यू.के. से नीरा त्यागी की लघुकथा

गले से गले को लगाती रहे : लुभाती रहे मन सुहाती रहे
सदा होली रंगीं बनाती रही : सदा होली रंगीं बनाती रहे
प्राण शर्मा


उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी..
नीरा त्यागी

समुद्र कि लहरें उनके पाँव को चारों तरफ से चूमती हैं..उनकी घुटनों तक मुड़ी जींस को छू कर लौट जाती हैं उन्हें दोबारा भिगोने के लिए … समुद्र ने सूरज को अपने भीतर छुपाने से पहले हाथों में ऊपर उठा रखा है ताकि सब उसे गौर से देख लें…आज की तारीख का सूरज देखने का यह आखरी मौका है… उसका रंग पीले से नारंगी हो चला है .. पर्यटक अपनी चटाई, तौलिये, फ्लास्क, छतरी, सेंडविच बॉक्स समेट रहे हैं … घोड़ेवाला बच्चों को घोड़े पर आखरी सवारी दे रहा है … आइसक्रीम वाले के पास अब सिर्फ वेनीला और मिंट फ्लेवर की आइसक्रीम बची है, तट पर चार पांच साल का लड़का रेत का महल पेरों तले रोंद कर खुश हो रहा है और उसकी बड़ी बहन उसकी दीवारें और छत बचाने कि कोशिश में उसे धक्का दे रही है…. उनकी माँ चिल्ला रही है ‘उसे रोंद लेने दो वैसे भी लहरें बहा ले जायेंगी यह महल…’ तट पर हलचल कम होने लगी है तो सामने सड़क पर बढ़ गई है और सड़क के उस पार दुकानों पर दिवाली जैसी जगमगाहट है …

रेचल पहली बार अपने गाँव से बाहर निकली है उसका गाँव यहाँ से अस्सी किलोमीटर कि दूरी पर है, इससे पहले उसने चहल-पहल गाँव में हर रविवार लगने वाले बाज़ार में देखी है. यहाँ पहली बार उसने समुद्र और शहर कि जगमगाहट देखी है. गाँव में एक ही बेकरी है, रेचल उसमें काम करती है जहाँ पर हर रोज राबर्ट लंच टाइम में सेंडविच और केक खरीदने आता था … रॉबर्ट गाँव से बाहर एक ऊन की फेक्ट्री बन रही है जिसमें क्रेन चलाने का काम करता है उसे पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी क्योंकि सोलह वर्ष के होते ही उसके पिता ने खर्चा देने से इनकार कर दिया …

रेचल को जो भी सीपी नज़र आती है वो उठा लेती है और उसे रॉबर्ट कि कमीज़ की जेब में डाल देती है… उसके क़दमों के साथ सीपियाँ छनक रही हैं पार्श्व में लहरों का संगीत सातवें स्वर में उनका साथ दे रहा है, ढेर सारा जीवन बिखरा पड़ा है गीले रेत पर पाँव के निशाँ में, लहरों में उबलते बुलबुलों में, हवा के साथ डोलते जहाज़ों में, नीले पानी में घुलती किरणों कि लाली में, आकाश में उड़ते परिंदों कि कतारों में, सड़क पर झिलमिलाती रौशनी में, कैफे से उड़ती मछली कि महक में, एम्यूजमेंट की मशीनों से आते शोर में …. वे समेट रहे हैं यह जीवन रेत में पड़ी सीपियों के साथ अपने ख़्वाबों में ….
दोनों थक कर बेंच पर बैठ जाते हैं …. रेचल का गुलाबी रंग नारंगी रौशनी में चमक रहा है. दोनों की नीली आँखे डूबते सूरज की अनगिनत किरणों को सोख रही हैं …. रेचल ने अपना सर रॉबर्ट के कन्धों पर टिका लिया है. दोनों की उम्र उनीस वर्ष है यह उनके हनीमून का आखरी दिन है… उनकी आँखों में वो सभी ख्वाब दस्तक दे रहे हैं जो प्यार के समुद्र में गोता लगाने आसमान से उतर कर आते हैं फिर नींद में बस जाते हैं … उन्होंने फैसला किया है उनके कुछ ख्वाब नींद से ज़मीन पर उतरेंगे … वह शादी कि पच्चीसवी सालगिरह यहीं मनाएंगे इसी तट पर, इसी बेंच पर, यहीं सूरज के सामने … वह दो बच्चे अगले दो वर्ष में पैदा करेंगे…उन्हे एक साथ पाल-पोस कर बड़ा करके … वह रेचल का दुनिया घूमने का सपना पूरा करेगा … वहां से लौट कर वह यूनिवेर्सिटी में दाखला लेगा और डिग्री की पढ़ाई पूरी करेगा ….

आज वो दोबारा से उसी बेंच पर बैठे हैं राबर्ट के माथे के ऊपर से सर से कुछ बाल उड़ गए हैं और रेचल के बाल कुछ ज्यादा सुनहरे हो गए हैं एक वर्ष पहले उनका तेईस वर्षीय बेटा माइकल इराक़ कि लड़ाई में मारा गया.. वह पेट्रोल से भरी लारी चला रहा था जिस पर किसी ने हेंड ग्रेनेड फेंक दिया…बेटे कि जगह उन्हे सरकार से कुछ पैसे, उसका सूटकेस और उसके दोस्तों से आखिर के दिनों में खींचे फोटो मिले … उसकी गर्भवती पत्नी एलिक्स को गहरा सदमा लगा था. छ: महीने बाद बेटे के जन्म के समय उसे ब्रेन हेमरेज हो गया…. उनकी बेटी लिज़ जो माइकल से एक साल बड़ी है बचपन में दादा के फार्म पर जाकर रहा करती, उसके दादा ने उसका यौन शोषण किया, उस दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसने हिरोइन का सहारा लिया, जब वो माँ बनी उसे बच्ची के पिता का नाम तक ना मालूम था… अपनी बच्ची को वह बहुत प्यार करती थी .. अपने आप को काबिल माँ बनाने के लिए वह एक वर्ष रिहाब में रही….फिर भी सोशल सर्विस ने बेटी को चिल्ड्रेन होम से माँ के पास नहीं लौटने दिया .. लिज़ वर्तमान से दूर भागने के लिए फिर से जाने- पहचाने पुराने रास्तों की तरह मुड़ ली … राबर्ट और रेचल को नातिन की कस्टडी के लिए कोर्ट में केस करना पड़ा जिसे वह दो साल बाद जीत गए….

आज भी चारों तरह बहुत सारा जीवन बिखरा पड़ा है. राबर्ट की गोदी में एक जीवन आँखे मूंदे दाये हाथ का अंगूठा चूस रहा है और दूसरा जीवन रेचल और रॉबर्ट के बीच बैठा बाएं हाथ की अंगुली उठा-उठा कर मुश्किल से मुश्किल सवाल पूछ रहा है जिसका वो बारी-बारी मुस्कुरा कर जवाब दे रहे हैं … आज भी समुन्द्र उनके पेरों को चूम रहा है, सूरज को उसने हाथों में उठा रखा है … राबर्ट के हाथ रेचल के कंधे पर है उनके सपने भले ही फिर से पचीस साल के लिए सूरज के साथ समुद्र में छिप गए हैं किन्तु पचीस साल पहले किया सूरज और समुद्र से इस बेंच पर मिलने का वादा उन्होंने निभाया है… आज भी उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी है जो उन्होंने दशकों पहले सोखी थी ..

नीर त्यागी

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11 Comments »

  1. 1

    बहुत मार्मिक कहानी है लेकिन ये पँक्तियाँ अन्त मे सकून देती हैं
    आज भी समुन्द्र उनके पेरों को चूम रहा है, सूरज को उसने हाथों में उठा रखा है … राबर्ट के हाथ रेचल के कंधे पर है उनके सपने भले ही फिर से पचीस साल के लिए सूरज के साथ समुद्र में छिप गए हैं किन्तु पचीस साल पहले किया सूरज और समुद्र से इस बेंच पर मिलने का वादा उन्होंने । नीर त्यागी जी को बहुत बहुत बधाई । लघू कथा मे इतने बडे कथानक को समेटने की कला मे वो पारंगत हैं। धन्यवाद

  2. श्रद्धेय महावीर जी, सादर प्रणाम
    नीरा जी की रचना भावुक करने वाली है….
    सब कुछ ऐसा नहीं हो जैसा हम चाहत हैं.
    प्रकृति की अपनी गति है, अपने नियम हैं…जिनमें इंसान एक बेबस कठपुतली से ज़्यादा कुछ नहीं रह जाता….ऐसे हालात ईश्वरीय सत्ता का जीता जागता प्रमाण होते हैं..

  3. घटनायें, हमारे आस-पास बिखरी, तलाश में होती हैं किसी ऐसे व्‍यक्ति की जो उन्‍हें शब्‍द दे और गूँथे ऐसे वाक्‍यों में जो भावनाओं को उसी रूप में व्‍यक्‍त कर सकें जैसे वो घटनाओं में थीं और फि़र सृजन हो एक लघुकथा, कथा या उपन्‍यास का। और जरूरी नहीं कि ऐसी घटनायें सत्‍य हों, काल्‍पनिक भी हो सकती हैं।
    ऐसी ही एक घटना को उसका शिल्‍पकार मिल गया।
    मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी एक अच्‍छी लघुकथा।

  4. 4

    सामान्यतः लघु कथा किसी एक घटना को केंद्र में रखकर लिखी जाती है. कथ्य को देखते हुए इस रचना को कहानी कहा जाना चाहिए. इसमें अनेक घटनाओं का उल्लेख है.

  5. 5
    pran sharma Says:

    ACHCHHEE LAGH KATHA KE LIYE NEERA JEE KO BADHAAEE AUR
    SHUBH KAMNAYEN.

  6. बहुत सुन्दर और मार्मिक कहानी है।एक अच्छी कहानी पढ़वाने के लिए आभार।

  7. नीरा जी की यह रचना लघुकथा नहीं है, कहानी के बहुत पास की रचना है और बहुत ही खूबसूरत लफ़्जों में बयान की गई है। भाषा देखकर तो मैं दंग हूँ, रचना में ऐसी ही बांध लेने वाली भाषा होनी चाहिए और एक प्रवाह भी। कहना न होगा कि नीरा जी के पास यह दोनों ही हैं। मैं उन्हें बधाई देता हूँ और महावीर जी को भी।

  8. 8

    बहुत खूबसूरत और भावपूर्ण कहानी, आरम्भ से अन्त तक। कहानी की निरन्तरता काबिले तारीफ है। वाकई कसौटी पर खरी उतरती भावपूर्ण कहानी। आभार!!

  9. 9
    Saagar Says:

    ise apne blog par bhi post karen… zyada log padh sakenge….

  10. 10
    ashok andrey Says:

    ek achchhi katha ke liye Neera jee ko badhai deta hoon

  11. 11
    Hindi SMS Says:

    neera jee ke liye badhai aur apne blog par jaroor post kare.


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