जून 2008 के लिए पुरालेख

ग़ज़ल: हादसों के शहर में – ‘प्राण’ शर्मा

जून 27, 2008

ग़ज़ल – हादसों के शहर में

सो रहा था चैन से मैं फ़ुर्सतों के शहर में
जब जगा तो ख़ुद को पाया हादसों के शहर में

फ़ासले तो फ़ासले हैं दो किनारों की तरह
फ़ासले मिटते कहाँ हैं फ़ासलों के शहर में

दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह
दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में

थक गये हैं आप तो आराम कर लीजे मगर
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में

मिल नहीं पाया कहीं सोने का घर तो क्या हुआ
पत्थरों का घर सही, अब पत्थरों के शहर में

हर किसी में होती है कुछ प्यारी प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन ख़ुशबुओं के शहर में

धरती-अम्बर, चाँद-तारे, फूल-ख़ुशबू, रात-दिन
कैसा-कैसा रंग है इन बंधनों के शहर में

हम चले हैं ‘प्राण’ मंज़िल की तरफ़ लेकर उमंग
आप रहियेगा भले ही हसरतों के शहर में

‘प्राण’ शर्मा

छोटी सी बिंदिया ! -3 क्षणिकाए

जून 22, 2008

छोटी सी बिंदिया ! -3 क्षणिकाएं

– महावीर शर्मा

दुलहन

अलसाये नयनों में निंदिया, भावों के झुरमुट मचलाए

घूंघट से मुख को जब खोला, आंखों का अंजन इतराए

फूल पर जैसे शबनम चमके,दुलहन के माथे पर बिंदिया।

मुस्काए माथे पर बिंदिया।

मुजरा

तबले पर ता थइ ता थैया, पांव में घुंघरू यौवन छलके

मुजरे में नोटों की वर्षा, बार बार ही आंचल ढलके

माथे से पांव पर गिर कर, उलझ गई घुंघरू में बिंदिया

सिसक उठी छोटी सी बिंदिया !

सीमा के रक्षक

दूर दूर तक हिम फैली थी, क्षोभ नहीं था किंचित मन में

गर्व से ‘जय भारत’ गुञ्जारा, गोली पार लगी थी तन में

सूनी हो गई मांग प्रिया की, बिछड़ गई माथे से बिंदिया।

छोड़ गई कुछ यादें बिंदिया।

– महावीर शर्मा

सुकवि प्राण शर्मा की ‘सुराही’ – एक ईमानदार और स्वस्थ दिशा-बोधक कृति

जून 16, 2008

सुकवि प्राण शर्मा की ‘सुराही’ – एक ईमानदार और स्वस्थ दिशा-बोधक कृति

– डॉ० कुँवर बेचैन

भारतीय साहित्य में काव्य के क्षेत्र में मुक्तक परम्परा बहुत पुरानी है। कारण यह है कि प्रबंध काव्य में कवि को किसी बाहरी कथावस्तु पर आश्रित रह कर सृजन करना होता है जब कि मुक्तक काव्य में कवि को अपनी निजी अनुभूतियों को नितांत अपनी तरह व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता होती है। प्रबंध में कवि को अपनी निजी अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिये भी कथावस्तु के किसी विशेष प्रसंग की तलाश करनी पड़ती। या कोई नया प्रसंग बनाना पड़ता है। मुक्तक में किसी मध्यस्थ की तलाश नहीं करनी पड़ती। उसमें तो यदि कोई मध्यस्थ होता भी है तो वह केवल शब्द ही होता है। लेकिन इनमे भी शब्द और अर्थ, शब्द और भाव, शब्द एवं विचार का सम्बंध शरीर और आत्मा एक साथ हैं। आत्मा ‘फुर्र’ हुई तो सरीर निष्प्राण रह जायेगा। इसी लिए मुक्तकों में भी सभी कावञ-विधाओं की कतरह शब्द औ भाव एक दूसरे में ऐसे गुंथे होते हैं जैसे शरीर और आत्मा।

इसी मुक्तक-परंपरा में दोहों, चतुष्पदियों, रुबाइयों तथा कवित्त-सवैयों का प्रमुख स्थान रहा है। लेकिन सभी में चतुष्पदियों का लेखन इतनी अधिक मात्रा में हुआ कि ‘मुक्तक’ शब्द के उच्चारण से ही किसी ‘चतुष्पदी’ का आभास होने लगता है। यही नहीं मुक्तक ‘चतुष्पदी’ का ही दूसरा नाम हो गया। भारत के मूल निवासी और अब इंगलैंड में रह रहे सुकवि श्री प्राण शर्मा इसी मुक्तक काव्य की परम्परा के प्रमुख कवि हैं। वैसे मुक्तकों में समान्यतः अलग-अलग विचारों को और अलग-अलग भावानुभूतियों को अलग-अलग मुक्तकों में कहा जाता है। यूं समझिये कि प्रत्येक मुक्तक की विषय-वस्तु अलग होती है। किंतु सुखद आश्चर्य है कि प्राण शर्मा जी ने अपनी चतुष्पदियों में एक ही विषय को विभिन्न कोणों से अभिव्यक्त किया है और उनके ये भाव-विचार जब शृंखलाबद्ध होकर उनके मुक्तकों में आते हैं तब इन मुक्तकों की क्रमबद्धता एक भाव-कथा या विचार-कथा बन जाती है और इस प्रकार उनकी मुक्तक-रचना मुक्तक काव्य का आनंद तो देती ही है, साथ ही प्रबंध-रचना के काव्य-सौंदर्य की ओर भी पाठक का ध्यान आकृष्ट करती है। उनका ‘सुराही’ काव्य इसका एक सन्दर और महत्वपूर्ण उदाहरण है।

यह सूचना देते हुए हर्ष होता है कि 14 जून 2008 के दिन ब्रिटेन की’हर मेजेस्टी महारानी एलिज़ाबेथ’ के जन्म-दिवस पर श्रीमती वन्दना सक्सेना पूरिया को ब्रिटिश ट्रेड एवं भारत में पूंजी निवेशन के लिए ओ.बी.ई (O.B.E) से सम्मानित किया गया जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए। श्रीमती पूरिया जी जानी मानी लेखिका श्रीमती उषा राजे सक्सेना और श्री के.बी.एल सक्सेना जी की सुपुत्री हैं। श्रीमती पूरिया जी का जीवनी संबंधी लेख आगामी पोस्टों में प्रकाशित किया जाएगा।
‘महावीर’ ब्लॉग परिवार की ओर से श्रीमती पूरिया जी को अनेकानेक बधाई।

‘सुराही’ में कवि ने ‘सुरा’ के महत्व को प्रतिपादित किया है, ऐसा लगता है किंतु सजग और सहृदय पाठक जानते हीहैं कि कवि यदि वास्तव में कवि है तो वह शुद्ध अभिधात्मक नहीं होता। वह लक्षणा, व्यंजना और प्रतीक आदि के महत्व को जानता है और इन सब का अन्योक्ति-परक प्रयोग भी करता चलता है। प्राण शर्मा के मुक्तक, विशेषकर सुराही के मुक्तक कुछ इसी प्रकार की अभिव्यक्ति-संपदा के मालिक हैं। ‘सुराही’ केवल सुराही नहीं है जिसमें केवल ‘सुरा’ ही भरी है वरन् वह ऐसी ‘सुरा’ है, ऐसी प्रेम-सुरा है, ऐसी भक्ति-सुरा है जिसके पीने से सारे छल-कपट एक तरफ हो जाते हैं औरपस सुरा को पीने वाला इन सबको एक किनारे करता हुआ अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होकर निरंतर प्रेम-सुधा बरसाता हुआ चलता रहता है और तब वह ‘राही’ नहीं ‘सु-राही’ बन जाता है, एक अच्छा राही जो घनानन्द की
भाषा में कह उठता हे –

‘अति सूधौ सनेह कौ मारग है
जहाँ नैकु सयानप, बांक नहीं।’

अतः श्री प्राण शर्मा का ‘सुराही’ काव्य ‘सुरा-ही’ नहीं हे वरन् वह ‘सु-राही’ है जो उनका अनुसरण कर रहा है जिन्होंने प्रेम का मार्ग दिखाया औरऐसे व्यक्तियों के लिये अनुकरणीय बन रहा है जो इस प्रेम-पथ पर आ खड़े हुए हैं। उनके लिये इस ‘सुराही’ का सोमरस उस शराब के तरह जो ठीक से पकी नहीं है, जलाने वाला नहीं है, ईर्ष्या-द्वेष में झुलसाने वाला नहीं है, झगड़ों में उलझाने वाला नहीं है वरन् वह ‘सोम’ (चन्द्रमा) की शीतलता और उसकीचाँदनी में स्नान कराने वाला रस हे। रस प्रत्येक इन्द्रिय की प्यास है और रस प्यास को तृप्त करता है, यदि वही जलाने वाला हो गया तो फिर वह रस कहाँ रहा? इसीलिये वह एक मुक्तक में यह कहते हैं –

बेतुका हर गीत गाना छोड़ दो
शोर लोगों में मचाना छोड़ दो
गालियां देने से अच्छा है यही
सोमरस पीना-पिलाना छोड़ दो

क्योंकि प्राण शर्मा जानते हैं कि जिसने ‘सोमरस’ पिया, जिसने प्रेम-रस का पान कर लिया वह भला गाली कैसे दे सकता है? झगड़ा कैसे कर सकता है? प्राण शर्मा के लिये तो ‘सोमरस’ ज़िनदगी का पर्याय है, आत्मा की अनुकृति है, ज्ञान का रूप है। यही नहीं वह मदभरे संगीत की छलकन और मदुर गान की अनुगूँज है जो तन-मन और आत्मा को नहलाने में सक्षम है। कवि ने ‘सुराही’ काव्य के प्रथम मुक्तक में यही घोषणा कर दी है –

ज़िन्दगी है, आत्मा है, ज्ञान है
मदभरा संगीत है औ’ गान है
सारी दुनिया के लिये यह सोमरस
साक़िया, तेरा अनूठा दान है

ज़िन्दगी सोमरस है, ज्ञान सोमरस है, संगीत और गान भी सोमरस हैं। एक-एक बूँद रस लेकर पीकर देखो तो …….। सारी व्यक्तिगत चिंताएँ काफ़ूर हो जायेंगी, ज़िन्दगी को जीने का सलीका आ जायेगा, आत्मा का परमात्मा-जगत में पदार्पण होने लगेगा, ज्ञान के आलोक में हम प्रकाशित होने लगेंगे, संगीत हमारे हृदय में नयी तरंगें भर देगा और गान हमें एक नयी ‘लय’ में ले जायेगा और ‘प्रलय’ से बचायेगा। यही संदेश है प्राण शर्मा की ‘सुराही’ का। जैसे मधुशाला में शराब पिलाने वाल ‘साक़िया’ है और पीने वाले रिंद हैं ऐसे ही संसार की मधुशाला में जो प्रेम छलकाने वाले हैं वे ‘साक़िया’ ही हैं और जो प्रेम पाकर झूमने वाले हैं वे ‘रिंद’ हैं।

सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विचार करें तो समाज में बड़ी वषमता हैं। कोई ऊंचा, कोई नीचा; कोई बहुत अमीर है, तो कोई बहुत निर्धन! कहने को ही ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ है। किंतु यदि ‘साक़ी’ सच्चा और ईमानदार है तो वह सबको बराबरी का दर्जा देगा। कवि ने ‘साक़ी’ के प्रतीक से आज के राजनितिज्ञों को दिशा-निर्देश देते हुए ये दितनी सुन्दर पंक्तियां कही हैं –

सबको बराबर मदिरा का प्याला आयेगा
इक जैसा ही मदिरा को बाँटा जायेगा
इसका ज़्यादा, उसको कम मदिरा ऐ साक़ी
मधुशाला में ऐसा कभी न हो पायेगा

हमारे समाज में कितने ही लोग, लाखों-करोड़ों लोग अभी ऐसे हैं जिन्हें वह जीवन-स्तर नहीं मिला जिनके वे हक़दार हैं। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी आवश्यक आवश्यक्ताओं की पूर्ति करने से वे वंचित रहे। उनहें यदि कहीं शरण मिली भी तो वहां, जहां दीवारों पर ‘काले धब्बे’ थे, जैसे वे काले धब्बे न होकर उनके हिस्से में आया वह गहन अँधेरा था जिसे लोगों ने दुर्भाग्यवश ‘दुर्भाग्य’ की संज्ञा दी। जबकि इसमें भाग्य का इतना हस्तक्षेप नहीं था जितना कि उजालों के व्यवस्थापकों का। ईश्वर और भाग्य को दोष देकर उन्होंने आम आदमीका ध्यान अपने उस दुष्कृत्य से हटा दिया जिसके वास्तविक दोषी वे ख़ुद थे। इन्होंने अभावग्रस्त लोगों को केवल ‘मकड़ी के जाले’ दिये। ‘मकड़ी के जाले’ अर्थात समस्याओं का जाल दे दिया जिसमें वे उलझते चले गये। वही रोटी की समस्या। इस संसार की मधुशाला में जहाँ सब पर छलकना था, सबको बराबरी का दर्जा मिलना था, कहाँ मिला? साक़ी (राजनीतिज्ञों एवं व्यवस्थापकों) ने बाँटने में गड़बड़ी की, पक्षपात किया। कितने ही ‘मद्यप’ अपने ख़ाली गिलास लिये खड़े के खड़े रह गये। अभावग्रस्तों को कुछ नहीं मिला। उनके हिस्से में ‘काले धब्बे’ और ‘मकड़ जाल’ को तकते रहने की सज़ा मिली। सुकवि प्राण शर्मा ने इस व्यथा-कथा को बड़े ही सुन्दर शब्दों में सांकेतिक प्रतीकों में इस प्रकार कहा है कि देखते ही बनता है –

दीवारों पर धब्बे काले तकते-तकते
कोनों में मकड़ी के जाले तकते-तकते
इस निर्धन मद्यप ने दिल पर पत्थर रखकर
रात गुज़ारी खाली प्याले तकते – तकते

सचमुच प्राण शर्मा की यह कृति, उनके मुक्तक बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं और ‘चिंता’ को ‘चिणतन’ तक ले जाकर उसे इक सही दिशा देते हैं, ऐसी दिशा जहाँ केवल भाव या विचार कल्पना में ही न रह जाये, वरन् उसे कार्यान्वित करने का संकल्प हो और सब को ‘समभाव’ से देखने का मनोरथ हो। ऐसी स्वस्थ दिशा-बोधक कृति को जो आम आदमी की व्यथा-कथा कहते हुए उसके ‘शुभ’ की चिंता में निमग्न है, मेरा प्रणाम!

– २ एफ-५१, नेहरू नगर
ग़ाज़ियाबाद (उ०प्र०) भारत
फोनः ०१२०-२७९३०५७, २७९३२४८

प्रेषकः महावीर शर्मा
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पाठकों के रसास्वादन के लिए ‘सुराही’ के कुछ चुने हुए मुक्तक (क़ता) प्रस्तुत हैं : –

ज़िंदगी है, आत्मा है, ज्ञान है
मदभरा संगीत है औ’ गान है
सारी दुनिया के लिए ये सोमरस
साक़िया, तेरा अनूठा दान है

कौन कहता है कि पीना पाप है
कौन कहता है कि यह अभिशाप है
गुण सुरा के शुष्क जन जाने कहां
ईश पाने को यही इक जाप है।

क्या निराली मस्ती लाती है सुरा
वेदना पल में मिटाती है सुरा
मैं भुला सकता नहीं इसका असर
रंग कुछ ऐसा चढ़ाती है सुरा

क्या नज़ारे है छलकते प्याला के
क्या गिनाऊँ गुण तुम्हारी हाला के
जागते-सोते मुझे ऐ साक़िया
ख्वाब भी आते हैं तो मधुशाला के

साक़िया तुझको सदा भाता रहूं
तेरे हाथों से सुरा पाता रहूं
इच्छा पीने की सदा जिंदा रहे
और मयख़ाने तेरे आता रहूं

देवता था वो कोई मेरे जनाब
या वो कोई आदमी था लाजवाब
इक अनोखी चीज़ थी उसने रची
नाम जिसको लोग देते हैं शराब

मधु बुरी उपदेश में गाते हैं सब
मैं कहूं छुप-छुप के पी आते हैं सब
पी के देखी मधु कभी पहले न हो
खामियाँ कैसे बता पाते हैं सब

जब चखोगे दोस्त तुम थोड़ी शराब
झूम जाओगे घटाओं से जनाब
तुम पुकार उट्ठोगे मय की मस्ती में
साक़िया, लाता- पिलाता जा शराब

जब भी जीवन में हो दुख से सामना
हाथ साक़ी का सदा तू थामना
खिल उठेगी दोस्त तेरी जिंदगी
पूरी हो जाएगी तेरी कामना

बेझिझक होकर यहां पर आइए
पीजिए मदिरा हृदय बहलाइए
नेमतों से भरा है मधु का भवन
चैन जितना चाहिए ले जाइए

मैं नहीं कहता पियो तुम बेहिसाब
अपने हिस्से की पियो लेकिन जनाब
ये अनादर है सरासर ऐ हुज़ूर
बीच में ही छोड़ना आधी शराब

नाव गुस्से की कभी खेते नहीं
हर किसी की बद्दुआ लेते नहीं
क्रोध सारा मस्तियों में घोल दो
पी के मदिरा गालियां देते नहीं।

बेतुका हर गीत गाना छोड़ दो
शोर लोगों में मचाना छोड़ दो
गालियां देने से अच्छा है यही
सोम-रस पीना-पिलाना छोड़ दो

प्रीत तन-मन में जगाती है सुरा
द्वेष का परदा हटाती है सुरा
ज़ाहिदों, नफ़रत से मत परखो इसे
आदमी के काम आती है सुरा

बिन किए ही साथियों मधुपान तुम
चल पड़े हो कितने हो अनजान तुम
बैठकर आराम से पीते शराब
और कुछ साक़ी का करते मान तुम

ज़ाहिदों की इतनी भी संगत न कर
ना- नहीं की इतनी भी हुज्जत न कर
एक दिन शायद तुझे पीनी पड़े
दोस्त, मय से इतनी भी नफ़रत न कर

मस्तियाँ दिल में जगाने को चला
ज़िंदगी अपनी बनाने को चला
शेख जी, तुम हाथ मलते ही रहो
रिंद हर पीने- पिलाने को चला

दिन में ही तारे दिखा दे रिंद को
और कठपुतली बना दे रिंद को
ज़ाहिदों का बस चले तो पल में ही
उँगलियों पर वे नचा दें रिंद को

पीजिए मुख बाधकों से मोड़कर
और उपदेशक से नाता तोड़ कर
जिंदगी वरदान सी बन जाएगी
पीजिए साक़ी से नाता जोड़कर

मधु बिना कितनी अरस है जिंदगी
मधु बिना इसमें नहीं कुछ दिलक़शी
छोड़ दूं मधु, मैं नहीं बिल्कुल नहीं
बात उपदेशक से मैंने ये कही

मन में हल्की-हल्की मस्ती छा गई
और मदिरा पीने को तरसा गई
तू सुराही पर सुराही दे लुटा
आज कुछ ऐसी ही जी में आ गई

खोलकर आंखें चलो मेरे जनाब
आजकल लोगों ने पहने है नकाब
होश में रहना बड़ा है लाज़िमी
दोस्तों, थोड़ी पियो या बेहिसाब

ओस भीगी सी सुबह धोई हुई
सौम्य बच्चे की तरह सोई हुई
लग रही है कितनी सुंदर आज मधु
मद्यपों की याद में खोई हुई

मस्त हर इक पीने वाला ही रहे
ज़ाहिदों के मुख पे ताला ही रहे
ध्यान रखना दोस्तों इस बात का
नित सुरा का बोलबाला ही रहे

प्रेषकः महावीर शर्मा

‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण लंदन में

जून 9, 2008

‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण लंदन में

राकेश बी. दुबेः हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी,भारतीय उच्चायोग, लन्दन, प्रज्ञा ‘सुरभि’ सक्सेना, उषा राजे सक्सेनाः लेखिका-‘ वह रात और अन्य कहानियां ‘, अचला शर्माः लेखिका तथा निदेशक, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस रेडियो-हिंदी, लंदन, मोनिका मोहताः निदेशक, नेहरू केन्द्र, ‘प्राण’ शर्माः आलोचक-समीक्षक गज़लकार, महेश भार्द्वाजः प्रकाशक,सामयिक प्रकाशन, भारत

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चर्चित कहानीकार उषा राजे सक्सेना के कहानी संग्रह ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण’ लंदन स्थित नेहरूकेंद्र में दिनांक शुक्रवार 30 मई 2008 को संपन्न हुआ।

समारोह की अध्यक्षता, अचला शर्मा लेखिका, निदेशक बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस हिंदी लंदन ने किया। नेहरूकेंद्र की निदेशक सुश्री मोनिका मोहता, आलोचक-समीक्षक गज़लकार श्री प्राण शर्मा, लेखिका-अनुवादक सुश्री युट्टा आस्टिन, तथा भारत से आए पुस्तक के प्रकाशक श्री महेश भारद्वाज (सामायिक प्रकाशन) विशिष्ट अतिथि थे।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए नेहरू केंद्र की निदेशक, मोनिका मोहता ने सभी आगंतुक साहित्यकारों और श्रोताओ का स्वागत करते हुए बताया कि उषा राजे सक्सेना ब्रिटेन की एक महत्वपूर्ण कथाकार हैं उनके कहानी संग्रह ‘वह रात ओर अन्य कहानियाँ’ पुस्तक का लोकार्पण समाहरोह आयोजित कर नेहरू सेन्टर गौरवान्वित है।

कार्यक्रम की अध्यक्षा अचला शर्मा ने अपने वक्तव्य में बताया उषा राजे की विशेषता यह है कि वे अपना काम चुपचाप करती हैं। उनकी कहानियों में युग-बोध है, यथार्थ है। ये कहानियाँ पाठक को अंत तक बाँधे रखते मे समर्थ हैं।

मुख्य वक्ता प्राण शर्मा ने अपने वक्तव्य के दौरान कहा, उषा राजे की कहानियाँ’ उनके ब्रिटेन के साक्षात अनुभवों को अभिव्यक्त करती हैं। ये कहानियाँ हिंदी साहित्य में तो शीर्ष स्थान बनाती ही हैं साथ अँग्रेज़ी कहानियों के समानांतर भी हैं। ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ में दुनिया के अनेक देशों के आप्रवासी पात्र अपनी-अपनी व्यक्तिगत एवं स्थानीय समस्याओं और मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ हमारे समक्ष आते हैं।

लेखिका-अनुवादक सुश्री युट्टा आस्टिन ने उषा राजे की कहानियों को गहन अनुभूतियोंवाली वाली कहानियाँ बताया। उन्होंने कहा ये कहानियाँ मात्र भारतीय या पाश्चात्य ही नहीं बल्कि विभिन्न देशों से आए प्रवासियों की कहानियाँ है। युट्टा ने बताया कि उन्होंने इन कहानियों का अंग्रेजी अनुबाद कर इन्हें विश्वव्यापी बनाने का प्रयास किया है।

प्रकाशक महेश भारद्वाज ने ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ को वैश्विक, यथार्थ पर आधारित पठनीय कहानियाँ बताया।

उषा राजे ने अपने वक्तव्य में कहा वे अपनी लेखनी के माध्यम से मातृ भाषा के उन पाठकों तक पहुँचना चाहती हैं जिनकी पहुँच अँग्रेज़ी भाषा साहित्य तक नहीं है परंतु वे पाश्चात्य जीवन-पद्धति, जीवन-मूल्य, कार्य-संस्कृति, मानसिकता और प्रवासी जीवन आदि का फर्स्टहैंड पड़ताल चाहते हैं।

कार्यक्रम का संचालन राकेश दुबे, अताशे (हिंदी एवं संस्कृति) भारतीय उच्चायोग लंदन ने किया।

कहानी-पाठ किशोरी प्रज्ञा ‘सुरभि’ सक्सेना ने बड़े ही प्रभावशाली और सरस ढंग से किया।
नेहरूकेंद्र लंदन के तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में ब्रिटेन के लगभग सभी गणमान्य साहित्यकार उपस्थित थे और सभागार श्रोताओं और अतिथियों से भरा हुआ था।
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पुस्तकः ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’
लेखिकाः उषा राजे सक्सेना
प्रकाशकः सामायिक प्रकाशन (श्री महेश भारद्वाज)
3320-21 जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज- नई दिल्ली, भारत
मोबाइल. 919811607086
मूल्य 5 पाउँड या 10 अमेरिकन डालर
भारत-200 रुपए

उषा राजे सक्सेना – एक संवेदनशील कहानीकार

जून 4, 2008

उषा राजे सक्सेना – एक संवेदनशील कहानीकार

नेहरू सैंटर, लंदन में ३० मई २००८ उषा राजे सक्सेना की कहानी संग्रह
‘वह रात और अन्य कहानियां’ के लोकार्पण के समय पर पढ़ा गया लेखः
– प्राण शर्मा

हिंदी कहानी में कुछ दशकों से कई रूप बदले हैं। उसे कभी नई कहानी, कभी प्रतीकात्मक कहानी, कभी सक्रिय कहानी, कभी सचेतन कहानी, कभी समांतर कहानी, कभी अकहानी और कभी प्रयोगवादी कहानी न जाने कितने आंदोलनों से गुज़रना पड़ा है। एक ऐसा वक़्त भी आया जब कहानी में अन्तर्वस्तु जैसा कुछ नहीं था। न कथानक और न ही किस्सागोई। यदि उसमें कुछ था तो केवल बौद्धिकता और दुरूहता। पठनीयता, मार्मिकता, गठन और सम्प्रेषणीयता जो कहानी के मुख्य गुण हैं, कहानी के एक सिरे से ही गायब हो गये। इसके अभाव में कहानी भटके हुए मुसाफ़िर की तरह लगने लगी। पाठक बस या ट्रेन में अपने सफ़र को सुखद बनाने के लिए बुकस्टाल से कहानी पत्रिका खरीदता लेकिन पढ़ने को उसे नीरस और दिलउबाऊ कहानियां मिलती। कहानीकार यह भूल गया कि कहानी वह होती है जिसमे पढ़ने वाली कोई बात हो, कोई किस्सा हो जो पढ़ने वाले को बांध ले।वह कहानी ही क्या जो मन को छू न सके। कहानी पढ़ कर लगने लगा कि जैसे कहानीकार ने कहानी पाठक की सन्तुष्टि के लिए नहीं बल्कि अपनी सन्तुष्टि के लिए लिखी है। परिणाम यह निकला कि कहानी पाठक से दूर हो गई और पाठक कहानी से दूर हो गया।

सुखद की बात यह है कि कुछेक सालों से कहानी में फिर से सजीवता आयी है। कहानी लेखक ऐसे-ऐसे विषय लेकर आ रहे हैं जिसमें कथावस्तु है, किस्सा गोई है। थोथे प्रयोगों के बोझ से मुक्त हो कर कहानी फिर से सांस लेने लगी है।

जीवंत विषयों को अपनी कहानियों में ढालने वाली ऐसी ही एक सशक्त कहानीकार हैं – उषा राजे सक्सेना। हाल ही में सामयिक प्रकाशन ने इनका कहानी संग्रह प्रकाशित किया है। कहानी संग्रह का नाम है – ‘वह रात और अन्य कहानियां’। संग्रह में दस कहानियां हैं, सब की सब मन को छूने वाली। वे हिंदी कथा साहित्य में लिखी जा रही अच्छी कहानियों से कतई कम नहीं हैं। सच तो यह है कि वे अंग्रेजी कथा साहित्य में लिखी जा रही अच्छी कहानियों से भी कतई कम नहीं है। ‘एलोरा’, डैडी’, ‘तीन तिलंगे’, ‘वह रात’ आदि कहानियों ने उषा राजे सक्सेना को उच्च श्रेणी के कहानीकारों में ला खड़ा किया है। जादू वह जो सर पर चढ़ कर बोलता है। उषा राजे सक्सेना की कहानियां सर पर चढ़ कर बोलती ही नहीं बल्कि दिल की गहराइयों में उतरती भी हैं।

उषा राजे सक्सेना ने लगन, परिश्रम और अभ्यास के बलबूते पर जो ऊंचा स्थान हिंदी कथा साहित्य में बनाया है, वह बहुत ही कम कहानीकार बना पाते हैं। चंद सालों में अच्छी से अच्छी कहानी देना उषा राजे सक्सेना की एक बड़ी उपलब्धि है। कुछ साल
पहले ही मैंने इनकी एक कहानी – ‘एक मुलाकात’ पढ़ी थी। कहानी क्या थी – एक जीतीजागती संवेदना थी। हालात पत्थर दिल को भी मोम जैसा बना देते हैं – कहानी का थीम था। कहानी का सजीव चित्रण मैं आज भी नहीं भूला हूं। आज भी वह मेरे मन पर अंकित है।

उषा राजे सक्सेना आज एक ऐसी कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कथा साहित्य को नयी से नयी कथावस्तु दी है, नयी से नयी भाषा दी है, नये से नये मुहावरे दिये हैं और नया सा नया शिल्प दिया है। इनकी कहानियों के विषय प्रायः यू.के. से जुड़े हुए हैं, मतलब यह है कि इनकी कहानियां ब्रिटेन के हर तबके के आदमी के जीवन का लेखा-जोखा है। इनकी कहानियों में ब्रिटेन के हर तबके के आदमी का सुख-दुख और उनकी आशा-निराशा है। ब्रतानवी परिवेश में लिखी गयी जितनी कहानियां इनकी हैं शायद ही किसी अन्य कहानीकार की हों।

‘एलोरा’ कहानी में जहां समाज में सर उठाकर चलने वाली एलोरा जैसा कैरेक्टर है ‘शर्ली सिम्पसन शतुरमुर्ग है’ कहानी में वही जीवन के सुख-दुख से समझौता करने वाली शर्ली सिम्पसन जैसा कैरेक्टर है। ‘सलीना तो शादी करना चाहती थी’ कहानी में जहां एक दूजे के लिए सलीना और बुखारी का त्याग है ‘रिश्ते’ कहानी में वही ज़िद्दी बाप-बेटी का बिछुड़ना और पुनर्मिलन है। ‘डैडी’ कहानी में जहां बरसों बाद मिले बाप-बेटी का सुखद संवाद है ‘अस्सी हूरें’ कहानी में वहीं आतंकवाद से उपजा दुखांत है। ‘तीन तिलंगे’ कहानी में जहां भविष्य को सुधारने का संकल्प करने वाले डोल मनी पर निर्वाह कर रहे तीन तिलंगों की आपबीती है ‘वह रात’ कहानी में वहीं दौलत के लिए एंजला की हवस है और मां की ममता को तरसते हए एनिस औ मार्क की छटपटाहट है।

‘वह रात —-‘ कहानी संग्रह की सभी कहानियों के पीछे उषा राजे सक्सेना का व्यापक अनुभव है। ढेरों सामाजिक चैरिटेबल कार्य करना, समय-समय पर लम्बी-लम्बी पानी विश्वयात्रा पर निकलना, विश्व सभ्यता और संस्कृति के विवध पहुलुओं को जानना और समझना, लंदन बोरो आफ् मर्टन के स्कूलों में मनोविज्ञान पढ़ाना और हिंदी के प्रचार-प्रसार में हमेशा करिबद्ध होना ये सभी अनुभव उषा राजे सक्सेना के कहानी लेखन में देखे जा सकते हैं।

उषा राजे सक्सेना आज कथा साहित्य में ऐसे मुकाम पर हैं जिसको पाने के लिए हर कथाकार सदैव आकांक्षी रहता है। उषा राजे सक्सेना की सभी कहानियों के विषय भिन्न हैं। उनमें विविधता है। कहीं दोहराव नहीं है। जिस कहानीकार की एक कहानी उसकी दूसरी कहानी से मेल खाती है, वह कहानी ही क्या?

उषा राजे सक्सेना एक सशक्त कहानीकार हैं । इनकी कहानियां युग और परिवेश की सच्ची इहचान है। इनकी कहानियां पाठक से रिश्ता जोड़ती हैं, उनमें संवेदना जगाती हैं। उषा राजे की कहनियों में अर मानवीय संवेदना का समावेश है तो उसका एकमात्र कारण उषा राजे सक्सेना के स्वभाव का संवेदनाशील होना है। ऐसी संवेदनशील कहानीकार की कहानियों के बारे में विद्वान लेखक शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव का कथन कितना सटीक है -“ब्रिटेन में एक नयी ऊंचाई देने में जिन कलमों का उल्लेखनीय भूमिक रही है उनमें एक सशक्त कलम है – उषा राजे सक्सेना की कलम——। एक बहु सांस्कृतिक, उन्मुकत, सम्पन्न और गतिशील समाज में व्यक्ति की पीड़ा क्या होती है, उसका रीतापन क्या होता है, सम्बंधों का तीतापन क्या होता है, एकांत का सुख और दुख कया होता है इन्हें जानने और समझने के लिए उषा राजे सक्सेना की कहानियों को ग़ौर से पढ़ने की ज़रूरत है।”

अंत में, कहानियों के बारे में पद्य में मेरी संक्षिप्त टिप्पणी है –

हर कतरा पानी है
‘वह रात’ की पुस्तक का
हर शब्द कहानी है
हर राज़ को खोलता है
हर शब्द कहानी का
सर चढ़ कर बोलता है
प्राण शर्मा

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पुस्तकः वह रात और अन्य कहानियाँ
लेखिकाः उषा राजे सक्सेना
प्रकाशकः सामायिक प्रकाशन (श्री महेश भारद्वाज)
3320-21
जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज- नई दिल्ली, भारत
मोबाइल. 919811607086
मूल्य 5 पाउँड या 10 अमेरिकन डालर
भारत-200 रुपए