संगति की गति

संगति की गति – (अनुगूँज संख्या १३)2nd anugunj.jpg

यह एक साधारण सी धारणा है कि बुरे लोगों की संगत अच्छी नहीं होती। कबीर जी ने अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कहाः
“नारी की झांई परत , अन्धो होये भुजंग
कबीरा तिनकी क्या गति जो नित नारी के संग।”
और तुलसी जी ने भी कुछ ऐसा ही कह डालाः
“ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।”
मंदिर के पुजारी श्री स्वर्गानन्द जी ने अपने पुत्र अभिमन्यु से कहा , ” बेटे, कल तुम्हें कलुआ के बेटे चीमू के साथ देखा गया था, उसकी संगत ठीक नहीं है।”
“क्यों? पिता जी, वह तो बड़ा अच्छा लड़का है। स्कूल जाता है, साफ कपड़े पहनता है, पढ़ाई में भी बहुत अच्छा है।” अभि ने कहा।
” वह शूद्र है और तुम ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए हो।” पुजारी जी ने कहा।
उधर श्रीकांत जी का समाज में बड़ा मान है, एक बड़े बंगले में रहते हैं, चमचमाती हुई गाड़ी है, नौकर चाकर, घर में विदेशी सामान से भरा हुआ है। वे परेशान हैं क्योंकि उनका इकलौता बेटा, उमेश चाल में रहने वाले मेहरुद्दीन के पुत्र अब्दुल के साथ देखा गया है। मेहरुद्दीन इतना बूढ़ा तो नहीं है किंतु ग़रीबी ने उसके चेहरे पर बुढ़ापे की छाप लगा दी है। बीवी और तीन बच्चों के साथ एक ही कमरे में गुज़र बसर करता है। मंझले लड़के अब्दुल को खुदा ने गले में ऐसा सोज़ दिया है कि जब गाता है तो राह चलता हुआ व्यक्ति रुक जाता है। इसी कारण उमेश उसका साथ पसंद करता है।
क्या कबीर जी की नारी, तुलसी जी के गंवार, शूद्र, नारी, और चीमू शूद्र तथा अब्दुल को ‘बुरा’ शब्द का लेबल चिपका दिया जाये? क्या पुजारी और श्रीकांत को अपने बच्चों को चीमू और अब्दुल से हटाने का प्रयास ठीक है? कल्पना कीजिये और यह प्रश्न स्वयं को उन स्थितियों में डाल कर उत्तर देने का प्रयत्न कीजिये।
कुसंगत का पात्र कोई भी नहीं होता। हां, कुछ विशेष प्रकार के व्यक्तियों से सतर्क अवश्य रहना पड़ता है। यदि हम सब ही को समाज का अंग मानते हैं तो ऐसे लोगों में जो कमियां हैं जिसके कारण उन्हें ‘बुरा’ , ‘दुष्ट’, ‘खतरनाक’, ‘समाज में दीमक’ आदि नाम देकर उनका अपमानित करते हैं । किसी कारण ये लोग अन्य बीमारियों की तरह मानसिक बीमारियों के शिकार होते है। जिस प्रकार दूसरी बीमारियों का इलाज होता है, इन मानसिक बीमारियों का उपचार भी हो सकता है। जब हम समाज की बात करते हैं उसमें हम सभी हैं; आप, हम, नेता-गण, सरकार, अध्यापक-वर्ग, पुलिस-विभाग, न्यायधीश, स्कूल, कॉलेज, डाक्टर, मनोवैज्ञानिक, संस्थायें आदि सभी सम्मलित हैं। (दुर्भाग्य यह है कि समाज का सब से मूल्यवान अंग नेता-गण और पुलिस तो पहले ही मनोरोगी हैं और साइकोपैथ की सीमा को लांघ चुके हैं।)
साधारणतयः कुसंगत के पात्रों को कुछ ऐसे अवगुणों से जोड़ा गया है जिसमें समाज-विरोधी व्यवहार और आचरण, आक्रमणात्मकता, बात को ना समझना, हिंसा, उत्पात मचाना, विकृत व्यक्तित्व, आत्महत्या, नशीली ड्रग्स-सेवन, अपराध करने में लज्जा ना होना आदि वृत्तियां जो किसी प्रकार उनमें आजाती हैं। कुछ किशोरावस्था में वातावरण के कारकों से बिगड़ जाते हैं और अधिकांश बड़े होकर इस जाल में से बाहर आजाते हैं। आवश्यकता है कि इस प्रकार के बच्चों के बचपन में ही पारिवारिक सहायता, आर्थिक समस्या और पड़ौस में सुधार तथा आरम्भिक शिक्षा आदि पर ध्यान दिया जाए तो बच्चे का आगामी जीवन सामान्य बन सकता है। वैज्ञानिकों और मनोविज्ञानिकों ने किसी हद्द तक माना है कि यह विकृत आचरण (कन्डक्ट डिस्आर्डर) अनुवांशिक और वातावरणिक दोनो ही हो सकते हैं। सी डी से अभिप्राय उन युवक और युवतियों के दुर्व्यवहार और भाव-जन्य समस्याओं से हैं।
इन के कारणः
१) पित्रैक या जननिक (जींस)हो सकते है

२) जिन बच्चों के सी.डी. (कन्डक्ट डिस्आर्डर) जननिक (जिनेटिक) नहीं हैं, तो दूषित वातावरण भी व्यक्ति के व्यहवहार में ऐसे दुर्गुण उतपन्न कर सकते हैं। इसे संगत का प्रभाव माना जाता है।

३) इस में दोनों का अंशदान भी हो सकता है। “करेला और नीम चढ़ा।”
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की बात करें तो पृष्ठों पर पृष्ठ भर जायेंगें जिनमें सी.डी., एस.डी., ओ.डी.डी., ए.एस.डी.पी, ए.डी.एच.डी. आदि की इस लेख में व्याख्या करना कठिन है। किंग्स कॉलेज, लंदन में किए गए अनुसंधानानुसार जो बच्चे जींस के शिकार हैं, यदि आरम्भ में उनका उचित उपचार ना किया जाए तो विकृत-आचरण असाध्य तो नहीं किंतु सुधार में बहुत कठिनाई आयेगी।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह सम्भव है कि दवाओं से भी ऐसे मनोरोगों की कुछ रोक थाम हो सकती है। इस दिशा में अनुसंधान जारी है। समस्या यह है कि सरकार ऐसी दवाओं के मिलने के कारण मूल सामाजिक-कारणों के उपचार से ध्यान हटा लेती है। यह जीन्स एक कण्वक (एनज़ाइम) मोनोमाइन ओक्सीडेज़ (एम.ए.ओ.ए.) की सक्रियता पर नियन्त्रण रखता है। रिसर्च प्रोफेसर टैरी मॉफिट का कहना है कि जन-संख्या का तीसरे भाग के जींस ऐसे हैं जो एम.ए.ओ.ए.की सक्रियता की कमी से संबंधित हैं। अनुवांशिक मिले हुए अवगुण वाले व्यक्ति को अनुकूल वातावरण सहायक सिद्ध हो सकता है। चन्दन के वृक्षों के आसपास की लकड़ियों में भी चन्दन की सुगंध आने लगती है।

संगतिः
जब हम संगति की बात करते हैं तो ध्यान केवल अवांछनीय व्यक्तियों तक ही रह जाता है। हम ऐसी ‘संगति’ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो हमारे मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं। इन ‘संगतियों’ में सब से पहली ‘संगत’ है – मीडिया, विशेषतयः टी.वी., फ़िल्में जहां क़त्ल, बलात्कार, जुर्म की दुनिया का क्रियात्मक खुलासा, नग्न अश्लीलता, खलनायक की भव्यता और ग्लैमर इन तस्वीरों में होते हुए भी युवा दर्शकों की आंखों की राह से गुज़र कर सीधे मस्तिष्क की चेतना को झंकारने लगते हैं। जो व्यक्ति एक चिड़िया के घायल होने पर द्रवित हो जाता था, इन फिल्मों को देख देख कर हत्या और बलात्कार का आदि हो जाता है। भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र में इसी कारणों को ध्यान रखते हुए रंग मंच पर हत्या और मृतक शरीर का निषेध किया गया था। इस क्षेत्र में मनोवैज्ञानिकों ने अपने अपने ढंग से प्रयोग किये हैं। लैनर्ड बरकोविट्ज़ का कहना है कि व्यक्ति प्राकृतिक रूप से उग्र और आक्रामक होता है किंतु वह इस पर नियन्त्रण रख के दबाता रहता है।हिंसात्मक और उग्रात्मक टी.वी. प्रोग्राम, फिल्में, टी.वी. सीरियल इस नियन्त्रण को कम कर देते हैं और आगे चल कर हिंसात्मक स्वभाव सामान्य हो जाता है। ऐसे प्रोग्राम देखने से बच्चों में उग्र स्वभाव बढ़ जाता है। (सिंगर एंड सिंगर के प्रयोग के अनुसार- १९८१)।
ह्यूसमैन एंड ऐरन, १९८६ – २२ वर्ष के अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि ८ वर्षीय बालक जो हिंसात्मक फिल्में देखते थे, ३० वर्ष की आयु तक किसी न किसी हिंसात्मक-अपराध में पकड़े गये थे।
बर्कोविट्ज़ (१९८४) के विश्लेषण स्वरूप, हिंसात्मक फिल्में देखने से हिंसात्मक विचार, भावनाएं और कुप्रवृत्तियां प्रेरित होति हैं।
दूसरी ओर सामाजिक क्रियाशील और रचनात्मक फिल्में उच्च विचारों, सहानुभूति और सुप्रवृत्तयों और सदव्यवहार की प्रेरणा देने में सहायक हैं।

संगीतः
संगीत के भी दो पक्ष हैं। यदि संगीत को विकार-युक्त दिशा में डाल दें तो आचार विचार वैसा ही प्रभाव होगा। यहां मैं क्षमा चाहूंगा, क्योंकि गत ४० वर्षों से इस आंगल देश में ही जीवन व्यतीत करता रहा हूं, इसलिये संगीत में भी पश्चिमी संगीत के ही आधार को लेकर अपनी राय दे रहा हूं। किंतु भारतीय शास्त्रीय संगीत तो आज भी मेरे कानों में अमृत सा घोलते रहते हैं।
हैवी मैटल संगीत (१९७० और १९८० के दशक) जिसकी विशेषता उग्रता, चलती ताल , गर्जते हुए गिटार की ध्वनि को विकृत करना, चिल्ला चिल्ला कर कानों को फाड़ने वाली आवाज़। सुनने वाला ड्रग्स के नशे में सर धुनने लगता था- (मैटल हैड्स तथा हैड बैंगर्स)। हैवी मैटल संगीत के चरम काल में उग्रता, ड्रग्स, खुले यौनाचार की सुलभता, समाज विरोधी व्यवहार के उदाहरण थोक में मिलते हैं। कितने ही किशोर युवक-युवतियां को इन कारणों से अस्पताल की शरण लेनी पड़ती। इस प्रकार के संगीत प्रेमियों की पसंद कुछ ऐसी थीं – शैतान-उपासना, रंगबिरंगे सींक से खड़े बाल, चिथड़े वाले कपड़े, मृतक-कपाल की तस्वीर छपी हुई टी शर्ट आदि। भारतीय फिल्मों और ऐल्बमों में ऐसे संगीत की छाप नज़र आने लगी है जिसका युवक और युवकों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ रहा है। आधुनिकता का अर्थ दोष-युक्त वृत्तियां नहीं हैं।

“संगति” विषय पर दृष्टि एक अन्य अमानवीय संगति पर भी विचार करना असंगत न होगा। वह है “झूटी शान” जो एक “मानसिक रूपी संगति” है। भारत में इसी के कारण लोग जंक फ़ूड खा खा कर दुनिया का कबाड़ शरीर में डाल कर कैंसर, ह्रदय-रोग, डायबीटिज़, असामाजिक उत्तेजनात्मक प्रवृत्ति आदि को आमंत्रित करते हैं। पश्चिमी देश के लोग इन बीमारियों के उदाहरण हैं। ‘शान’ से कहते हैं “यार, मकडोनल्ड या पिज़्ज़ा, बर्गर के लिये चलते हैं।” अंग्रेजी में एक कहावत हैः यू आर व्हॉट यू ईट।
१९८८ की बात है, मैं भारत घूमने के लिये गया था। गर्मी के दिन थे और ऐसे स्थान पर पहुंच गये थे जहां कोई रेस्तराँ नहीं था। बस, एक छोटी सी स्टॉल थी जहां रस निकालने की मशीन थी और जूस के कार्टन भी थे। मेरे मित्र ने दुकानदार से कहाः ‘ दो जूस के कार्टन देना।’ मैंने कहा, ‘ दोस्त, जब ताज़ा रस निकल सकता है तो यह कार्टन क्यों जिसमें न जाने कब का रस पड़ा होगा। दुकानदार को कहते हैं कि मशीन को अच्छी तरह धो दे।’ मित्रवर बोले,’ यार, कार्टन की शान है, इस बाबा आदम के ज़माने की मशीन से रस लेने में स्टेटस में फ़रक पड़ता है।’ यहां देखिये कि झूठी शान के कारण गुणों वाले पेय को छोड़ कर इस पुराने बासी रस को पी रहे थे।
इस ‘झूठी शान’ से झूठ बोलने की इतनी अधिक आदत पड़ जाती है कि सत्य बात निकालें तो गले में फंस जाती है। यह भी मनोरोग का एक अंग है।

अंत में यह कहूंगा कि जितने भी अवगुण संगत के कारण आजाते हैं, ऐसे व्यक्ति इन मानसिक रोगों में किसी कारण से ग्रस्त हो गये हैं। बीमारियों का इलाज भी होता है, समय अवश्य लगता है। उनसे घृणा नहीं, सावधानी बरत कर, प्रेम, सद्भावना, सहानुभुति और विश्वास की औषध दी जाए तो सफलता अवश्य मिलेगी।
महावीर शर्मा

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

Advertisements

1 Comment »

  1. 1
    “अनुगूँज”:एक अवलोकन Says:

    महावीर जी की प्रविष्टि विस्तार से लिखी गयी प्रविष्टि है।

    निश्‍चित रूप से , महावीर शर्मा की यह प्रविष्टि , इस विषय पर सोचे जाने वाले तमाम दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करती हुई और तमाम तथ्यों को सामने लाने वाली एक बहुत उम्दा प्रस्तुति थी।


RSS Feed for this entry

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: