अगस्त 3rd, 2010 के लिए पुरालेख

यू.के. से नीरा त्यागी की लघुकथा

अगस्त 3, 2010

कन्वेयर बेल्ट पर उगता माटी का सोना…

नीरा त्यागी

फ्लाईट आये घंटे से ऊपर हो चला था पर उन दोनों का कहीं अता-पता न था… उनके आने की ख़ुशी में उसे ढाई सौ मील के सफ़र का पता न चला, पर अब मंजिल पर पहुँच कर एक-एक मिनट घंटो से कम नहीं… वो उसके घर पहली बार आ रहे थे… पिता को तो एतराज़ ना था किन्तु उनकी सरकारी नौकरी इजाज़त नहीं देती बेटी के घर महीने भर से ज्यादा रह सकें और माँ को उनका बेटी की माँ होना रोकता था.. चलो दोनों आने को तो राज़ी हुए महीने भर को ही सही…. जिन बातों को अब तक वह चिठ्ठी और फोन पर बताती रही है वो खुद देख लेंगे जैसे सूरज का धरती से अक्सर नाराज रहना और बादलों को धरती से हद से ज्यादा प्यार करना… हर मौसम में जमीन के हर कोने में घास का धूल-मिटटी को जकड़े रहना… टायरों की चीख के बीच शमशान की शांति का सड़कों पर पसरे रहना.. बेचारे गीले कपड़ों को धूप नसीब ना होना उनका लांड्री की मशीनों में भभकती भाप में झुलसना… पानी के लोटे का बाथरूम के फर्श को तरसना, लोटे से पानी उड़ेल खुल कर नहाने पर पाबन्दी होना… हवा की नमी को विंड स्क्रीन पर सेलोटेप की तरह चिपक जाना और स्क्रेपर के साथ मिल कर बेहूदा आवाज़ निकालना… गाड़ी का पेट भी उसमें से निकल कर खुद भरना.. अनजान बच्चों का सड़क पर चलते चलते “पाकी” बुला कर अभिनन्दन करना…यदि आप सही और गलत वक्त पर थंकयू और सारी न कह पाए तो प्यार भरी आँखों के तीर के दर्द को अपनी नासमझी समझ कर भूल जाना …

अब उसकी आँखे और कमर दोनों जवाब देने लगे थे … वो सभी यात्री आने बंद हो गए थे जिनके सूटकेस और बैग पर एरो फ्लोट के टैग हों… कहाँ हो सकते हैं टायलेट में भी इतनी देर तो नहीं लग सकती .. इन्क़ुआयिरी पर यह उसका तीसरा चक्कर था … वो फ्लाईट लिस्ट चेक कर के उसे बता चुके हैं उनका नाम लिस्ट में है… उसका संयम टूटने लगा और चिंता बढ़ने लगी थी…

वह समय की गंभीरता को हल्का-फुल्का बनाने और उसके माथे पर चिंता की लकीरों को गालों के गड्ढों में बदलने के लिए अपने होंठों को उसके कानो के नज़दीक ला धीरे से फुसफुसाया…

“वो कहीं रशिया में अपने दूसरे हनीमून के लिए तो नहीं उतर गए…” और ही.. ही करने लगा… उसने घूर कर उसकी ओर देखा… ऐसे अवसरों पर उसका सेंस आफ हयूमर उसे चूंटी की तरह काटता है “बिना उससे कुछ बोले वह इन्क़ुआयिरी की तरफ बढ़ गई…

वह इन्क़ुआयिरी पर गिडगिडा रही है क्या वह बैगेज क्लेम तक जाकर उन्हें देख आये.. अब डेढ़ घंटा हो चला था… वो एक स्कुरिटी स्टाफ के साथ उसे अन्दर भेजने के लिए तैयार हो गए … वह उसके आगे-आगे हो ली… डिपारचर लांज को पार कर साड़ी और पेंट, कमीज़, कोट में दो पहचाने चेहरों को ढूंढने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा, वैसे भी वो अकेले ही थे कन्वेयर बेल्ट के पास … कन्वेयर बेल्ट खाली थी, उनके सूटकेस ट्राली में थे … तभी उसे नजर आया कन्वेयर बेल्ट पर चावल का ढेर उग आया है जैसे ही वह ढेर उनके पास से गुजरता है … चार हाथ बढ़ कर उस ढेर को बेग में उड़ेल रहे हैं और इंतज़ार करते हैं. धरती के घूमने और सफ़ेद ढेर का फिर पास से होकर निकलने का… वह भाग कर पीछे से जाकर दोनों को बाहों भर लेती है वो तीनो एक दूसरे के कंधे भिगोते हैं…नाक से सू…..सू करते हुए मुस्कुराते हैं एक दूसरे को टीशू पास करते हैं माँ उसे ऊपर से नीचे तक देखती है और शिकायत करती है..

“तू ऐसी की ऐसी… ना सावन हरे ना भादों… लगता नहीं आखरी महीना है कभी तो लगे बिटिया …..” तभी सफ़ेद ढेर पास से गुजरता है वह भी हाथ बढ़ाती है … माँ पकड़ कर झिड़क देती है “ऐसी हालत में झुकना ठीक नहीं… तू बस खड़ी रह… बहुत थकी लगती है”..

पिता को कहती है सूटकेस उतार दो बैठने के लिए… वह माँ को क्या समझाए ऐसी हालत में वो यहाँ क्या नहीं करती…
” कहा था न इन्हें सूटकेस में भर लेते हैं” माँ शिकायत के लहजे में बोली..

“अरे! मैंने कौनसा मना किया था” पिता झल्ला कर बोले…

“अब क्या फरक पड़ता है वो बेग में थे या सूटकेस में” वो हमेशा की तरह दोनों के बीच रेफरी बनी
वो दोनों से जिद करती है वहां से चलने की ..

“रहने दो… माँ बहुत अच्छा बासमती चावल मिलता है यहाँ”…

“पर यह देहरादून का बासमती चावल है…”
वह सिक्योरिटी स्टाफ की तरफ देखती है, वो उसकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए सर हिलाते हुए मुड़ जाता है …
वह पहाड़ों के बीच घाटी में खड़ी है, उसके चारों तरफ धान के खेत हैं, वह मुस्कुराते हुए देखती रहती है चार हाथ बड़ी तमन्यता से अपनी माटी का सोना बेग में भर रहे हैं..

उनके हाथों से गुजर अनगिनित सफ़ेद दानों की महक उसके ज़हन में हमेशा के लिए बसने जा रही है…

नीरा त्यागी

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