दिसम्बर 10th, 2008 के लिए पुरालेख

सीमा गुप्ता की दो कविताएं

दिसम्बर 10, 2008

सीमा गुप्ता की दो कविताएं

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मृगतृष्णा

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
seema-gupta-1ढूँढ़ा तुमको तकदीरों में
चन्दा की सब तहरीरों में
हाथों की धुँधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम

इन आंखों की तस्वीरों में

कैसी ये ………………….

अम्बर के झिलमिल तारों में
सावन में रिमझिम फुहारों में
लहरों के उजले किनारों में
तुमको पाया तुमको पाया

प्रेम-विरह अश्रुधारों में

कैसी ये…………………….

ढूँढ़ा तुमको दिन रातों में
ख्वाबों ख्यालों जज्बातों में
उलझे से कुछ सवालातों में
बसते हो तुम बसते हो तुम

साँसों की लय में बातों में

कैसी ये……………………..

ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम

हर्फ बने जब उठी दुआयें

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी

“यादें”

सीमा गुप्ता

बहुत रुला जाती हैं , दिल को जला जातीं हैं ,
नीदों मे जगा जाती हैं , कितना तड़पा जातीं हैं ,
“यादें” जब भी आती हैं ”

भीगे भीगे अल्फाजों को , लबों पर लाकर ,
दिल के जज्बातों को , फ़िर से दोहरा जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं ”

खाली अन्ध्यारे मन के , हर एक कोने में ,
बीते लम्हों के टूटे मोती , बिखरा जाती हैं ,
“यादें जब भी आती है ”

हम पे जो गुजरी थी , उन सारी तकलीफों के ,
दिल मे दबे हुए , शोलों को भड़का जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं ”

कितना सता जाती हैं , दीवाना बना जाती हैं ,
हर जख्म दुखा जाती हैं , फिर तन्हा कर जाती हैं ,
“यादें जब भी आती हैं”