इस ज़िन्दगी से दूर – ग़ज़ल

इस ज़िन्दगी से दूर – ग़ज़ल

इस ग़ज़ल का मतला (पहला शेअर) उन लोगों को समर्पित है जो ज़िन्दगी के ढलान
पर हैं। जिस्म और ज़हन पूरी तरह साथ नहीं दे पाते। मस्तिष्क से शब्द निकल कर
देर तक ज़ुबान को चाट चाट कर मुंह से निकलते हैं, या फिर ख़ामोशी से मस्तिष्क के
शब्दकोश की अंधेरी कोठरी में वापस चले जाते हैं। ख़ुद को भी उसी सफ़ में देख रहा हूँ।

इस ज़िन्दगी से दूर, हर लम्हा बदलता जाए है,
जैसे किसी चट्टान से पत्थर फिसलता जाए है।

अगले दो अशआर उन लोगों को समर्पित करता हूं जो बुढ़ापे में तन्हाई के कैदख़ाने की
सलाखों से जूझते रहते हैं।

अपने ग़मों की ओट में यादें छुपा कर रो दिए
घुटता हुआ तन्हा, कफ़स में दम निकलता जाए है।

कोई नहीं अपना रहा जब, हसरतें घुटती रहीं
इन हसरतों के ही सहारे दिल बहलता जाए है।

………………..
तपती हुई सी धूप को हम चांदनी समझे रहे
इस गर्मिये-रफ़तार में दिल भी पिघलता जाए है।

जब आज वादा-ए-वफ़ा की दासतां कहने लगे,
ज्यूं ही कहा ‘लफ़्ज़े-वफ़ा’, वो क्यूं संभलता जाए है।

इक फूल बालों में सजाने, खार से उलझे रहे,
वो हैं कि उनका फूल से भी, जिस्म छिलता जाए है।

दौलत जभी आए किसी के प्यार में दीवार बन,
रिश्ता वफ़ा का बेवफ़ाई में बदलता जाए है।

महावीर शर्मा

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

Advertisements

14 Comments »

  1. 1

    शर्मा जी प्रणाम, बहुत दिनो बाद आपके ब्‍लाग में आया हूं । सुन्‍दर कलेवर है । आपका लिंक मेरे आरंभ में डाल रहा हूं ।

    आरंभ
    जूनियर कांउसिल

  2. आदरणीय महावीर जी सर
    बहुत दिनो बाद (68दिनो) आपकी पोस्ट पढने को मिली. 🙂

    गज़ल का हर शेर दिल को छु गया ।

    आदर
    हेम ज्योत्स्ना

  3. 3
    balkishan Says:

    आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ सर. पढ़कर अच्छा लगा. कुछ शेर सीधे दिल मे उतरते है.
    इक फूल बालों में सजाने, खार से उलझे रहे,
    वो हैं कि उनका फूल से भी, जिस्म छिलता जाए है।

  4. 5
    neeraj Says:

    जैसे किसी चट्टान से पत्थर फिसलता जाए है।
    वाह क्या बात है….बहुत खूब.
    हुजूर कभी आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें और नवाजें.
    बुढ़ापे में भी जिंदा दिल रहें तभी जीने का मज़ा है.
    नीरज

  5. 6
    divyabh Says:

    आदरणीय महावीर सर
    नमस्कार,
    आज बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढ़ने को मिली… बेहतरीन रचना !!! पढ़ते हुए ऐसा लगा कि पिघलते हुए जिस्म से बहता हुआ जज्बात अब अक्स को भी डुबोए हुए है……।
    अभी-2 एक नालंदा(बिहार) पर लघु फिल्म बनाने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया है…इसकारण बहुत व्यस्त चल रहा हूँ ब्लाग पर भी कम ही आना होता है… और आज आया तो देखा कि आपकी रचना छपी है… मन आह्लादित हो गया…।
    आपका आशीर्वाद रहा तो एक अच्छी फिल्म बनेगी…।

  6. आदरणीय महावीर जी, नमस्ते, इतनी उम्दा गज़ल पढकर दिल बाग बाग हो उठा है – आशा है, आप स्वस्थ व सानँद हैँ 🙂

    पँडित नरेन्द्र शर्मा की ” षष्ठिपूर्ति ” के अवसर पर डा. हरिवँश राव बच्चन के भाषण से साभार उद्`धृत ) कृपया लिन्क देखेँ
    http://www.lavanyashah.com/

  7. 8

    आदरणीय शर्मा जी,

    बहुत बहुत खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आपने..हर शेर दिल में उतर गया…आपके बिना सब सूना-सूना सा था…आप आए महफ़िले बहार आई….बस आप लिखते रहिए और स्वस्थ्य रहिए….

    डा. रमा द्विवेदी

  8. 10
    neeraj Says:

    श्रद्धेय महावीर जी
    प्रणाम
    आप का कृपा पत्र प्राप्त हुआ. आप मेरे ब्लॉग पर आए और कहा की “बहुत ही नपी तुली खूबसूरत ग़ज़ल है। हर शे’र असरदार है। ये शे’र बहुत पसंद आयाः
    यहाँ जीने के दिन हैं चार माना
    मगर मरने के मौके सौ गुने हैं”
    ये मेरे लिए बहुत गौरव की बात है. आप के ब्लॉग पर आने मात्र से मैं पुलकित हूँ. अपनी खुशी शब्दों के माध्यम से बयां करने में असमर्थ हूँ. जहाँ तक मेरी ग़ज़ल के बहर का प्रशन है तो आप और आप के मित्र में से मैं किसी को नाराज़ करने के पक्ष में नहीं हूँ . सही बात तो ये है की मैं भी ख़ुद भी अभी सीख ही रहा हूँ ऐसी स्तिथि में कुछ भी कहना मेरे लिए ग़लत ही होगा.मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात ये है की आप को मेरा लिखा पसंद आया. उम्मीद करता हूँ की आप के सानिध्य में सीखने का मौका मिलेगा और कभी आप जैसा में भी कह पाउँगा. अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखियेगा.
    इसी प्रार्थना के साथ.
    नीरज

  9. 12

    तपती हुई सी धूप को हम चांदनी समझे रहे
    इस गर्मिये-रफ़तार में दिल भी पिघलता जाए है।

    इक फूल बालों में सजाने, खार से उलझे रहे,
    वो हैं कि उनका फूल से भी, जिस्म छिलता जाए है।

    आदरणीय महावीर जी….बहुत सुंदर ….बधाई

  10. 13

    आदरणीय महावीर जी,
    बहुत दिनों के बाद आज आपके ब्लॉग पर आया , बिगत दिनों लगातार या तो विभागीय कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रहा या फ़िर कहीं न कहीं यात्रा में , आपकी ग़ज़ल बहुत हीं सुंदर है , बधाईयाँ ! कथ्य और बिम्ब में गज़ब का तालमेल , बहुत बढिया , बहुत ही नपी तुली खूबसूरत ग़ज़ल है। हर शे’र असरदार है। आशा है स्वस्थ -सानंद होंगे ! जहाँ तक मेरी विनम्र व्यक्तिगत मान्यता है , शायद आप भी सहमत होंगे , कि- “जो दिल को छू जाए वही ग़ज़ल होती है,
    महसूस हो अपने पराए वही ग़ज़ल होती है.
    ग़ज़ल इश्क़ है, खुदा है, तसबबुर है यार-
    ये मतलब समझा जाए वही ग़ज़ल होती है.”

  11. 14

    आदरणीय महावीर जी
    बहुत दिनों बाद आपके ब्लाग पर आई हूँ, और न आकर मैंने बहुत खोया हैॠ
    अपने ग़मों की ओट में यादें छुपा कर रो दिए
    घुटता हुआ तन्हा, कफ़स में दम निकलता जाए है।

    क्या करूँ कया न कहूँ. बस दौर से गुजरने की आहटें सभी को सुनाई देती है.
    सूखे पत्ते हरे नहीं होते
    क्यों बहारों का आसरा है अब?

    सादर देवी


RSS Feed for this entry

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: