भारत से सुकेश साहनी की दो लघुकथाएं

प्रतिमाएं
-सुकेश साहनी

उनका काफिला जैसे ही बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के नज़दीक पहुँचा, भीड़ ने घेर लिया। उन नग-धड़ंग अस्थिपंजर-से लोगों के चेहरे गुस्से से तमतमा रहे थे। भीड़ का नेत्तृव कर रहा युवक मुट्ठियाँ हवा में लहराते हुए चीख रहा था, मुख्यमंत्री—मुर्दाबाद ! रोटी कपड़ा दे न सके जो, वो सरकार निकम्मी है! प्रधानमंत्री !—हाय!हाय!1” ुख्यमंत्री ने लती ुई नजरों से हां िलाधिकारी ेखा। आनन-फानन ें प्रधानमंत्री ाढ़ग्रस्त क्षेत्र के वाई िरीक्षण िए हेलीकाप्टर ्रबंध िया या। हां ्थिति ँभालने के िए मुख्यमंत्री वहीं ुक गए।

हवाई निरीक्षण से लौटने पर प्रधानमंत्री दंग रह गए। अब वहां असीम शांति छायी हुई थी। भीड़ का नेतृत्व कर रहे युवक की विशाल प्रतिमा चौराहे के बीचों बीच लगा दी गई थी। प्रतिमा की आँखें बंद थी, होंठ भिंचे हुए थे और कान असामान्य रूप से छोटे थे। अपनी मूर्ति के नीचे वह युवक लगभग उसी मुद्रा में हाथ बाँधे खड़ा था। नंग-धड़ंग लोगों की भीड़ उस प्रतिमा के पीछे एक कतार के रूप में इस तरह खड़ी थी मानो अपनी बारी की प्रतीक्षा में हो। उनके रुग्ण चेहरे पर अभी भी असमंजस के भाव थे।

मुख्यमंत्री सोच में पड़ गए थे। जब से उन्होंने इस प्रदेश की धरती पर कदम रखा था, जगह-जगह स्थानीय नेताओं की आदमकद प्रतिमाएँ देखकर हैरान थे। सभी प्रतिमाओं की स्थापना एवं अनावरण मुख्यमंत्री के कर कमलों से किए गए होने की बात मोटे-मोटे अक्षरों में शिलालेखों पर खुदी हुई थी। तब वे लाख माथापच्ची के बावजूद इन प्रतिमाओं को स्थापित करने के पीछे का मकसद एकदम स्पष्ट हो गया था। राजधानी लौटते हुए प्रधानमंत्री बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे।

दो घंटे बाद ही मुख्यमंत्री को देश की राजधानी से सूचित किया गया-आपको जानकर हर्ष होगा कि पार्टी ने देश के सबसे महत्त्वपूर्ण एवं विशाल प्रदेश की राजधानी में आपकी भव्य,विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया है। प्रतिमा का अनावरण पार्टी-अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री के कर-कमलों से किया जाएगा। बधाई !

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पिंजरे
-सुकेश साहनी

उसके कदमों की आहट से चौंककर नीलू ने आँखें खोलीं, उसे पहनाकर धीरे से दुम हिलाई और फिर निश्चिन्त होकर आँखें बंद कर लीं। चारों पिल्ले एक दूसरे पर गिरते पड़ते माँ की छाती से दूध पी रहे थे। वह मंत्रमुग्ध-सा उन्हें देखता रहा।
नीलू के प्यारे-प्यारे पिल्लों के बारे में सोचते हुए वह सड़क पर आ गया। सड़क पर पड़ा टिन का खाली डिब्बा उसके जूते की ठोकर से खड़खड़ाता हुआ दूर जा गिरा । वह खिलखिलाकर हँसा। उसने इस क्रिया को दोहराया, तभी उसे पिछली रात माँ द्वारा सुनाई गई कहानी याद आ गई, जिसमें एक पेड़ एक धोबी से बोलता है, “धोबिया, वे धोबिया! आम ना तोड़—-उसने सड़क के दोनों ओर शान से खड़े पेड़ों की ओर हैरानी से देखते हुए सोचा—पेड़ कैसे बोलते होंगे,—कितना अच्छा होता अगर कोई पेड़ मुझसे भी बात करता! पेड़ पर बैठे एक बंदर ने उसकी ओर देखकर मुँह बनाया और फिर डाल पर उलटा लटक गया। यह देखकर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
खुद को स्कूल के सामने खड़ा पाकर वसह चौंक पड़ा। घर से स्कूल तक का लम्बा रास्ता इतनी जल्दी तय हो गया, उसे हैरानी हुई । पहली बार उसे पीठ पर टँगे भारी बस्ते का ध्यान आया। उसे गहरी उदासी ने घेर लिया। तभी पेड़ पर कोयल कुहकी। उसने हसरत भरी नज़र कोयल पर डाली और फिर मरी-मरी चाल से अपनी कक्षा की ओर चल दिया।
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5 Comments »

  1. 1

    पहली लघुकथा स्पष्ट नहीं हो पा रही है शायद कुछ शब्द कहीं गड़बड़ हो गए हैं या शायद पूरा वाक्य ही. दूसरी में पहनाकर को पहिचानकर कर दीजियेगा सर. पढवाने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार और सुकेश जी को बधाई.

  2. दोनों कथायें पढ़ी. शायद पुनः पठन में ज्यादा स्पष्ट हों.

  3. 3

    आदर जोग महावीर जी को सादर प्रणाम ,
    सुकेश जी जी की दोनों लघु कथाए पढ़ी , अच्छी लगी, ”’ प्रतिमाए ” नामक लघु कथा पढ़ी , हालाकि विषय नया नहीं लगा मगर कथानक को नए रूप में ढालते हुए शायद थोड़ी ज़ल्दी करदी , दूसरी लघुकथा ” पिंजरे ”’ मेरी पसंद की है , मगर थोडा सा और ध्यान कसावट मांगती है , मगर यहाँ भी जाने सुकेश जी अपने असली रूप में कम लगे, अच्छे विचारों को पढने के लिए साधुवाद .
    आभार

  4. 4

    सुकेश जी की लघुकथाओं में टंकण में भी पूर्णता का भी अभाव लगा जो अखरता है

  5. 5
    सुधा अरोड़ा Says:

    सुकेश साहनी बेहतरीन लघु कथाएं लिखते हैं , पर इसमें कुछ शब्द या पंक्तियाँ छूट गयी लगती हैं जिसकी वजह से दोनों लघु कथाएं बहुत स्पष्ट नहीं हो पायी हैं .
    सुधा अरोड़ा


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