ग़ज़ल ‘याद है…..’महावीर शर्मा

भूल कर ना भूल पाए, वो भुलाना याद है
पास आये, फिर बिछड़ कर दूर जाना याद है

हाथ ज़ख्मी हो गए, इक फूल पाने के लिए
प्यार से फिर फूल बालों में सजाना याद है

ग़म लिए दर्दे-शमां जलती रही बुझती रही
रौशनी के नाम पर दिल को जलाना याद है

सूने दिल में गूंजती थी, मदभरी मीठी सदा
धड़कनें जो गा रही थीं, वो तराना याद है

ज़िन्दगी भी छांव में जलती रही यादें लिये
आग दिल की आंसुओं से ही बुझाना याद है

रह गया क्या देखना, बीते सुनहरे ख़्वाब को
होंट में आंचल दबा कर मुस्कुराना याद है

जब मिले मुझ से मगर इक अजनबी की ही तरह
अब उमीदे-पुरसिशे-ग़म को भुलाना याद है
महावीर शर्मा

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7 Comments »

  1. बहुत ही खूबसूरत गज़ल, बहुत सी भूली बिसरी बातें याद दिला गयी। अब तो यही कहना है
    जब मिले मुझ से मगर इक अजनबी की ही तरह
    अब उमीदे-पुरसिशे-ग़म को भुलाना याद है
    चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

  2. 2
    mahavir Says:

    सागर चन्द जी
    यह मेरा सौभाग्य है कि आप जैसी हस्ती इस नाचीज़ के घर पर आए। आपने ठीक
    पहचाना है कि मेरी ग़ज़ल हसरत मोहानी की मशहूर ग़ज़ल ‘चुपके चुपके….’ की
    ज़मीन पर ही बनाई गई है। दोनों ही ‘रमल मुसम्मन महज़ूफ़’ बहर में हैं।
    आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर बहुत खुशी हुई। आपका बहुत बहुत धन्यवाद!
    महावीर शर्मा

  3. 3
    divyabh Says:

    adbhut,bahut kub kaha hai dard ki jo lehar hoti hai woh jaroor abhivaykta hua hai.lehar hai yaado ki to uthanaa hi tha dard esme hum kaya kahen bandhu kuch aapse woh bhoole se din yaad aa gaye mujhe.Thnx

  4. 4
    neeraj Says:

    bahut achhi gajal hai,
    ek taraf se shuru kiya to bas parhta hi chala gaya ….
    maja aa gaya parhkar….

  5. 5
    mahavir Says:

    नीरज
    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

  6. 6
    Devi Nangrani Says:

    Mahavirji

    ज़िन्दगी भी छांव में जलती रही यादें लिये
    आग दिल की आंसुओं से ही बुझाना याद है

    Bahut hi dard hai in alfaaz mein, aur bayaN andaz bhi bahut hi acha laga.

    Ek sher aapki Nazar

    Teri yaadOn ke saaye the Sheetal
    Ho gayi dhoop be-asar jaise.

    Devi

  7. 7
    mahavir Says:

    देवी जी
    टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
    आपने निहायत ही खूबसूरत शेर दिया हैः
    ‘तेरी यादों के साये थे शीतल
    हो गई धूप बे-असर जैसे।’
    दाद क़बूल कीजिए।
    महावीर


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