अमेरिका से देवी नागरानी की दो लघुकथाएं

कड़वा सच

देवी नागरानी

सोच के सैलाब में डूबा रामू पेड़ के नीचे बुझी हुई बीड़ी को जलाने की कोशिश में खुद ठिठुर रहा था. दरवाज़े की चौखट पर घुटनों के बल बैठा अपनी पुरानी फटी कम्बल से खुद को ठिठुरते जाड़े से बचाने की कोशिश में जूझ रहा था, पर कम्बल के छोटे-बड़े झरोखे उनकी जर्जर हालत बयान करने से नहीं चूके.

“रामू यहाँ ठंडी में क्यों बैठे हो? अंदर घर में जाओ” गली के नुक्कड़ से गुज़रते हुए देखा तो उसके पास चला गया. रामू मेरे ऑफिस का चपरासी है.

“साहब अंदर बेटे-बेटी के दोस्त आये हुए हैं. गाना-बजाना शोर-शराबा मचा हुआ है. सब झूम-गा रहे हैं. इसलिए मैं बाहर….” कहकर उसने ठंडी सांस ली.

“तुम्हारी उम्र की उन्हें कोई फ़िक्र नहीं, रात के बारह बज रहे हैं और यह बर्फीली ठण्ड!”

“साहब दर्द की आंच मुझे कुछ होने नहीं देती अब तो आदत सी पड़ गयी है. पत्नी के गुज़र जाने के बाद बच्चे बड़े होकर आज़ाद भी हो गए हैं, बस गुलामी की सारी बेड़ियाँ उन्होंने मुझे पहना दी है. कहाँ जाऊं साहब?” कहकर वह बच्चों की तरह बिलख पड़ा.

मैंने उसका कंधा थपथपाते हुए निशब्द राहत देने का असफल प्रयास किया और सोच में डूबा था की अगर मैं उस हालत में होता तो !

“क्या उन्हें बिलकुल परवाह नहीं होती कि तुम उनके बाप हो? क्या कुछ नहीं किया तुमने और तुम्हारी पत्नी ने उन्हें बड़ा करने के लिए?”

” वो बीती बातें हैं साहब, ‘आज’ मस्त जवानी का दौर है, उनकी मांगें और ज़रूरतें मैं पूरी नहीं कर पाता, उनकी पगारें कर देती हैं. पैसा ही उनका माई-बाप है.”

“तो इसका मतलब हुआ, संसार बसाकर, बच्चों कि पैदाइश से उनके बड़े होने तक का परिश्रम, जिसे हम ‘ममता’ कहते हैं कोई माइने नहीं रखता?”

“नहीं मालिक! मैं ऐसा नहीं सोचता. दुनिया का चलन है, चक्र चलता रहता है और इन्हीं संघर्षों के तजुर्बात से जीवन को परिपूर्णता मिलती है. जीवन के हर दौर का ज़ायका अलग-अलग होता है. जो मीठा है उसे ख़ुशी से पी लेते हैं, जो कड़वा है उसे निग़ल तक नहीं सकते. बीते और आने वाले पलों का समय ही समाधान ले आता है. काल-चक्र चलता रहता है, बीते हुए कल की जगह ‘आज’ लेता है और आज का स्थान ‘कल’ लेगा. यही परम सत्य है और कड़वा सच भी.

देवी नागरानी

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दाव पर द्रोपदी

देवी नागरानी

कहते हैं चोर चोरी से जाए पर हेरा फेरी से न जाए. अनील भी कितने वादे करता, किए हुए वादे तोड़ता और जुआ घर पहुँच जाता, अपनी खोटी किस्मत को फिर फिर आज़माता. बस हार पर हार उसके हौसले को मात करती रही.

एक दिन अपनी पत्नी को राज़दार बनाकर उसके सामने अपनी करतूतों का चिट्ठा खोलकर रखते हुए कहाँ- “अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है जो मैं दाव पर लगा सकूँ. क्या करूँ? क्या न करूँ, समझ में नहीं आता. कभी तो लगता है खुद को ही दाव पर रख दूँ.”

पत्नी समझदार और सलीकेदार थी, झट से बोली- “ आप तो खोटे सिक्के की तरह हो, वो जुआ की बाज़ार में कॅश हो नहीं सकता ? अगर आपका ज़मीर आपको इज़ाज़त देता है तो, आप मुझे ही दाव पर लगा दीजिए. इस बहाने आपके किसी काम तो आऊंगी.”

अनील सुनकर शर्म से पानी पानी हो गया. और इस तरह के कटाक्ष के वार से खुद को बचा न पाया. हाँ, एक बात हुई. ज़िंदगी की राह पर सब कुछ हार जाने के बाद भी, जो कुछ बचा था उसे दाव पर हार जाने से बच गया.

देवी नागरानी

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8 Comments »

  1. 1

    दोनो लघुकथायें बहुत अच्छी लगी उनकी कलम हम जैसे लोगों के कमेन्ट की मोहताज नही वो हमेशा ही अच्छा लिखती हैं उन्हें बधाई

  2. 2

    दोनों ही लघुकथाएं बेहतरीन हैं… दोनों ही सीख देती हुईं हैं.. देवी नागरानी मैम को बधाई और आपका आभार सर..

  3. वाह…दोनों ही कथाएं प्रेरणाप्रद अतिसुन्दर हैं…
    बहुत बहुत आभार..

  4. 4
    ashok andrey Says:

    Devi Nagrani jee jee ki pehli laghu kath bahut hii marmik v asardaar trike se prastut kee gai hai dil ko gehre chhu jaati hai hum log aaj apne bude maa-baap ko kis tarah se thukraa dete hai aur doosri katha samajik burai par gehri chot karti hai inn bahtareen laghu katha ke liye badhai deta hoon.

  5. devi jee
    apki laghu katha pad kar bahut achchha laga. aap bharat se door america men hindi ka parcham fahra rahin hain. rachnatmak lekhan ke liye badhai.
    Dr Maharaj Singh parihar
    www-vichar-bigul-blogspot.com
    pariharms57@gmail.com
    mobile. 09411404440

  6. 6

    देवी नागरानी जी की दोनों लघुकथाओं को पढ़ा. कडुआ सच में जहाँ आज की निर्मम पीढ़ी पर पैना कटाक्ष है तो दाव पर द्रोपतीमें नारी को सहज रूप में लेखिका ने ऊंचा और सही स्थान दे दिया है.दोनों ही लघु कथाएं गंभीर विषयों का सहज निर्वहन कर रही हैं इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि कडुआ सच लघु कथा में’ विलख पड़ने के बाद’ विस्तारकि आवश्यकता नहीं थी. यदि लघुकथा वहीँ समाप्त हो जाती तो कहीं अधिक मारक होती .लेकिन यह अधिकार तो लेखक का होता है इस लिए मेरी बात पर आप ध्यान न दें और सुन्दर रचनाओं के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें.महावीर जी को धन्यवाद.

  7. 7
    sudha arora Says:

    ” Kadwa Sach ” & ” Daanv par Draupadi ” — donon laghukathayen abhi padheen . Devi didi , Badhayee ! mujhe maloom nahin tha ki aap apni likhi ghazalon ko apni behad sureeli aawaaz me gaane ke saath itni achchhi laghkathayen bhi likhati hain !
    sudha .

  8. Aadarniya Devi bahan humesha samaj ka sach , apnee Gazalon mei ya katha kahaneeyon mei ujagar kartee rahee hain – dono kahaniyaan samaj ka Iyina dikhlatee bahut pasand aayeen

    Badhayee aap sabhee ko —

    sa sneh, sadar,
    – Lavanya


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