पंकज सुबीर की कहानी- ‘जब दीप जले आना’

“महावीर” और “मंथन” की टीम की तरफ से आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

diwali lamps

‘जब दीप जले आना’ –कहानी

पंकज सुबीर

Subeer Pankajवो लड़की आज भी उसी प्रकार खिड़की में नज़र आ रही है । दोनों तरफ खड़े ग़ुलमोहर के पेड़ों के ठीक बीच बनी हुई वह खिड़की दूर से देखने पर किसी चित्र की तरह नार आती है । उस मकान के जितने दूर से होकर वह रोज़ गुजरता है उतनी दूर से किसी की चीज़ के  बारे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, ठीक ठाक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता । उस मकान का एक पार्श्व उस ओर से दिखाई देता है जिस तरफ से वह निकलता है ।

कंटीले तारों की घेरदार बाड़ के  उस  तरफ  कुछ छोटे फूलदार पौधे लगे हैं । उसके बाद खड़े हैं गुलमोहर के दो पेड़ । जिसके बीच से नजर आती है मकान की वह दीवार जिसमें वह खिड़की बनी है । गहरे नीले रंग से पुती हुई खिड़की । इसी खिड़की पर शायद हाथों की टेक लगा कर उसी प्रकार खड़ी रहती है वह लड़की । रोज़ बिना नागा किसी नियम की तरह ।

एक माह हो गया है शिरीष को यहाँ आये तब से ही वह रास्‍ते कालेज आते और जाते समय इस दृष्य को  देख रहा है । ये नियम कभी नहीं टूटता । जिस सड़क से होकर वह गुजरता है उसके बाद एक बडा सा खाली मैदान है और उसके बाद है वह खिड़की वाला मकान । जो धीरे धीरे शिरीष के लिये कौतुहल और उत्सुकता का पर्याय बनता जा रहा है ।

मकान के ठीक समांनातर पर आकर शिरीष ने मकान की ओर  देखा । लडक़ी उसी प्रकार वहां थी, शिरीष को लगा कि वह लड़की मुस्कुरा रही है, फिर उसे अपने ही विचार पर हंसी आ गई । भला इतनी दूर से नज़र आ भी सकता है कि किसी के चेहरे पर किस प्रकार के भाव हैं ? यहां से तो उस लड़की की पीली फ्राक पर बने हुए लाल फूल भी ठीक ठीक दिखाई नहीं  देते हैं । पीली फ्राक ….? लाल फूल ….? चलते चलते शिरीष को अचानक झटका सा लगा, ये तो उसने कभी सोचा ही नहीं । एक माह से रोज़ वो लड़की इसी फ्राक में नज़र आ रही  है । उसने ठिठक कर मकान की ओर  देखा लड़की उसी प्रकार वहां थी । जरूर ही यह कोई पेंटिंग है जो किसी चित्रकार ने मकान की इस तरफ वाली दीवार पर बना दी है । उसने गौर से खिड़की की तरफ देखा और कुछ देर तक देखता रहा, लड़की इस बार उसे बिल्कुल स्थिर किसी पेंटिंग की तरह नज़र आई । उसने मुस्कुराते हुए अपने ही सर पर चपत लगाई ”फिजूल ही  एक पेंटिंग के चक्कर में एक महीने से परेशान है”  । और आगे बढ़ गया ।

शाम को जब कालेज से लौट रहा था तो अपनी सुबह की खोज पर मुस्कुराते हुए उसने खिड़की की ओर देखा एक बार फिर उसके पैर जम गये । लड़की खिड़की पर नहीं थी । एक माह में ये पहली बार हुआ है कि शिरीष को वह लड़की खिड़की पर  नहीं दिखाई  दी है । सुबह की उसकी खोज पर पानी फिर गया ।

कमरे पर लौटकर उसका किसी काम में मन नहीं लगा, एक ग्लास पानी पीकर पलंग पर  आकर  लेट गया । खिड़की के बाहर दिन के रात में परिवर्तित होने की क्रियाऐं चल रही हैं । आज पहली बार उस लड़की ने शिरीष को उलझन में डाल दिया है । एक विचित्र सा रहस्यमय आकर्षण उसे उस खिड़की की ओर खींच रहा है क्या यही प्रेम है ? फिर उसे अपने  ही फिज़ूल के विचार पर हंसी आ गई । इतनी दूर से नार आने वाली एक धुंधली सी आकृति भला प्रेम कैसे हो सकती है । मगर फिर है क्या आखिर ? क्यों खिंचाव सा महसूस हो रहा है उसे । कुछ तो है ।

लेटे लेटे ही शिरीष ने तय कर लिया कि  दीपावली के दिन वह जाएगा उस लड़की से मिलने । अगले सप्ताह दीपावली है,  दीपावली की छुट्टियों में घर जाने का उसका कोई कार्यक्रम नहीं है, यहाँ रहकर पढ़ाई करना चाह रहा है वह । दीपावली के दिन जाएगा वह उस लड़की से मिलने । और किसी दिन जाएगा तो शायद उस घर के लोग अन्यथा ले लें लेकिन दीपावली को कोई भी अन्यथा नहीं लेगा । उस लड़की से मिलना इस लिए भी ज़रूरी है क्योंकि वह लड़की अब उसकी पढ़ाई में बाधक बन रही है । निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से आया है वह, उसके माता पिता ने खुद के काफी सारे सपनों को स्थगित करते हुए उसे उसके सपने पूरे करने भेजा है यहां । वह किसी भी कारण  इन सपनों के खंडित टुकड़े लेकर पराजित योद्धा की तरह वापस नहीं लौटना चाहता ।

अगले  दिन जब शिरीष वहां  से गुज़रा तो लड़की वहीं थी, उसी प्रकार अपनी लाल फूलों वाली पीली फ्राक पहने हुए । मगर आज शिरीष को कोई तनाव  नहीं है दीपावली के दिन वह इस गुत्थी को सुलझा ही लेगा । शिरीष खिड़की की ओर देखकर मुस्कुराया आज फिर उसे लगा कि वह लड़की भी मुस्कु रा रही है । लड़की के मुस्कुराते ही खिड़की के दोनों तरफ खड़े गुलमोहर  के हरे भरे पेड़ भी मुस्कुराने लगे हैं । कंटीले तार के पास कतार में खड़े गुलाब के पोधों में चटक चटक कर कुछ कलियाँ फूल बनने लगी हैं और दिन की धूप ज़र्द से अचानक सफेद होकर चांदनी बनती जा रही है, हवाओं में धीमी धीमी घंटियां बजने लगी हैं, मानो कोई भेड़ों का  रेवड़ पास से होकर गुजर रहा हो । शिरीष स्तब्ध सा खड़ा उस खिड़की की ओर देखता रहा उसे लगा मानो मकान के पहिये लग गए हैं और वह मकान मैदान  को पार करता हुआ धीरे-धीरे  उसकी ओर बढता  आ रहा है । ”ए भाई अब चलो भी, रास्ता घेर कर क्यों  खडे हो ?” पीछे से किसी की आवाज़ सुनकर शिरीष की तंद्रा टूटी । ठंडी सांस छोड़ते हुए वह अपनी राह पर बढ़ गया ।

बीच के सात दिन बड़ी उहापोह में गुजरे शिरीष के । कई बार लगता कि कालेज जाते समय मुड जाए उस घर की ओर । मगर मर्यादाओं के प्रश् पैरों में गुंथ कर थाम लेते । क्या कहेगा वहाँ जाकर ? किसको जानता है वो वहाँ ? दीपावली का दिन ऐसा लगा मानो वर्षों  के इंताज़ार के बाद आया । जैसे समय का पहिया किसी रेतीले टीले में  फंसकर सुस्त हो गया  हो । उस पर भी दीपावली  का पूरा दिन काटना उसके लिए किसी युग को काटने  के समान हो गया । शाम  ढले जब सूर्य ने अपनी सत्ता मावस के अंधेरे असमान पर टिमटिमाते सितारों को सौंप कर अस्ताचल में विदा ली तो अंधेरे को चुनौती देते हुए जगमगा उठे हजारों हजार दीपक  । शिरीष ने कमरे से बाहर आकर देखा तो चारों तरफ पृथ्वी पर सितारे उतरे हुए थे । अंधेरा अपना साम्राज्य पसारना चाह रहा था पर विफल होकर कहीं अटका हुआ था । शिरीष ने घड़ी देखी आठ बज रहे हैं बाज़ार से मिठाई वगैरह खरीदने में आधा घंटा तो लग ही जाएगा । तब तक लक्ष्मी पूजन भी हो जाएगी तब ही जाना ठीक रहेगा । सोचता हुआ वह कमरे पर ताला लगा कर निकल पड़ा । बाजार से मिठाई खरीद कर लौटने में उसकी उम्मीद से ज्यादा समय लगा गया कितनी भीड़ थी दुकान पर आधे घंटे में उसका नंबर आया । मिठाई और शुभकामना संदेश खरीद कर लौट पड़ा वह ।

तिराहे पर आकर उसके पैर ठिठक गए यहाँ से ही तो एक रास्ता उस नीली खिड़की वाले मकान की ओर गया है । कुछ देर तक ठहर कर  सोचता रहा फिर सधे कदमों से उस मकान की ओर  जाने वाले रास्ते पर बढ़ गया ।  छोटा सा मकान खामोशियों में  डूबा हुआ था गेट के दोनों तरफ दीपकों की पंक्तियाँ  झिलमिला रहीं थीं जो कतार में मकान से जुड़ी पगडंडी को घेरते हुए मकान तक गईं थीं । मकान का वह पार्श्व जहाँ वह खिड़की है सामने से नज़र नहीं आ रहा था । गेट खोलकर शिरीष  अंदर आया और झिझकते कदमों से आगे बढ़ा।

”कौन ?”  गेट के खुलने और बंद होने की आवाज़ से अंदर से एक स्त्री स्वर आया ।

”जी मैं हूं शिरीष” अपने ही  उत्तर के अटपटेपन को महसूस किया शिरीष ने ।

कुछ देर में दरवाज़ा खुला, एक अधेड उम्र की महिला दरवाजे पर खड़ीं थीं । स्थिति असहज बनने से पहले ही शिरीष ने उनके हाथ में मिठाई का डब्बा तथा शुभकामना संदेश थमा कर उनके पैर छू लिए ”दीपावली की शुभकामानाएं आंटी”। ”बस बस ,खुश रहो । आओ, अंदर आओ” कहते हुए वे दरवाजे से हट गईं ।

अंदर आकर शिरीष ने देखा चारों तरफ ख़ामोशी बिछी हुई है ”तुम बैठो बेटा मैं अभी आती हूं ”  कह कर वो महिला अंदर चली गईं । कुछ  देर बाद एक प्लेट में नाश्ता वगैरह लेकर लौटीं । टेबल पर रखते हुए बोलीं ”लो बेटा दीपावली की मिठाई खाओ”।

मिठाई का एक छोटा सा टुकड़ा उठाते हुए कहा शिरीष ने ”और कोई नहीं है घर में ?”।

”मैं यहाँ अकेली ही रहती हूँ ” महिला का उत्तर सुनकर शिरीष को ऐसा लगा मानो कोई बड़ा पटाखा उसके ठीक पास ही चल गया हो । उसने देखा सामने दीवार पर एक लड़की की फोटो लगी है, उसने अटकते हुए पूछा ”और ये ? ” ।

” ये मेरी बेटी थी, दो साल पहले नहीं रही । ” महिला ने ठंडे स्वर में उत्तर दिया ।

महिला का एक एक शब्द शिरीष को किसी कुंए में गूंजता प्रतीत हो रहा था ”दोनो पैरों से विकलांग थी सुधा, मगर दोनो ऑंखें सपनों से भरी रहतीं थीं हमेशा । जैसे जैसे बडी होने लगी उसके सपने प्रेम की दस्तक सुनने की प्रतीक्षा में सुनहले रुपहले होने लगे । खिड़की पर बैठकर घंटों रास्ते की ओर देखती रहती । मानो किसी की प्रतीक्षा कर रही हो । किसी से प्रेम करना चाहती थी वह, और इसी लिए अपने जीवन में प्रेम की प्रतीक्षा करती रहती थी । दीपावली के दिन बाहर पगडंडी के दोनों तरफ कतार से दीपक लगवाती, मैं पूछती तो कहती ”इससे आने वाले को लगता है कि उसका स्वागत में पलके बिछीं हुईं हैं कोई उसके आने की प्रतिक्षा कर रहा है । सपने देखने वाली उसकी ऑंखें दो साल पहले अचानक बुझ गईं” कहते कहते महिला का कंठ रुंध गया ।

शिरीष अवचेतन से वर्तमान में लौटा और बोला ”सॉरी आंटी मुझे पता नहीं था”।

”कोई बात नहीं बेटा, मिठाई तो लो तुम तो कुछ ले ही नहीं रहे” महिला ने अपने को संभालते हुए कहा ”नहीं आंटी अब मैं चलूंगा, और भी जगह जाना  है मिलना है” कहते हुए शिरीष उठ कर खड़ा हो गया । महिला उसे गेट तक छोड़ने आईं । जब विदा लेकर वह चलने लगा तो पीछे से महिला की आवाज़ आई ”बेटा” । सुनकर शिरीष ठिठक कर पलटा  और बोला ”जी आंटी ” ।

वो महिला कुछ न बोली बस शिरीष की ओर देखती रही । शिरीष  भी चुपचाप खड़ा कुछ देर तक महिला के निचले होंठ और ठुड्डी में होते हुए कंपन तथा पलकों के भीगते किनारों को देखता रहा, फिर अचानक महिला ने कांपते स्वर में शिरीष की ओर देखते हुए पूछा

”क्या तुम्हें भी नज़र आई थी वह ?”

(समाप्त)

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अगला अंक: २१ अक्तूबर २००९
प्राण शर्मा की दो लघुकथाएँ
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24 Comments »

  1. 1
    pran sharma Says:

    KAHANI KAHNE YAA SUNAANE KEE EK KALAA HAI.PANKAJ SUBEER JEE NE KAHANI KAA
    TAANA-BAANAA BKHOOBEE BUNAA HAI.ACHCHHEE KAHANI KI SABSE BADEE VISHESHTA
    HAI KATHAVASTU KAA PRAVAAH.KAHANI MEIN PRAVAAH HO TO PAATHAK EK SAANS MEIN
    KAHANI PADH JAATAA HAI. YAH VISHESHTA ” TUM DEEP JALE AANAA ” KAHANI MEIN DEKHEE
    JAA SAKTI HAI.IS KAHANI KAA ANT MUJH JAESE PAATHAK KE HRIDAY PAR AMIT CHHAP CHHOD
    JAATAA HAI.BAHUT ACHCHHEE BHASHA-SHAILEE AUR UMDA SHILP KE LIYE PANKAJ JEE KO
    BADHAAEE .EK AUR BADHAAEE UNKO. AADHAARSHILA KE JULY ANK MEIN PRAKAASHIT UNKEE
    KAHANI PAR HINDI KE PRASIDDH VIVECHAK AUR AALOCHAK BHARAT BHARDWAAJ JEE NE
    LOKPRIY PATRIKA ” HANS” KE OCT.ANK MEIN VISHESH PANKTIYAN LIKHEE HAIN.

  2. 2
    mehek Says:

    rongate khade ho gaye , kahani ka antim para padhte huye, bahut achhi lagi katha.

  3. 3
    शैल अग्रवाल Says:

    ई मेल द्वारा:
    पंकज सुबीर जी की कहानी अच्छी लगी। एक विशेष मूड बनाती है। भाषा में प्रवाह और प्रभाव दोनों हैं।
    शैल अग्रवाल

  4. यह कहानी अब बहुत दिनों तक याद आयेगी. कहीं कुछ गहरा असर छोड़ गई अतृप्त अनुभूतियों का चित्रण और उन्हें अहसासने वाला मन. अच्छा सम्मिश्रण रहा इस कथा. बांधे रखा अंत तक. पंकज मास्साब को बहुत बधाई.

  5. पीली फ्रोक्क …लाल फूल वाली ड्रेस पहने हुए वह लडकी
    क्या फिर कभी दीखलाई देगी क्या
    कथा नायक शिरीष को ?
    यही सोच रही हूँ …………
    इतनी सजीव लगी यह कथा ..
    और मेरा भी एक अनुभव , एक आत्मा से ………., बहुत पहले हुआ था ..वह याद आया

    बधाई पंकज भाई आपको …….
    अब दीपावली की रात को , ये कथा जरूर याद आयेगी ..आती रहेगी याद …
    ” जब् दीप जले आना, जब् शाम ढले आना ”
    वाह ………..
    धन्यवाद आ. प्राण भाई साहब, आ. महावीर जी
    सभी को दीपावली की मंगल कामनाएं –
    सादर , स – स्नेह,
    – लावण्या

  6. बहुत सुगठित, प्रवाहमय, कलात्मक और पंक्ति पंक्ति रहस्य को बढ़ाती लेकिन प्रेतों के अस्तित्व में विश्वास जगाती कहानी! इसे पढ़ कर कोई पैंतालीस बरस पहले की मनोहर कहानियाँ याद आ गई।

  7. 7
    Roop Singh Chandel Says:

    Aadarniya Sharma ji

    Pankaj Subeer ki achhi kahani prakashit kahani padhvane ke liye aabhar.

    Chandel

  8. 8

    आँखें नम हो गयी। कहानी मे लम्बा चौडा कथानक या विश्य मा होते हुये भी इसकी गहराई पाठक को इस तरह बान्ध लेती है कि उसे पता नहीं चलता कब दिल मे उतर कर आँख से टपकने लगी है सुबीर जी एक संवेदनशील व्यक्ति हैं और संवेदनशीलता ही इस कहानी की पहचान है।जीवन की अनुभूतोयों और कल्पनाओं को पंख लगाना कोई पंकज जी से सीखे। और इन पंखों मे स्वाभाविक्ता का समावेश बनाये रखते हैं तभी कहानी प्रभावित करती है। इनकी कहानियों मे अक्सर देखा है कि न तो लम्बा चौडा कथानक होता है न ही पात्रों की संख्या बहु गिनती मे होती है फिर भी कहानी की गती और शिल्प मे कहीं ठहराव नहीं आता अपनी प्रभावोत्पादकता बनाये रखती है । पंकज जी को बहुत बहुत बधाई। और आशीर्वाद।अपका भी धन्यवाद ऐसे महान शब्दशिल्पियों से हमे रूब्रू करवाने के लिये। दीपावली की आपको व आपके परिवार को बहुत बहुत मंगल कामनायें आभार्

  9. कहानी का अंत वास्तव में बहुत रोमांचित करता है सचमुच रोम खड़े हो जाते हैं !!

  10. 10
    digamber Says:

    पीली फ्राक वाली लड़की ………….
    कहानी पढ़ते पढ़ते धीरे धीरे रहस्य बढ़ता गया पर अंतिम रहस्य …………. ये नहीं सोच सका था ……….. कहानी लाजवाब है …. सरल भाष में अच्छा प्रवाह है ……..

  11. 11

    दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामना…

  12. 12
    mohan Says:

    दीपावली पर्व की आप सभी को समस्‍त परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं वैभव लक्ष्‍मी आप सभी पर कृपा बरसाएं। लक्ष्‍मी माता अपना आर्शिवाद बरसाएं।

  13. 13

    पंकज जी की कहानियों का अंत चौकाने वाला होता है…उनकी ये खूबी उन्हें अपने समकालीन कहानीकारों से अलग और ऊपर रखती है…मन्त्र मुग्ध हो कर पढता रहा और अंत में झटका खा कर उठा…ग़ज़ब की कहानी…
    नीरज

  14. 14
    arsh Says:

    पलाश के बाद गुरु जी की ये कहानी और कुछ कहानिओं के साथ हमेशा ही याद रह जाने वाले हैं.. सच में गुरु जी की कहानियाँ ख़त्म होते ही चौका देती है आप नहीं सोच सकते के कहानी का अंत ऐसे होता है … पूरी तरह से बांधे रहती है कहानी ख़तम होने तक और यही कहानीकार का असल रूप होता है … बस यही कहूँगा के सादर चरण स्पर्श गुरु देव

    अर्श

  15. 15

    कहानी दिल को छू लेने वाली थी.शुरू से अंत तक बांधे रखा.इस दौर में आपकी कहानी पढ़कर महसूस हुआ कि सुबह की ताजा हवा सा साहित्य अभी भी लिखा जा रहा है.

  16. 16

    दिल को छू लेने वाली कहानी , पाठक को बांधे रखने में कामयाब रही है,,पढ़ते पढ़ते उसमें खो जाने की चाहना बनी रही . इस प्रयास में पंकज जी कलम की रवानी अपने साथ पाठकों को बाहने में सफल रही है जिसके लिए उन्हें बधाई है. और साथ में सभी को

    दीवाली मुबारक!
    बड़ी खुशनुमा याद की ताज़गी है
    वो मुरझाए फूलों को फिर से खिलाए
    दिवाली का त्यौहार सब को मुबारक
    ये त्यौहार ख़ुशियों का हर साल आए
    देवी नागरानी

  17. महावीर साहिब
    कभी देखी ना सुनी ऐसी कहानी पहले
    कहानी शुरू से रोचक है और अंत में रुला के रख देती है
    इस कहानी को अक्सर सराहा जायेगा और लेखक पंकज सुबीर को इस कहानी की वजह से
    हमेशा हर दीवाली को ख़ास करके याद किया जायेगा
    कलमकार की कलम को सलाम

    चाँद शुक्ला हदियाबादी

  18. सभी को आभार जो आप सब ने कहानी को पसंद किया । कोई भी रचना तभी सफल मानी जाती है जब पाठक उसको पसंद करे ।ये कहानी मेरी एक जिद है । असल में कुछ लोगों को जब कहानी दिखाई थी तो उन्‍होंने कहा कि कहानी का अंत बदलो । लेकिन मुझे लगा कि नहीं ये ही अंत श्रेष्‍ठ होगा । ये जानकर बहुत सुखद लगा कि मंथन के पाठकों ने अंत को पसंद करके मेरी जिद पर मोहर लगा दी । आदरणीय दादा भाई महावीर जी का आभारी हूं कि उन्‍होंने एक अच्‍छा मंच इस कहानी को प्रदान किया । सभी का दिल से आभार ।

  19. 19
    ankit Says:

    गुरु जी आपकी ये कहानी और उफ़ क्या अंत ……..
    बहुत ही प्रभावपूर्ण कहानी, जो पाठकों के लिए बहुत कुछ छोड़ देती है.
    पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

  20. 20
    तिलक राज कपूर Says:

    आपकी कहानी की पीली फ्राक पहने लड़की भले ही कुछ पाठकों को एक कहानीकार की कल्‍पना लगे लेकिन यह प्रकृति के अनसुलझे रहस्‍यों में से एक है। प्रश्‍न यह है कि ऐसी स्थिति व्‍यक्ति विशेष के साथ ही क्‍यों निर्मित होती है? मैं कहानी का तत्‍वज्ञानी तो नहीं लेकिन मानता हूँ कि कहानी के लिये आवश्‍यक होता है कि स्थितियों का ताना-बाना प्रस्‍तुत कर कुछ प्रश्‍न खड़े करे, ऐसा करने में यह कहानी सक्षम है।

  21. 21
    Shardula Says:

    बड़ी रोचक कहानी! ऎसी जिसे बीच में छोड़ के उठा नही जा सकता ! सुबीर जी की कहानियां सधी हुई होती हैं, जिसे चाहे पाठक की नज़र से पढें या आलोचक की, कांट-छाँट की कम ही गुंजाइश रहती है. किसी भी कहानीकार के लिए यह बड़ी उपलब्धी होगी.
    हाँ सुबीर जी, मैं भी शायद उन ही लोगों में से होती जो आपको कहते, भैया अंत बदलिए, क्योंकि मेरा विश्वास और मान्यता यही कहती है :), पर frankly speaking ये अंत भी बाँध गया हमें ! बहुत खूब!
    आदरणीय महावीर जी को बहुत धन्यवाद, इस कहानी से रू-ब-रू कराने के लिए!
    देर से कहानी पढ़ने के लिए क्षमा चाहती हूँ, पर्वों के कारण इन्टरनेट पे आना थोड़ा अनियमित हो गया था.
    सादर …

  22. मैं सुबीर जी का धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने ‘मंथन’ के पाठकों के लिए एक ऎसी कहानी पढ़ने का अवसर दिया है जो केवल लोकरंजन मात्र न होकर एक संवेदनशील कहानी है. इसमें सुबीर जी के अंतर का कहानीकार पूरी सफलता के साथ उभर कर आया है. भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित सुबीर जी की पुस्तक ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ से ही वे उच्चकोटि के कहानीकारों में विशेष स्थान बना चुके हैं.
    ‘जब दीप जले’ में देखा जा सकता है कि भावों को शब्दों में इस रोचकता से ढालें हैं कि एक बार पढ़ना शुरू होते ही कहानी के अंतिम शब्द तक आँखों को हटाना लगभग असंभव सा ही होजाता है. पाठक को ऐसा महसूस होने लगता है जैसे वह स्वयं कहानी का एक पात्र बन गया हो.
    इसके अतिरिक्त यदि आप ‘नया ज्ञानोदय’ में सुबीर जी की ‘प्रेम क्या होता है…? और ‘आधारशिला’ पर ‘महुवा घटवारिन’ पढ़ें तो मानिए आप निराश नहीं होंगे.

    ‘नया ज्ञानोदय’ PDF में है जो नीचे दिए लिंक से लिया जा सकताहै:-
    http://jnanpith.net/ny.pdf
    ‘आधारशिला’ :-
    http://adharshilapatrika.blogspot.com/2009/10/blog-post_4043.html

    अंत में आप सभी पाठकों और अपनी प्रतिक्रियाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद.

  23. एक अजीब-सी झुरझुरी या ऐसा की कुछ पूरे वजूद को कंपकपा गया…अभी-अभी जब ये लिख रहा हूं तो एक सिहरन सी रह-रह कर दौड़ जा रही है।
    पहली पंक्ति से लेकर आखिर तक विचित्र ढ़ंग से कहानी बाँधे रखती है और अंत….उफ़्फ़्फ़्फ़!

    कहानी कहने का कौशल अपने चरम पर है यहाँ !

  24. 24
    Simarpreet Singh Arora Says:

    very nice comments


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