भारत से रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ की दो लघुकथाएं

ऊँचाई

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्‌ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?”

मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।

घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खान खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो” -कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फ़ुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”

उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा- “ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?”

“नहीं तो” – मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।

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जाला

रामेश्वर काम्बोजहिमांशु

नीलांजना का बुखार था कि छूटने का नाम नहीं ले रहा था। खाँसी का दौरा पड़ता तो साँस जैसे रुक जाती। ऐसे कष्ट से बेहतर है कि मौत आ जाए। क्या सुख मिला है इस घर में? रात–दिन बाँदी की तरह खटो फिर भी ज़रा–सा सुख नहीं। पति समीर को काम से ही फुर्सत नहीं, दो घड़ी पास में बैठकर बात तो क्या करेंगे? आज सुबह से ही गायब हैं।

बुखार और तेज हो गया है। रह–रहकर उसका जी रोने को चाह रहा है। आँखें मुँदी जा रही हैं। सब कुछ धुँधला नज़र आ रहा है। वह जैसे एक ऊँचे पहाड़ से नीचे लुढ़क गई है। उसकीचीख निकल गई। वह घिघियाई…मैं नहीं बचूँगी।’’

उसके माथे पर कोई ठण्डे पानी की पट्टी रख रहा है। वह सुबक रही है। किसी ने रूमालसेउसकी आँखें पोंछ दी हैं। कुछ उँगलियाँ उसके बालों को सहला रही हैं। उसे अजीब–सा सुकून मिल रहा है। वह सहलाने वाली उँगलियों को दोनों हाथों से दबोच लेती है।

जब उसकी आँख खुली–दो कोमल हाथ उसका माथा सहला रहे थे। उसकी दृष्टि सामने दीवार पर लगी घड़ी पर पड़ी, साफ दिख रहा है…..बारह बज गए, रात के बारह बजे!

उसने गर्दन घुमाई। सिरहाने समीर बैठा है। घोर उदासी चेहरे पर पुती है। आज तक उसको इतना उदास कभी नहीं देखा।

‘‘अब कैसी हो नीलांजना?’’ उसने भर्राई आवाज़ में पूछा।

‘‘मैं ठीक हूँ समीर। तुम पास में हो तो मुझे कुछ नहीं हो सकता……’’ नीलांजना के होठों पर मुस्कान बिखर गई।

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11 Comments »

  1. 1

    जहाँ पहली लघुकथा में आज के कठिनाई के दौर में एक बाप के अपने बेटे की मदद को आने को ही बिना समझे बेटे के परिवार द्वारा उसके आगमन को शंकाग्रस्त होकर देखने और फिर अपनी सोच पर शर्मिंदा होने को बखूबी दर्शाया गया है वहीँ दूसरी में प्रेम को एक ऐसी ताक़त बना कर उभरा गया है जो हर दवा से बढ़ कर है.. मार्मिक और सुन्दर चित्रण.. नैतिक मूल्यों को जगाने का प्रयास करती लघुकथाएं.. आभार..

  2. दोनों ही कथाएँ कम शब्दों में पूरी बात कहती हैं. अच्छा लगा पढ़कर.

  3. कहानियाँ अच्छी लगी……अब पहेलियों का नंबर है…..
    ……..
    विलुप्त होती… नानी-दादी की बुझौअल, बुझौलिया, पहेलियाँ….बूझो तो जाने….
    ………
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_23.html
    लड्डू बोलता है ….इंजीनियर के दिल से….

  4. 4
    MANIK Says:

    kamboj jee kee rachanaaye chhu gayee.lagukhathaa.com par bhee padhataa rahaa hu.badhaai

  5. रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की दोनों लघुकथाएं बेजोड़ हैं। मानवीय संवेदना और पारस्परिक स्नेह और समझदारी को खूबसूरती से व्यक्त करति ये लघुकथाएं किसी के भी हृदय को आसानी से स्पर्श कर सकती हैं।

  6. 6
    रूपसिंह चन्देल Says:

    कंबोज जी की दोनों लघुकथाएं वास्तविकता के धरातल पर मानवीय सरोकारों को समेटे खूबसूरत रचनाएं हैं.

    आप और उन्हें बधाई.

    चन्देल

  7. 7

    उत्तम. सशक्त कथ्य. प्रभावी शैली.

  8. 8

    दोनों ही रचनाएँ लघुकथा की विधा को बल प्रदान करने वाली हैं। इन जैसी सशक्त लघुकथाओं को पढ़कर नया लेखक अभिव्यक्ति के ही नहीं संवेदन-बिन्दुओं की पहचान के तौर-तरीकों से भी परिचित होता है।

  9. कोई भी पिता सारी उम्र यह नहीं भूल पाता है कि वह पिता है, हॉं कुछ बच्‍चों का बड़ा हो जाना और अपने पैरों पर खड़ा हो जाना उन बच्‍चों की कमज़ोरी का कारण बन सकता है, उनका स्‍वतंत्र परिवार हो जाना उनके लिये एक कारण हो सकता है पिता से दूर हो जाने का।
    दूसरी कथा में रिश्‍ते भले ही अलग हैं लेकिन कथ्‍य सार वही है, परस्‍पर विश्‍वास का बंधन, किसी अपने के पास होने की अनुभूति। आज जिस स्‍पर्श चिकित्‍सा की बात होती है उसके मूल में यही विश्‍वास और बंधन ही तो है।
    दोनों लघुकथायें सशक्‍त अभिव्‍यक्ति हैं। बधाई।

  10. 10
    ashok andrey Says:

    manviya sarokaron se judee dono rachnaen apna grhra prabhav chhodne me saphal hue hain Rameshvar kamboj jee ko badhai deta hoon inn dono achchhi laghu kathaon ke liye

  11. 11
    Ranjana Says:

    पहली कथा ने भावुक कर दिया….बड़े ही हृदयस्पर्शी ढंग से आपने कथा का ताना बाना बुना है..

    दूसरी कथा ठीक से पढ़ नहीं पायी,क्योंकि प्रविष्टि का रंग चयन इस प्रकार से किया गया है कि बायाँ भाग तो सहजता से पढ़ा जा पा रहा है,पर दायाँ भाग नहीं…कृपया फॉण्ट कलर व पृष्ठ कलर बदल दें,ताकि यह सहजता से पढ़ी जा सके…


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