सारा चमन ही जल गया

SELECTED BEST GHAZAL OF DAY – NAI SUBHA AND PUBLISHED IN ANUBHUTI.

दिसंम्बर 2004 में सुनामी के कहर पर एक कविताः-

      “सारा चमन ही जल गया”

      खुशियों का वो लम्हा था ग़म में बदल गया
      मुंह फाड़ कर सागर सुनामी विश्व को निगल गया ।
      लाखों ही बेघर हो गये, थे हर तरफ़ शव बेकफ़न
      आशियां का क्या करें सारा चमन ही जल गया।

    कैसे कहें सागर तुझे, लक्ष्मी माँ का जन्म-दाता
    माता की गोदें छीन कर, हंस हंस के तू मचल गया।

      मिटा सिंदूर मांगों से अट्टाहास का गरजना
      शिशुओं का हंसना खेलना ये सब तुझे क्यों फल गया?

    क्यों न तेरा दिल पसीजा देख बच्चों का तड़पना
    हृदय-विदारक दृश्य से पाषाण भी पिघल गया।

      पथराई सी निर्जीव आंखें घूरतीं घातक लहर को
      विध्वंस के इस खेल में, तुझ को बता क्या मिल गया?

    वेदना सुना रही भूकम्प की करुणा कहानी
    देव-गण भी रो पड़े, रुद्र का सिहांसन हिल गया।

    महावीर शर्मा



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      1 Comment »

      1. 1
        Deepa Joshi Says:

        From: DEEPA JOSHI
        Date: Mon Jan 10, 2005 6:45 am
        Subject: Re: [naisubha] SUNAMI KE KAHAR PAR EK KAVITA :- Mahavir Sharma
        sir…bahut hi sudar likhi hai
        deepa


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