अगस्त 2008 के लिए पुरालेख

क़ातिल सिसकने क्यूं लगा – ग़ज़ल

अगस्त 31, 2008

क़ातिल सिसकने क्यूं लगा – ग़ज़ल

ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में संपूर्ण और स्वतंत्र होता है। यह आवश्यक नहीं कि ग़ज़ल के एक शे’र का दूसरे शे’र के साथ समविषयक हो। हाँ, ग़ज़ल के सारे अशा’र एक ही बहरो-वज़न में होने चाहिए।

सोगवारों* में मिरा क़ातिल सिसकने क्यूं लगा
दिल में ख़ंजर घोंप कर, ख़ुद ही सुबकने क्यूं लगा

(*सोगवारः- मातम/शोक करने वाले)

आइना देकर मुझे, मुंह फेर लेता है तू क्यूं
है ये बदसूरत मिरी, कह दे झिझकने क्यूं लगा

गर ये अहसासे-वफ़ा जागा नहीं दिल में मिरे
नाम लेते ही तिरा, फिर दिल धड़कने क्यूं लगा

दिल ने ही राहे-मुहब्बत को चुना था एक दिन
आज आंखों से निकल कर ग़म टपकने क्यूं लगा

जाते जाते कह गया था, फिर न आएगा कभी
आज फिर उस ही गली में दिल भटकने क्यूं लगा

छोड़ कर तू भी गया अब, मेरी क़िस्मत की तरह
तेरे संगे-आसतां पर सर पटकने क्यूं लगा

ख़ुश्बुओं को रोक कर बादे-सबा ने यूं कहा
उस के जाने पर चमन फिर भी महकने क्यूं लगा।

महावीर शर्मा

कथा महोत्सव-2008

अगस्त 23, 2008

कथा महोत्सव-2008

अभिव्यक्ति, भारतीय साहित्य संग्रह तथा वैभव प्रकाशन द्वारा आयोजित

अभिव्यक्ति, भारतीय साहित्य संग्रह तथा वैभव प्रकाशन की ओर से कथा महोत्सव २००८ के लिए हिन्दी कहानियाँ आमंत्रित की जाती हैं।

• दस चुनी हुई कहानियों को एक संकलन के रूप में में वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया जाएगा और भारतीय साहित्य संग्रह से http://www.pustak.org पर ख़रीदा जा सकेगा।

• इन चुनी हुई कहानियों के लेखकों को ५ हज़ार रुपये नकद तथा प्रमाणपत्र सम्मान के रूप में प्रदान किए जाएँगे। प्रमाणपत्र विश्व में कहीं भी भेजे जा सकते हैं लेकिन नकद राशि केवल भारत में ही भेजी जा सकेगी।

• महोत्सव में भाग लेने के लिए कहानी को ईमेल अथवा डाक से भेजा जा सकता है। ईमेल द्वारा कहानी भेजने का पता है- teamabhi@abhivyakti-hindi.org डाक द्वारा कहानियाँ भेजने का पता है- रश्मि आशीष, संयोजक- अभिव्यक्ति कथा महोत्सव-२००८, ए – ३६७ इंदिरा नगर, लखनऊ- 226016, भारत।

• महोत्सव के लिए भेजी जाने वाली कहानियाँ स्वरचित व अप्रकाशित होनी चाहिए तथा इन्हें महोत्सव का निर्णय आने से पहले कहीं भी प्रकाशित नहीं होना चाहिए।

• कहानी के साथ लेखक का प्रमाण पत्र संलग्न होना चाहिए कि यह रचना स्वरचित व अप्रकाशित है।

• प्रमाण पत्र में लेखक का नाम, डाक का पता, फ़ोन नम्बर ईमेल का पता व भेजने की तिथि होना चाहिए।

• कहानी के साथ लेखक का रंगीन पासपोर्ट आकार का चित्र व संक्षिप्त परिचय होना चाहिए।

• कहानियाँ लिखने के लिए A – ४ आकार के काग़ज़ का प्रयोग किया जाना चाहिए।

• ई मेल से भेजी जाने वाली कहानियाँ एम एस वर्ड में भेजी जानी चाहिए। प्रमाण पत्र तथा परिचय इसी फ़ाइल के पहले दो पृष्ठों पर होना चाहिए। फ़ोटो जेपीजी फॉरमैट में अलग से भेजी जा सकती है। लेकिन इसी मेल में संलग्न होनी चाहिए। फोटो का आकार २०० x ३०० पिक्सेल से कम नहीं होना चाहिए। कहानी यूनिकोड में टाइप की गई हो तो अच्छा है लेकिन उसे कृति, चाणक्य या सुशा फॉन्ट में भी टाइप किया जा सकता है।

• कहानी का आकार २५०० शब्दों से ३५०० शब्दों के बीच होना चाहिए।

• कहानी का विषय लेखक की इच्छा के अनुसार कुछ भी हो सकता है लेकिन उसमें मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था होना ज़रूरी है।

• इस महोत्सव में नए, पुराने, भारतीय, प्रवासी, सभी सभी देशों के निवासी तथा सभी आयु-वर्ग के लेखक भाग ले सकते हैं।

• देश अथवा विदेश में हिन्दी की लोकप्रियता तथा प्रचार प्रसार के लिए चुनी गई कहानियों को आवश्यकतानुसार प्रकाशित प्रसारित करने का अधिकार अभिव्यक्ति के पास सुरक्षित रहेगा। लेकिन निर्णय आने के बाद अपना कहानी संग्रह बनाने या अपने व्यक्तिगत ब्लॉग पर इन कहानियों को प्रकाशित करने के लिए लेखक स्वतंत्र रहेंगे।

• चुनी हुई कहानियों के विषय में अभिव्यक्ति के निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम व मान्य होगा।

• कहानियाँ भेजने की अंतिम तिथि १५ नवंबर २००८ है।

• यह विवरण http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2008/kathamahotsav2008.htm पर वेब पर भी देखा जा सकता है।

पूर्णिमा वर्मन
टीम अभिव्यक्ति

ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंजी हिन्दी

अगस्त 15, 2008

यू.के. की डायरी सेः

स्वतन्त्रता-दिवस पर भारत और विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों को हार्दिक
शुभकामनाएं।
महावीर शर्मा

‘ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूंजी हिन्दी’

(लंदन – 28 जून) ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक बार फिर गूंजी हिन्दी। ब्रिटिश सरकार के आंतरिक सुरक्षा राज्य मन्त्री टोनी मैक्नलटी ने शुक्रवार की शाम सुप्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा को उनके उपन्यास कुइयां जान के लिये 14वां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिये स्थापित पद्मानंद साहित्य सम्मान से यॉर्क की उषा वर्मा को सम्मानित किया।

कथा यू.के. द्वारा हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित सम्मान समारोह में ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नलटी ने हिन्दी में अपने भाषण की शुरूआत की। उन्होंने कहा कि राजा और रानियां, मन्त्री और प्रधान मन्त्री भुला दिये जाते हैं, लेकिन साहित्य को लोग याद रखते हैं। आज हम शेक्सपीयर को ज़रूर जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि उस समय के राजा या प्रधान मन्त्री कौन थे। उन्होंने कहा कि लेखकों और दार्शिनिकों ने हमारे इतिहास और सभ्यता का निर्माण किया। हम राजनेताओं ने नहीं।

टोनी मैक्नलटी ने अपने बचपन का हवाला देते हुए कहा कि उसके पिता चौदह साल की उम्र में आयरलैण्ड से लन्दन आकर बस गये थे। उस समय अंग्रेज़ी का ठीक उच्चारण न कर पाने कि लिये आयरिश लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता था। लेकिन आज हम सभी जानते हैं कि आयरलैण्ड की परम्परा और संस्कृति किसी से भी कम नहीं है। उन्होंने ब्रिटेन में बसे एशियाई लेखकों की चर्चा करते हुए कहा कि हम अंग्रेज़ भले ही उनकी भाषा न समझें लेकिन हमें उनकी भावना और उत्साह का आदर करना चाहिए क्योंकि वे बड़ी संस्कृतियों के वारिस हैं। आज उनकी नई पीढ़ी पूरब और पश्चिम की संस्कृति के बीच दुविधाग्रस्त खड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि राजनेताओं के लिये सबसे अधिक ख़ुशी का क्षण वह होता है जब वे साहित्य का आनन्द उठाते हैं। कारण कि साहित्य किसी देश राष्ट्र, भाषा, जाति जैसी सभी सीमाओं से लांघ कर पूरी मानवता की बात करता है। इसीलिये मैं कथा यू.के. के काम की सराहना करता हूं और संरक्षक के रूप में इससे जुड़ा हूं।

लेबर पार्टी की काउन्सलर ज़कीया ज़ुबैरी ने इस बात पर चिन्ता प्रकट की कि एशियाई समाज की नई पीढ़ी अपनी मातृ भाषाओं से लगातार दूर होती जा रही है। ब्रिटेन में पहली पीढ़ी के आप्रवासी ही अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि यह एशियाई लोगों की घर घर की कहानी है कि उनके बच्चे लगातार उनकी संस्कृति से दूर जा रहे हैं। हमारे लेखकों को इस बारे में भी सोचना चाहिए। कथा यू.के. ने उन उम्दा किताबों को सम्मानित करती रही है जिन पर भारतीय आलोचकों ने ठीक से ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार कथा यू.के. ने उस श्रेष्ठ साहित्य को सम्मानित किया है जो किसी वजह से हाशिये पर चला गया था।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि ब्रिटिश संसद में हिन्दी की बात करके हम सच्चे अर्थों में विश्व बंधुत्व की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने टोनी मैक्नलटी का आभार व्यक्त करते हुए कहा, कि उन्होंने हिन्दी को स्वीकृति दे कर, ब्रिटेन की लोकतांत्रिक परम्परा को आगे बढ़ाया है। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन में बसे हिन्दी प्रेमियों के लिये, भारतीय प्रकाशकों के सहयोग से, कथा यू.के. द्वारा एर बुक क्लब शुरू करने की सूचना दी। इसके माध्यम से यहां के हिन्दी पाठकों को श्रेष्ठ हिन्दी पुस्तकें घर बैठे उपलब्ध हो सकेंगी।

साक्षात्कार और रचना समय के संपादक हरि भटनागर ने नासिरा शर्मा कि पुरस्कृत कृति कुइयांजान का परिचय देते हुए कहा, “कुइयांजान मनुष्य की आदिम प्यास – एक तरह से मनुष्य की जिजीविषा – जद्दोजहद का पर्याय है – लेखिका ने इसी जिजीविषा को उपन्यास की विषयवस्तु बनाया है और इसी के बहाने वह भारतीय समाज की अंतरंग जीवन झांकी प्रस्तुत करती है। अपने कहन में उपन्यास सुख-दुख, प्यार-मुहब्ब्त, विडम्बना का एक ज्वलन्त रचनात्मक दस्तावेज़ है जिसके बयान में कहीं अश्रुगलित भावुकता नहीं, कहीं चीख़-पुकार नहीं। उपन्यास अपनी जातीय परम्परा की एक कड़ी है – एक रचनात्मक इतिहास है। अपने शिल्प में यह उपन्यास आधुनिक गद्य लेखन का ऐसा नमूना है जिसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट से लेकर मुंशी प्रेमचन्द, निराला और हरिशंकर परसाई के गद्य शिल्प का विकसित नव्यरूप देखा जा सकता है।”

इस अवसर पर अपने आभार वक्तव्य में नासिरा शर्मा ने कहा, कि कुइयां जान हमारी परम्परा और रिश्तों की प्यास की बात करत है। पानी रिश्तों को प्रभावित करता है। मैनें इस उपन्यास में मौसम की ख़ुशबू और बदबू को दिखाने की कोशिश की है। तेजेन्द्र शर्मा ने मेरे लिये एक ऐसा नया रास्ता खोला जिससे ज़िन्दगी और मुहब्बत की दोबारा शुरूआत हो सकती है। मैनें अपने शहर इलाहाबाद पर चार उपन्यास लिखे लेकिन उस शहर ने मुझे कभी नहीं बुलाया। ब्रिटेन आने के लिये वीज़ा हासिल करने की प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए मुझे अहसास हुआ कि हम लेखक, दुनियां के सबसे मज़लूम और मुसीबतज़दा लोग हैं।

पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त करने वाली उषा वर्मा ने प्रवासी जीवन में हिन्दी लेखन की समस्याओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि निरन्तर लेखन में कई प्रकार की बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। लेखन की गाड़ी रुक रुक कर चलती है। ऐसे में जब हमारे साहित्य को पहचाना जाता है और उसकी प्रशंसा होती है तो मन में कहीं अच्छा तो लगता है। संघर्ष उदासी और आकांक्षाएं – सबको रचना में समेटना आसान नहीं होता। हम लेखक मनके दर्द को रचना में डालते हैं। ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई परिवारों के बीच काम करते हुए मुझे जो अनुभव हुए उन्हें ही मैने अपनी रचना का आधार बनाया है। उषा जी ने अपने बचपन की यादों को भी श्रोताओं के साथ बांटा और कथा यू.के. को धन्यवाद दिया।

लंदन में भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकार राकेश दुबे ने उषा वर्मा के पुरस्कृत कथा संग्रह कारावास का परिचय दिया। सनराइज़ रेडियो के प्रसारक रवि शर्मा ने कुइयां जान के अंशों का अभिनय पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकार श्री अजित राय ने नासिरा शर्मा के मानपत्र का पाठ किया वहीं मुंबई की मधुलता अरोड़ा ने उषा वर्मा का मानपत्र पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन डा. निखिल कौशिक ने किया।

बीबीसी हिन्दी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव के.सी. मोहन, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुमन्त मिश्र (मुंबई), कथा यू.के. के कोषाध्यक्ष रमेश पटेल, अमरदीप के संपादक जगदीश मित्तर कौशल, गीतांजलि (बरमिंघम) के अध्यक्ष डा. कृष्ण कुमार, सुप्रसिद्ध नाटककार इसमाइल चुनारा, भारतीय भाषा संगम के अध्यक्ष महेन्द्र वर्मा, ग़ज़लकार सोहन राही, इंदिरा आनंद, चंचल जैन, डा. वन्दना शर्मा, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, चित्रा कुमार, सहित कार्यक्रम में शामिल होने के लिये वेल्स, यॉर्क, बर्मिंघम एवं अन्य दूर दराज़ के शहरों से मीडिया, साहित्य, उद्योग एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के प्रतिनिधि पहुंचे।

प्रेषकः तेजेन्द्र शर्मा
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देवी नागरानी एक संवेदन शील कवियित्री – प्राण शर्मा

अगस्त 10, 2008

देवी नागरानी एक संवेदन शील कवियित्री
-प्राण शर्मा

‘प्रतिभाशाली और श्रेष्ट कवि कौन है?’ के उत्तर में गुरु ने कहा की प्रतिभाशाली और श्रेष्ट कवि वह है जिसके पास विपुल भाषा का भंडार हो, जिसके पास संसार का अनुभव ही अनुभव हो, जिसमें सॉफ-सुथरी कविता कहने की निपुणता हो, और जिसको छंदों- बहरों का पूरा ग्यान हो. पूछने वाले में संतुष्टि की लहर दौड़ गयी.

देवी नागरानी एक ऐसी सशक्त कवियित्री हैं, जिसमें उपरोक्त चारों विशेषताएँ हैं. उनका भाषा पर अधिकार भी है, उनको संसार का अनुभव भी है, उनमें सॉफ-सुथरी कविता कहने की क्षमता भी है और उन्हें छंदों- बहरों का पूरा ग्यान भी है. उनमें इन्ही विशेषताओं एवं गुणों के कारण हिंदी और उर्दू के मूधन्यि साहित्यकारों डा॰. कमल किशोर गोयनका, आर. पी शर्मा “महर्षि” , अहमद वसी, अंजना सँधीर, दीक्षित दनकौरी, मरियम ग़ज़ाला, हसन माहिर और अनवरे इस्लाम ने उनके चरागे-दिल की ग़ज़लों को भरपूर सराहा है. उनकी शायरी के बारे में जनाब अनवरे इस्लाम का कथन वर्णननीय है -” मैने पाया की वे (देवी नागरानी) महसूस करके फ़िक्र के साथ शेर कहती हैं, आपकी फ़िक्र में दिल की मामलेदारियों के साथ ग़मे ज़माना और उसके तमाम मसाइल शेरों में ढलकर ‘रंगे-रुख़े-बुताँ’ की तरह हसीन हो जाते हैं क्योंकि वे ग़म में भी ख़ुशी के पहलू तलाश करना जानती हैं –

ज़िंदगी अस्ल में तेरे ग़म का है नाम
सारी ख़ुशियाँ है बेकार अगर ग़म नहीं

चराग़े-दिल के पश्चात देवी नागरानी का नया ग़ज़ल-संग्रह है- “दिल से दिल तक” ग़ज़ल-संग्रह की लगभग सभी ग़ज़लें मैने पढ़ी है. प्रसन्नता की बात है कि देवी नागरानी ने ग़ज़ल की सभी विशेषताओं का निर्वाह बख़ूबी किया है. मैने अपने लेख ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ में लिखा है-” अच्छा शेर सहज भाव स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छन्द के सम्मिलन का नाम है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दीख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईँट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर के विचार से शब्द-सौंदर्या तथा लय का माधुर्या प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है.”

चूँकि देवी नागरानी के पास भाषा है, भाव है और छन्दों-बेहरों का ग्यान है, उनकी ग़ज़लों में लय भी है, गेयता भी है और शब्द सौंदर्या भी है. वे उपयुक्त शब्दों के अनुसार छन्दों का और उपयुक्त छंदो के अनुसार शब्दों का प्रयोग करने में प्रवीण हैं, इसलिए उनके एक-एक शेर में माधुर्य और सादगी निहित है. अपनी ग़ज़लों में देवी नागरानी एक कुशल राजगीर की तरह कौशलता दिखाती है. उन्होने अपने मन के आँगन को यादों से ख़ूब सजाया है. बिल्कुल वैसे ही जैसे एक माली उध्यान को फूलों से सजाता है. उनके अनगिनत शेर ऐसे हैं जिन्हें गुनगुनाने को जी करता हैं. मसलन-

मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती

वक्त़ किसका कहाँ हुआ ‘देवी’
कल हमारा था अब तुम्हारा है.

हमको ढूंढो न तुम मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं

वफ़ा मेरी नज़र अंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का ज़िक्र कल जिनकी ज़ुबाँ पर था

हस्ती ही मेरी तन्हा,
इक द्वीप सी रही है

चारों तरफ़ है पानी,
फिर भी बची हुई है.

भरोसा करने से पहले ज़रा तू सोचती देवी
कि सच में झूठ कितना उस फ़रेबी ने मिलाया है
देवी

नागरानी एक कुशल कवियित्री हैं. यूँ तो ‘दिल से दिल तक’ में सुख के भाव भी बिखरे हैं लेकिन दुख के भाव कुछ ज़्यादा ही व्यक्त हुए हैं. उनके शब्दों में-

ग़म तो हर वक्त साथ साथ रहे
ग़म कहीं अपना रुख़ बदलते हैं.

यहां मैं महादेवी वर्मा की दो पंक्तियां कहना चाहूँगा जिनके शब्दों से दर्द उसी तरह टपकता है जैसे देवी नागरानी जी के शेरों से –

मैं नीर भरी दुख की बदली
उमड़ी कल थी मिट आज चली.

मानव-जीवन में सुख-आगमन पर दुख भरे शेर भी मीठे लगते हैं, महान अँग्रेज़ी कवि शैले की इस पंक्ति की तरह-

Our sweetest songs are those
That tell of saddest thoughts.

परिणाम स्वरूप देवी नागरानी के अधिकांश शेर सर पर चढ़ कर बोलते ही नहीं, दिल में भी उतरते चले जाते हैं.
प्राण शर्मा
3 Crackston Close
Coventry CV25EB
U.K
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नामे किताबः दिल से दिल तक,
शायराः देवी नागरानी, पन्नेः १४४, मूल्यः १५०, प्रकाशकः लेखक

कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़

अगस्त 5, 2008

कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़:
देवी नागरानी जी का
नया
ग़ज़ल-संग्रह “दिल से दिल तक”

श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल-संग्रह “ग़म में भीगी ख़ुशी” और “चराग़े-दिल” प्रकाशित हो चुके हैं। तीसरे ग़ज़ल-संग्रह “दिल से दिल तक” का विमोचन महरिष ‘गुंजार समिति’ द्वारा आयोजित किए गए समारोह में ११ मई २००८ रविवार के दिन आर.डी. नेशनल कालेज, मुम्बई के कॉन्फ़्रेंस रूम में संपन्न हुआ था।

अपनी संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के कारण देवी जी संवेदनशील रचनाकार कही जा सकती हैं। देवी जी अपने इस नये ग़ज़ल- संग्रह में ग़ज़लों को कुछ इस अंदाज़ से कहती हैं कि पाठक पूरी तरह उन में डूब जाता है। विचारों के बिना भाव खोखले दिखाई देते हैं। इस संग्रह में भावों और विचारों का सुंदर सामंजस्य होने के कारण यह पुस्तक सारगर्भित बन गई है।

शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूंढता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भांति परिचित हैं। ज़िन्दगी अक्सर सीधी-सादी नहीं हुआ करती। उन्होंने लंबे संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई हैः

जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं.

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.

नारी से जुड़े हुए गंभीर सवालों को उकेरने और समझाने के लिए उनके पारदर्शी प्रयास से ग़ज़लों के फलक का बहुत विस्तार हो गया है। फिर भी स्त्री-मन की तड़प, चुभन और अपने कष्टों से झूझना, समाज की रुग्ण मानसिकता आदि स्थितियों की परतें खोल कर रख देना तथा अपनी रचनाओं की अंतरानुभूति के साथ पाठकों को बहा ले जाती हैं:

कैसी दीमक लगी है रिश्तों की
रेज़े देवी है भाईचारों के

नारी के जीवन की पीड़ा, संघर्ष और अस्तित्व की पहचान भी कराती हैं:

“ये है पहचान एक औरत की
माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी.”

ग़ज़ल कहने की अपनी अलग शैली के कारण देवी जी की ग़ज़लों की रंगत कुछ और ही हो जाती है। अतीत का अटूट हिस्सा हो कर यादों के साथ पहाड़ जैसे वर्तमान को भी देख सकते हैं:

कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.

उनकी शब्दावली, कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़ देखिएः

मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती.

वो सोच अधूरी कैसे सजे
लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़े न कभी.

आज की शा‘इरी अपने जीवन और वक्त के बीच गुज़रते हुए तरक्की कर रही है। समय की यातना से झूझती है, टकराती है और कभी कभी लाचार हालत में तड़प कर रह जाती हैः

ज़िदगी से जूझना मुशकिल हुआ इस दौर में
ख़ुदकुशी से ख़ुद को लेकिन मैं बचाकर आई हूँ

वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.

उनकी ग़ज़लों के दायरे का फैलाव सुनामी जैसी घटनाओं के समावेश करने में देखा जा सकता है, जिसमें आर्द्रता है, मानवीयता हैः

सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फ़िज़ाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपके-चुपके से कफ़न लाया.

आज धर्म के नाम पर इंसान किस तरह पिस रहा है। धनलोलुपता के कारण धर्म के रक्षक ही भक्षक बन कर धर्म और सत्य को बेच रहे हैं। इस ग़ज़ल के दो मिस्रों को देखिएः

मौलवी पंडित खुदा के नाम पर
ख़ूब करते है तिजारत देखलो

दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.

निम्नलिखित पंक्तियों में अगर ग़ौर से देखा जाए तो यह आईना उनके अंदर का आईना है या वक्त का या फिर महबूब का जिसके सामने खड़े होकर वो अपने आप को पहचानतीं हैं :

मुझको सँवरता देखके दर्पण
मन ही मन शरमाया होगा.

इन अशा‘र में गूंजती हुई आवाज़ उनकी निजी ज़िन्दगी से जुड़ी हुई है। कितनी ही यातनाएं भुगतनी पड़े, पर वे हार नहीं मानती, बस आगे बढ़ती जाती हैं:

पाँव में मजबूरियों की है पड़ी ज़ंजीर देवी
चाल की रफ़्तार लेकिन हम बढ़ाकर देखते हैं.

हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.

जीवन के लंबे अथक सफ़र पर चलते चलते देवी जी ज्यों ही मुड़ कर अतीत में देखती हैं तो बचपन के वो क्षण ख़ुशी देकर दूर कहीं अलविदा कहते हुए विलीन हो गयाः

वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.

आशा है कि देवी नागरानी जी का यह ग़ज़ल-संग्रह ग़ज़ल साहित्य में अपना उचित स्थान पायेगा। हार्दिक शुभकामनाओं सहित

महावीर शर्मा

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‘दिल से दिल तक”
मूल्य़ – रुपये 150/- $5
Publisher: Devi Prakashan
9-D, Corner View Society
15/33 Road, Bandra,
Mumbai – 400 050