होली है या…. ?

होली है या…. ?

फागुन की मस्त बयार लिये होली का अवसर आया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

हर नगर नगर और ग्राम ग्राम में , अबीर के बादल छाये
टेसू के फूलों के रंग से, भर बालक पिचकारी लाये
हर आने जाने वाले पर, पङती फुहार पिचकारी की
लहंगा भीगा, चुनरी भीगी, कंचुकी भीगी पनिहारी की
मुस्काती सी वह निकल गई, रग रग में यौवन छाया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

घर घर में रहने वाले सब, बालक सोते से जाग गये
अपनी मां से पैसे ले कर, रंग लेने बाहर भाग गये
लाये जेबों में भर भर गुलाल, रंग लाल हरा पीला धानी
जो भी मिलता रंगते उसको, करते सब अपनी मनमानी
मानो केवल धनवानों ने होली का पर्व मनाया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

धनवानों के बच्चे मिल कर उस कुटिया के बाहर आये
दो दिन से भूखा वह बालक कैसे रंग के पैसे लाये
मन मारे फिर भी बेचारा कुटिया से बाहर आया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

सब बच्चे आगे निकल गये धरती पर कुछ बिखरा गुलाल
बालक ने उसका रंग देखा, सोचा कि रक्त भी तो है लाल
फिर पटक वहीं सर धरती पर, मुख लाल किया उसने अपना
देखो माँ होली खेल आज साकार किया मैं ने सपना
जा कर माता की गोदी में उसने निज प्राण गंवाया है !
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

महावीर शर्मा

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