‘मेरी प्यारी बेटी’ – महावीर शर्मा

‘मेरी प्यारी बेटी’
-महावीर शर्मा

साभार:  ‘कादम्बिनी’ मार्च २००६ (‘एक बेटी का अभागा पिता’ के नाम से)

लन्दन
15 जुलाई, 2005

मेरी प्यारी बेटी
मेरे इस पत्र की तिथि देख कर तुम सोचती होगी कि इससे दो दिन पहले ही तो फ़ोन पर बात हुई थी,फिर यह पत्र क्यों?… बेटी, इस पत्र में जो कुछ लिख रहा हूं, वह फोन पर सम्भव नहीं था। इस पत्र की प्रेरणा मुझे दो बातों से मिली। सुबह सड़क पर गिरे कुछ काग़ज़ मिले जिन में किसी पिता के मर्म-स्पर्शी उद्‌गार भरे थे। ऐसा लगा जैसे कि उसकी आत्मा उन्हीं काग़ज़ों के पुलिंदे के इर्द-गिर्द भटक रही हो। दूसरे, स्वः पं० नरेन्द्र शर्मा की इन पंक्तियों को पढ़ कर हृदय विह्वल हो उठा:
‘ सत्य हो यदि, कल्प की भी कल्पना कर, धीर बांधूँ,
किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये, यह योग साधूँ !
जानता हूँ, अब न हम तुम मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
….. कितना साम्य था उन फेंके हुए काग़ज़ों के शब्दों और इस कविता की पंक्तियों में! बेटी, इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन और कैनेडा की राजधानी औटवा की दूरी ने तुम सब को देखने की अभिलाषा को जैसे किसी अन्जान वादी में भटका दिया हो – मैं स्वास्थ्य के कारण और तुम कार्य-वश तथा अवकाश के अभाव के कारण, दोनो ही अपने अपने शहर को नहीं छोड़ पाते।

तुम जिस प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थीं, उसी के पास वुडसाइड पार्क ट्यूब स्टेशन के साथ वुडसाइड एवेन्यू पर प्रायः घूमने जाता हूं जहां दोनो ओर सुन्दर वृक्षों की शृंखला है और रास्ते में वही स्कूल तुम्हारे बचपन की यादें ताज़ा करता रहता है। उसी समय पर एक पुलिस ऑफिसर भी प्रतिदिन गश्त पर मिल जाता है। बड़ा मिलनसार और स्वभाव से हंस-मुख है। वह मजाकिया भी है। आज रोज़ की तरह सुबह सैर के लिये उसी वुडसाइड एवेन्यू पर जा रहा था कि काग़ज़ों के एक पुलिंदे पर पाँव की हल्की-सी ठोकर लगी। मैं वहीं रुक गया। अपनी छड़ी से उसे हिलाया और झुक कर उठा लिया। देख ही रहा था कि इस में क्या है, वही पुलिस ऑफिसर भी पास आ गयाः‘ हैलो सीनियर! क्या कोई खज़ाना मिल गया है?” वह मुस्कुरा कर बोला।

पैन्शनर (सीनियर सिटीज़न) होने के नाते वह मुझे मज़ाक में सीनियर ही कह कर सम्बोधित करता था। मैं ने भी परिहास की भाषा में उत्तर दियाः ‘ आप ही देख कर बताओ कि कहीं किसी आतंकवादी का रखा हुआ बम तो नहीं है?’ पुलिंदे को देख कर हंसते हुए
कहने लगाः ‘ लोग wildes-letter-1.jpgइतने सुस्त और लापरवाह हो गये हैं कि रद्दी के काग़ज़ बराबर में रखे हुए डस्ट बिन (कूड़े-दान) तक में भी नहीं डाल सकते ! लाओ, मैं ही डाल देता हूं।” मैं उन काग़ज़ों को अपने हाथों में उलट-पलट ही रहा था कि देखा पत्रों के साथ एक विवाह प्रमाण-पत्र भी था। मैं ने उसका ध्यान इस की ओर आकर्षित किया। कुछ क्षणों के लिये तो वह स्तब्ध रह गया। उसके चेहरे पर आर्द्रता का भाव झलक उठा, “ये किसी की धरोहर है। मैं इसे पुलिस-स्टेशन में जमा करवा दूंगा।” मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई। मैंने उन पत्रों को देखने की इच्छा प्रकट की तो उसने कहा कि यह बंडल क्योंकि तुम्हें ही मिले हैं, तुम पुलिस-स्टेशन जा कर देख सकते हो और यदि छः मास तक किसी ने भी इसके स्वामित्व का दावा नहीं किया तो हो सकता है कि यह तुम्हारी ही संपत्ति मानी जाए।

उत्सुकतावश मैं दोपहर के समय पुलिस-स्टेशन चला गया। संयोगवश स्वागत-कक्ष में वही ऑफिसर ड्यूटी पर था। औपचारिक कार्यवाही के पश्चात मैं एक एकांत कोने में बैठ कर पढ़ता रहा। बेटी! ये मुड़े-तुड़े पुराने साधारण से दिखनेवाले काग़ज़ एक हृदय-स्पर्शी पत्रों का एक संग्रह था जिस में कुछ पत्र प्रथम विश्वयुद्ध में युद्धस्थल से किसी सैनिक ‘राइफलमैन जॉर्ज वाइल्ड‘ ने अपनी इकलौती प्यारी बेटी ‘ऐथल ’ के नाम लिखे थे। कैसी विडंबना है! उसके उद्‌गार, उसके अरमान, उसकी सिसकती वेदना- आज भग्न-स्वप्न की तरह सड़क के किनारे इन काग़ज़ों में सिसक रहे थे! पत्र, पेंसिल से पीले काग़ज़ों पर लिखे हुए थे। इन पत्रों में आतताइयों का वर्णन था। वह अभागा सैनिक ऐसे स्थान पर था, जिसे ‘नो मैन्सलैण्ड’ कहा जाता था, जहां केवल चूहे थे। औषधियों का अभाव था, बीमारियों का बाहुल्य था और वे वनस्पतियां थीं जो फुंसी-फोड़े, अंधौरी और ददौरी आदि के अतिरिक्त कुछ नहीं देती थीं।

वह अपनी बेटी को सांत्वना देते हुए लिखता है- ‘ मेरी बेटी! तुम भाग्यशाली हो। उन व्यक्तियों की ओर दृष्टि डाल कर देखो जिनके पिता, भाई, पति, पुत्र-पुत्री… युद्ध की वीभत्स-घृणित-भूख को मिटा ना सके। इसीलिये ही कहता हूं कि तुम कितनी भाग्यवान हो कि अभी भी तुम्हारा पिता इन पत्रों को लिखने के लिये जीवित है।’

बेटी ऐथल को अपने अंतिम पत्र में लिखता है- ‘मैं हर समय घर लौटने का स्वप्न देखता रहता हूं कि तुम और शारलौट (उनकी पत्नी) दरवाज़े पर मेरी बाट निहारते होंगे और मैं गले लगा कर, रो-रो कर अपने दमित उद्‌गार और उन यातना भरे क्षणों को खुशियों के आँसुओं के सैलाब में बहा दूं! किन्तु ईश्वर ही जानता है कि भविष्य में तुम से मिलने की यह आकांक्षा पूरी हो सकेगी या नहीं। मैं सदैव आशान्वित जीवन में जीता हूं।’

किंतु दुर्भाग्य और आशा के युद्ध में दुर्भाग्य ही जीत गया। 19 नवम्बर 1917 के दिन शत्रु के एक लड़ाकू-वायुयान के आक्रमण में घायल होने के कारण फ्रांस में न. 63, ‘केज़ुअलटी क्लीयरिंग स्टेशन’ में भर्ती हो गया। डॉक्टर और सर्जन उसे बचा न सके। 10 दिन के बाद अपनी प्यारी बेटी और प्रिया शारलॉट से मिलने की अधूरी अभिलाषा अपने साथ ले कर इस वैषम्य भरे संसार से 39 वर्ष की आयु में सदैव के लिये विदा ले ली!

उनकी पत्नी को युद्ध कार्यालय की ओर से एक औपचारिक सूचना मिली कि तुम्हारे पति जो लन्दन रेजिमेण्ट की 9वीँ बटालियन में सैनिक था, के शव को बेल्जियम में ‘हैरिंगे मिलिट्री कब्रिस्तान‘ में अंतिम संस्कार सहित दफ़ना दया गया।

इन पत्रों के साथ एक अखबार की कतरन भी थी जिसमें पश्चिमी रण-स्थल का नक्शा था। साथ ही था जॉर्ज वाइल्ड तथा शारलॉट एलिज़ाबेथ हॉकिन्स के विवाह का प्रमाण-पत्र जिसके अनुसार उन दोनो का विवाह 8 जुलाई 1900 में लन्दन के चेल्सी क्षेत्र में सेंट सिमंस चर्च में समपन्न हुआ था।

आज इन अमूल्य लेख्य-पत्रों को ठोकरों में स्थान मिला। पुलिस ने साल्वेशन आर्मी और अन्य संस्थाओं से संपर्क किया है किंतु इन दु:ख भरे दस्तावेज़ों के उत्तराधिकारी की खोज में अभी सफलता नहीं मिली।

(बेटी, कभी कभी न जाने क्यों मेरे मन में नकारात्मक विचार आ जाते हैं कि क्या मेरे पत्रों का भी यही हाल होगा ?)

प्यार भरे आशीर्वाद सहित
तुम्हारे डैडी

यह पत्र मिलते ही मेरी बेटी ने फौरन् ही टेलीफोन किया और कहा, ‘डैडी, जिस प्रकार आपने लंदन के वातावरण में भी मुझे इस योग्य बना दिया कि आपके हिंदी में लिखे पत्र पढ़ सकती हूं और समझ भी सकती हूं, उसी प्रकार मैं आपके नाती को हिंदी भाषा सिखा रही हूं ताकि बड़ा हो कर वह भी अपने नाना जी के पत्र पढ़ सके। आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं। मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!’

सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!

महावीर शर्मा

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(नोट: काफी भाग-दौड़ के बाद ये पत्र जार्ज की तीसरी पीढ़ी के व्यक्ति तक पहुंचा दिए गए.)

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20 Comments »

  1. 1
    vani geet Says:

    भावविह्वल कर दिया पिता और पुत्री के इस स्नेहमय संवाद ने ….अपने पिता का हस्ताखारित एक जवाबी लिफाफा अब तक संभल कर रखा है मैंने भी …!!

  2. वाकई भावुक कर दिया इस कथा ने…शब्द नहीं मिल रहे!!!

  3. आदरणीय दादा भाई प्रणाम
    कहानी को पढ़कर कुछ देर तक तो स्‍तब्‍ध रहा फिर एक बार पुन: कहानी को पढ़ा । पूरी कहानी एक विचित्र प्रकार की उदासी उत्‍पन्‍न करती है । नहीं समझ में आता कि ये उदासी क्‍यों है । कहानी में कुछ ऐसा है जो कि झकझोर देता है । पिता और पुत्री का रिश्‍ता हमेशा से ही सबसे अनोखा होता है । मेरे विचार में पिता और पुत्री का जो रिश्‍ता है वो सबसे अद्भुत होता है । पुत्री चाहती है कि उसके सपनों का नायक ठीक वैसा ही हो जैसे उसके पिता है । किसी भी पुरुष को सबसे ज्‍यादा प्रेम करने वाली होती है उसकी पुत्री । पुरुष के जीवन में यही वो स्‍त्री होती है जो टूटकर नेह करती है । दुर्भाग्‍य शाली होते हैं वे लोग जिनके बेटियां नहीं होती हैं । मुझे याद आता है कि मेरे मित्र श्री रमेश हठीला जी एक बार गंभीर रूप से बीमार हुए थे उनकी बेटी और बेटे दोंनो ही दूर थे दोनों को खबर कर दी गई । बेटी को सूचना मिलते ही वो भागती हुई मद्रास से सीहोर पहुंची जबकि बेटा जो अपेक्षाकृत पास हैदराबाद में था वो दो दिन बाद पहुंचा ।
    आपकी ये कहानी उसी सुंदर रिश्‍ते का एक और सुंदर पक्ष है । पूरी की पूरी कहानी एक बहुत ही सीधी जमीन पर चलती है जिसमें कहीं कोई उलझाव, प्रतीक बिम्‍ब डालकर पाठक के साथ फिजूल की बौद्धिक शब्दिक धींगामस्‍ती करने का प्रयास नहीं किया गया है । कहानी बिल्‍कुल कहानी ही की तरह है । कहानी सरलता के साथ गुजरती है ।
    कहानी का एक और जो प्रबल पक्ष है वो है युद्ध । युद्ध को लेकर काफी कुछ लिखा गया तथा हर बार उसकी वि‍भीषिका पर बातें हुई हैं । किन्‍तु युद्ध को लेकर इतने संवेदनशील तरीके से बहुत ही कम लिखा गया है । आपने ”जिनके पिता, भाई, पति, पुत्र-पुत्री… युद्ध की वीभत्स-घृणित-भूख को मिटा ना सके” इन पंक्तियों में मानो मानव सभ्‍तया के इतिहास में अभी तक हुए युद्धों की पूरी कहानी ही लिख दी है । युद्ध विषयक बहुत सी कहानियां हुई हैं लेकिन पिता और पुत्री को लेकर इस प्रकार का प्रयोग कम ही देखा है । आपने युद्ध के बारे में मौन रहा कर भी बहुत कुछ कह दिया है । उस सिपाही की कसक उसका दर्द सब कुछ मानो उभर कर सामने आ गया है । दादा भाई आखिर इन्‍सान कब तक युद्ध लड़ता रहेगा और कब तक बेटियां घर पर बैठी पिता के आने की राह तकती रहेंगीं कि शायद ये आहट पिता की ही है । उसे तो पता भी नहीं कि युद्ध की अंधी आग ने उसके पिता की आहुति ले ली है ।
    दादा भाई आपकी ये कहानी ओ हेनरी की कई सारी कहानियों को पूरी तरह से टक्‍कर दे रही है । मेरा एक सुझाव है कि आप इसका अंग्रेजी में अनुवाद करके इसे जरूर प्रकाशित करवाएं। क्‍योंकि ये जिंदा रहने वाली कहानी है । ये वो कहानी है जिसको लम्‍बे समय तक रहना है । कहानी में वो स्‍थान जहां पर आपने लिखा है कि उन पत्रों का कोई भी उत्‍तराधिकारी नहीं मिला वो पंक्तियां मानो उदासी को स्‍थाई रूप से अंकित कर देती हैं मानस पटल पर । ऐसा लगता है की समूची पृथ्‍वी उन पत्रों के उत्‍तराधिकारी को तलाश करने निकल गई है । वो कौन हैं जिनको वे पत्र लिखे गये थे । पत्र जो कही नहीं पहुंचे कभी नहीं पहुंचे । या शायद पहुंचे भी तो देर हो चुकी थी । दादा भाई ये पंक्तियां शुद्ध विषाद की पंक्तियां हैं । विषाद जो इस प्रकार से घनीभूत होकर उभरा है कि उसके बरसे बिन मन की बेकली नहीं जाती । बरसना, आंखों की राह से । लेकिन कभी कभी कुछ पीड़ाएं ऐसी होती हैं जो बरसने की राह भी नहीं ढूंढ पाती हैं । ये भी उसी प्रकार की पीड़ा है ।
    कहानी में दो मार्मिक पक्ष हैं पहला तो पिता का अपनी पुत्री के स्‍कूल के आस पास टहलने जाना । और दूसरा सैनिक पिता का पुत्री को पत्र । और आपने पूरी सफलता के साथ इस पीड़ा को शब्‍दों का जामा पहनाया है । ओ हेनरी मेरे बहुत ही पसंदीदा कहानीकार हैं । और इस पूरी कहानी को पढ़ते समय मुझे ये ही लगा कि मैं औ हेनरी की ही कोई कहानी पढ रहा हूं । एक बहुत बहुत बहुत बहुत अच्‍छी कहानी पढ़वाने के लिये आभार । मेरी इच्‍छा है कि आप इसका अंग्रेजी अनुवाद जरूर प्रकाशित करवाएं ।
    आपका ही अनुज सुगीर

  4. 4

    आदरणीय महावीरजी

    “सुबह सड़क पर गिरे कुछ काग़ज़ मिले जिन में किसी पिता के मर्म-स्पर्शी उद्‌गार भरे थे। ऐसा लगा जैसे कि उसकी आत्मा उन्हीं काग़ज़ों के पुलिंदे के इर्द-गिर्द भटक रही हो…………..” एक मर्म जो दिल को छू ही नहीं लेता, बल्कि दिल की पुराणी दीवारों को रक्त से पोत देता है.
    आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं। मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!’
    सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!महावीर शर्मा

    आपकी एक कहानी “वसीयत” भी कुछ ऐसा ही दर्द अपने सीने में लिए हुए थी. क्या विदेशों में अपनी जड़ों से जुदा होने का दर्द भी शामिल है. एक कभी न भूलने वाली कथा है! क्या कहूं क्या न कहूं. प्रसव पीड़ा सी अंगडाई दर्द मेरा क्यों लेता है?????

    देवी नागरानी

  5. 5
    Roop Singh Chandel Says:

    आदरणीय शर्मा जी

    निश्चित ही एक मार्मिक कहानी .

    बधाई.

    चन्देल

  6. 6

    दिल को छु जाने वाले भाव….बेहद भावुक संवाद …

    regards

  7. 7
    तिलक राज कपूर Says:

    आपकी कहानी का पिता रोज ही ना जाने कितनें संवेदनशील हृदयों में जीता और मरता है। सबके अपने-अपने युद्ध हैं । अंतत: सभी कोई न कोई लड़ाई अधूरी छोड़ अभिव्‍यक्ति के बिना ही इस मिथ्‍या जगत से विदा ले लेते हैं। आपकी लेखनी ने ऐसे कितने ही पिताओं को अभिव्‍यक्‍त किया है इसका अनुमान स्‍वयं आप भी शायद कभी न लगा पायें।
    इस सशक्‍त संवेदनात्‍मक सृजन के लिये साधुवाद।

    सादर,

    तिलक राज कपूर

  8. 8
    तिलक राज कपूर Says:

    पुनश्‍च:

    आज 3 दिसम्‍बर है, भोपाल गैस त्रासदी की बरसी। उस अंधियारी दुर्घटना को 25 वर्ष हो गये और आज भी उसी रासायनिक कचरे का ढेर जिंदा है और चीख-चीख कर कह रहा हैं कि मेरा निराकरण करो, इससे पहले कि मैं कुछ कर बैठूँ। क्‍या कोई ऐसी संवेदनशील व्‍यवस्‍था है जो इसका निराकरण कर सके?

  9. 9
    digamber Says:

    आदरणीय महावीर जी
    बहुत ही संवेदनशील, मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानी है ……. पिता पुत्री के प्रेम को, दिल में उठते जज़्बात को उत्कृष्ट भाव से रचा है ……. कहानी की उदासी पढ़ कर बरबस आँखें नम हो जाती हैं ……. ऐसा लगता है कोई सत्य है जो सामने ही घटित हो रहा है …… बेमिसाल ……. अद्वितीय …….. सजीव कहानी …………

  10. 10

    श्रद्देय महावीर जी,
    ”किंकर्तव्यविमूढ” की स्थिति में ले गये आप !
    निदा फाज़ली साहब का एक दोहा शायद यहां उपयुक्त है..
    मैं रोया परदेस में रोया, भीगा मां का प्यार
    दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  11. 11

    निश्चित ही मार्मिक और कालजयी रचना है। आपके लिये मैं अदना सी और क्या कह सकती हूँ शुभकामनायें

  12. 12

    वाह….. क्या कथानक चुना आपने…… भावविह्वल कर दिया…… नमन करता हूं, साब…. सुबीर जी ने विस्तार से लिखा ही है….

  13. 13
    Pushpa Bhargava Says:

    Sharma ji,
    It is a very interesting ,moving story. Pen definitely can do a lot more
    than actions. Hope we get more articles like that in future.
    Thanks

    Pushpa Bhargava

  14. 14
    Lavanya Says:

    आदरणीय महावीर जी, ये कहानी पहले भी पढी है ..इस बार भी भीतर तक रूला गयी
    ऐसा लगा मानो उस सैनिक का आज सही तर्पण हुआ हो ..

    😦

    आपने कथा कहनेवाले पिता के साथ पाठकों के मन को भी बाँध लिया है .
    ये कुशल रचनाकार की लेखनी का कमाल तो है ही , पर , हर व्यक्ति के अन्तरंग संबंधों के
    डोर की साकल कोइ खटखटा कर , भीतर प्रवेश करने को उतावला हो और झंझा का शोर
    प्रचंड हो उठा हो ऐसा भास् हुआ
    जब् मुझ जैसी एक बेटी के ह्रदय से भी यही पीड़ा और विषाद
    का स्वर उठ रहा था,
    ‘ आज के बिछुड़े , न जाने कब मिलेंगें ‘
    और पापा जी का गीत उनकी याद बन विह्वल कर गया –
    – आपकी बिटिया सुखी रहे –
    – भावी पीढी इन संचित , अमूल्य उत्तराधिकार की कीमत समझे ,
    यही मेरी प्रार्थना है .
    आप और भी लिखें
    जिससे अनुभव से रचे , शब्द हमारा मार्गदर्शन करें ..

    श्रध्दा के साथ,
    – एक बेटी के प्रणाम

  15. 15

    bahut marmik aur samvedansheel kahani… aapko dhero badhai… http://aakhar.org

  16. 16
    pran sharma Says:

    SHRI MAHAVIR SHARMA JEE KEE LEKHNEE SE NIKLEE SASHAKT KAHANI MAN KO BAANDHE
    RAKHTEE HAI. KAHANI KAA SABSE BADAA GUN HAI USMEIN MAANVIY SAMVEDNAA KAA HONA.
    KAHANI JITNEE BAAR PADHEE JAAYEGEE UTNEE BAAR NAYEE LAGEGEE.

  17. आदरणीय महावीर जी,
    कहानी पढ़ी. कमेन्ट देने में कुछ कठिनाई हो रही है.आप दे दे.
    हिंदी साहित्य में एक कालजई कहानी है जो सैनिक जीवन पर है ‘उसने कहा था’ पर आपकी इस कहानी ने वो सारी स्मृतिया मिटा दी और एक नए अहसास को मेरे अन्दर भर दिया है. मै हतब्रत हूँ. बहुत सार्थक और संवेदनशील कहानी लिखने के लिए बहुत सुक्रिया.आपकी कलम को नमन.
    अपनी पसंदीदा रचनाये ‘आखर’ के लिए भेजे.
    चंद्रपाल सिंह
    mumbai
    0987269764 / 02264104661

  18. 18

    आदरणीय,
    कहानी ने स्तब्ध कर दिया, एक हृदय स्पर्शी, भीतर कहीं अन्तः स्थल को छूती,
    याद रहने वाली कहानी..सुबीर इतना कुछ कह गए हैं कि वह मेरी ही आवाज़ बने हैं.
    एक अच्छी कहानी पढ़वाने के लिए आभारी हूँ …..

  19. 19
    Ranjana Says:

    MAN AISE BHAVUK HO GAYA AUR AANKHEN AANSUON SE AISE DHUNDHLAA GAYIN HAIN KI ANDAJE BHAR SE YE SHABD YAHAN TAANK RAHI HUN….

    DUNIYA KE KATHORTAM HRIDAY WALA INSAAN BHI IS PATRA KO PADH APNE AANSUON KO NAHI ROK PAYEGA….

  20. 20
    ashok andrey Says:

    aadarniya mahaveer jee aapki bahut aachchhi kahanee padne ko milee man ko gehre chhu kar stabdh kar gaaee itnee achchhi kahaanee padvaane ke liye mai aapko dhanyvaad detaa hoon


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