकती हो। ”
निवेदिता सहम सी गई, ऐसा कैसे हो सकता था? वह यह वस्त्र एक याद के रूप में जोज़फ़ीन को देना चाहती थी। उसने वस्त्र नहीं लिया।

चमत्कार था या संयोग-कौन जाने ?

निवेदिता को जिस वस्त्र को लेने की इच्छा थी, जलती हुई चिता से उसी वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा हवा से उड़कर उसके पांव के पास आकर गिर पड़ा। वस्त्र को देख, वह विस्मित हो गई। छोटे से टुकड़े को श्रद्धापूर्वक बार बार मस्तक पर लगाया। उसने यह स्वमी जी का दिया हुआ अंतिम उपहार जोज़फ़ीन के पास भेज दिया जिसने दीर्घ काल तक उसे संजोए रखा।
उस चिता की अग्नि-शिखा आज भी स्वामी जी के अनुपम कार्यों में निहित, विश्व में भारतीय अंतश्चेतना, अंतर्भावनाशीलता और सदसद् विवेक का संदेश दे, भटके हुए को राह दिखा रही है!
“ईश्वर को केवल मंदिरों में ही देखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा ईश्वर उन लोगों से अधिक प्रसन्न होते हैं जो जाति, प्रजाति, रंग, धर्म, मत, देश-विदेश पर ध्यान ना देकर निर्धन, निर्बल और रोगियों की सहायता करने में तत्पर रहते हैं। यही वास्तविक ईश्वर-उपासना है। जो व्यक्ति ईश्वर का रूप केवल प्रतिमा में ही देखता है, उसकी उपासना प्रारंभिक एवं प्रास्ताविक उपासना है। मानव-ह्रदय ही ईश्वर का सब से बड़ा मंदिर है।”

महावीर शर्मा

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“हिन्दी का गला घुट रहा है!” महावीर शर्मा

दिसम्बर 8, 2005

“हिन्दी का गला घुट रहा है!”

अंग्रेज़ी-पुच्छलतारे नुमा व्यक्ति जब बातचीत में हिन्दी के शब्दों के अंत में जानबूझ कर व्यर्थ में ही ‘आ’ की पूंछ लगा कर उसका सौंदर्य नष्ट कर देते हैं , जब ‘ज़ी’ टी.वी. द्वारा इंगलैण्ड में आयोजित एक सजीव कार्य-क्रम में जहां लगभग १०० हिन्दी-भाषी वाद-विवाद में भाग ले रहे हों और एक हिन्दू भारतीय प्रौढ़ सज्जन जब गर्व से सिर उठा कर ‘हवन कुण्ड’ को ‘हवना कुंडा’ कह रहा हो तो
हिन्दी भाषा कराहने लगती है, उसका गला घुटने लगता है।

यह ठीक है कि अधिकांश कार्यवाही अंग्रेज़ी में ही चल रही थी किंतु अंग्रेज़ी में बोलने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें हिन्दी शब्दों को कुरूप बना देने का अधिकार मिल गया हो। वे यह भी नहीं सोचते कि इस प्रकार विकृत उच्चारण से शब्दों के अर्थ और भाव तक बदल जाते हैं। ‘कुण्ड’ और ‘कुण्डा’ दोनों शब्द भिन्न संज्ञा के द्योतक हैं।

” श्रीमान, सुना है यहां एक संस्था या केंद्र है जहां योग की शिक्षा दी जाती है, आप बताने का कष्ट करेंगे कि कहां है?”
” आपका मतलब है योगा-सैंटर?” महाशय ने तपाक से अंग्रेजी-कूप में से मण्डूक की तरह उचक कर “योग” शब्द का अंग्रेजीकरण कर ‘योगा’ बना डाला। यह बात थी दिल्ली के करौल बाग क्षेत्र की।
यह मैं मानता हूं कि रोमन लिपि में अहिन्दी भाषियों के हिन्दी शब्दों के उच्चारण में त्रुटियां आना स्वाभाविक है, किन्तु हिन्दी-भाषी लोगों का हमारी राष्ट्र-भाषा के प्रति कर्तव्य है कि जानबूझ कर भाषा का मुख मलिन ना हो। यदि हम उन शब्दों को अंग्रेज लोगों के सामने उन्हीं का अनुसरण ना करके शब्दों का शुद्ध उच्चारण करें तो वे लोग स्वतः ही ठीक उच्चारण करके आपका धन्यवाद भी करेंगे। यह मेरा अपना निजी अनुभव है।
कुछ निजी अनुभव यहां देने असंगत नहीं होंगे और आप स्वयं निर्णय कीजिए कि हम हिन्दी शब्दों के अंग्रेजीकरण उच्चारण में क्यों गर्वित होते हैं।

मैं इंग्लैण्ड के कोर्बी नगर में एक स्कूल में अध्यापन-कार्य करता था। उसी स्कूल में सांयकाल के समय बड़ी आयु के लोगों के लिए भी कुछ विषयों की सुविधा थी। अन्य विषयों के साथ योगाभ्यास की कक्षा भी चलती थीं जो हम भारतीयों के लिये बड़े गर्व की बात थी। यद्यपि मेरा उस विभाग से संबंध नहीं था पर उसके प्रिंसिपल मुझे अच्छी तरह जानते थे । योग की कक्षाएं एक भारतीय शिक्षक लेते थे जिन्होंने हिन्दी-भाषी उत्तर प्रदेश में ही शिक्षा प्राप्त की थी, हठयोग का बहुत अच्छा ज्ञान था और जहां तक याद है, उन्होंने श्री धीरेन्द्र स्वामी जी के ही किसी प्रशिक्षण-केन्द्र से हठयोग का प्रमाणपत्र प्राप्त किया था। मूझे भी हठयोग में बहुत रुचि थी, इसीलिए उनसे अच्छी जानपहचान हो गई थी। एक बार उन्हें किसी कारण एक सप्ताह के लिए कहीं जाना पड़ा तो प्रिंसिपल ने पूछा कि मैं यदि एक सप्ताह के लिए योग की कक्षा ले सकूं। पांच दिन के लिए दो घंटे प्रतिदिन की बात थी। मैंने स्वीकार कर कार्य आरम्भ कर दिया। २० मिलीजुली आयु के अंग्रेज पुरुष और स्त्रियां थीं। परिचय देने के पश्चात एक प्रौढ़ महिला ने पूछा, ” आज आप कौन सा ‘असाना’ सिखायेंगे?” मैं मुस्कुराया और बताया कि इसका सही उच्चारण असाना नहीं, ‘आसन’ कहें तो अच्छा लगेगा ।” उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, कहने लगीं ,” मिस्टर आनन्द ने तो ऐसा कभी भी नहीं कहा। वे तो सदैव ‘असाना’ ही कहा करते थे।” मैंने यह कहकर बात समाप्त कर दी कि हो सकता है मि० आनन्द ने आप लोगों की सुगमता के लिए ऐसा कह दिया होगा। महिला ने शब्द को सुधारने के लिए कई बार धन्यवाद किया। मूल कार्य के साथ जितने भी आसन, मुद्राएं और क्रियायें उन्होंने आनन्द जी के साथ सीखी थीं, उनके सही उच्चारण भी सुधारता गया। प्रसन्नता की बात यह थी कि वे लोग हिन्दी के उच्चारण बिना किसी कठिनाई के बोल सकते थे। ‘त’ और ‘द’ बोलने में उन्हें आपत्ति अवश्य थी जिसको पचाने में कोई आपत्ति नहीं थी। जब आनन्द जी वापस आकर अपने विद्यार्थियों से मिले तो अगले दिन मुझे मिलने आए और हंसते हुए कहने लगे,” यह कार्य तो मुझे आरम्भ में ही कर देना चाहिये था। इसके लिए धन्यवाद!”

श्री अर्जुन वर्मा हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेज़ी के अच्छे ज्ञाता हैं। गीता तो ऐसा कहिये कि जैसे सारे १८ अध्याय कण्ठस्थ हों । लंदन की एक हिन्दू-संस्था के एक विशेष कार्य-क्रम के अवसर पर “श्री मद्भगवद्गीता” पर भाषण दे रहे थे । भारतीय, अंग्रेज़ और यहां तक कि ईरान के एक मुस्लिम दम्पति भी श्रोताओं में उपस्थित थे । स्वाभाविक है, अंग्रेज़ी भाषा में ही बोलना उपयुक्त था।
“माई नेम इज़ अर्जुन वर्मा…..” (Arjun Verma). गीता के विषयों की चर्चा करते हुए सारे पात्र अर्जुना, भीमा, नकुला, कृश्ना, दुर्योधना, भीष्मा, सहदेवा आदि बन गए। विडम्बना यह है कि वे स्वयं अर्जुन ही रहे और गीता के अर्जुन अर्जुना बन गए। बाद में जब भोजन के समय अकेले में मैंने इस बात पर संक्षिप्त रूप से उनका ध्यान आकर्षित किया तो कहने लगे “ये लोग गीता अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं तो उनके साथ ऐसा ही बोलना पड़ता है।” मैंने कहा,”वर्मा जी आप तो संस्कृत और हिन्दी में ही पढ़ते हैं।” वर्मा जी ने हंसते हुए यह कहकर बात समाप्त कर दी, ” मैं आपकी बात पूर्णतयः समझ रहा हूं, मैं आपकी बात को ध्यान में रखूंगा।”

अपने एक मित्र का यह उदाहरण अवश्य देना चाहूंगा। बात, फिर वही लन्दन की है। आप जानते ही हैं कि “हरे कृष्ण” मंदिर विश्व के कोने कोने में मिलेंगे जिनका सारा कार्य-भार विभिन्न देशों के कृष्ण-भक्तों ने सम्भाला हुआ है। गौर वर्ण के लोग भी अपनी पूरी सामर्थ्यानुसार अपना योग देरहे हैं। मेरे मित्र (नाम आगे चलकर पता लग जायेगा) इस मंदिर में प्रवचन सुनकर आए थे। मैंने पूछा, ” भई आज किस विषय पर चर्चा हो रही थी। हमें भी इस ज्ञान-गंगा में यहीं पर गोता लगवा दो।”
कहने लगे, “आज सूटा के विषय में ,…” मैंने बीच में ही रोक कर पूछा,”भई, यह सूटा कौन है?” कहने लगे,” अरे वही, तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे जानते ही नहीं। दिल्ली में मेरी माता जी जब हर माह श्री सत्यनारायण की कथा करवातीं थी, तुम हमेशा आकर सुनते थे। कथा के पहले ही अध्याय में सूटा ही तो…” मैंने फिर रोक कर उनकी बात टोक दी, “अच्छा, तुम श्री सूत जी की बात कर रहे हो!” फिर अपनी बात सम्भालते हुए कहने लगे, “यार, ये अंग्रेज़ लोग उन्हें सूटा ही कहते हैं।”
मैंने फिर कहा,” देखो, तुम्हारा नाम ‘ अरुण ‘ है, यदि कोई तुम्हारे नाम में ‘आ’ लगा कर ‘अरुणा’ कहे तो यह पसंद नहीं करोगे कि कोई किसी अन्य व्यक्ति के सामने तुम्हारे नाम को इस प्रकार बिगाड़ा जाए, तुम्हें ‘नर’ से ‘नारी’ बना दे। तुम उसी समय अपने नाम का सही उच्चारण करके सुधार दोगे ।”
यह तो मैं नहीं कह सकता कि अरुण को मेरी बात अच्छी लगी या बुरी किंतु वह चुप ही रहे।

मैंने कहीं भी रोमन अंग्रेज़ी लिपि में या अंग्रेज़ी लेख आदि में मुस्लिम पैग़म्बर और पीर आदि के नामों के विकृत रूप नहीं देखे। कहीं भी हज़रत मुहम्मद की जगह ‘हज़रता मुहम्मदा’ या ‘रसूल’ की जगह ‘रसूला’नहीं देखा गया। मुस्लिम व्यक्ति की तो बात ही नहीं, किसी पाश्चात्य गौर वर्ण के व्यक्ति तक को ‘मुहम्मदा’ या ‘रसूला’ बोलते नहीं सुना। कारण यह है कि कोई उनके पीर, पैग़म्बर के नामों को विकृत करके मुंह खोलने वाले का मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होने से पहले ही सीधा कर देते हैं।

कभी मैं सोचता हूं , ऐसा तो नहीं कि एक दीर्घ काल तक गुलामी सह सह कर हमारे मस्तिष्क को हीनता के भाव ने यहां तक जकड़ लिया है कि कभी यदि वेदों पर चर्चा होती है तो ‘मैक्समुलर’ के ऋग्वेद के अनुवाद के उदाहरण देने में ही अपनी शान समझते हैं।

नेता, फिल्मी कलाकार, निर्माता, निर्देशक आदि यहां तक कि जब वे भारतीयों के लिए भी किसी वार्ता में दिखाई देते हैं, तो हिन्दी में बोलना अपनी शान में धब्बा समझते हैं। शाहरुख खान अपने सिने-जीवन के प्रारम्भिक दिनों में टी.वी. साक्षात में भारतीय भाषा में ही उत्तर देते हुए दिखाई देते थे किंतु आज तो ऐसा लगता है कि उर्दू या हिन्दी तो उनके लिए किसी सुदूर अनभिज्ञ देश की भाषा है। वैसे मैं इस युवक कलाकार को कला के क्षेत्र और जीवन के अन्य क्षेत्रों में आदर की दृष्टि से देखता हूं।

यह देखा जा रहा है कि हर क्षेत्र में व्यक्ति जैसे जैसे अपने कार्य में सफलता प्राप्त करके ख्याति के शिखर के समीप आजाता है, उसे अपनी माँ को माँ कहने में लज्जा आने लगती है।

भारत में बी.बी.सी. संवाददाता पद्म भूषण सम्मानित सर मार्क टली एक वरिष्ट पत्रकार हैं। उन्हें उर्दू और हिन्दी का अच्छा ज्ञान है। भारतीयों का हिन्दी भाषा के प्रति उदासीनता का व्यवहार देख कर उन्होंने कहा था, “… जो बात मुझे अखरती है वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेज़ी का विराजमान ! क्योंकि मुझे यकीन है कि बिना भारतीय भाषाओं के ‘भारतीय संस्कृति’ जिंदा नहीं रह सकती। दिल्ली में जहां रहता हूं, उसके आसपास अंग्रेजी पुस्तकों की तो दर्जनों दुकानें हैं, हिन्दी की एक भी नहीं । हकीकत तो यह है कि दिल्ली में मुश्किल से ही हिन्दी पुस्तकों की कोई दुकान मिलेगी ।”

लज्जा आती है कि एक विदेशी के मुख से ऐसी बात सुनकर भी ख्याति के शिखर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सफलकारों के कान में जूं भी नहीं रेंगती।

लोग कहते हैं कि हमारे लोग दूसरे देशों के नेताओं से अंग्रेजी में इसलिए बात करते हैं क्योंकि वे हिन्दी नहीं जानते। मैं यही कहूंगा कि रूस के व्लाडिमिर पूटिन, फ्रांस के जेक्स शिराक, चीन के ह्यू जिन्ताओ और जर्मनी के होर्स्ट कोलर आदि कितने ही देशों के नेता जब भी दूसरे देशों में जाते हैं तो गर्व से भाषांतरकार को मध्य रख अपनी ही भाषा में बातचीत करते हैं। ऐसा नहीं है कि ये लोग अंग्रेजी से अनभिज्ञ हैं किंतु उनकी अपनी भाषा का भी अस्तित्व है।

हिन्दी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग होना चाहिये या नहीं, इस विषय पर आगामी सप्ताहों में इसी चिट्ठे पर विभिन्न लोगों के विचारों को व्यक्त करने का प्रयास करूंगा । आपकी प्रतिक्रियाएं अमूल्य निधि स्वरूप होंगी।
महावीर शर्मा


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हिमालय की गोद में

नवम्बर 17, 2005

हिमालय की गोद में!

हिमालय की गोद में ऊंची ऊंची पर्वत-शृंखलाओं से आच्छादित, अपनी प्राकृतिक विरासत को सहेजे हुए, नयनाभिराम दृश्यों की नैसर्गिक छटा से अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम, नेपाल के खुम्बू क्षेत्र में ४०० लोगों की जनसंख्या का ऊंचाई पर एक छोटा सा खेती-प्रधान गांव है ‘ फोर्त्से ‘।
टॉनी फ्रीक, न्यू बार्नेट, इंगलैंड के ६८ वर्षीय रिटायर्ड को सौंदर्य मन को अभिभूत कर देने वाले इस छोटे से गांव ने पहली ही भेंट में ऐसा1.Tony Freake.JPG मोह-पाश में जकड़ा कि सेवा-निवृत्ति के पश्चात १७ वर्षों में २५ बार वहां जाकर प्रकृति-दर्शन की पिपासा बुझाता रहा।
टॉनी सेवा-निवृत्ति से पहले किंग्ज़ कालेज, लन्दन में हैड आव फ़िज़िक्स लैबॉरट्रीज़ के पद पर कार्य-रत था।
इन रमणीय दृश्यावलियों और शहरों से अछूते निःस्वार्थ ग्रामीणों की सादगी और प्यार के अतिरिक्त देखने को ज्यादा कुछ नहीं है पर टॉनी के लिये यह स्वर्गीय आनंद प्राप्ति से कम ना था।
सन् १९८८ में रिटायर होने के पश्चात उसे हिमालय की वादियों और अनछुई ऊंची ऊंची पहाड़ियों में ट्रैकिंग की पुरानी दबी हुई आकांक्षा को पूरी करने का अवसर मिल गया। नेपाल-भ्रमण के मध्य, एक स्थानीय गाइड के आग्रह से फोर्त्से ग्राम को देखने के लिये चल दिया। चार दिनों की दुर्गम ऊबड़-खाबड़ चढ़ाई पहाड़ों की अनुपम धरोहर नज़ारों ने इस श्रमसाध्य यात्रा को भी सुगम बना दिया। गांव को देखकर वह मंत्रमुग्ध हो, स्तब्ध सा खड़ा रह गया। गाइड मुस्कुराते हुए उसके चेहरे के भावों को देखता रहा।
टॉनी का यह ग्राम-प्रेम क्षणभंगुर नहीं था। उसने गांव की भलाई के लिये अपनी आयु और अन्य उपलब्ध साधनों से क्षमतानुसार बहुत कार्य किया। दो दशकों से भी कम अवधि में उसने जो कार्य किया, बड़ा सराहनीय है।
गांव में शिक्षा और चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं थी। गांव में एक स्कूल, एक मैडिकल सैंटर और ग्राम-अध्यापक के लिये एक घर बनवा दिया। गांव में पानी का उचित प्रबंध नहीं था। गांव ऊंचाई पर था। वहां तक पाइप-सिस्टम देकर गांव के इतिहास में एक और पन्ना जोड़ दिया।
आठ वर्षों तक वह योजनाओं की सफलता के प्रयास में गांव के गहन अंधकार में तेल के दीये के प्रकाश में काम करता रहा। गांव में बिजली नहीं थी जिसको यहां तक पहुंचाना बड़ा कठिन कार्य था। जहां चाह है, वहां राह भी मिल जाती है। भारत में निर्मित एक टर्बाइन मंगवाकर निकटवर्ती नदी पर स्थापित किया। गांव में वायरिंग आदि द्वारा लाने का काम भी सफलतापूर्वक संपन्न हो गया।
एक दिन सांयकाल के समय, उसने लोगों को इकट्ठा किया और एक ऊंचे स्थान पर खड़ा हो गया। अपने हाथों को फैलाकर चारों ओर घूमता हुआ बोला,

“लैट देयर बी लाइट!” (Let there be light! )

उसके साथी ने बिजली का स्विच दबा दिया और बरसों के टिमटिमाते दीयों को विदा किया। थोड़े समय के बाद लोगों ने यह चमत्कार भी देखा कि एक बटन के दबाते ही स्कूल, चिकित्सालय और अन्य स्थानों का अंधकार एक क्षण में ही चमकते प्रकाश में लुप्त हो जाता है। साधारण ग्रामीण धनाढ्य नहीं थे। उन्हें कम बिजली खर्च करने वाले बल्ब (energy-saving light bulbs)भी उपलब्ध होने लगे जिसमें १५ वॉट्स का बल्ब ७५ वॉट्स का प्रकाश देते हैं। लोगों को यह बिजली सस्ते दामों में दी जाती है। टॉनी फ्रीक को इस गांव से जो प्यार और प्रकृति की सुषमा का निर्बाध रसपान मिला है, उसने एवज में अपने अथाह परिश्रम के रूप में गांव को यह अनुपम प्रेमोपहार दिया।

टॉनी कहता है, मैं चाहे बार्नेट में रहता हूं पर मेरा दिल नेपाल में रहता है।

*************************

महावीर शर्मा



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साबरमती आश्रम – सर्व-धाम !

अक्टूबर 2, 2005
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आज गांधी-जयंती पर श्रद्धेय बापू को शत् शत् नमन!

१९६३ में संस्था के कार्य-वश ‘साबरमती आश्रम’ में दो दिवस के लिये रहने का स्वर्णिम शुभ अवसर मिला था। यह कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि जो शांति और आध्यात्मिक अनुभव इन दो दिनों में मिला वह कितने ही विख्यात मंदिरों और तीर्थों में नहीं मिल सका। उस समय कोई उत्सव या पर्व नहीं था तो वातावरण बहुत ही शांतमय और सुखद था।
महात्मा गांधी जब अपने २५ साथियों के साथ दक्षिणी अफ्रीका से भारत लौटे तो २५ मई १९१५ को अहमदाबाद में कोचरब स्थान पर ” सत्याग्रह आश्रम ” की स्थापना की गई। दो वर्ष के पश्चात जुलाई १९१७ में आश्रम साबरमती नदी के किनारे पर बनाया गया जो बाद में साबरमती आश्रम के नाम से कहलाता है। यह ३६ एकड़ ऐसी खाली भूमि थी जहां सांपों की भरमार थी किंतु उन्हें मारने की आज्ञा नहीं थी। १९६३ में ४६ वर्ष के बाद भी मैंने स्वयं सांयकाल बाहर घूमते हुए एक छोटे से सर्प को देखा जो मेरी चप्पल के पास से उछलता हुआ गुजर गया। मेरे साथी ने बताया कि यह पद्म-सर्प था जो उछल कर व्यक्ति के माथे तक पहुंच सकता है।
‘सत्याग्रह-आश्रम’ के बाद उसे ‘हरिजन-आश्रम’ का नाम दिया गया। आश्रम के दो उद्देश्य थे – एक तो ‘सत्य’ की खोज और दूसरा अहिंसात्मक कार्य-कर्ताओं का गुट तैयार करना। ये लोग देश की स्वतंत्रता के लिये अहिंसा-प्रणाली का अनुसरण करते हुए कार्यान्वित रहे।
महात्मा गांधी जी ने १२ मार्च १९३० को साबरमती आश्रम से ही दांडी मार्च आरम्भ किया था। २४१ मील की दूरी करके ५ अप्रैल १९३० को दांडी पहुंचे और अगले दिन नमक-क़ानून तोड़ कर स्वतंत्रता संग्राम में एक नया अध्याय जोड़ दिया। जनता में एक नया जोश उमड़ गया।
बापू जी ने आश्रम में १९१५ से १९३३ तक निवास किया। जब वे साबरमती में होते थे, एक छोटी सी कुटिया में रहते थे जिसे आज भी “ह्रदय-कुञ्ज” कहा जाता है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से अमूल्य निधि है जहां उनका डेस्क, खादी का कुर्ता, उनके पत्र आदि मौजूद हैं। ‘ह्रदय-कुञ्ज’ के दाईं ओर ‘नन्दिनी’ है। यह इस समय ‘अतिथि-कक्ष’ है जहां देश और विदेश से आए हुए अतिथि ठहराए जाते थे। वहीं ‘विनोबा कुटीर’ है जहां आचार्य विनोबा भावे ठहरे थे। गांधी जी की अनन्य अनुयायी और शिष्या मीरा बहन जो एक ब्रिटिश एडमिरल की पुत्री थी, उस के नाम पर ‘मीरा कुटीर’ भी कहलाई जाती है।
‘ह्रदय कुञ्ज’ और ‘मगन कुटीर’ के मध्य का खुला स्थान ‘उपासना मंदिर’ था। ‘मगन कुटीर’ में आश्रम के प्रबंधक श्री मगन लाल गांधीmy message -gandhi.jpg रहा करते थे। ‘उपासना मंदिर’ में प्रार्थना के बाद प्रश्न – उत्तर के लिये समय दिया जाता था।
१० मई १९६३ में प. जवाहर लाल नेहरू जी द्वारा ‘आश्रम में ‘गांधी संग्रहालय’ का प्रतिष्ठापन किया गया। इसमें ५ कक्ष, पुस्तकालय, २ फ़ोटो गैलरी और श्रोत-कक्ष (आडिटोरियम) हैं। ‘माई लाईफ़ इज़ माई मैसेज’ गांधी जी के जीवन पर एक प्रदर्शनी आयोजित है। एक पुरा-अभिलेखागार (archive) स्थापित किया गया है जिसमें गांधी जी के ३४०६६ पत्र, ८६३३ हस्तलिखित लेख, ६३६७ फ़ोटो के नेगिटिव, उनके लिखित लेखों की माइक्रोफ़िल्म की १३४ रीलों में सुरक्षित हैं। गांधी जी की स्वतंत्रता-संग्राम की फ़िल्में हैं। पुस्तकालय में ३०,००० पुस्तकें, गांधी जी को भेजे हुए १५५ पत्र और अन्य वस्तुएं जैसे सिक्के, डाक-टिकट आदि हैं। पुस्तकों की संख्या समयानुसार बढ़ती रहती ही होगी। इस संग्रहालय में २०’ x २०’ के ५४ कक्ष हैं। सभा-मंडप और श्रोता-कक्ष का उपयोग फ़िल्में और विडियो देखने के लिये होता है। संग्रहालय प्रातः ८ बजे से सांय ७ बजे तक खुला रहता है।

आज मस्तिष्क सोचने को बाध्य हो जाता है कि बापू के आदर्शों का आज के युग में क्या स्थान है। उनके भारत का स्वप्न आज की राजनीतिक भ्रष्टाचारिक व्यवस्था , स्वार्थपरायण हिंसात्मक प्रणाली, जातिवाद में स्वप्नावस्था में ही लुप्त हो गया।
कितनी विडम्बना है!
जय भारत!
महावीर शर्मा

पताः साबरमती आश्रम, गांधी स्मारक संग्रहालय, गांधी आश्रम,
अहमदाबाद – ३८०००२७, भारत।

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