‘लिख चुके प्यार के गीत बहुत’

कविता पुरानी है किंतु कुछ शब्दों में संशोधन करके यहां दुबारा लिख रहा हूं। पुरानी
टिप्पणियां भी यथावत् नीचे दी गई हैं।

*** *** *** ***

लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

तू तो सृष्टा है रे पगले कीचड़ में कमल उगाता है,
भूखी नंगी भावना मनुज की भाषा में भर जाता है ।
तेरी हुंकारों से टूटे शत्‌ शत्‌ गगनांचल के तारे,
छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे।

छोड़ो रम्भा का नृत्य सखे, अब शंकर का विषपान लिखो।।

उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्‍वान लिखो।।

मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।

महावीर शर्मा

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22 Comments »

  1. पढते पढते भावुक हो उठा। महावीर जी एसी रचना का रचरिता असाधारण सोच का धनी है..आपकी रचनाधर्मिता को मेरा नमन।

    “छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे” इस पंक्ति “छिः” का प्रयोग एक अनूठा प्रयोग है।

    अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
    माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

    कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
    भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

    लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।

    बहुत सुन्दर रचना, बधाई।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

  2. बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर! बधाई!

  3. 3

    अति सुंदर..
    कवि कुलवंत सिंह

  4. 4

    शर्मा जी मार्मिक कविता लिखा है कवि को जन गीत गाना ही चाहिये ,
    साधुवाद

  5. बहुत ही अच्छा लगा इस रचना को पढ़कर, महावीर जी. बहुत मार्मिक रचना है, बधाई.

  6. 6
    राकेश खंडेलवाल Says:

    सदा रहा हू मौन प्रशंसक, कलम आपकी जो कुछ लिखती
    उसके बारे में लिख पाऊम शब्द नहीं कुछ मिल पाते हैं
    छन्दों में ढल कर मानस के सहज भाव की अभिव्यक्ति को
    अक्सर ही हम पिरो राग में सुधियों में रकह्ते जाते हैं

  7. 7
    ranjana Says:

    अति सुंदर..मार्मिक रचना है,

    मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
    जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।

  8. 8

    बहुत सुन्दर रचना है ।
    घुघूती बासूती

  9. 9
    divyabh Says:

    आदरणीय सर,
    रचना तो यह उत्तम हैं ही वरन मानवीय संस्कारों की वह भीतरी सतह को स्पष्ट करती है जो हम जानते हुए भी अंजान बने रहते है…नया उद्देश्य नये उमंग की तरफ एक इशारा भी है…सर बहुत ही स्तरीकृत रचना है जिसपर टिप्पणी करना महज़ अर्थ पूरा करना है…

  10. 10
    Neeraj Tripathi Says:

    Itni maarmik rachna arse baad parhne ko mili …
    bahut sunder.

  11. फिर से:

    बहुत ही अच्छा लगा इस रचना को पढ़कर, महावीर जी. बहुत मार्मिक रचना है, बधाई.

  12. बहुत अच्छा लिखा है…सुंदर भाव है…..
    लाजवाब……

  13. 14
    lavanya Says:

    Bahut achcha hua ki aapne ees Chandobadhdh rachna ko punah prakashit kiya !
    Behad uddat bhaav aur saras shabdon se bandhee ye Kavita , bahot bahot pasand aayee .

    Sadar, sa – sneh,
    – Lavanya
    ( maaf kijiyega, Angrezi mei tippani ker rahee hoon, kyunki mere PC se door hoon _)

  14. 15
    ranju Says:

    मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
    जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
    कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
    भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

    बहुत सुंदर कविता है यह ..

  15. 17
    meet Says:

    महावीर जी,
    इतनी खूबसूरत रचना की है की इसे कई बार पढ़ चुका हूँ,
    और ना जाने कितनी बार पढूंगा…
    इतनी सुंदर रचना के लिए badhai…

  16. 18
    Pran Sharma Says:

    आदरणीय शर्मा जी ,
    आपकी कविता पढी है.भले ही कविता पुरानी है पर मुझ जैसे नए पढने वालों
    के लिए नयी है.वैसे भी अच्छी कविता कभी पुरानी नहीं होती . इस कविता
    में वह सब कुछ है जो कविता को सर्वश्रेष्ठ बनाती है यानी सुंदर भाषा और
    उपयुक्त व् मन को मोह लेने वाला छंद. उत्तम कविता के लिए मेरी बधाई
    स्वीकार करें.
    प्राण शर्मा

  17. आप उम्र के जिस पड़ाव पर हैं आपसे ऐसी ही कोई कविता आपेक्षित है! बहुत ही उत्तम कृति है।

  18. 20
    Dr.Arvind Mishra Says:

    वाह बहुत प्रभावशाली !

  19. 21

    आप इतना सुंदर लिखते हैं कि आपके लिखे शब्द लोगों को सोचने पर विवश कर दे, जिस तरह से मैं हो गया|मैं कुछ और भी कहना चाहूँगा, जो कि आपकी कविता खत्म होते ही मेरे मन में अनायास ही आ गया……

    अब देखो अपने अंतर्मन में, एक बदला सा इंसान लीखो|

  20. 22

    आप इतना सुंदर लिखते हैं कि आपके लिखे शब्द लोगों को सोचने पर विवश कर दे, जिस तरह से मैं हो गया|मैं कुछ और भी कहना चाहूँगा, जो कि आपकी कविता खत्म होते ही मेरे मन में अनायास ही आ गया……

    अब देखो अपने अंतर्मन में, एक बदला सा इंसान लिखो|


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