अमेरिका से देवी नागरानी की दो लघुकथाएं

देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू.एस.ए.

रिश्ता

अमर अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। उच्च शिक्षा के लिए अमरिका जाकर पढने की इच्छा प्रकट की साथ में वादे भी किया कि वह पढ़ाई पूरी करते ही वापस आकर दोनों की देखभाल भी करेगा। दोनों बहुत खुश हुए ।

उन्होंने तमाम उम्र की जमा पूँजी लगाकर उसे रवाना कर दिया था ।

वहाँ जाकर अमर जल्दी-जल्दी ख़त लिखा करता था पर जल्द ही खतों की रफ़्तार ढीली पड़ गयी। एक दिन डाकिया एक बडा-सा लिफाफा उन्हें दे गया । ख़त में कुछ फोटो भी थे। ये अमर की शादी के फोटो थे । उसने अंग्रेज़ लड़की के साथ शादी कर ली थी । ख़त में लिखा था – ” पिताजी, हम दोनों आशीर्वाद लेने आ रहे हैं । फकत पाँच दिन के लिए । फिर घूमते हुए वापस लौटेंगे। एक निवेदन भी कि अगर हमारे रहने का बंदोबस्त किसी होटल में हो जाये तो बेहतर होगा। और हाँ, पैसों की ज़रा भी चिंता न कीजियेगा……”

दोनों को पहली बार महसूस हो रहा था कि उनकी उम्मीदें और अरमान तो कब के बिखर चुकें हैं । दूसरे दिन तार के ज़रिये बेटे को जवाब में लिखा – ” तुम्हारे खत से हमें कितना धक्का लगा है कह नहीं सकते, उसी को कम करने के लिए हम कल ही तीर्थ के लिए रवाना हो रहे हैं, लौटेंगे या नहीं कह नहीं सकते, अब हमें किसी का इंतज़ार भी तो नहीं । और हाँ, तुम पुराने रिश्तों को तो नहीं निभा पाये, आशा है, नये रिश्तों को जीवन-भर निभाने की कोशिश करोगे….

देवी नागरानी

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समय की दरकार

समय  की कद्र वो ही जानते हैं जो समय की पाबंदिओं  का पालन करते हैं और उस दौर में अपना लक्ष्य भी हासिल करते हैं. समय के सैलाब में बहते हुए हम कभी दो पल रुककर ये नहीं सोचते की यह समय भी रेत की तरह हमारी बंद मुठियों से निकला जा रहा है. जाना कहाँ है, जा कहाँ रहे हैं? शायद वक्त की धाराओं के साथ बेमकसद ही रवां हो रहे हैं.
सब कुछ करते रहते हैं, खाने -पीने, मौज-मस्ती की महफिलों का हिस्सा बनने के लिए समय है,पर जो काम खुद की पहचान पाने के लिए करना है, उसके लिए समय नहीं! उस काम को न करने के बहाने सबब बन कर सामने आते हैं. अक्सर कहते हैं और सुनते हैं- ” समय ही नहीं मिलता” सच है समय को कौन बांध पाया है जो हम बांध पाएंगे. पर उसी समय के चलते चक्रव्यूह से बाहर निकल कर एक आयर पहचान पा लेनी है जो सच का मापदंड है.
इस समय के सिलसिले में एक सुना हुआ किस्सा याद आया- एक बच्चे  ने एक दिन अपने पिता से, जो काम से थका हारा लौटा था पूछा-” पिताजी आपको घंटे के काम के लिए कितने डालर मिलते हैं?” अजीब सवाल में न उलझ कर पिता ने कहा ” २५ डालर.”
बेटे ने पिता से जिद की कि वह उसे १० डालर दे. पिता ने दे तो दिए पर वह सोचने लगा – “कभी न मांगने वाला बेटा ये कैसी फरमाइश कर बैठा है?”  कुछ सोचकर वह बेटे के कमरे में गया तो देखा वह कुछ डालर उन दिए हुए  पैसों में जोड़ रहा था.
“क्या कर रहे हो? क्यों चाहिए तुम्हें इतने पैसे.” पिता ने जानना चाहा. बेटे ने  २५ डालर पिता कि ओर बढ़ाते हुए कहा ” पिताजी क्या कल आप ऑफिस से जल्दी आकर मेरे साथ खाना खा सकते हैं, ताकि हम एक घंटा साथ-साथ बिताएं, यह $२५ मैंने उसीके लिए जमा किये हैं.”
समय का मूल्यांकन तो उस मासूमियत ने लगाया जिसे समय कि दरकार थी, दौलत कि नहीं!!!

देवी नागरानी

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12 Comments »

  1. आदरणीया देवी जी की दोनों ही कहानियां रिश्‍तों को नये सिरे से परिभाषित करती हैं । दूसरी कहानी ये बताती है कि पहली कहानी वाले हालात कैसे और क्‍यों बनते हैं । दूसरी कहानी वास्‍तव में पहली कहानी का प्रथम खंड है । या यूं कहें कि दूसरी कहानी पहली कहानी की प्रतिध्‍वनि है । देवी जी साहित्‍य की हर विधा में कुशलता के साथ लेखन करती हैं । यदि व्‍यक्तिगत पसंद की बात हो तो मुझे दूसरी कहानी अधिक पंसद आई । उसमें बच्‍चों के मन की पीड़ा को कुशलता से अभिव्‍यक्‍त किया गया है । दादा भाई का आभार इतनी सुंदर रचनाओं को पढ़वाने के लिये ।

  2. 2

    दोनो लघुकथायें बहुत सुन्दर हैं आज के जीवन का सच बहुत सुन्दर शब्दों मे कहानी के रूप मे कहा है ।एक मे बच्चों के पास समय नहीं है माँ बाप के लिये दूसरे मे माँबाप के पास समय नहीं बच्चों के लिये । नागरानी जी को बधाई आपका धन्यवाद्

  3. 3

    दोनों लघुकथाओं के कथ्य बहुत ही अच्छे हैं।

  4. 4
    Dinesh "DARD" Says:

    आदरणीय देवी जी,

    आपकी लिखी दोनों लघु कथाऐं पढ़ीं. लगा, कि इन कथाओं को कोई बे-मन से भी पढता तो संजीदगी उसे घेर ही लेती. हालाँकि दोनों कथाऐं मुझे आईना सा दिखाती हुई लगीं, लेकिन पहली कथा ने मुझे अपने कल के लिए फिक्रमंद कर दिया, तो दूसरी कथा मेरे माज़ी की दास्ताँ साबित हुई, लेकिन अफ़सोस कि मेरा बचपन गुज़र गया और मुझे अपने पिता से ऐसा कोई अनुभव नहीं हो सका.

  5. देवी नागरानी जी की दोनों लघुकथायें अच्‍छी हैं कह कर इतिश्री का साहस नहीं मुझमें। दूसरी कथा में व्‍यक्‍त किस्‍सा पूर्व से ज्ञात होते हुए भी कथानक का निचोड़ पूर्वाभिव्‍यक्ति में आ जाने से रुचिकर हो गया है। दोनों कथानक एक आपाधापी भरी जिन्‍दगी के मानवीय दृष्टिकोण को एक ही माध्‍यम से पूरी शक्ति से व्‍यक्‍त करने में सफल हैं।
    ‘…वहाँ जाकर अमर जल्दी-जल्दी ख़त लिखा करता था पर जल्द ही खतों की रफ़्तार ढीली पड़ गयी।..’
    तथा
    ‘..और हाँ, तुम पुराने रिश्तों को तो नहीं निभा पाये, आशा है, नये रिश्तों को जीवन-भर निभाने की कोशिश करोगे….’ अंश ‘उसने कहा था’ की तरह कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
    मैं तो बस बधाई के साथ फटाफट आशआर में कहूँगा कि:

    ऋतु बदलते ही नये साथी बनाते,
    ये भला रिश्‍ते कहॉं लंबे निभाते।

    हो गये आदम के बच्‍चे भी परिंदे
    जिनके रिश्‍ते पंख आते टूट जाते।

    हमने कोशिश की, परिंदे हो न पाये
    आस ना बच्‍चों से जो कोई लगाते।
    तिलक राज कपूर

  6. 6

    आदरणीय महावीर जी और श्री प्राण शर्मा जी की तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ जो इस मंच पर रचनाओं को समोहित किया है. सुबीर जी की, निर्मला जी की, तिलक राज जी की, , दिनेश जी की और बलराम अग्रवाल जो खुद लघुकथा की सशक्त से परिचित है, अपने उत्त्साह भरे शब्दों में मेरे प्रयास को एक दिशा बक्ष्ने में समर्थ हुए हैं.

    कलम की सियाही की दरकार है ये
    कोई रूप-रंग उसका देखे, सराहे
    शुभकामनाओं सहित
    देवी नागरानी

  7. 7
    ashok andrey Says:

    bahut achchhe dang se prosaa hai jeevan kee sachchaai ko jo hame sochne ko majboor karti hai mai devi nagrani jee ko badhai deta hoon, unhen in achchhi laghu kathaaon ke liye

    ashok andrey

  8. दोनों कहानियों का प्रस्तुतिकरण बहुत अच्छा है.
    बधाई.

  9. देवी नागरानी जी की दोनों लघुकथाएं के कथ्य जीवन की सच्चाई पर आधारित हैं जो बड़े रोचक ढंग और कुशलता से प्रस्तुतत की हैं. देवी जी ‘मंथन’ की ओर से बधाई और धन्यवाद स्वीकारें.
    महावीर शर्मा

  10. 10
    अवनीश तिवारी Says:

    दोनों लघु कथाएं अच्छी हैं | वाकई में शहरी जीवन ने केवल पैसा कमाने तक ही रख दिया है हमें |
    अमेरिका का तो मुझे पता नहीं , लेकिन हम भारतीय तो पैसे की तंगी के कारण विवश हो जाते हैं |
    भविष्य में इस स्थिति में सुधार हो इस मंगल कामना के साथ ,

    अवनीश तिवारी
    मुम्बई

  11. पहली कथा में जो उस लड़के के माँ बाप ने आत्मविश्वास का परिचय दिया, वो कितने माँ बाप कर पाते हैं. अक्सर तो वो समझौता करते या रोते ही नजर आते हैं. अगर कुछ माँ बाप ऐसे फैसले कड़े दिल से लेने लगें तो शायद औलादें ऐसा करने के पहले दो बार सोचें कि They cannot take everything for granted.

    कथा प्रभावी है.

    दूसरी कथा बहुत हृदयस्पर्शी और सीख देती.

    देवी जी को नमन!!

  12. देवी नागरानी जी की दोनों लघुकथाएं ध्यान खींचती हैं। पहली लघुकथा में बहुत कड़वी सच्चाई को बयान किया गया है। पर यह लघुकथा अपने शिल्प में थोड़ा सा कसाव मांगती है। दूसरी लघुकथा “समय की दरकार” की अन्तिम पंक्तियां ही जब लेखिका एक बच्चे का किस्सा बयान करती है, ही लघुकथा है। इससे पहले की सभी पंक्तियाँ मुझे निरर्थक लगती है। ऐसा लगता है किसी लेख की पंक्तियां पढ़ रहे हों अथवा समय पर लेखिका के विचार… मुझे माफ कीजिएगा लघुकथा तो बस बच्चे के किस्से में ही है जो दिल को छूता है।


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