समीर लाल ‘समीर’ की पुस्तक ‘बिखरे मोती’ पर देवी नागरानी की समीक्षा

“वक्त की पाठशाला में एक साधक”-श्री समीर लाल समीर

कलम आम इन्सान की ख़ामोशियों की ज़ुबान बन गई है. कविता लिखना एक स्वभाविक क्रिया है, शायद इसलिये कि हर इन्सान में कहीं न कहीं एक कवि, एक कलाकार, एक चित्रकार और शिल्पकार छुपा हुआ होता है. ऐसे ही रचनात्मक संभावनाओं में जब एक कवि की निशब्द सोच शब्दों का पैरहन पहन कर थिरकती है तो शब्द बोल उठते हैं. यह अहसास हू-ब-हू पाया, जब श्री समीर लाल की रचनात्मक अनुभूति ‘बिखरे मोती’ से रुबरु हुई. उनकी बानगी में ज़िन्दगी के हर अनछुए पहलू को कलम की रवानगी में खूब पेश किया है-

हाथ में लेकर कलम, मैं हाले-दिल कहता गया

काव्य का निर्झर उमड़ता, आप ही बहता गया.

यह संदेश उनकी पुस्तक के आखिरी पन्ने पर कलमबद्ध है. ज़िन्दगी की किताब को उधेड़ कर बुनने का उनका आगाज़ भी पाठनीय है-

मेरी छत न जाने कहाँ गईस

छांव पाने को मन मचलता है!

इन्सान का दिल भी अजब गहरा सागर है, जहाँ हर लहर मन के तट पर टकराकर बीते हुए हर पल की आहट सुना जाती है. हर तह के नीचे अंगड़ाइयां लेती हुई पीड़ा को शब्द स्पष्ट रुप में ज़ाहिर कर रहे हैं, जिनमें समोहित है उस छत के नीचे गुजारे बचपन के दिन, वो खुशी के खिलखिलाते पल, वो रुठना, वो मनाना. साथ साथ गुजरे वो क्षण यादों में साए बनकर साथ पनपते हैं. कहाँ इतना आसान होता है निकल पाना उस वादी से, उस अनकही तड़प से, जिनको समीर जी शब्द में बांधते हुए ‘मां’ नामक रचना में वो कहते हैं:

वो तेरा मुझको अपनी बाहों मे भरना

माथे पे चुम्बन का टीका वो जड़ना..

जिन्दगी में कई यादें आती है. कई यादें मन के आइने में धुंधली पड़कर मिट जाती हैं, पर एक जननी से यह अलौकिक नाता जो ममता कें आंचल की छांव तले बीता, हर तपती राह पर उस शीतलता के अहसास को दिल ढूंढता रहता है. उसी अहसास की अंगड़ाइयों का दर्द समीर जी के रचनाओं का ज़ामिन बना है-

जिन्दगी, जो रंग मिले/ हर रंग से भरता गया,

वक्त की है पाठशाला/ पाठ सब पढ़ता गया…

इस पुस्तक में अपने अभिमत में हर दिल अज़ीज श्री पंकज सुबीर की पारखी नज़र इन सारगर्भित रचनाओं के गर्भ से एक पोशीदा सच को सामने लाने में सफल हुई है. उनके शब्दों में ‘पीर के पर्वत की हंसी के बादलों से ढंकने की एक कोशिश है और कभी कभी हवा जब इन बादलों को इधर उधर करती है तो साफ नज़र आता है पर्वत’. माना हुआ सत्य है, ज़िन्दगी कोई फूलों की सेज तो नहीं, अहसासों का गुलदस्ता है जिसमें शामिल है धूप-छांव, गम-खुशी और उतार-चढ़ाव की ढलानें. ज़िन्दगी के इसी झूले में झूलते हुए समीर जी का सफ़र कनाडा के टोरंटो, अमरीका से लेकर हिन्दोस्तान के अपने उस घर के आंगन से लेकर हर दिल को टटोलता हुआ वो उस गांव की नुक्कड़ पर फिर यादों के झरोखे से सजीव चित्रकारी पेश कर रहा है अपनी यादगार रचना में ‘मीर की गजल सा’-

सुना है वो पेड़ कट गया है/ उसी शाम माई नहीं रही

अब वहां पेड़ की जगह मॉल बनेगा/ और सड़क पार माई की कोठरी

अब सुलभ शौचालय कहलाती है,

मेरा बचपन खत्म हुआ!

कुछ बूढ़ा सा लग रहा हूँ मैं!!

मीर की गज़ल सा…!

दर्द की दहलीज़ पर आकर मन थम सा जाता है. इन रचनाओं के अन्दर के मर्म से कौन अनजान है? वही राह है, वही पथिक और आगे इन्तजार करती मंजिल भी वही-जानी सी, पहचानी सी, जिस पर सफ़र करते हुए समीर जी एक साधना के बहाव में पुरअसर शब्दावली में सुनिये क्या कह रहे हैं-

गिनता जाता हूँ मैं अपनी/ आती जाती इन सांसों को

नहीं भूल पाता हूँ फिर भी/ प्यार भरी उन बातों को

लिखता हूँ बस अब लिखने को/ लिखने जैसी बात नहीं है.

अनगिनत इन्द्रधनुषी पहुलुओं से हमें रुबरु कराते हुए हमें हर मोड़ पर वो रिश्तों की जकड़न, हालात की घुटन, मन की वेदना और तन की कैद में एक छटपटाहट का संकेत भी दे रहे हैं जो रिहाई के लिये मुंतजिर है. मानव मन की संवेदनशीलता, कोमलता और भावनात्मक उदगारों की कथा-व्यथा का एक नया आयाम प्रेषित करते हैं- ‘मेरा वजूद’ और ‘मौत’ नामक रचनाओं में:

मेरा वजूद एक सूखा दरख़्त / तू मेरा सहारा न ले

मेरे नसीब में तो / एक दिन गिर जाना है

मगर मैं/ तुम्हें गिरते नहीं देख सकता, प्रिये!!

एक अदभुत शैली मन में तरंगे पैदा करती हुई अपने ही शोर में फिर ‘मौत’  की आहट से जाग उठती है-

उस रात नींद में धीमे से आकर/ थामा जो उसने मेरा हाथ…

और हुआ एक अदभुत अहसास/ पहली बार नींद से जागने का…

माना ज़िन्दगी हमें जिस तरह जी पाती है वैसे हम उसे नहीं जी पाते हैं, पर समीर जी के मन का परिंदा अपनी बेबाक उड़ान से जोश का रंग, देखिये किस कदर सरलता से भरता चला जा रहा है. उनकी रचना ‘वियोगी सोच’ की निशब्दता कितने सरल शब्दों की बुनावट में पेश हुई है-

पूर्णिमा की चांदनी जो छत पर चढ़ रही होगी..

खत मेरी ही यादों के तब पढ़ रही होगी…

हकीकत में ये ‘बिखरे मोती’ हमारे बचपन से अब तक की जी हुई जिन्दगी के अनमोम लम्हात है, जिनको सफल प्रयासों से समीर जी ने एक वजूद प्रदान किया है. ब्लॉग की दुनिया के सम्राट समीर लाल ने गद्य और पद्य पर अपनी कलम आज़माई है. अपने हृदय के मनोभावों को, उनकी जटिलताओं को सरलता से अपने गीतों, मुक्त कविता, मुक्तक, क्षणिकाओं और ग़ज़ल स्वरुप पेश किया है. मन के मंथन के उपरांत, वस्तु व शिल्प के अनोखे अक्स!!

उनकी गज़ल का मक्ता परिपक्वता में कुछ कह गया-

शब्द मोती से पिरोकर, गीत गढ़ता रह गया

पी मिलन की आस लेकर, रात जगता रह गया.

वक्त की पाठशाला के शागिर्द ‘समीर’ की इबारत, पुख़्तगी से रखा गया यह पहला क़दम…आगे और आगे बढ़ता हुआ साहित्य के विस्तार में अपनी पहचान पा लेगा इसी विश्वास और शुभकामना के साथ….

शब्द मोती के पिरोकर, गीत तुमने जो गढ़ा

मुग्ध हो कर मन मेरा ‘देवी’ उसे पढ़ने लगा

तुम कलम के हो सिपाही, जाना जब मोती चुने

ऐ समीर! इनमें मिलेगी दाद बनकर हर दुआ..

देवी नागरानी

न्यू जर्सी,

dnangrani@gmail.com

**********

कृति: बिखरे मोती,
लेखक: समीर लाल ‘समीर’,
पृष्ठ : १०४, मूल्य: रु २००/ ,
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन,
पी.सी. लेब, सम्राट कॉम्पलैक्स बेसमेन्ट,
बस स्टैंड के सामने, सिहोर, म.प्र. ४६६ ००१
भारत.
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18 Comments »

  1. 1

    क्या बात है ?
    मन प्रसन्न हो गया………..

    वाह !
    बेहतरीन……………
    बधाई !

  2. आदरणीय दादा भाई शिवना प्रकाशन को जिस प्रकार से आपका सहयोग मिल रहा है उसे देख कर मैं अभिभूत हूं । कल ही श्री रमेश हठीला जी से मेरी बात हो रही थी और मैं उनको बता रहा था कि शिवना के पंख अब सात समंदर पार भी फैल चुके हैं और वहां पर दादा भाई आदरणीय महावीर जी जैसे संरक्षक शिवना को मिल गये हैं । समीर जी की पुस्‍तक शिवना के लिये एक मील का पत्‍थर है , उस पर देवी नागरानी जी की क़लम का जादू तो पूरे आलेख में सर चढ़ कर बोल रहा है । समीर जी का एक नया रूप इस पुस्‍तक के माध्‍यम से लाने का जो प्रयास शिवना ने किया था, उस पर पाठकों और समीक्षकों ने जैसे मोहर लगा दी है । सभी का आभार ।

  3. अब समीक्षा पर क्या कहें ,” बिखरे मोती ” पढ़ने को मिल जाती तो एक समीक्षा हम भी कर देते , आखिर यह अपना कर्म है और समीर भाई की पुस्तक पर समीक्षा करना तो धर्म भी है । फिलहाल बधाई इस विवेचना के लिये ।

  4. 4

    आपने सच कहा आदरणीय,

    हकीकत में ये ‘बिखरे मोती’ हमारे बचपन से अब तक की जी हुई जिन्दगी के अनमोम लम्हात है, जिनको सफल प्रयासों से समीर जी ने एक वजूद प्रदान किया है. ब्लॉग की दुनिया के सम्राट समीर लाल ने गद्य और पद्य पर अपनी कलम आज़माई है. अपने हृदय के मनोभावों को, उनकी जटिलताओं को सरलता से अपने गीतों, मुक्त कविता, मुक्तक, क्षणिकाओं और ग़ज़ल स्वरुप पेश किया है. मन के मंथन के उपरांत, वस्तु व शिल्प के अनोखे अक्स!!

    इस नायाब पुस्तक को पढ़कर हर कोई अभिभूत है।

  5. 5

    आभार इस सुन्दर समीक्षा की प्रस्तुती पर….

    regards

  6. समीर जी की कविताई करिश्माई है । बिखरे मोती पढ़ी नहीं – पढ़ने की उत्कंठा है । इस समीक्षा ने तो यह चाह और भी बढ़ा दी है ।आभार ।

  7. 8
    pran sharma Says:

    SABKE PYARE SAMEER LAL SAMEER JEE KEE KAA HARMAN PYARA BLOG HAI- UDANTASHTREE.
    LAGTAA HAI KI UNKAA KAVYA SANGARAH ” BIKHRE MOTEE” UDAN TASHTREE SE KATAEE KAM
    NAHIN HAI.VO BHEE LOKPRIYTA KE AAKAASH MEIN UDAAN BHAR RAHAA HAI.SAMEER,
    SUBEER AUR DEVI JEE KO BADHAAEE.

  8. 9

    Bahut achchee sameeksha ki hai..
    dekhte hain kab haath aati hai Sameer ji ki yah kitaab.

    abhaar

  9. 10

    मैं आदरणीय महावीर जी और प्राण शर्मा जी की तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ शिवना प्रकाशन की इस कृति के बारे में मेरे विचारों को प्रस्तुत करना.
    इसमें कोई शक नहीं –“”समीर जी की पुस्‍तक शिवना के लिये एक मील का पत्‍थर है “” उनकी लेखनी पुरअसर है और मन की तूलिका पर अपनी छाप छोडती रही –सुबीर जी और श्री रमेश हठीला जी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं कबूल हो.

    देवी नागरानी

  10. 11

    मैं आदरणीय महावीर जी और प्राण शर्मा जी की तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ कि शिवना प्रकाशन की इस कृति के बारे में मेरे विचारों को प्रस्तुत किया है .
    इसमें कोई शक नहीं –“”समीर जी की पुस्‍तक शिवना के लिये एक मील का पत्‍थर है “” उनकी लेखनी पुरअसर है और मन की तूलिका पर अपनी छाप छोडती
    रही –सुबीर जी और श्री रमेश हठीला जी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं कबूल हो.
    देवी नागरानी

  11. 12
    Neeraj Tripathi Says:

    bahut barhiya…Sameer ji ki pustak to barhiya hogi hi…
    Aadarniy Devi ji ki sameeksha parhkar achha laga..bahut achhe se likha hai…

  12. 13
    arsh Says:

    SAMEER JI KI PUSHTAK BIKHARE MOTI JIS TARAH SE SHIVANAA PRAKASHAN KA PANKH LAGAA KAR UDANTASHTARI KEE TARAH UD RAHI HAI USME KOI SHAK NAHI KE YAH EK MIL KA PATHHAR HAI NAYE LIKHHAADON KE LIYE… SAMEER JI WESE TO HASMUKH MAJAAKIYA HAIN MAGAR IS PUSHTAK ME UNKI GAMBHIRTA JIS TARAH SAMANE AAYEE HAI LOG UNSE RUBARU HO JAATE HAIN… WAKAI KAMAAL KI BATEN KAHI HAI SAMEER JI NE APNEE GAZALON SE CHHAND MUKTAK AUR NAZMON SE… DEVI JI NE JIS TARAH SE SAMIKHSHAA KI HAI IS PUSHTAK KI WO APNE AAP ME EK DHAROHAR KI TARAHA HAI ……. SAMEER JI AUR SHIVANAA PRAKASHAN KO BADHAAYEE ….

    ARSH

  13. 14
    Shrddha Says:

    Bikhre moti padhne ke liye lalaayit……………
    devi naagraani ji kee sameeksha ne pyaas aur bhi badha di hai

  14. 15
    urmi Says:

    बहुत सुंदर और शानदार समीक्षा लिखा है आपने ! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

  15. आप सभी के स्नेह का इतना आभारी हूँ जिसे व्यक्त करने की शब्द क्षमता मुझमें नहीं है.

    स्नेह बनाये रखिये.

  16. 17
    deobrat kumar Says:

    आदरणीय दादा भाई शिवना प्रकाशन को जिस प्रकार से आपका सहयोग मिल रहा है उसे देख कर मैं अभिभूत हूं । कल ही श्री रमेश हठीला जी से मेरी बात हो रही थी और मैं उनको बता रहा था कि शिवना के पंख अब सात समंदर पार भी फैल चुके हैं और वहां पर दादा भाई आदरणीय महावीर जी जैसे संरक्षक शिवना को मिल गये हैं । समीर जी की पुस्‍तक शिवना के लिये एक मील का पत्‍थर है , उस पर देवी नागरानी जी की क़लम का जादू तो पूरे आलेख में सर चढ़ कर बोल रहा है । समीर जी का एक नया रूप इस पुस्‍तक के माध्‍यम से लाने का जो प्रयास शिवना ने किया था, उस पर पाठकों और समीक्षकों ने जैसे मोहर लगा दी है । सभी का आभार ।


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