मई 25th, 2010 के लिए पुरालेख

आयरलैंड (यू.के.) से दीपक चौरासिया “मशाल” की दो लघुकथाएं

मई 25, 2010

दीपक चौरसिया ‘मशाल’
२४ सितम्बर सन् १९८० को उत्तर प्रदेश के उरई जिले में जन्मे दीपक चौरसिया ‘मशाल’ की प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के ही कोंच नामक स्थान पर हुई. बाद में आपने जैव-प्रौद्योगिकी में परास्नातक तक शिक्षा अध्ययन किया और वर्तमान में आप उत्तरी आयरलैंड (यू.के.) के क्वींस विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. शोध में संलग्न हैं. १४ वर्ष की आयु से ही आपने साहित्य रचना प्रारंभ कर दी थी. लघुकथा, व्यंग्य तथा निबंधों से प्रारंभ हुई. आपकी साहित्य यात्रा धीरे-धीरे कविता, ग़ज़ल, एकांकी तथा कहानियाँ तक पहुँची. साहित्य के अतिरिक्त चित्रकारी, अभिनय, पाक कला, समीक्षा निर्देशन तथा संगीत में आपकी गहरी रूचि है. तमाम पत्र-पत्रिकाओं में आपकी विविध विधाओं की रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं. आपकी कविताओं में जहाँ एक ओर प्रेम की सहज संवेदना अभिव्यक्ति होती है वहीं सामाजिक सरोकार और विडम्बनाओं के प्रति कचोट स्पष्ट भी दिखाई देती है.
इसी वर्ष आपकी कविताओं का संग्रह “अनुभूति” शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है.

पुस्तक के लिए नीचे लिखे पते पर संपर्क कीजिए:
शिवना प्रकाशन
P.C. Lab, Samrat Complex Basement,
Opp. New Bus Stand, Sehore, M.P. 466001, India.
Phone: +91-9977855399, +91-7562405545
E mail: shivnaprakashan@gmail.com

शनि की छाया
दीपक ‘मशाल’

पूजा के लिए सुबह मुँहअँधेरे उठ गया था वो, धरती पर पाँव रखने से पहले दोनों हाथों की हथेलियों के दर्शन कर प्रातःस्मरण मंत्र गाया ‘कराग्रे बसते लक्ष्मी.. कर मध्ये सरस्वती, कर मूले तु…..’. पिछली रात देर से काम से घर लौटे पड़ोसी को बेवजह जगा दिया अनजाने में.

जनेऊ को कान में अटका सपरा-खोरा(नहाया-धोया), बाग़ से कुछ फूल, कुछ कलियाँ तोड़ लाया, अटारी पर से बच्चों से छुपा के रखे पेड़े निकाले और धूप, चन्दन, अगरबत्ती, अक्षत और जल के लोटे से सजी थाली ले मंदिर निकल गया. रस्ते में एक हड्डियों के ढाँचे जैसे खजैले कुत्ते को हाथ में लिए डंडे से मार के भगा दिया.

ख़ुशी-ख़ुशी मंदिर पहुँच विधिवत पूजा अर्चना की और लौटते समय एक भिखारी के बढ़े हाथ को अनदेखा कर प्रसाद बचा कर घर ले आया. मन फिर भी शांत ना था…

शाम को एक ज्योतिषी जी के पास जाकर दुविधा बताई और हाथ की हथेली उसके सामने बिछा दी. ज्योतिषी का कहना था- ”आजकल तुम पर शनि की छाया है इसलिए की गई कोई पूजा नहीं लग रही.. मन अशांत होने का यही कारण है. अगले शनिवार को घर पर एक छोटा सा यज्ञ रख लो मैं पूरा करा दूंगा.”

‘अशांत मन’ की शांति के लिए उसने चुपचाप सहमती में सर हिला दिया.
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‘शक’
दीपक ‘मशाल’

यूनिवर्सिटी ने जब से कई नए कोर्स शुरू किये हैं, तब से नए छात्रों के रहने की उचित व्यवस्था(हॉस्टल) ना होने से यूनिवर्सिटी के पास वाली कालोनी के लोगों को एक नया व्यापार घर बैठे मिल गया. उस नयी बसी कालोनी के लगभग हर घर के कुछ कमरे इस बात को ध्यान में रखकर बनाये जाने लगे कि कम से कम १-२ कमरे किराये पर देना ही देना है और साथ ही पुराने घरों में भी लोगों ने अपनी आवश्यकताओं में से एक-दो कमरों की कटौती कर के उन्हें किराए पर उठा दिया. ये सब कुछ लोगों को फ़ायदा जरूर देता था लेकिन झा साब इस सब से बड़े परेशान थे, उनका खुद का बेटा तो दिल्ली से इंजीनिअरिंग कर रहा था लेकिन फिर भी उन्होंने शोर-शराबे से बचने के लिए कोई कमरा किराए पर नहीं उठाया. हालाँकि काफी बड़ा घर था उनका और वो खुद भी रिटायर होकर अपनी पत्नी के साथ शांति से वहाँ पर रह रहे थे लेकिन कुछ दिनों से उन्हें इन लड़कों से परेशानी होने लगी थी.
असल में यूनिवर्सिटी के आवारा लड़के देर रात तक घर के बाहर गली में चहलकदमी करते रहते और शोर मचाते रहते, लेकिन आज तो हद ही हो गई रात में साढ़े बारह तक जब शोर कम ना हुआ तो गुस्से में उन्होंने दरवाज़ा खोला और बाहर आ गए.
”ऐ लड़के, इधर आओ” गुस्से में झा साब ने उनमे से एक लड़के को बुलाया.
लेकिन सब उनपर हंसने लगे और कोई भी पास नहीं आया, ये देख झा साब का गुस्सा और बढ़ गया.. वहीँ से चिल्ला कर बोले- ”तुम लोग चुपचाप पढ़ाई नहीं कर सकते या फिर कोई काम नहीं है तो सो क्यों नहीं जाते? ढीठ कहीं के”
एक लड़का हाथ में शराब की बोतल लिए उनके पास लडखडाता हुआ आया और बोला- ” ऐ अंकल क्यों टेंशन लेते हैं, अभी चले जायेंगे ना थोड़ी देर में. अरे यही तो हमारे खेलने-खाने के दिन हैं..”
शराब की बदबू से झा साब और भी भड़क गए- ” बिलकुल शर्म नहीं आती तुम्हें इस तरह शराब पीकर आवारागर्दी कर रहे हो.. अरे मेरा भी एक बेटा है तुम्हारी उम्र का लेकिन मज्जाल कि कभी सिगरेट-शराब को हाथ भी लगाया हो उसने, क्यों अपने माँ-बाप का नाम ख़राब रहे हो जाहिलों..”
उनका बोलना अभी रुका भी नहीं था कि एक दूसरा शराबी लड़का उनींदा सा चलता हुआ उनके पास आते हुए बोला- ”अरे अंकल, आप निष्फिकर रहिये आपके जैसा ही कुछ हमारे माँ-बाप भी हमारे बारे में समझते हैं इसलिए आप जा के सो जाइये.. खामख्वाह में हमारा मज़ा मती ख़राब करिए.”
और वो सब एक दूसरे के हाथ पे ताली देते हुए ठहाका मार के हंस दिए.
अब झा साब को कोई जवाब ना सूझा और उन्हें अन्दर जाना ही ठीक लगा.. उनका मकसद तो पूरा ना हुआ लेकिन उस लड़के की बात ने एक शक जरूर पैदा कर दिया.
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