बीती रात का सपना – लावण्या

अंतर्मन की चिट्ठाकार लावण्या जिनकी रचनाएं अनेक जालघरों में सुशोभित हैं,
उनकी भावपूर्ण कविता ‘बीती रात का सपना’ प्रस्तुत हैः

बीती रात का सपना
लावण्या

बीती रात का सपना, छिपा ही रह जाये,
तो वो, सपना, सपना नहीँ रहता है!
पायलिया के घूँघरू, ना बाजेँ तो,
फिर,पायल पायल कहाँ रहती है?
बिन पँखोँ की उडान आखिरी हद तक,
साँस रोक कर देखे वो दिवा- स्वप्न भी,
पल भर मेँ लगाये पाँख, पँखेरु से उड,
ना जाने कब, ओझल हो जाते हैँ !
मन का क्या है ? सारा आकाश कम है
भावोँ का उठना, हर लहर लहर पर,
शशि की तम पर पडती, आभा है !

रुपहली रातोँ मेँ खिलतीँ कलियाँ जो,
भाव विभोर, स्निग्धता लिये उर मेँ,
कोमल किसलय के आलिँगन को,
रोक सहज निज प्रणयन उन्मन से
वीत राग उषा का लिये सजातीँ ,
पल पल मेँ, खिलतीँ उपवन मेँ !
मैँ, मन के नयनोँ से उन्हेँ देखती,
राग अहीरोँ के सुनती, मधुवन मेँ,
वन ज्योत्सना, मनोकामिनी बनी,
गहराते सँवेदन, उर, प्रतिक्षण मेँ !

सुर राग ताल लय के बँधन जो,
फैल रहे हैँ, चार याम,ज्योति कण से,
फिर उठा सुराही पात्र, पिलाये हाला,
कोई आकर, सूने जीवन पथ मेँ !
यह अमृत धार बहे, रसधार, यूँ ही,
कहती मैँ,, यह जग जादू घर है !
रात दिवा के द्युती मण्डल की,
यह अक्षुण्ण अमित सीमा रेखा है

लावण्या

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3 Comments »

  1. 1
    divyabh Says:

    Pranaam Sir,mai aapke blog par pahale aaya tha lekin aapke Profile ko nahi dekha es kaaran sambodhan mai thik se kar nahi payaa,i m very Sorry…–ese kahate hai Kavita jisme har pankti me sabere hone ki akulahat hai…man kaa kya hai saraa aakaash hi kam hai–thats very impressive.

  2. 2
    mahavir Says:

    चि. दिव्यभ
    टिप्पणी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
    मेरे ब्लाग ‘महावीर’ पर “बीती रात का सपना” मेरी रचना नहीं है। इस सुंदर कविता की रचयिता श्रीमती लावण्या शाह हैं जो सुप्रसिद्ध कवि स्वर्गीय प० नरेंद्र शर्मा जी की सुपुत्री है।
    उनका अपना वेबलॉग भी हैः अंतर्मन
    आपके सुंदर भाव जो इस टिप्पणी में व्यक्त किए हैं, श्रीमती लावण्या जी ही इन की पात्र हैं।
    मेरे दोनों चिट्ठों महावीर तथा
    शर्मा होम पर मेरे अतिरिक्त अन्य लेखक भी इनके पृष्ठों की शोभा बढ़ाते हैं।
    सधन्यवाद
    महावीर

  3. 3
    लावण्या Says:

    आदरणीय महावीरजी,
    प्रणाम !
    आपने मेरी कविता को अपने “जाल -घर” पर स्थान देकर मेरा उदारतासे स्वीकार किया है सो मैँ बडी अनुग्रहीत हुई !
    यूँ ही मुझे आपके “जाल -घर” पर, जगह मिलती रहे तो, बडा सँतोष मिलेगा.
    आपकी स्वजन,
    लावण्या
    हाँ — भाई श्री दीव्याभ को भी धन्यवाद जो मेरी कविता उन्हेँ पसँद आई –
    शुक्रिया !
    स – स्नेह, सादर,
    लावण्या


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