प्राण शर्मा की कहानी- ‘पराया देश’

pran_sharma1

(लावण्या जी और समीर जी के अनुरोध पर प्राण शर्मा जी लम्बी कहानी ‘पराया देश’ प्रस्तुत है. यह कहानी ‘कादम्बिनी’ के दीवाली विशेषांक नवम्बर १९८३ में प्रकाशित हुई थी. ‘उषा राजे सक्सेना’, ‘रमाकांत भारती’ और ‘हिमांशु जोशी’ के प्रवासी कथा-संकलनों में यह कहानी भी शामिल हैं.)

मस्तिष्क को झंझोड़ देने वाली कहानी जिसमें स्वदेश के लिए एक प्रवासी की तड़प है, हर सुविधा के बावजूद अकेलेपन का अहसास है. इसी कशमकश और छटपटाहट के भावों को कलम के जादूगर प्राण शर्मा ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त किये हैं. पाठक पढ़ कर कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध हो जाता है.
मेरे दो शेर प्राण शर्मा जी, कहानी के नायक और प्रवासियों के लिए अर्पित हैं:
अपने ग़मों की ओट में यादें छुपा कर रो दिए
घुटता हुआ तन्हा, कफ़स में दम निकलता जाए है।

हर तरफ़ ही शोर है, ये महफ़िले-शेरो-सुख़न
अजनबी इस देश में हम तो अकेले हो गए !
महावीर शर्मा
—————————————————————-

पराया देश

– प्राण शर्मा

टाइल हिल लेन के बस स्टाप से अन्य यात्रियों में एक अधेड़ उम्र की अंग्रेज महिला मेरी बस में चढ़ी. टिकेट लेते समय उसने मुझसे कहा कि वो दो स्टापों के बाद ” हर्सल  कामन ” के स्टाप पर उतरना चाहती है. कह कर वो इत्मीनान से एक खाली सीट पर बैठ गयी . मैं बस दौड़ाने लगा.

पिछले कुछ सालों से इंग्लॅण्ड के सभी शहरों की बसों में कंडक्टर की सेवाएँ समाप्त  कर दी गयी हैं. यात्रियों को टिकेट देने का काम अब ड्राईवर ही अपनी सीट पर बैठा-बैठा करता है. यात्रियों को चढ़ाना-उतारना, उन्हें टिकेट देना, बस को चलाना यानि कि पूरी बस का संचालन करना अब ड्राईवर की ही जिम्मेदारी है. बड़ी सावधानी का काम है. इसलिए उनकी  वीकली वेज  भी अच्छी है.

हर्सल  कामन तक के  रास्ते में  बस पकड़ने वाला कोई और यात्री नज़र नहीं आया मुझको. मैं भूल ही गया कि उस महिला को हर्सल कामन पर उतारना था. बस तेज स्पीड से दौड़ने लगी.
” ड्राईवर, बस रोको, मुझे ये स्टाप चाहिए.” उस महिला ने चिल्ला कर कहा. मेरे कानों के परदे जैसे फट गए. मुझको अपनी गलती का अहसास हुआ. मैंने देखा कि हर्सल कामन का
स्टाप पीछे छूट गया था. अब तो अगला स्टाप आनी वाला था. मैंने तुंरत बस रोकी. बड़े विनय से उस महिला को सोरी कहा. इंग्लॅण्ड की परम्परा है कि सोरी कहने से दूसरा व्यक्ति शांत हो जाता है लेकिन वो महिला शांत की बजाय मुझ पर बरस पड़ी. लगी लेने मेरे यूनिफार्म और बस के नंबर. डर के मारे मेरे पसीने छूटने लगे sad-male05कि कहीं वो “पर्सोनल” से मेरी शिकायत नहीं
कर दे. मैं  गिड़गिड़ा कर उस से क्षमा मांगने लगा. लेकिन वो लाल-पीली हुए जा रही थी. कुछ यात्री भी उसका साथ दे रहे थे. खुद को असहाय पाकर मैंने बड़ी नम्रता से कहा- “मैडम, हम सब इंसान है. गलती किससे  नहीं होती है?” वो मुझे “यू ब्लैक बास्टर्ड ” और ” पाकी” कहती हुई क्रोध से तिलमिलाती हुई बस से उतर गयी.

बस “पूल मेडो” के बस अड्डे पर पहुँची. मेरा चालीस मिनट का ब्रेक था. चाय पीने के लिए मैं कैंटीन चला आया. चाय का प्याला लेकर हरबंस सिंह के पास जा बैठा. सारी घटना उसे सुनाई. उस महिला का मुझको “ब्लैक बास्टर्ड” और ” पाकी”  कहना हरबंस सिंह  को मज़ाक लगा. मुझ पर हंस कर वो दूर जा बैठा और अन्य साथियों से गपशप मारने लगा.

“हम लोगों का जमीर मर गया  है” सोचते हुए मैं मन ही मन में रुआंसा हो गया. नीचे आकर अन्य मनस्क सा ‘पूल मेडो’ का चक्कर लगाने लगा. मैं उस घटना को भूलना चाह रहा था लेकिन भूल नहीं पा रहा था. उस महिला का अशिष्ट और जला-भुना व्यवहार और उस पर हरबंस सिंह की उपेक्षा मुझी बार-बार कचोट रही थी. यहाँ अँगरेज़ युवकों का हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी लोगों को ” पाकी” कहना आम है. लेकिन आज एक भद्र और सभ्य दिखने वाली महिला के मुख से ऐसे घिनौने शब्द सुनकर मैं विचलित हुए बिना नहीं रह सका. मन-मस्तिष्क में असंख्य सुईयों का चुभना मैंने महसूस किया. बड़ी कठिनाई से दोबहर के दो बजे मैंने ड्यूटी समाप्त की. ओवर टाइम लिया हुआ था. उसे वापस कर घर पहुंचा. मैं धड़ाम से कुर्सी में जा धंसा.

बच्चे स्कूल में थे. सुषमा भी काम पर थी. कुर्सी में धंसा-धंसा मैं छत को निहारने लगा. न जाने कब गहरी सोच में डूब गया मैं. इंग्लॅण्ड में क्या रखा है? इससे तो अच्छा अपना भारत देश ही है. माना कि वहां कुछ आर्थिक विषमताएं हैं लेकिन कोई ‘ब्लैक बास्टर्ड’ या ‘पाकी’ कहने वाला तो नहीं है. जहाँ मान  नहीं, इज्ज़त नहीं, वहां रहना ही क्यों? ये धन, ये गाड़ियां किस काम की? आपमान का जीवन भोगने से तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना अच्छा है. किसी ने सच कहा है कि पराये देश में सुख और आराम से जीने से अपने देश की गरीबी और मौत कहीं ज्यादा अच्छी है.

सोलह साल पहले मैं और मेरी पत्नी अटल इरादा लेकर भारत से इंग्लॅण्ड में आये थेकि यहाँ पांच साल रह कर,खूब धन कमाकर भारत लौट जायेंगे. खूब धन कमा लिया है लेकिन दोनो अभी तक यहीं पड़े हैं दोनो, ब्लैक बास्टर्ड और पाकी सुनने के लिए. भारत वापस जाने के लिए पत्नी से कई बार तकरार भी होती है. मेरी बात का कोई असर नहीं होता है,  न पत्नी के सामने और न ही बेटों-बेटी  के सामने. किसी ने सच ही कहा है कि पति का जोर तब तक ही पत्नी पर है जब तक औलाद बड़ी न हो जाए.

भारत में भाई-बहन, यार-दोस्त आदि सभी याद करते हैं. लिखते हैं- “अब तो भारत लौट आओ ,कितना समय हो गया है तुम सबको विदेश में रहते हुए…. लगता है, तुम लोगों ने अपना देश भुला दिया है. “क्या करूँ, मैं भारत जाने को तैयार हूँ लेकिन सुषमा भारत जाने की नेक सलाह पर नाक-भौं चढ़ा लेती है. हर बार वो टका सा जवाब देती है–” हमें नहीं जाना भारत. यहीं सुखी हैं हम. आप भी खूब हैं, लोग कितना खर्च करके अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लॅण्ड में भेजते हैं और एक आप हैं कि यहाँ पढ़ रहे अपने बच्चों को उखाड़ कर भारत ले जाना चाहते हैं. सरला अगले साल “ऐ लेवल” करके यूनीवर्सिटी में चली जायेगी. उमेश और दिनेश भी पढ़ाई में अच्छे है. भारत में वे न इधर के रहेंगे और न ही उधर के. आपभारत जाना चाहते हैं तो शौक से जाइये. हम यहीं अच्छे हैं.” सरला, उमेश और दिनेश भी अपनी माँ की बात में “हाँ” मिलाने लगते हैं. उमेश तो उछल कर कहता है -“पापा, हम इंडिया नहीं जाएँगे, नहीं जायेंगे. वहां तो मक्खियाँ ही मक्खियाँ हैं . मक्खियों में आप जाकर रहिये.

इंग्लॅण्ड के टी.वी. पर भारत के पिछड़े इलाकों की गरीबी और गंदगी दिखा-दिखा कर ये अँगरेज़ हमारे बच्चों में भारत के प्रति कितनी हेयता की भावना पैदा कर रहे हैं. भारत सरकार न जाने क्यों इन लोगों को भारत के पिछड़े  इलाकों की तस्वीरें लेने देती हैं? पिछड़े इलाके सही लेकिन ज़मीर तो ऊंचा है .

” अरे, बेटे, भारत तो स्वर्ग है, स्वर्ग. सुन्दरता का दूसरा नाम है भारत. चलो, मेरे साथ. मैं दिखाऊंगा तुम्हें उसकी सुन्दरता.”

” लेकिन पापा, अँग्रेज कौम का खाना-पीना, रहना-सहना और उठाना-बैठना सलीके का है. कितनी सफाई इस कौम में. भारत के लोग गंदे हैं, गंदे. आपने ही तो एक बार कहा था कि भारत में कई लोग दीवारों से सट-सट कर पेशाब करना शुरू कर देते हैं. “उमेश का अंतिम वाक्य सुनकर सरला और दिनेश के हंसी का फव्वारा फूट पड़ता है.

मैं उनकी हंसी पर ध्यान न देकर कहता हूँ- “ये मत भूलो कि हम भारतीय हैं. हम यहाँ हजारों साल रह लें लेकिन रंग से भारतीय ही रहेंगे. अँगरेज़ हम कभी न बन पायेंगे और न ही अँगरेज़ लोग हमें अँगरेज़ के रूप में स्वीकार करेंगे. हम प्रवासी भारतीय ही कहलवाएंगे. यहाँ की संस्कृति, यहाँ की सभ्यता के प्रभाव हम अपना सब कुछ खो रहे हैं . अँगरेज़ लोग लगभग दो सौ वर्ष भारत में रहे लेकिन वे भारतीय रंग में नहीं रंगे. हम हैं कि कुछ ही सालों में अँग्रेजी रंग में रंग गए हैं. भारतीय नवयुवक तो अब अपने नामों से ही घृणा करने लगे हैं. कोई जानी है और कोई स्टीवन. आनंद अपने को एंडी कहलवाता है. हरि अपना नाम हैरी बताता है और कपूर अपने को कूपर कहलवाना अधिक पसंद करता है. बेटो,ये मत समझना कि मैं कोई उपदेश दे रहा हूँ. मैं तुम को समझा रहा हूँ, एक बाप की हैसियत से. अपना देश अपना होता है और पराया देश पराया. मेरी इस बात को समझोगे तो फायदे  में रहोगे. भारत में रह कर अँगरेज़ इस बात को समझे. आप भी समझो”.

मेरी किसी बात का असर न तो बच्चों पर पड़ता है और न ही पत्नी पर. सब की एक ही रट है कि वे भारत नहीं जायेंगे. इंग्लॅण्ड में रहेंगे सदा के लिए. सरला उल्टे मुझे ही समझाने लगती है-“पापा, आप भारत जाकर, कुछ सालों में ही आपको खाने-पीने के लाले पड़ जायेंगे. यहाँ फिर दौड़े आयेंगे आप.”

कुछ सोच कर वो मुझसे प्रश्न करती है-“आप यहाँ किसलिए आये थे” ? खुद ही उसका उत्तर देने लगती है- “धन के लिए न. धन कमा लिया तो इसका मतलब ये तो नहीं कि आप बोरिया-बिस्तर बांधकर नौ-दो ग्यारह हो जाएँ यहाँ से. ये तो स्वार्थ हुआ न. जिस देश ने आपको खाने के लिए भोजन दिया, रहने के लिए घर दिया, घूमने के लिए गाड़ी दी, धन से आपकी तिजोरी भर दी, उस देश से चले जाना, विमुख हो जाना, क्या आप इसको उचित समझते हैं?”

मैं कुछ कह नहीं पाता  हूँ. मुझे निरुत्तर देखकर सरला फूली नहीं समाती है. इन गोरों के चिमचों को कैसे समझाया जाए कि पराया देश तो पराया देश देश ही है. सदा के लिए पराये देश में टिकना अपनी सभ्यता और संस्कृति से हाथ धोना है. लेकिन ये बच्चे मानते ही नहीं हैं. मेरे ही नहीं सब के बच्चों का यही हाल है. अपने को ब्लैक बास्टर्ड और पाकी कहलवाना सहन कर लेंगे पर अपने देश में बसना इन्हें पसंद नहीं. कभी-कभी पत्नी और बच्चों की बातों से इतना तंग आ जाता हूँ कि सोचता हूँ कि मैं अकेला ही भारत लौट जाऊं. फिर सोचता हूँ कि अगर अकेला भारत मैं लौट गया तो वहां सगे-संबन्धी और यार-दोस्त पूछेंगे कि पत्न्नी-बच्चे कहाँ छोड़ आये? इसी उलझन और कश्मकाश में भारत लौटने का इरादा टाल जाता हूँ. वर्ना यहाँ के भेद भरे जीवन में रखा ही क्या है. हाल के रिपोर्ट के अनुसार इंग्लॅण्ड में रंगभेद  की समस्या इतनी जटिल हो रही है कि यहाँ की पुलिस भी अब अपराध के मामले में एशियन और काले लोगों से ज़्यादा पूछताछ करती है.

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आती है. मेरी विचार-श्रृंखला टूट जाती है. थकी नज़रों से मैं घड़ी देखता हूँ. सवा चार बज रहे हैं. सुषमा और बच्चे लौंज में प्रवेश करते हैं. मुझे कुर्सी में अस्तव्यस्त सा धंसा देखकर शुष्मा मुझसे पूछती है-

“बड़े उखड़े -उखड़े हो .क्या तबीअत ठीक नहीं?”

” कुछ नहीं.” मैं अनमने भाव से कहता हूँ.

” कुछ तो जरूर है?” अपना बैग टेबल पर रखते हुए वह फिर मुझसे पूछती है.

” कहा न, कुछ नहीं ”

” आप कुछ छिपा रहे हैं. बताएं न, क्या बात है ?” वह कोट उतार कर पास वाली कुर्सी पर बैठ जाती है और कुछ क्षणों तक मेरा उतरा हुआ चेहरा पढ़ते हुए कहती है- “लगता है कि आज फिर किसी पैसेंजर से आपकी तू-तू , मैं-मैं हो गयी है.

” हाँ.” मैं रुंधे स्वर में स्वीकार करता हूँ.”

” क्या बात हुई?”

मैं सारी घटना सुषमा को सुनाता हूँ. सुनते ही वो जोर खिलखिलाकर हंस पड़ती है-

“आप तो यूँ ही छोटे सी बात को दिल से लगा लेते हैं..” उसका इस तरह से हंसना मुझे अच्छा नहीं लगता है. मैं घायल शेर की तरह बिफर पड़ता हूँ- “तुम हर बात को टाल जाती हो. अंग्रेजियत क्या हुई कि तुम लोग मानसिक रूप से गुलाम हो गए हो उसके. तुम लोगों की सोच मर गयी है. मैं अब भी कहता हूँ कि इस देश में ज़्यादा दिन टिकना ठीक नहीं है. वह और टाइम था जब यहाँ हर एक को काम मिलता था. अब लाखों बेकार हैं. गोरों को नौकरियां मिलती नहीं, हमारे बच्चों को कहाँ से मिलेंगी? गोरों को पहले ही हमसे चिढ़ है कि हमारे पास दो-दो कारें हैं, रहने को अपना घर है और अच्छा बैंक बैलेंस है. एक बार हालत खराब हो गए, साम्प्रदायिक दंगे छिड़ गए तो हम सब को अपनी-अपनी कमाई यहीं छोड़कर भागना पड़ेगा. तब हमें अपना देश याद आएगा. मेरी बात अपने पल्ले बांधो. बच्चों को लेकर हम भारत चलते  हैं.”

सुषमा गुस्से भरी नज़रों से मेरी ओर देखती है. सदा की तरह इस बार भी उस पर मेरी बात का असर नहीं पड़ता है. वो असंयत होकर कहती है- “तौबा, इतनी भावुकता! आप भारत की संस्कृति ओर सभ्यता की बात करते हैं, सब संस्कृतियाँ और सभ्यताओं का मेल-जोल  हो रहा है अब. हमारी तरह हजारों-लाखों लोग यही सोच कर इंग्लॅण्ड में आये थे कि धन कमाकर पांच सालों में वे लौट जायेंगे. सुविधाएँ पाकर सभी यहाँ रह गए हैं. रही भेद-भाव की बात, सो मैं आपसे पूछती हूँ कि भारत इससे अछूता है? क्या वहां साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते? वहां तो एक प्रांत के लोग दूसरे प्रांत के लोगों से भी मिल-जुल कर नहीं रहते हैं. आपस में इतना अलगाव है कि मराठी अपना मकान पंजाबी को किराये पर देने के लिए तैयार नहीं है और पंजाबी मराठी को नहीं. कौन है वहां सच्चा भारतीय? सभी साम्प्रदायिक हैं. सभी प्रांतीयता के संकुचित दायरे में बंधे हैं. आये दिन वहां से किसी न किसी साम्प्रदायिक दंगे की खबर सुनने में आती है. यहाँ कभी कोई छोटी सी घटना हो भी जाती है तो आप शोर मचाने लगते हैं. आप भारत में गणित के अध्यापक थे. हिसाब लगाकर बताईये कि यहाँ पर साम्प्रदायिक दंगे अधिक होते हैं या वहां पर? अब भारत में जाइये और देखिये वहाँ पर अंग्रेजियत के चमत्कार. दांतों तले उंगली दबा लेंगे आप. नयी पीढ़ी की न तो अपनी भाषा है और न ही अपना लिबास ही. और तो और बड़ों के प्रति आदर और सत्कार की भावना भी उनमें मर सी गयी है. भारत को आज़ादी मिले कितने साल हो गये हैं लेकिन गरीबी वहीँ की वहीं है. लोग अब भी बेचैन हैं. किसी को सुख-शांति नहीं है. मंहगाई का बोलबाला है. गुज़ारा मुश्किल से हो रहा है. पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं. धक्के खाने पड़ रहे हैं उन्हें. कोई काम आसानी से नहीं बनता है. रिश्वत का दैत्य मुंह खोले खडा है. क्या आप वो दिन भूल गये हैं जब आपको अपने पासपोर्ट के लिए दौड़-धूप  करनी पड़ी थी. रिश्वत  देने के लिए आप क्लर्क से लड़ पड़े थे. उससे हाथा-पाई होते-होते बची थी आपकी. सब कुछ जानते-समझते हुए भी आप सच्चाई से आँखें मूंदते हैं. यहाँ की सुख-सुविधाओं से मैं अपने बच्चों को वंचित नहीं होने दूंगी. मैं ही क्या कोई माँ ऐसा नहीं होने देगी. लोग इस देश में आने के लिए तरसते हैं. आप हैं कि —————-”

बोलते -बोलते सुषमा उठ खड़ी होती है और किचन में चाय बनाने  के लिए चली जाती है. आज पहली  बार मैंने उसे अपने दिल का गुबार निकालते हुए देखा. उसकी बातों से मैं इतना गुमसुम हो गया कि मुझे इतनी खबर भी नहीं रही कि बच्चे उठकर कब ऊपर चले गये. मुझे उसका आभास तभी होता है जब सुषमा किचन से उन्हें आवाज़ देती है-

” सरला, दिनेश और उमेश नीचे आओ .चाय तैयार है.”

सरला, दिनेश और उमेश नीचे आते हैं. सुषमा टेबल पर चाय,बिस्कुट, सैंडविच  आदि सजा देती है. तीनों बच्चे मुझे अब तक कुर्सी में धंसा देखकर मेरे पास आते हैं और गुदगुदी करने लगते हैं, “उठो न पापा, चाय ठंडी हो रही है .”

इतने में मैं देखता हूँ कि सुषमा भी मेरे पास खड़ी है और बड़े प्यार-मनुहार से कह रही है- “अगर आप इस देश से इतना ही तंग आ गये हैं तो एक दिन यहाँ से हम चले जायेंगे. बस बच्चों की शिक्षा पूरी और अपने पैरों पर उन्हें खड़ा हो जाने दें.”

मैं सोचने लगता हूँ कि सुषमा कितनी होशियार बनती है ! आज वो बच्चों की शिक्षा पूरी और उनको अपने पैरों पर खड़ा हो जाने की बात करती है, कल उनके ब्याहों के बहाने बनाने लगेगी. और फिर उनके बाल-बच्चों के——–.

-प्राण शर्मा

Advertisements

18 Comments »

  1. बहुत आभार..अब इत्मिनान से पढ़ता हूँ.

  2. 2
    रूपसिंह चन्देल Says:

    प्राण जी,

    ’पराया देश’ पढ़ गया. हालात बिल्कुल नहीं बदले. वास्तविकता के धरातल पर एक अद्भुत कहानी. नायक की पीड़ा के साथ पाठक पीडित होता है तो सुषमा यह कथन कि ’क्या भारत में साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते? वहां मराठी पंजाबी को मकान किराये पर नहीं देता और पंजाबी मराठी को’ एक क्रूर सत्य को शर्मा ने उद्घाटित किया है. आज तो मराठी मराठियों के अतिरिक्त मुम्बई में किसी अन्य को बर्दाश्त करने को ही तैयार नहीं हैं. हां, कुछ परिवर्तन हुआ है कि कुछ युवक आज उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना तो चाहते हैं, लेकिन वे वहां नौकरी नहीं करना चाहते.

    इतने वर्षों बाद भी यह कहानी उतनी ही — बल्कि उससे कहीं अधिक सार्थक है.

    प्राण जी आपको बधाई और महावीर जी को इसे पुनः प्रकाशित करने के लिए बधाई.

    रूपसिंह चन्देल

  3. आदरणीय प्राण जी, कहानी नें आख नम और मन को भारी कर दिया। आप की लेखनी और स्वदेश प्रेम को नमन।

  4. 4

    साधु ! साधु !
    वाह प्राण शर्माजी,
    बधाई शब्द बहुत छोटा पड़ रहा है………….
    नमन ठीक रहेगा…
    ____________नमन आपको !
    बहुत ख़ूब !

  5. वाह भाई साहब आँखें नम कर दीं. एक समय था जब मेरा बोरिया बिस्तरा बंद रहता था भारत लौटने के लिए. भारत में परिवार की जिम्मेदारियां लम्बी खींचती चली गईं और मेरा सामान यहाँ खुलता गया. कहानी के मुख्य पात्र के दर्द को बहुत करीब से महसूस कर सकती हूँ. एक उम्दा कहानी के लिए बधाई.

  6. काफी देर से शब्द ढूंढ रही हूँ टिपण्णी देने के लिए पर यथोचित शब्द नहीं मिल रहा…..

    बहुत बहुत लाजवाब कथा……पीडा को आपने इतने प्रभावी ढंग से रखा है कि उसे सहजता से अनुभूत किया जा सकता है…

  7. कहानी उसीको कहते हैं जो पाठक शुरू तो अपनी मर्जी से करे लेकिन ख़त्‍म कहानी के हाथ में हो । मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ । सोचा था कि सरसरी निगाह से कहानी को देख लूंगा था क्‍योंकि अभी व्‍यस्‍तता है, बाद में इतमीनान से बैइ कर पढ़ूंगा भी और कमेंट भी करूंगा । किन्‍तु प्राण साहब ने तो मोटी जंजीर से बांध डाला ऐसे कि पूरी कहानी पढे बिना चैन ही नहीं आया । अभी भी हाथों की सूजन के बाद भी कमेंट कर रहा हूं । क्‍योंकि मुझे लगा कि कमेंट तो अभी करना चाहिये । क्‍योंकि अभी मैं कहानी के आनंद में डूबा हूं । आपके पात्र कहीं से भी कहानी के पात्र नहीं लग कर जीवन के ही पात्र लग रहे हैं । पूरी की पूरी कहानी एक पीड़ा का दस्‍तावेज़ है । दस्‍तावेज़ जिसमें सनद है कि देश की सीमा के बाहर जाकर सम्‍मान के साथ जीना कितना मुश्किल है । प्राण साहब की लेखनी को तो चुराना होगा पर क्‍या करें मजबूरी ये है कि वे इंग्‍लैंड में हैं और भारत में । यदि वे भारत में होते तो किसी बहाने से जाकर उनकी लेखनी चुरा लाता । आदरणीय प्राण शर्मा जी, आदरणीय महावीर शर्मा जी और आदरणीय तेजेन्‍द्र शर्मा जी आप सब लोग धन्‍य हैं जो वहां सात समंदर पार रह कर भी अपनी मातृभाषा के प्रति अपने कर्तवय का निर्वाहन कर रहे हैं । मुझे विश्‍वास है कि आप जैसे हिंदी सेवी ही हिंदी को अंतत: वह सम्‍मान दिला पायेंगें जो हिंदी का है । नत हूं आप सब के सामने । प्राण शर्मा जी के बारे में तो अब लिखने के लिये कोई नया शब्‍दकोश ही लाना होगा । मेरे पास जितने शब्‍द थे वे तो समाप्‍त हो गये । हाथ के दर्द है इसलिये इतना ही लिख पा रहा हूं । और कोई अवसर होता तो कहानी के बराबर ही कमेंट करता इस कहानी पर क्‍योंकि ये कहानी है ही उतने उच्‍च स्‍त्‍र की ।

  8. 8
    Lavanya Says:

    ऐसी कथा लिखी है आदरणीय प्राण भाई साहब ने मानों
    हमारे परिवार के किसी बड़े ने अपने मन की पीडा व्यक्त की हो –

    मार्मिक मन के भाव तथा परिवेश के बीच के घर्षण की ये एक सचित्र कथा है

    पत्नी, बच्चे तथा वह अभद्र अँगरेज़ महिला भी सजीव से लगे —

    मुश्किलें , हर देश में है –

    प्रवासी भारतीय की पीडा ,

    सिर्फ वही जानता है जिसने इसे भुगता हो —

    कोइ कहेगा तब आप , परदेस गए ही क्यूं ?

    तो उत्तर है,

    मनुष्य वहीं रहता है, जहां उसका नसीब उसे खींच ले जाता है – –

    आदरणीय महावीर जी ने मेरे अनुरोध पर ध्यान दिया और लम्बी तथा मार्मिक कथा

    ” मंथन ” पर प्रस्तुत की

    उसके लिए
    आपका बहुत बहुत आभार ………

    आशा है

    भविष्य में आदरणीय महावीर जी की लम्बी कहानी भी यहीं पढने का सुख मिलेगा

    आप दोनों को सादर स स्नेह नमस्कार ,

    – विनीत,
    – लावण्या

  9. 9
    Shrddha Says:

    पराया देश कहानी में जहाँ भारतीय मन की पीड़ा और अपने घर लौट जाने की कसक है वही सुविधाओं का नशा है
    भारत से कितने ही लोग कुछ समय में लौटने का सोच कर बाहर आते हैं फिर लौटने के लिए कोशिश करते रहते हैं
    कभी पैसे की भूख नहीं खतम होती तो कभी सुख का नशा रोक लेता है
    भारत की मक्खियाँ, गंदगी, रिश्वत और ऐसी कई बीमारी को देख कर मन घबरा जाता है
    मगर भारत में अपने घर में जो सकून है जो गर्व है जो
    सुख है वो कहीं नहीं है
    हलाकि इंसान की फितरत है उसे बदलाव कम ही पसंद आता है
    फिर ये तो जिंदगी उथल पुथल कर देने जितना बदलाव है
    बच्चों का नजरिया समझने लायक है
    उन्होंने भारत के उस सुख को नहीं जाना और उनके लिए तो ये देश ही उनका है
    कहानी
    का अंत भी बहुत अच्छा था पत्नी का अपनी सोच और चिडचिडाहट को कह देना पर फिर भी अपने पति को इस बात के मनाना उसकी भारतीय मानसिकता बताती है
    जो उसे पति के खिलाफ जाकर काम करने से मन करती है
    माँ और पत्नी के बीच सामंजस्य बैठती सुषमा का व्यक्तिव बहुत सजीव है

  10. 10

    यूँ तो मैं गुरूदेजी की किसी रचना पर कुछ कहूँ मेरी कलम मे इतना सामर्थ्य तो नहीं है मगर कहानी पढ कर इतनी भाव विहल हो गयी कि लिखे बिना रह ना सकी इसके लिये गुरूदेव से क्षमा प्रार्थी हूँ ।कहानी पढते हुये कहीं नहीं लगा कि कहानी पढ रही हूँ लगा कि नायक मेरे सामने है और अपनी व्यथा सुना रहा हो और मै नम आँखों से उसे देख रही हूँ गुरूदेव प्राण जी की लेखनी को तो सदा ही नमन करती हूँ आत्मकथानक मे लिखना शायद सब से मुश्किल काम होता है इसमे कथ्य कथानक शैली शिल्प हर भाव लाजवाब है शब्दों के अथाह सागर मे डूब कर पता ही नहीं चला कि किनारा कब आ गया । अपने देश से अलग होने का दर्द बाखूबी एक एक शब्द मे झलकता है मगर नायक की पत्नि की बात भी सही है कि भारत का हाल भी अब सही नहीं है। दो देशों, दो भावनाओं, के सं तुलन को इस तरह शब्द दिये हैं कि पाठक सोचने पर मज्बूर हो जाता है कुछ पल के लिये । ये कहानी हर उस आदमी की है जो विदेश मे है । इसमे नायक और नायिका दोनो अपनी अपनी जगह सही हैं यही इस कहानी की विशेशता है । बहुत सुन्दर लाजवाब ्र्मस्पर्शी कहानी के लिये गुरूदेवजी को बधाई और आपका आभार्

  11. यद्यपि श्री रूप सिंह चंदेल जी टिप्पणी दे चुके हैं, लेकिन वे ई मेल में पुन: कहते हैं:-

    आदरणीय शर्मा जी,
    प्राण जी की कहानी पर दूसरी टिप्पणी मेरी थी. सुबह सबसे पहले यह कहानी पढ़ी और रहा नहीं गया.
    बधाई,
    चन्देल

  12. ई मेल द्वारा कृष्णबिहारी जी का सन्देश:
    pran ji,
    aapki kahani ek saans mein padh dali.abhi abhi aapka mail mila tha.kahani ek vidroop sach ko dikhati hai.achhi hai.26 saal pahle yah jaroor charcha mein aayee hogi.
    nikat ka agla ank 2 maheene mein aayega.main soochit karoonga.
    krishnabihari

  13. 13
    HARI SHARMA Says:

    प्रणाम

    बहुत काबिल लोगो़ ने बहुत कुछ कह दियाजो कहने का मन था.
    यही कहुन्गा
    अद्भुत
    मन को छूने बाली
    प्रासन्गिक
    कथा
    जिसे सब यहा वहा जी रहे है और महसूस कर रहे है.

  14. 14

    behtrin kahani aapki…. abhi vichar manthan chal raha hai..jald hi lamba comment dunga…chandrapal@aakhar.org

  15. 15
    neeraj Says:

    प्राण शर्मा साहब की कलम की येही खूबी है, उसकी नोक से निकले शब्द पाठक को जकड लेते हैं, मष्तिष्क के तंतुओं को झकझोरते हैं…पराये देश में रहने की पीडा और अपने देश के बुरे हाल दोनों को सामान रूप से उजागर करती ये कहानी अद्वितीय है…
    प्राण शर्मा साहब की प्रशंशा में शब्द अब कम पड़ने लगे हैं…अब तो उन्हें पढ़ कर मैं आँखें बंद कर सर झुका देता हूँ…
    नीरज

  16. 16

    हर तरफ़ ही शोर है, ये महफ़िले-शेरो-सुख़न
    अजनबी इस देश में हम तो अकेले हो गए !
    महावीर शर्मा

    प्राण जी की कहानी पराया देश एक मर्म है जो दिल को छूकर रुक गया है.

    तन्हा तन्हा जिंदगानी खुद को लेकर चल रही
    चलते चलते साथ उसके काफिले होते गए

    देवी नागरानी

  17. 17
    सुशील कुमार Says:

    कहानी लंबी है, वक्त निकाल कर पढूंगा।

  18. 18
    ashok andrey Says:

    bahut khoob itni achchhi rachna ke liye mei aapko badhai deta hoon vakei videsh mei rehkar hii svadesh kii yaad mann ko gehre chhu jaati hei jise bachche nahi samajh paate hein kyonki unke sapne unhen sochne nahi dete hein aur hum ——-? khamosh nigahon se apni jameen ke liye tarasten hein aur ek dard ko jise apne seene mei chhipae rehte hein use niharne ke sivaaya kuchh nahi kar paate hein achchhi kahani ke liye badhai sveekar karen

    ashok andrey


RSS Feed for this entry

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: