यू. के. से प्राण शर्मा की दो लघु कथाएँ

pran_sharma round

मजबूरी

-प्राण शर्मा

बचपन  में सरोज जब अपने साथियों को काजू-मेवे खाते हुए देखता तो उसके मुंह में पानी भर आता. उसका मन करता कि वो भी जी भर कर काजू-मेवे खाए. काजू-मेवे वो खा नहीं सकता था.उसके माँ-बाप गरीब थे. इतने गरीब के वे अपने बेटे के लिए मूंगफली भी नहीं खरीद सकते थे. दोस्तों से काजू-मेवा मुफ्त में लेकर खाना सरोज के लिए भीख मांगने के बराबर था. कोई उसपर तरस खा कर काजू-मेवे के कुछ दाने दे,ये भी उसको मंज़ूर नहीं था. एक दिन सोहन ने काजू के कुछ दाने उसको दिए थे लेकिन उसने न कह दिया था.

बचपन बीता यौवन आया. सरोज की काजू-मेवे खाने की चाह पूरी न हो सकी . गरीबी उसे घेरे रही.

बुढापे का प्रवेश हुआ. गरीबी ने सरोज का पीछा नहीं छोडा.

एक दिन सरोज घर लौट रहा था. उसकी नज़र एक बोर्ड पर पड़ी. लिखा था-” एक रूपये की लोटरी टिकेट खरीदो और अपनी गरीबी भगाओ.” उस की जेब में एक रुपया ही था.  पढ़ कर वो बढ़ गया..कुछ कदम बढ़ा ही था, वो  मुड़ पडा. मन मारकर उसने ज़ेब से एक रुपया निकाला और लोटरी का टिकेट खरीद लिया.

सरोज की लोटरी लग गयी. खुशी को वो बर्ताश्त नहीं कर सका. हार्ट अटैक से उसे अस्पताल में दाखिल होना पड़ा. ठीक हुआ तो हार्ट स्पेशलिस्ट ने उसे डाएटिशियन के पास भेज दिया.

चूँकि सरोज को कोलेस्ट्राल भी था, इसलिए डाएटिशियन ने उसे ऐसा डाएट चार्ट बना कर दिया जिसमें चिकनी चीज़ों की साथ-साथ काजू-मेवे खाना उसके लिए बिलकुल वर्जित था.

उसने पढ़ा तो वो मन मार कर रह गया.

ज़ेब में ढेर सारे रुपयों -पैसों के होने पर  भी सरोज  काजू-मेवे नहीं खा सकता था.

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संतोष

-प्राण शर्मा

बेटे ने माँ से कहा-” मुझे साइकिल लेकर दो. स्कूल आते-जाते थक जाता हूँ
मैं. बहुत लंबा रास्ता है.”

माँ को बेटे की मांग जायज़ लगी. उसने साइकिल खरीदने में देर नहीं लगाई. बेटे से बोली-” खुश है न अब ?”

” खुश हूँ.” बेटे ने संतोष प्रकट किया.

कुछ दिनों के बाद बेटा फिर माँ से बोला-“मेरे कई साथी ऑटो रिक्शा में स्कूल
आते-जाते हैं. मेरे लिए ऑटो रिक्शा लगवा दो न माँ?”

माँ ने सोचा कि लंबा रास्ता है. बेचारा बेटा साइकिल चलाते-चलाते थक जाता होगा. सही कहता है वो. माँ ने ऑटो रिक्शा लगवा दी.

“अब तो खुश है न.?” माँ ने पुचकारते हुए बेटे से पूछा.
” बहुत खुश.” बेटे ने झूम कर कहा.

कुछ दिनों के बाद बेटा फिर माँ से बोला “मेरे कुछ मित्र हैं. वे अपने-अपने पिता जी की कार में स्कूल आते-जाते हैं. मुझे भी पिता जी की कार में स्कूल आना-जाना है. तुम कार खरीद दो न”.

माँ को गुस्सा आया. गुस्से में उसने ऑटो रिक्शा बंद करवा दिया और साइकिल भी बेच दी. बेटे से बोली – “अब तू पैदल ही स्कूल आये-जाएगा.”

-प्राण शर्मा

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महावीर

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18 Comments »

  1. दोनों कथायें बढ़िया लगी. इच्छाओं की इति नहीं है..एक पूरी हो जाये तो दूसरी..यही कथा है दूसरी वाली..और हमारा हाल भी ऐसा ही है. अब लग रहा है कि प्राण जी लघु की जगह विस्तृत कथा पेश करें तो आनन्द आ जाये. 🙂

  2. समीर लालजी ने सही कहा। इच्छाओं की इति कभी नहीं होती। जो चाहते हैं, कभी होता नही।

  3. 3

    dono kahaniyan sunder hai par saroj ko kaju mewe ek din to kha hee lene chahiye the jindagi gribee me katee cholestrol kahanse ho gaya ?

  4. 4
    mehek Says:

    dono kahniyaa bahut sunder hai,mann ki chah kabhi rukti hi nahi,mann ko aur chahiye ,bahut kuch. ichha aur lobh hi bhare hai us mein.pehli kahani wale nayak par shayad kismat hi ruthi rahi.kabhi kaju mewa jo nahi kha sake.

  5. 6

    छोटी छोटी कहानियों से बड़ी बड़ी सीख देना प्राण साहेब की विशेषता है…दोनों कहानियां पढने के बाद सोचने को विवश करती हैं…ये ही तो कमाल है प्राण साहेब की लेखन शैली में …नमन है उन्हें मेरा…
    नीरज

  6. 8

    बहुत सुन्दर कहानियाँ है आदनी को किसी तरह संतुश्टी नहीं है ।सरोज भी अपनी इच्छाओं को सीमित ना रख सकी इस लिये दुख झेलना पडा । और दूसरी कहानी मे माँ को पहले ही लडके की हर aइच्छा पूरी नहीं करनी चाहिये थी इस तरह आसानी से इच्छ्हा पूरी होते देख बच्चों की आपेक्षायें बढ जाती हैं बहुत सुन्दर सन्देश देती कहानिया आदर्णीय प्राण जी को बधाईआउर आपका आभार्

  7. 10

    प्राण जी कि लघुकथाएं अपने सन्देश को मानवता के मन पर दस्तक देने में नहीं चूकती, यही सकारात्मक पक्ष है इस विधा का, छोटे के दयिरे में बड़े ही कारगर सन्देश पहुँचाना. ये रिशतों कि पहचान कराती हुई लघुकथाएं बहुत ही अनूप लगी. बधाई के saath
    देवी नागरानी

  8. 11

    दोनों लघु कथायों ने सुन्दर सन्देश दिया है. आभारी हूँ.
    बधाई.

  9. 12
    Lavanya Says:

    प्राण भाई साहब से अब लम्बी कथा की गुजारीश हम भी करते हैं 🙂

  10. 13
    digamber Says:

    DONO HI LAGHU KAHANIYA YATHAARTH KA CHITRAN HAIN ……………. KUCH KNA KUCH JEEVAN KA SANDESH DETI HAIN ….. ICHAA AUR AASHAA KA KOI ANT NAHI HAI …… PAR PAR APNI ICHAAON PAR ANKUSH RAKHNA HI JEEVAN KA SAAR HAI NAHI TO SAB KUCH ULAT BHI SAKTA HAI ……..AADARNIY PRAAN JI KI KALAM SE DONO KATHAYEN PADH KAR AANAN AA GAYA …

  11. 14
    Shrddha Says:

    Mazburi ko padhte hi man mein bus ek hi khyaal aaya
    jab daant the to khana nahi aur khana tha to aant nahi thi

    Mazburi ko padhte hi man mein bus ek hi khyaal aaya
    jab daant the to khana nahi aur khana tha to aant nahi thi

  12. 15
    Shrddha Says:

    Santoshi sada sukhi ye is kahani se sabak milta hai

  13. प्राण शर्मा जी की लघुकथाएँ बहुत रोचक हैं और इनमें जो सन्देश दिए हैं, वे व्यक्ति को जीवन के लिए सकारात्मक राह दिखाती है.
    प्राण शर्मा जी को अनेक धन्यवाद और बधाई. साथ ही आप सभी को टिप्पणियों के लिए धन्यवाद.

  14. 17
    सुशील कुमार Says:

    बेहतरीन ! काजु-किसमिस वैसे भी ज्यादा नहीं खाना चाहिये, न बच्चों को ज्यादा बेलगाम करना चाहिये।

  15. 18
    ashok andrey Says:

    priya bhai pran jee aapki dono laghu kathaen kaphii gehre sandesh liye hue hei aadmi ki lachaari use kis mod par laa patkti yahi iski saphaltaa hei meri aur se badhai sveekar karen
    ashok andrey


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