यू.के. से महेंद्र दवेसर “दीपक” की लघुकथा – ‘त्रिशूल’

महेन्द्र दवेसर “दीपक
जन्म: नई देहली¸14 दिसम्बर 1929
शिक्षा तथा संक्षिप्त जीवन चित्रण: 1947 में विभाजन के समय डी. ए. वी. कॉलेज, लाहौर में F.Sc (Final) के विद्यार्थी। प्रभाकर (पंजाब विश्वविद्यालय, 1950)। पंजाब युनीवर्सिटी कैम्प कॉलेज, नई देहली में एम. ए. – अर्थशास्त्र (Final) के विद्यार्थी – 1952। परीक्षा पूर्व भारतीय विदेश मंत्रालय की विदेश सेवा में चयन पश्चात जाकार्ता, इंडोनेशिया में भारतीय दूतावास में नियुक्ति।
1952-56 तक जाकार्ता, इंडोनेशिया में निवास। विदेश सेवा अवधि में इंडोनेशिया सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार की विशेष आज्ञा पर Radio Republic Indonesia (Voice of Indonesia) के संचालन तथा प्रसारण का अतिरिक्त भार संभाला। रेडियो जाकार्ता से दैनिक समाचारों, चर्चाओं, वार्ताओं और इंडोनेशिया जीवन-संबन्धी अपनी लिखी कहानियों का प्रसारण किया जो बहुत प्रशंसित हुआ। 1956 में स्वदेश वापसी। मेरी कहानियां स्कूल, कॉलेज की पत्रिकाओं में छपीं और प्रशंसित हुईं। 1956-1959: भारत सरकार के संभरण मंत्रालय में नियुक्ति। इस अवधि में छुट-पुट कहानियां समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में छपती रहीं। जुलाई, 1971 में भारतीय हाइ कमिशन, लंदन में नियुक्ति। 1971 से लंदन में निवास। 1976 से अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसी (Reuters World Service) में Senior Technical Buyer के पद पर नियुक्ति। 1992 में नौकरी से अवकाश-ग्रहण। पुन: लेखन-कार्य में जुट गया। मैं जीवन के 80 वर्ष पार कर चुका हूं और विचार से आगे बढ़ रहा हूं कि अभी भी बहुत करने की क्षमता मुझमें बाक़ी है।
प्रकाशित रचनायें: कहानी-संग्रह –- (1) पहले कहा होता (2003), (2) बुझे दीये की आरती (2007), *(3) अपनी अपनी आग (2009)
*इस पुस्तक को ‘डॉक्टर लक्षमीमल्ल सिंघवी सम्मान योजना’ के अंतर्गत संचालित प्रतियोगिता में वर्ष 2009 का 250 पाउंड का अनुदान घोषित किया गया है।
मेरी कहानियां लंदन से प्रकाशित “पुरवाई” और भारतीय पत्रिकाओं “वर्तमान साहित्य”, “गगनांचल”, “अक्षर संगोष्ठि” आदि में छपती रही हैं। “रचना समय” (भोपाल) द्वारा प्रकाशित “समुद्र पार रचना संसार” नामक प्रवासी भारतीय कहानी संकलन और “वर्तमान साहित्य” के प्रवासी महाविशेषांक में भी मेरी कहानियां सम्मिलित हुई हैं और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित भी हुई हैं।

त्रिशूल
– महेंद्र दवेसर ‘दीपक’

समय अनंत का फूल भी है, त्रिशूल भी ! फूल वह, जिसकी सुगंध यदि अंतर में उतर जाए तो उम्र भर मन को सहलाती रहे!! . . . और त्रिशूल ऐसा कि कभी कभी इसके घाव इतिहास बन जाते हैं और फिर भी नहीं भरते!!!
सेठ बलवंतराय को इस फूल और त्रिशूल, दोनों का यह ताज़ा अनुभव हुआ है!
यह कोई जिज्ञासा थी या अपनी मिट्टी की पुकार जो देश-विभाजन के ३५ वर्ष बाद उन्हें पाकिस्तान ले गयी. पहले उन्होंने रावलपिंडी में अपना पुराना घर देखा. फिर अजनबी हो गयी आसपास की गलियों, मुहल्लों की ख़ाक छानी और आ खड़े हुए अपनी पुरानी दुकान ‘सुपर स्पोर्ट्स’ के सामने! यह दुकान बलवंत सेठ के स्वर्गीय पिता सेठ यशवंतराय ने तीस के दशक में शुरू की थी जब दुनिया भर में मंदी का दौर चल रहा था. उनका परिश्रम रंग लाया और बिज़नेस धड़ल्ले से चल निकला. आज कौन है इसका मालिक, कौन मैनेजर है और यह कैसी चल रही है??? यह प्रश्न बलवंत सेठ को दुकान के भीतर खींच लाये. तब उनहोंने देखा कि स्वर्गीय बाउजी के वे
तख्तपोश, उसपर बिछी सफ़ेद चादर और गाव-तकिया अब वहां नहीं थे और न ही था वह हुक्का जिसकी गुड़गुड़ दुकान में गूंजा करती थी. अब इस एयरकंडीशंड दुकान में
इन सबका स्थान शीशम से बने शानदार मेज़ और गद्देदार कुर्सिओं ने ले लिया था और इस फर्नीचर की पिछली दीवार पर अब भी टंगी हुई थी बलवंत सेठ के अपने स्वर्गीय बाउजी . . . सेठ यशवंतराय की वही पुरानी तस्वीर! . . . वे निहाल हो गए!
इस दुकान का मालिक निकला बलवंत सेठ का पुराना मित्र और सहपाठी, मुहम्मद अकरम. बाउजी के दिनों में ही वह उनके आधीन दुकान का मैनेजर बना. वफ़ादार इतना कि ज़रुरत पड़ने पर बाउजी कि चिलम तक भर दिया करता. बाउजी हज़ार बलवंत को कहते कि बेटा तुम भी अकरम के साथ बैठकर दुकान का कुछ कम-धंधा सीख लिया करो, मगर बिगड़े नवाब को अपने फ़ुटबाल और क्रिकेट से फ़ुर्सत मिलती, तब न! जब भी कभी बलवंतराय दुकान में आ बैठता तो बाहर ‘यार, यार’ बुलाये जाने वाले साहिबज़ादे ‘छोटे सेठजी’ की उपाधि से संबोधित होते!
इस अचानक हुई मुलाक़ात के बाद अकरम अपने पुराने यार के गले मिला और उनकी ख़ूब आवभगत की. घंटों दोनों मित्रों के बीच ग़प-शप चलती रही, पुरानी यादें ताज़ा होती रहीं. फिर अचानक अकरम साहिब फॉर्मल हो गए और दुकान की चाबियाँ बलवंत की ओर बढ़ाते हुए बोले , “छोटे सेठ, आप न आते, तो न आते! बरसों आपकी दुकान मुझे चलानी पड़ती. अब आप आ गए हैं तो संभालिये अपनी अमानत. मैं अमानत में ख़यानत नहीं कर सकता. आप इसे रखिये या बेचिए, आपकी मर्ज़ी. अगर दुकान आपके पास रहती है तो आप मुझे नौकरी में रखें या निकल दें. कहिये, मेरे लिए क्या हुक्म है?”

बलवंत सेठ भौचक्के रह गए. फिर ज़रा सोचकर बोले, “अकरम मियाँ, मुझे शर्मिंदा न कीजिये. बरसों से यह दुकान आप चलाते आ रहे हैं, अब आपका इस पर पूरा हक़ है. हमें इसका मुआवज़ा मिल चुका है और वहां भारत में हम ‘सुपर स्पोर्ट्स (इंडिया)’ के नाम से एक दूसरी दुकान चला रहे हैं जो आपकी दुआ से ज़ोरों पर चल रही है. वैसे भी मैं यहाँ घूमने आया था, अपनी दुकान वापस लेने थोड़ी आया था?”

बलवंत सेठ की उसी शाम की फ़्लाईट थी. वह होटल जाने के लिए उठ खड़े हुए और जाते जाते उन्होंने फ़र्माइश कर डाली,” अकरम मियाँ, एतराज़ न हो तो बाउजी की यह तस्वीएर मैं साथ लिए जाता हूँ. अब आपका इससे क्या काम?”
“नहीं जनाब, यह तस्वीर मेरी दुआ-ए-ख़ैर है. इसके साए तले मेरे काम में बरकत हुई है. अब यह दुकान का हिस्सा है. दुकान आपकी, तो यह तस्वीर भी आपकी. नहीं तो यह अब यहाँ से नहीं हिलेगी!”

अकरम का इनकार भी कितना प्यारा था! जब ये दोस्त एयरपोर्ट पर विदा हुए, दोनों की आँखें भीगी हुई थीं. बलवंत सेठ का प्लेन इंदिरा गाँधी एयरपोर्ट पर उतरा. आशा थी कि उनका इकलौता बेटा धनवंत उन्हें लेने के लिए वहां मौजूद होगा. लेकिन न वह स्वयं आया न उसने कार ही भेजी. उन्होंने टैक्सी ली और घर पहुँच गए. . घर आकर उन्होंने पत्नी, सरोज से एयरपोर्ट पर बेटे की ग़ैरमौजूदगी का कारण पूछा, तो वे भी हैरान हो गयीं. फ़्लाईट नंबर आदि तो उसे ठीक से समझा दिए गए थे तो वह फिर क्यों नहीं आया?
भारत विभाजन के समय धनवंत कोई दस वर्ष का था. इकलौता बेटा था, ख़ूब लाड-प्यार से पाला गया था. उसे पढ़ा लिखा कर वकील बनाया. उसकी शादी पर लाखों लुटाये और विवाह के चार महीने बाद, बहू और बेटा, दोनों अलग हो गए. ठीक है, आजके युग में बच्चों की आज़ादी में दख़ल देना उचित नहीं है. बेटे की प्रैक्टिस ख़ूब चल निकली है. मियाँ-बीवी, दोनों के पास अपनी अपनी कारें भी हैं. फिर बेटे के एयरपोर्ट न आने या कार न भेजने का कोई भी उचित कारण या बहाना बलवंत सेठ की समझ में नहीं आ रहा था.
उचित कारण अगले दिन सामने आया. पिता के हाथ में किसी दूसरे वकील के नाम से सीने में घोंपा गया था यह त्रिशूल! एक रजिस्टर्ड नोटिस था. दो महीने के भीतर पुश्तैनी कारोबार में और कारोबार से जमा पूँजी का आधा हिस्सा माँगा गया था.
कब भरेगा यह घाव?

महेन्द्र दवेसर “दीपक”
स्वरचित, अप्रकाशित
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6 Comments »

  1. 1

    एक संवेदनशील कहानी है अच्छी लगी… गैरों से कितना अपनापन और अपनों से त्रिशूल… यही दुनिया की रीत है… कहानी का विस्तार और रोचकता बढ़ाने की अनेक संभावनाएं हैं…

  2. 2
    तिलक राज कपूर Says:

    कथानक में कुछ आधार प्रश्‍न हैं। क्‍या यह जरूरी है कि आशा या अपेक्षा हो ही। पुत्र की ओर से बिना किसी पृष्‍ठभूमि के एकाएक नोटिस प्राप्‍त होना दर्शाता है कि संबंध सामान्‍य नहीं रहे हैं। समृद्ध होते हुए भी खानदानी संपत्ति में अंश की मॉंग आज की सामाजिक परिस्थितियों में बढ़ती जा रही भूख को दर्शाता है। जहॉं तक अकरम मियॉं का प्रश्‍न है उनका चरित्र पूरी तरह इस्‍लाम को समझता है इसलिये वो अमानत में खयानत नहीं कर सकते।

  3. 3

    वास्तव में तो यह प्लॉट कहानी, वह भी लम्बी कहानी का है, लघुकथा का नहीं।

  4. 4
    ashok andrey Says:

    Mahendr jee ki lagju kathaa padte hue kisee shayar ki gajal yaad aa gaee-
    hame to apno ne maara hai, geyron men kahaan dam thaa
    kashti vaheen doobee , jahaan paani kam thaa.
    iss oodhran me koi trutee ho to shayar se chhamaa yaachnaa kartaa hoon lekin hum sabhee sehmat honge ki aaj aeyse hee maahol ko naee peedi me aam dekhne ko mil rahaa hai pataa naheen kab hamare sanskaar loutengen
    itni sundar kathaa padvane ke liye mai aapko tathaa Mahendr Davesar “Deepak” jee ko badhai deta hoon

  5. 5

    agar aisee ye dunia hai to dunia kyon hai???
    hai to laghukatha lekin ye bhi kisi na kisi ka sach hoga jaroor.. bahut marmik aur sundar lekhan.. Deepak ji aur Mahavir sir ka abhar

  6. 6
    Ranjana Says:

    सचमुच इस कथा में फूल और त्रिशूल दोनों ही हैं…
    मनुष्य में मनुष्यता किसी भी जाती बिरादरी या सम्बन्ध के कारण नहीं रहती…यह तो नितांत ही व्यक्तिगत गुण है….और जो सच्चा इंसान होता है वही रिश्तों की मर्यादा भी समझता है..
    कोई एकदम गैर होकर भी सगों से भी बढ़कर होता है और कोई सगा होकर भी गैर से भी बदतर….

    बहुत ही सुन्दर कथा है…


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