यू. के. से प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं

ये  इंग्लॅण्ड है,माई ब्रोदर

–प्राण शर्मा

गोपीनाथ से लन्दन जाने वाली कोच छूट गयी थी. एक अन्य कोच ड्राईवर ने बड़ी शिष्टता से उसको अगली कोच का समय बताया.

गोपीनाथ को लगा कि उसने उस ड्राईवर को पहले भी कहीं देखा था. उसने भेजे पर जोर दिया.याद आते ही उसने बड़े प्यार से पूछा–

” भाई साहिब, आपने क्या भारत में पंजाब रोडवेज में भी काम किया था ?”

”  जी हाँ, मैं पंजाब रोडवेज में बस कन्डक्टर था.”

” क्या आपको याद है कि पांच साल पहले किसी यात्री से दिल्ली जाने वाली बस छूट गयी थी.उसने आपसे अगली बस के टाइम के बारे में पूछा था . आपने उसको ऊपर से नीचे घूरते हुए बड़ी बेरुखी से कहा था–

” पढ़े- लिखे लगते हो .वो सामने बोर्ड पर टाइम लिखा है. जाकर पढ़ लो.”

”  वो भारत की बात भारत में ही रहने दो. ये इंग्लॅण्ड है, माई ब्रोदर.”

–प्राण शर्मा

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बहु नंबर वन

प्राण शर्मा

जब रमा ससुराल ब्याही आयी तो गली की दो ” शुभ  चिन्तक” महिलायें ललिता पवार और शशिकला की भाँति उसके आसपास मंडराने लगी. एक उसकी चाची होने का अधिकार जताती और दूसरी मौसी होने का. दोनो ही रमा को उसकी सास के खिलाफ कुछ न कुछ भड़काती . वो उनकी बातों को एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकाल देती.

धीरे-धीरे प्यारी, दुलारी और अति आज्ञाकारी रमा शुभ चिन्तक चाची और मौसी की आँखों में काला अक्षर भैंस के बराबर हो गयी . वो उनकी नज़रों में ” बहु नंबर वन ” बनी रहती बशर्ते वह उनके इशारों पर नाचती और अपनी सास को नचवाती .

रमा अब फिर चाची और मौसी की नज़रों में बहु नंबर वन बन गयी है.

दोनो की अपनी-अपनी बहु आ चुकी है. उनकी बहुओं ने गली की कई महिलाओं के बहकावे में उनकी नाकों में दम कर रखा है.

–प्राण शर्मा

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21 Comments »

  1. पहली कहानी को कई बार पढ़ा । और देव आनंद साहब की एक फिल्‍म का गीत याद आ गया । जैसा देस वैसा भेस फिर क्‍या डरना । सचमुच ऐसे ही तो होते हैं हम । जब हम अपने ही देश में होते हैं तो कितने अभद्र होते हैं किन्‍तु वहां जहां पर हम परदेशी होते हैं वहां कितने सभ्‍य हो जाते हैं । कहानी मानव मन के अंदर छिपी कालिख को उजागर करती है । काश के हम अपने देश में भी उतने ही सभ्‍य रहें जितने कि बाहर जाकर हो जाते हैं ।

  2. 2

    अच्छी लघुकथाएँ, बधाई।

  3. 3
    Devi nangrani Says:

    पहली कथा में परिवेश के अंतर को उभरा है, सुंदर शब्दों कि बुनावट से.

    ” पढ़े- लिखे लगते हो .वो सामने बोर्ड पर टाइम लिखा है. जाकर पढ़ लो.”

    “ वो भारत की बात भारत में ही रहने दो. ये इंग्लॅण्ड है, माई ब्रोदर.”

    दूसरी लघुकथा एक सन्देश रेखांकित कर रही है

    सुनो सबकी करो अपनी ,

    देवी नागरानी

  4. 4
    Lavanya Says:

    कितने कम शब्दों में , परिवेश और मानसिक स्थति का बखूबी खाका खींच कर रख दिया है प्राण भाई साहब ने
    वाह …लघुकथाएं होते हुए भी, बात बड़ी कर गयीं ..बधाई ..आपको ..
    आ. महावीर जी, हर नया पृष्ठ जुड़कर , उम्दा साहित्य , जोड़ रहा है . आपकी कर्मठता को देख प्रसन्न व चकित हूँ
    बहुत आदर व स्नेह के साथ ,
    – आपकी एक और बिटिया
    लावण्या

  5. 5
    Lavanya Says:

    हमारी आदरणीया देवी बहन की सशक्त अभिव्यक्ति सी
    ये दोनों लघु कथाएँ बेहद अच्छी लगीं –
    देर से कमेन्ट करने के लिए क्षमप्रार्थी भी हूँ
    बहुत स्नेह सहित सादर नमन
    – लावण्या

  6. अच्छी लघु कथाएँ बधाई.

  7. 7
    रूपसिंह चन्देल Says:

    बहुत सुन्दर लघुकथाएं. दोनों ही यथार्थपरक.

    प्राण जी न केवल उल्लेखनीय गजलकार हैं बल्कि महत्वपूर्ण लघुकथाकार भी हैं.

    पढ़वाने के लिए आभार

    चन्देल

  8. 8
    amar jyoti Says:

    परिवेश के साथ-साथ मानसिकता भी परिवर्तित होने का सटीक उदाहरण।
    बहुत ही सुन्दर और सामयिक।
    सादर,
    अमर

  9. ऐसा ही होता है दुसरे के घर में आग लगाने वालों के अपने घर भी आग की लपेट में आ जाते हैं

  10. दोनों कथानक एक उदाहरण हैं कि परिस्थितियॉं सोच और व्‍यवहार पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहतीं। बदलाव प्रबंधन (चेंज मैनेजमेंट) की कार्यशालाओं में जो लोग ऐसा मानते हैं कि बदलाव असंभव नहीं तो दुष्‍कर अवश्‍य होता है उनके लिये ये कहानियॉं आधार उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं।

  11. 11
    Ranjana Says:

    Waah….Bahut bahut sahi…..teekhee chot karti ati prabhavi laghukathayen….

    Choote me badi baat kahne me aap siddh hast hain….

  12. 12

    वाह वाह आदरनी प्राण भाई साहिब ने तो इस बार कमाल कर दिया इतनी छोती से कथा के माध्यम से कितना बडा सत्य कह दिया सही मे हम अपने देश मे उन सभी अच्छी बातों का पालन नहीं करते जो विदेश मे रह कर करते हैं वहाँ से आने के बाद भी हम सबक ले कर नहीं आते। बहुत खूब दूसरी कहानी के माधय्म से सोचें तो एक साथ कई स्न्देश मिलते हैं एक तो किसी की बातों मे आ कर अपने घर मे आग न लगायें दूसर अच्छाई हमेशा अच्छा फल देती है जैसे आंवले का सवाद खा लेने के बाद ही पता चलता है कि वो कितना गुन कारी है इसी तरहुन महिलाओं को अच्छाई पता चल गयी फिर जो जैसा बोयेगा वैसा काटेगा। अच्छा सबक मिला उन दोनो को भी और बहु रानी को तो नम्बर वन रहना ही था बहुत ही सुन्दर सन्देश देती हैं दोनो रचनायें भाई साहिब को बहुत बहुत बधाई। आपका धन्यवाद

  13. कभी कमाल साहब का भाषण पढ़ा था कि जो एन आर आई अमेरीका में अपनी सिगरेट ऐश ट्रे ढूंढ कर उसमें फैंकता है, वो ही भारत आकर सिगरेट सड़क पर फेंकने से गुरेज नहीं करता और फिर भारत में गंदगी की दुहाई देता है……..पहली कथा पढ़कर उसी भाषण का स्मरण हो आया.

    दूसरी कथा तो युगों युगों से आस पास दिखाई देती है..बहुत उम्दा कथाएँ.

  14. “ वो भारत की बात भारत में ही रहने दो. ये इंग्लॅण्ड है, माई ब्रोदर.”
    इस छोटे से वाक्य में दो देशों की आज के लोगों की अभिवृत्ति, उनकी मानसिकता का बड़ी कुशलता से खुलासा दिया है.
    दूसरी कथा में फिल्मी अभिनेत्री शशिकला और ललिता पवार का नाम ‘शुभचिंतक’ जोड़ने से एकदम सपष्ट हो जाता है कि यह ‘शुभचिंतक’ शब्द व्यंग्यात्मक रूप में लिया गया है. इससे कथानक में रोचकता भी बढ़ गई है. सुन्दर कहावतों का प्रोयोग तो देखने वाला है.
    दोनों ही कथाएं संक्षिप्तता और रोचकता के साथ केवल मनोरंजन मात्र ही नहीं हैं, बल्कि उद्देश्य की दृष्टि से सन्देश भी देते हैं.

  15. प्राण जी द्वारा लिखी दो लघु कथाएं पढ़ीं
    मज़ा आ गया कमाल का लिखतें हैं प्राण जी
    लघु कथा में समय की भी बचत होती है
    और जो लेखक कहना चाहता है वोह भी समझ में जल्दी आ जाता है
    चाँद शुक्ला हदियाबादी
    डेनमार्क

  16. प्राण साहिब की पहली लघुकथा बेहतर लगी। अपने कथ्य में ही नहीं, बल्कि अपनी प्रस्तुति में भी। दूसरी लघुकथा ने अधिक प्रभावित नहीं किया। ऐसा लगा जैसे रचना बहुत पास से गुजर गई, पाठक के साथ बगैर कोई गहरा संवाद रचाए। यह नितांत मेरी निजी राय हो सकती है, फिर भी जैसा मुझे महसूस हुआ मैंने वैसा ही कहने की कोशिश की है, अन्यथा न लें।

  17. 17
    ashok andrey Says:

    priya bhai pran jee inn chhoti see laghu kathaaon me aapne vaakei jindagee kii sachchai ko behtar dhang se prosaa hai jiske liye mai aapko badhaai detaa hoon

  18. 18

    परम आदरणीय प्राण साहब देर से आने पर माफ़ी मांगता हूँ. आपकी लाजवाब लेखनी का कमाल फिर से देखने को मिला है. दोनों ही लघु कथाएं हमारे समाज का दर्पण है और हमारी मानसिकता पर गहरी चोट करती हैं. क्यूँ हम परिवेश बदलते ही अपने आप को बदल लेते हैं…इस का उत्तर खोजना बाकि है…दूसरी कथा तो घर घर की कहानी है…अब शब्दों में आपके लेखन की क्या प्रशंशा करूँ…मन ही मन इन कथाओं को पढ़ कर आपको प्रणाम करता हूँ.
    नीरज

  19. 19
    shrddha Says:

    बहुत सही व्यंग है जो अच्छा व्यवहार हम बाहर के देश में करते हैं अगर वो भारत में भी करें तो भारत भी आज बेहतर बन जाए

    bahut achchi katha

  20. श्रद्देय प्राण शर्मा जी, आदाब
    लघुकथाओं के माध्यम से कितनी बड़ी शिक्षा दी है आपने.
    सच कहा है, माहौल हमें अपने आप अनुशासित बना देता है
    और, समझदार बहुएं,
    किसी की बातों में आकर अपनी खुशियों में आग नहीं लगातीं

    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद


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