महावीर

July 15, 2008

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार”

Filed under: महावीर शर्मा, सामान्य/General — महावीर @ 12:10 am

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” (पहला भाग)

दोस्तों, प्राण शर्मा जी का और मेरा (महावीर शर्मा) आप सभी को प्यार भरा नमस्कार
यह कहने में गर्व होता है कि इस ‘बरखा-बहार’ मुशायरे/कवि-सम्मेलन में देश-विदेश के
कवि इस मंच की रौनक़ बढ़ाने के लिए इकट्ठे हुए हैं।

आज हमारी ख़ुशकिस्मती है कि अमेरिका से इस मंच पर बरखा पर अपनी कविता से आपके दिलों में आनंद का संचार करने के लिए श्रीमती लावण्या शाह जी आ रही हैं। मैं देख रहा हूं कि लावण्या जी का नाम सुनते ही तालियों के शोर में मेरी आवाज़ ऐसे गुम हो गई जैसे नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़। मैं जानता हूं कि आप उनकी कविता के लिए बेज़ार हो रहे हैं। हों भी क्यों ना, जिनकी ख्याति उनके ब्लॉग अंतरमन और कितने ही जालघरों, पत्रिकाओं, कवि-सम्मेलनों आदि में फैली हुई है। आप जानते ही कि लावण्या जी महाकवि स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं । पंडित जी के विषय में कुछ कहना तो सूरज के सामने दीपक दिखाने वाली बात होगी।


लीजिए,
लावण्या जी माइक पर आगई हैं-

” पाहुन “
बरखा स -ह्रदया, उमड घुमड कर बरसे,
तृप्त हुई, हरी भरी बन्, शुष्क धरा,
बागोँ मेँ खिल उठे कँवल - दल
कलियोँ ने ली मीठी अँगडाई !

फैला बादल दल , गगन पर मस्ताना
सूखी धरती भीग कर मुस्काई !

मटमैले पैरोँ से हल जोत रहा

कृषक थका गाता पर उमग भरा
” मेघा बरसे मोरा जियरा तरसे ,
आँगन देवा, घी का दीप जला जा !”

रुन झुन रुन झुन बैलोँ की जोडी,
जिनके सँग सँग सावन गरजे !
पवन चलये बाण, बिजुरिया चमके

सत्य हुआ है स्वप्न धरा का आज,
पाहुन बन हर घर बरखा जल बरसे !

बहुत सुंदर।
बागोँ मेँ खिल उठे कँवल - दल
कलियोँ ने ली मीठी अँगडाई !
***************

पंजाब के ‘जगराँव’ शहर का नाम आता है तो भारत स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गज ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय के नाम मात्र से ही गर्व से सर उठ जाता है। उसी ‘जगरांव’ में जन्में, आज व्यस्त के जीवन से कुछ क्षण निकाल कर यू.के. के सुविख्यात लेखक, कवि, कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा जी इस मुशायरे में शिरकत कर रहे हैं।

(वे अभी तो मंच पर भी नहीं आए और नाम लेते ही उनके स्वागत में तालियों से हॉल गूंज उठा है।)

तेजेन्द्र जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंगरेज़ी की डिग्री हासिल की। उनके हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिन में कुछ कविता एवं ग़ज़ल संग्रह ‘यह घर तुम्हारा है’, पांच कहानियों का संग्रह, और अंगरेज़ी में (Black & White – the biography of a Banker, Lord Byron – Don Juan, John Keats – The Two Hyperions) उल्लेखनीय हैं।

उनके अन्य भाषाओं नेपाली, उर्दू और पंजाबी में अनुवादित संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरुस्कार के अतिरिक्त देश-विदेशों में पुरुस्कारों से सम्मनित हुए हैं।
तेजेन्द्र जी आजकल लंदन में कथा यू.के. के महासचिव हैं। उनकी १६ कहानियों की आडियो बुक और ग़ज़लों की एक सी.डी. भी बाज़ार में उपलब्ध है।

लीजिए, तेजेन्द्र जी माइक पर आगये हैं और उनकी रचना का लुत्फ़ उठाइयेः

(एक बार फिर से हॉल तालियों से गूंज उठा है)

तेजेन्द्र शर्मा:

लंदन में बरसात….

ऐसी जगह पे आके बस गया हूं दोस्तो

बारिश का जहां कोई भी होता नहीं मौसम .
पतझड़ हो या सर्दी हो या गर्मी का हो आलम
वर्षा की फुहारें हैं बस गिरती रहें हरदम ..

मिट्टी है यहां गीली, पानी भी गिरे चुप चुप
ना नाव है कागज़ की, छप छप ना सुनाई दे .

वो सौंघी सी मिट्टी की ख़ुशबू भी नहीं आती
वो भीगी लटों वाली, कमसिन ना दिखाई दे ..

इस शहर की बारिश का ना कोई भरोसा है
पल भर में चुभे सूरज, पल भर में दिखें बादल .

क्या खेल है कुदरत का, ये कैसे नज़ारे हैं
सब कुछ है मगर फिर भी ना दिल में कोई हलचल.

चेहरे ना दिखाई दें, छातों की बनें चादर
अपना ना दिखे कोई, सब लगते हैं बेगाने .

लगता ही नहीं जैसे यह प्यार का मौसम है
शम्मां हो बुझी गर तो, कैसे जलें परवाने..

वाह!
चेहरे ना दिखाई दें, छातों की बनें चादर
अपना ना दिखे कोई, सब लगते हैं बेगाने .
(फिर वही ना रुकने वाली तालियां)

**********

‘न बुझ सकेगी ये आंधियाँ
ये चराग़ है, दिया नहीँ।’

जी हाँ, ये शे’र उस शाइरा का लिखा हुआ है जिन्हों ने अपनी ग़ज़लों में भाव, उद्गारों और अहसास के उमड़ते हुए सैलाब को अपने ग़ज़ल संग्रहों चराग़े-दिलआस की शमअ’(सिंधी में), दिल से दिल तक और ‘सिंध जी माँ जाई आह्याँ’ में समेट लिया है। ‘रेडियो सबरंग’ में अपनी गुलोसोज़ आवाज़ से और राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं , जालघरों में ग़ज़ल, कहानियों और लेखों, मुशायरों में अपनी रचनाओं की अमिट छाप छोड़ देती हैं।

वह हैं श्रीमती ‘देवी’ नागरानी जी जिन्हें भारत और अमेरिका में अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया हैं। अमेरिका में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से ‘Eminent Poet’ काव्य सम्मान, स्वतंत्रता दिवस २००७ पर जर्सी सिटी के मेयर द्वारा ‘Proclamation Honor Award’, न्यू यार्क में विद्याधाम का ‘काव्य रतन’, बाल दिवस पर पदक और काव्यमणि परुस्कार, रायपुर छत्तीसगढ़ राज्य की सृजन सन्मान का ‘सृजन-श्री सम्मान’ उल्लेखनीय हैं। अमेरिका निवासी श्रीमती ‘देवी’ नागरानी ग़ज़ल के सफ़र में अथक मुसाफ़िर हैं। लीजिए,

देवी नागरानी जी मंच पर माइक के सामने आगई हैं…

(सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा हैः)
देवी नागरानीः

आपके सामने एक ग़ज़ल पेश हैः

बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना.

ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना.

हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना.

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.

खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गवाना.

मैं देवी खुदा से दुआ मांगती हूं
बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना.

बहुत ख़ूब देवी जी,
चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.
(देवी जी मंच से दूर जारहीं हैं और सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से
गूंज रहा है।)

****************

राक्षसों के विनाश हेतु भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की एकत्रित शक्तियों से पहाड़ों से एक ज्वाला उठी और उसी ज्वाला से ‘आदि-शक्ति’ देवी माँ का जन्म हुआ। हिमाचल प्रदेश की उसी पवित्र-पावन भूमि ज्वालामुखी में अप्रैल १९३८ में एक शायर का जन्म हुआ जिसे आज हम सुरेश चन्द्र “शौक़” के नाम से जानते हैं। आप आजकल ए.जी. आफ़िस से बतौर सीनियर आडिट आफ़िसर रिटायर होकर शिमला में रहते हैं। सुप्रसिद्ध शायर श्री राजेन्द्र नाथ “रहबर” ने कहा थाः ” ‘शौक़’ साहिब की शायरी किसी फ़कीर द्वारा मांगी गई दुआ की तरह है जो हर हाल में क़बूल हो कर रहती है।” ‘शौक़’ साहिब का ग़ज़ल संग्रह “आँच” बहुत लोकप्रिय हुआ है।

लीजिए ‘शौक’ साहिब का कलाम…….
(लोगों को इतनी उत्सुक्ता हो रही थी कि मेरी बात को नज़र अंदाज़ कर उनके स्वागत
में खड़े हो गए और तालियों से हाल गूंज उठा)

जनाब सुरेश चन्द्र जी ‘शौक़’ :


सावन की बरखा

भूले बिसरे दर्द जगा कर बीत गई सावन की बरखा
दिल में सौ तूफ़ान उठा कर बीत गई सावन की बरखा

दीवारो —दर को सुलगा कर बीत गई सावन की बरखा
जज़्बों में हलचल— सी मचा कर बीत गई सावन की बरखा

कितने फूल खिले ज़ख़्मों के,कितने दीप जले अश्कों के
कितनी यादों को उकसा कर बीत गई सावन की बरखा

सोज़,तड़प, ग़म ,आँसू ,आहें ,टीसें ,ख़ामोशी, तन्हाई
हिज्र के क्या—क्या रंग दिखा कर बीत गई सावन की बरखा

रिम—झिम,रिम—झिम बूँदे थीं या सुर्ख दहकते अंगारे थे
दिल के नगर में आग लगा कर बीत गई सावन की बरखा

उनसे मिलन की आस कॊ शबनम साथ लिये आई थी ,लेकिन
यास के शोलों को भड़का कर बीत गई सावन की बरखा

हिज्र की रातें काटने वालों से यह जाकर पूछे कोई

क्या—क्या क़ह्र दिलों पर ढा कर बीत गई सावन की बरखा

ये आँखों की ज़ालिम बरखा आ कर जाने कब बीतेगी
‘शौक़’! सुना है कब की आ कर बीत गई सावन की बरखा.

(लोग मंत्रमुग्ध से ‘शौक़’ साहिब के चेहरे को निरख रहे हैं। अचानक यह क्या हुआ कि सब खड़े हो गए और आनंदविभोर हो कर तालियाँ से अपने उद्गारों का इज़हार कर रहे हैं।)

‘शौक़’ साहिब आपकी ग़ज़ल के सारे अशा’र एक से एक बढ़ कर हैं। हर शे’र पर वाह! ख़ुदबख़ुद निकल जाता है। काश! आपके पास कुछ और वक़्त होता और हम सुनते रहते।

(’शौक़’ साहिब मंच से उतर रहे हैं।)

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अनछुई छुअन से सिहर गई पगली !

एक ही पंक्ति जो दिल के साज़ के तारों को झंकार दे तो क्या उनकी पूरी कविता सुनकर अपना दिल संभाल पाएंगे? लीजिए दिल संभाल लीजिए जो आपके दिल के तारों को झंकारने के लिए हिन्दी तथा अंगरेज़ी में स्नातकोत्तर, ‘हृदय गवाक्ष’ ब्लॉग में जिनकी कविताओं और लेखों से ‘अनछुअन’ से भी ‘छुअन’ का आभास होने लगता है। हृदय गवाक्ष गवाह है कि उनकी रचनाएं कितनी संवेदनाशील और प्रभावशाली हैं।

गन्ना विकास निदेशालय, लखनऊ में हिंदी अनुवादक पद पर कार्यरत मंच पर माइक के सामने आगई हैं-

आप हैं कंचन चौहान जीः

(तालियों से हॉल गूंज रहा है।)

पेड़ों के काधों पे झुकी हुई बदली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

तन कर खड़े हैं तरू, पहल पहले वो करे,
बदली ने झुक के कहा, अहं भला क्या करें ?

तुम से मिले, मिल के झुके नैन अपने,
झुकना तो सीख लिया, उसी दिन से हमने,

ये लो मैं झुकी पिया, शर्त धरो अगली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

तेरे लिए घिरी पिया, तेरे लिए बरसी,
तुझे देख हरसी पिया, तेरे लिए तरसी।

तेरे पीत-पात रूपी गात नही देख सकी,
सरिता,सर,सागर भरे, इतना आँख बरसी,

तुझे देख मैं जो हँसी, नाम मिला बिजली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

कंचन चौहान

वाह! क्या बात हैः
ये लो मैं झुकी पिया, शर्त धरो अगली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

(सारा हॉल तालियों से गूंज रहा है।)
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मुम्बई से कवि कुलवंत सिंह जी जिनकी विभिन्न विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कुछ प्रकाशनाधीन हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं होती रहती हैं। ‘काव्य भूषण सम्मान’, ‘काव्य अभिव्यक्ति सम्मान’, ‘भारत गौरव सम्मान’, ‘राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान, ‘बाबा अंबेडकर मेडल’ आदि सम्मानों से विभूषित आजकल भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर आसीन हैं। जिनके गीत सुनहरे आप पढ़ते ही रहते हैं, किंतु सावन के महीने में प्रकृति की सुंदरता आप के सामने अपनी सुंदर कविता से आपका दिल मोह लेंगे।

कवि कुलवंत सिंह जी-

(हॉल की दीवारों से तालियों की गड़गड़हट टकरा कर अद्भुत नाद कर रही हैं। तालियों
की गूंज अब कम हो गई है और कवि जी माइक के सामने आगए हैं)

प्रकृति - बरखा बहार
सावन का महीना, प्रकृति की सुंदरता, बरसात.. इस मौसम में एक कविता प्रस्तुत है॥

सतरंगी परिधान पहन कर,
आच्छादित है मेघ गगन,

प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,
चहक रहे द्विज हो मगन ।

कन - कन बरखा की बूंदे,
वसुधा आँचल भिगो रहीं,

किरनें छन - छन कर आतीं,
धरा चुनर है सजो रहीं ।

सरसिज दल तलैया में,
झूम - झूम बल खा रहे,
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,
समीर सुगंधित कर रहे ।

हर लता हर डाली बहकी,

मलयानिल संग ताल मिलाये,
मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।

कल - कल करती तरंगिणी,
उज्जवल तरल धार संवरते,

जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,
माणिक, मोती, हीरक लगते।

मृग शावक कुलाँचे भरता,
गुंजन मधुप मंजरी भाता,

अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,
लोचन बसता, हृदय लुभाता ।

वाह! दिल मोह लियाः
हर लता हर डाली बहकी,

मलयानिल संग ताल मिलाये,

मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।

कवि कुलवंत जी शायराना अंदाज़ से लोगों का धन्यवाद देते हुए मंच से जा रहे हैं और हॉल में अभी भी ‘सतरंगी परिधान पहन कर’
लोगों की ज़बान पर है और साथ ही तालियाँ बज रही हैं।

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आप दिल को थाम लीजिए क्योंकि आज हमारे बीच डॉक्टर महक जी मौजूद हैं जिनके क्लीनिक में उनके इलाज से कितने ही मरीज़ों को ज़िन्दगी में मायूसी से राहत मिली है। दोस्तों, आज वे आपके दिल की बढ़ती हुई धड़कनें दवाओं से नहीं बल्कि अपनी रोग निवारक खूबसूरत कविता से करेंगी। डॉ. महक जी की महक आपको उनके ब्लॉगों महक और मराठी भाषा में चांदणी में भी आपके दिलो-दिमाग़ की ताज़गी बनाए रखेगी।

(लीजिए, डॉ. महक माइक पर आगई हैं। लोग उनके स्वागत में ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजा रहे हैं।)

डॉ. महक जीः

मेघा बरसो रे आज

मौसम बदल रहा है ,एक नया अंदाज़ लाया
बहती फ़िज़ायो संग रसिया का संदेसा आया

आसमान पर बिखरे सात रंग
रोमांचित,पुलकित,मैं हूँ दन्ग
भिगाना चाहूं इन खुशियों में तनमन से
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

वादीयां भी तुमको,आवाज़ दे रही है

हवाए लहेराकर अपना साज़ दे रही है
घटाओ का जमघट हुआ है
रसिया का आना हुआ है
भीगना चाहती हूँ रसिया की अगन मे
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

हरे पन्नो पर बूँदे बज रही है
मिलन की बेला मैं अवनी सज रही है
थय थय मन मयूर नाच रहे है
पूरे हुए सपने,जो अरसो साथ रहे है

भीगना चाहती हूँ,प्यार के सावन में
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

डॉ. महक जी

बहुत ही सुंदर कविता सुनाई है आपने-

‘हरे पन्नों पर बूंदे बज रही है।’

बड़ा खूबसूरत ख़याल है।

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आप सब उत्सुक्ता से अगले कवि का स्वागत करने के लिए बेज़ार हो रहे हैं। मैं जानता हूं कि ऑडियो वेब साइट रेडियो सबरंग के संचालक व्यस्तता के कारण खाना तक भी भूल जाते हैं। मैं देख रहा हूं कि इस वक़्त भी कान पर मोबाइल है, लीजिए उनका मोबाइल बंद हो गया है और मंच पर आगए हैं। आप हैं डेनमार्क से जनाब ‘चाँद शुक्ला हदियाबादी’ जी :-

लोगों की तालियां रुकने में नहीं आर हीं हैं।

जनाब चाँद साहिब माइक पर आगए हैं-

क़दम क़दम पे हमें मौसम ने रोका था
हम अपनी आंखों में बरसात लिये फिरते हैं।

लीजिए उनका मोबाइल बीच में ही बज उठा है और वो कह रहे हैं कि एक बहुत ही ज़रूरी काम से बीच में जाना पड़ रहा है जिसके लिए वह बहुत मुआफ़ी की दर्ख़्वास्त कर रहे हैं।

(लोगों के चेहरों पर मायूसी छा गई है लेकिन हॉल तालियों की गूंज से अभी भी गूंज रहा है।)

हम सब उनके आभारी हैं जो ‘ रेडियो सबरंग’ के ज़रिए ‘सुर संगीत’, ‘कलामे शायर’, ‘सुनो कहानी’ और ‘भूले बिसरे गीत’ २७ देशों में सुनने वालों का मनोरंजन कर रहे हैं।

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राजस्थान-भ्रमण में यदि कोटा बुन्दी देखने न जाएं तो राजस्थान-यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। आज उसी ऐतिहासिक कोटा नगर से हेमज्योत्स्ना ‘दीप’ जी अपने लम्हें जिन्दगी के कुछ लम्हे कविता के रूप में आपके सामने प्रस्तुत करने आ रही हैं।

हेम ज्योत्स्ना जी व्यवसाय से सॉफ्टवेअर इन्जीनियर हैं। B.E. (I.T.) के अतिरिक्त गणित से स्नातक की डिग्री ली है। उनकी काव्य-प्रतिभा तो छोटी सी आयु में ही पता लग गई थी जब ११वीं कक्षा में एक सुंदर कविता ने लोगों को चकित कर डाला था। मुझे तो लगता है कि ११वीं कक्षा में से ही नहीं, पिछले जन्म से भी इन्हें काव्य से लगाव रहा होगा।
(लोगों की तालियां अनायास ही बज उठी हैं।)

लीजिए हेमज्योतस्ना जी माइक के सामने आ गई हैं।

(तालियां और भी ज़ोर से बजने लगी हैं)

मन की चिड़िया
मन की चिड़िया सावन में तन का मैल है धोये ।
देख के बादल मतवारे निकले ,होना हो जो होये ।

कभी इधर को मचले , कभी उधर को मचले,
मौसम के इस जादु में मन बावरा सा होये ।

जेठ दुपहरी ,खून पसीना एक करा सब खेत में ,
खेत खड़े सब धरती-पुत्र मेघ के संग-संग रोये ।

तितली-भँवरे , फूल-बगीचा , गांव शहर ,
हर मौसम में लगे अलग ,सावन में एकसा होये ।

रिमझिम की झड़ी जब साज उठा कर गाये ,
सब के सब ताल मिलाये , उम्र कोई भी होये ।

मिट्टी में मिल जाये गम, भुल के नाचो गाओ ,
बिखरे सपनो के पर आओ उम्मीद की फसले बोये ।

आज घिरे हैं मेघ गगन में , “दीप” जलाओ कोई,
दिन में जब-जब बरखा आई , घना अन्धेरा होये ।

वाह! हेम ज्योत्स्ना जी, आपकी ‘मन की चिड़िया’ ने तो श्रोताओं के मन को जीत लिया।

(हेम ज्योत्सना जी श्रोताओं की ओर मुस्कुराते हुए मंच से जा रही हैं और
लोग और भी ज़ोर से तालियां बजा रहे हैं।)

मुशायरा अभी ख़त्म नहीं हुआ है। हमारे काफ़ी कवि और शायर आज के मुशायरे में शिरकत नहीं कर पाये लेकिन जुलाई २२, २००८ मंगलवार के दिन उन कवियों और शायरों की कविताएं, उनके ख़ूबसूरत कलाम का इसी ब्लॉग पर लुत्फ़ उठाना ना भूलियेगा,

जिनके नाम हैं-
प्राण शर्मा, समीर लाल ‘समीर’, देव मणि पांडेय, डॉ. मंजुलता, द्विजेन्द्र ‘द्विज’, रज़िया अकबर मिर्ज़ा ‘राज़’, राकेश खंडेलवाल,
रंजना भाटिया ‘रंजू’, नीरज गोस्वामी और हास्य-रस कवि नीरज त्रिपाठी।

इस मुशायरे/कवि-सम्मेलन में जिन कवियों और शायरों ने अपनी अनमोल रचनाएं और अमूल्य समय देकर इसे सफल बनाने में योगदान दिया है, उसके लिए हम आभारी हैं और हार्दिक धन्यवाद करते हैं। मुशायरा चाहे किसी हॉल में हो, पार्क में हो या ब्लॉग पर हो, श्रोताओं, दर्शकों या पाठकों के बिना मुशायरा एक शेल्फ़ पर पड़ी किताब बन कर रह जाती है। इस ब्लॉग पर आने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद करते हैं।
हाँ, इसका दूसरा भाग मंगलवार २२ जुलाई २००८ के दिन इसी ब्लॉग पर देखना ना भूलियेगा।

ख़ाकसार
महावीर शर्मा

mahavirpsharmaऐटyahoo.co.uk

June 9, 2008

‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण लंदन में

Filed under: सामान्य/General — महावीर @ 8:41 pm

‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण लंदन में

राकेश बी. दुबेः हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी,भारतीय उच्चायोग, लन्दन, प्रज्ञा ‘सुरभि’ सक्सेना, उषा राजे सक्सेनाः लेखिका-’ वह रात और अन्य कहानियां ‘, अचला शर्माः लेखिका तथा निदेशक, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस रेडियो-हिंदी, लंदन, मोनिका मोहताः निदेशक, नेहरू केन्द्र, ‘प्राण’ शर्माः आलोचक-समीक्षक गज़लकार, महेश भार्द्वाजः प्रकाशक,सामयिक प्रकाशन, भारत

*****

चर्चित कहानीकार उषा राजे सक्सेना के कहानी संग्रह ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ का लोकार्पण’ लंदन स्थित नेहरूकेंद्र में दिनांक शुक्रवार 30 मई 2008 को संपन्न हुआ।

समारोह की अध्यक्षता, अचला शर्मा लेखिका, निदेशक बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस हिंदी लंदन ने किया। नेहरूकेंद्र की निदेशक सुश्री मोनिका मोहता, आलोचक-समीक्षक गज़लकार श्री प्राण शर्मा, लेखिका-अनुवादक सुश्री युट्टा आस्टिन, तथा भारत से आए पुस्तक के प्रकाशक श्री महेश भारद्वाज (सामायिक प्रकाशन) विशिष्ट अतिथि थे।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए नेहरू केंद्र की निदेशक, मोनिका मोहता ने सभी आगंतुक साहित्यकारों और श्रोताओ का स्वागत करते हुए बताया कि उषा राजे सक्सेना ब्रिटेन की एक महत्वपूर्ण कथाकार हैं उनके कहानी संग्रह ‘वह रात ओर अन्य कहानियाँ’ पुस्तक का लोकार्पण समाहरोह आयोजित कर नेहरू सेन्टर गौरवान्वित है।

कार्यक्रम की अध्यक्षा अचला शर्मा ने अपने वक्तव्य में बताया उषा राजे की विशेषता यह है कि वे अपना काम चुपचाप करती हैं। उनकी कहानियों में युग-बोध है, यथार्थ है। ये कहानियाँ पाठक को अंत तक बाँधे रखते मे समर्थ हैं।

मुख्य वक्ता प्राण शर्मा ने अपने वक्तव्य के दौरान कहा, उषा राजे की कहानियाँ’ उनके ब्रिटेन के साक्षात अनुभवों को अभिव्यक्त करती हैं। ये कहानियाँ हिंदी साहित्य में तो शीर्ष स्थान बनाती ही हैं साथ अँग्रेज़ी कहानियों के समानांतर भी हैं। ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ में दुनिया के अनेक देशों के आप्रवासी पात्र अपनी-अपनी व्यक्तिगत एवं स्थानीय समस्याओं और मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ हमारे समक्ष आते हैं।

लेखिका-अनुवादक सुश्री युट्टा आस्टिन ने उषा राजे की कहानियों को गहन अनुभूतियोंवाली वाली कहानियाँ बताया। उन्होंने कहा ये कहानियाँ मात्र भारतीय या पाश्चात्य ही नहीं बल्कि विभिन्न देशों से आए प्रवासियों की कहानियाँ है। युट्टा ने बताया कि उन्होंने इन कहानियों का अंग्रेजी अनुबाद कर इन्हें विश्वव्यापी बनाने का प्रयास किया है।

प्रकाशक महेश भारद्वाज ने ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’ को वैश्विक, यथार्थ पर आधारित पठनीय कहानियाँ बताया।

उषा राजे ने अपने वक्तव्य में कहा वे अपनी लेखनी के माध्यम से मातृ भाषा के उन पाठकों तक पहुँचना चाहती हैं जिनकी पहुँच अँग्रेज़ी भाषा साहित्य तक नहीं है परंतु वे पाश्चात्य जीवन-पद्धति, जीवन-मूल्य, कार्य-संस्कृति, मानसिकता और प्रवासी जीवन आदि का फर्स्टहैंड पड़ताल चाहते हैं।

कार्यक्रम का संचालन राकेश दुबे, अताशे (हिंदी एवं संस्कृति) भारतीय उच्चायोग लंदन ने किया।

कहानी-पाठ किशोरी प्रज्ञा ‘सुरभि’ सक्सेना ने बड़े ही प्रभावशाली और सरस ढंग से किया।
नेहरूकेंद्र लंदन के तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में ब्रिटेन के लगभग सभी गणमान्य साहित्यकार उपस्थित थे और सभागार श्रोताओं और अतिथियों से भरा हुआ था।
*****

पुस्तकः ‘वह रात और अन्य कहानियाँ’
लेखिकाः उषा राजे सक्सेना
प्रकाशकः सामायिक प्रकाशन (श्री महेश भारद्वाज)
3320-21 जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज- नई दिल्ली, भारत
मोबाइल. 919811607086
मूल्य 5 पाउँड या 10 अमेरिकन डालर
भारत-200 रुपए

January 30, 2008

‘बापू जी’ की पुण्य-तिथि पर श्रद्धा-सुमन

Filed under: महावीर शर्मा, सामान्य/General — महावीर @ 8:00 am

‘बापू जी’ की पुण्य-तिथि पर श्रद्धा-सुमन

आज से ठीक ६० वर्ष पहले
“एक अर्द्ध-नग्न बूढ़ा जो ग्रामीण भारत में बसता था,उसके निधन पर मानवता रोई!” - लूइस फिशर (१८७६-१९७०)।

मानवता आज भी ‘बापू’ को खोज रही है, समय की धूल से ढके हुए उसके पद-चिन्हों को ढूंढ रही है। गांधी जी के साथ ‘महात्मा’ शब्द जोड़ने का साहस मुझ में नहीं है,क्योंकि उन्होंने एक बार कहा था,”इस महात्मा की पदवी ने मुझे बड़ा कष्ट पहुंचाया है,और मुझे एक क्षण भी ऐसा याद नहीं जब इसने मुझे गुदगुदाया हो।”
हाँ, ‘बापू’ संबोधित करते हुए ऐसा लगता है जैसे महात्मा, संत, मसीहा आदि अनेक गुण-वाचक शब्द स्वतः ही ‘बापू’ शब्द में समाहित हो गए हों।

लंदन में लगभग हर मास गांधी जी के पद-चिन्हों पर चलते हुए उनकी यादें ताज़ा रखने के लिए ‘गांधी जी के लंदन की पद-यात्रा’ (Gandhi’s London Walk) का आयोजन किया जाता है। आगामी पद-यात्रा १६ फरवरी २००८ के दिन निश्चित की गई है।

२१ जुलाई २००७ की एक ऐसी ही पद-यात्रा का हाल ‘यूट्यूब’ द्वारा देखिए और सुनिएः-


महावीर शर्मा

January 16, 2008

वर्ष २००७ के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों को बधाई.

Filed under: सामान्य/General — महावीर @ 9:01 pm

सृजन-सम्मान द्वारा आयोजित सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक ब्लॉग पुरस्कारों के लिए चयन समिति के सदस्य श्री रवि रतलामी जी, बालेन्दु दाधीच जी और संयोजक जय प्रकाश मानस जी का यह जटिल कार्य सराहनीय है. यह कार्य और भी कठिन हो जाता है जब प्रविष्टियों के अतिरिक्त सभी अन्य ब्लॉगों को भी सम्मलित किया गया है. दस के स्केल में अंक देने के लिए निर्धारित मापदंडों को ध्यान में रखते हुए सावधानी से निर्णय देने के लिए निर्णायक मंडल विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं. श्री रवि रतलामी जी ने स्पष्ट किया है की अंक देते समय ब्लॉगों के विषय की गुणवत्ता, सामयिकता, ब्लॉग की निरंतरता, उसके सक्रिय रहने की अवधि, भाषायी शुद्धता और रोचकता, प्रामाणिकता, पोस्टों की विविधता, कुल पोस्टों की संख्या तथा ब्लॉगिंग के प्रति उनके समर्पण और गंभीरता को पैमाना बनाया है, न कि सिर्फ ब्लॉगों की हिट संख्या को. और, इसी वजह से सिर्फ और सिर्फ 152 हिट्स वाला नैनो विज्ञान भी यहाँ पर सूची में स्थान पाने में सफल हुआ है.
इस प्रकार के आयोजन हिन्दी के प्रसार और विविधमुखी विकास में भी सहायक सिद्ध होते हैं. वह दिन दूर नहीं कि हिन्दी ब्लॉगों की बढ़ती हुई संख्या को देख कर पद्म भूषण सर मार्क टली के हृदय को भी एक सांत्वना मिलेगी जिन्होंने एक बार कहा था कि “जो बात मुझे अखरती है वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेज़ी का विराजमान! क्योंकि मुझे यकीन है कि बिना भारतीय भाषाओं के ‘भारतीय संस्कृति’ जिंदा नहीं रह सकती।”

विजेता अनूप जी, अजित जी तथा ममता जी को हार्दिक बधाइयाँ.

शीर्ष क्रम पर चयनित २२ ब्लॉगों में से पीले हाई लाईट में दिए हुए ब्लॉग को छोड़ कर अन्य २१ ब्लौगरों को हमारी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित हैं.

http:// sarthi.info 6.5/10
http://hgdp.blogspot.com/ 6.5/10
http://alizakir.blogspot.com/ 6.5/10
http://nirmal-anand.blogspot.com 6/10
http://paryanaad.blogspot.com/ 6/10
http://unmukt-hindi.blogspot.com/ 6/10
http://mahavir.wordpress.com 6/10
http://drparveenchopra.blogspot.com/ 6/10
http://paryanaad.blogspot.com/ 6/10
http://nahar.wordpress.com/ 6/10
http://subeerin.blogspot.com/ 6/10
http://paramparik.blogspot.com/ 6/10
http://poonammisra.blogspot.com/ 5/10
http://rajdpk.wordpress.com/ 5/10
http://hemjyotsana.wordpress.com/ 5/10
http://antariksh.wordpress.com/ 5/10
http://hivcare.blogspot.com/ 5/10
http://sehatnama.blogspot.com/ 5/10
http://chhoolenaasmaan.blogspot.com/ 5/10
http://vigyan.wordpress.com/ 4/10
http://nanovigyan.wordpress.com/ 3/10
http://parulchaandpukhraajka.blogspot.com/ 3/10

सम्भव है कुछ लोग सोचते हों कि बहुत से स्तरीय ब्लॉग विचारार्थ सम्मलित नहीं हुए, किंतु श्री रवि रतलामी जी ने ‘सृजन-गाथा’ में इसका स्पष्टीकरण कर दिया है.
महावीर शर्मा

January 1, 2008

नव वर्ष की कामनाएं

Filed under: सामान्य/General — महावीर @ 1:28 am
nav-varsh-1.jpg

December 30, 2007

नव वर्ष की शुभकामनाएं

Filed under: महावीर शर्मा, सामान्य/General — महावीर @ 1:03 pm

April 28, 2007

मुटापा

Filed under: महावीर शर्मा, सामान्य/General — महावीर @ 7:28 pm

तरकश पर सागर चन्द नाहर जी का सुप्रसिद्ध गायक अदनान सामी के मुटापे और
१०८ किलो वजन कम करने की कहानी पढ़ी ही होगी।
सामी की “जब” और “अब” की फोटो देखिएः

१०८ किलो वजन घटाने से पहलेः
(फोटो ‘तरकश’ से साभार)
fat-adnan.jpg
और “अब”? फिल्मी हीरो से कम नहीं!
adnan-sami-slim.jpg
(फोटो gobollywood से साभार)
कमाल है ना?

July 4, 2006

हिमालय अदृष्य हो गया - महावीर शर्मा

Filed under: कहानी, लेख, सामान्य/General — महावीर @ 12:17 am

“हिमालय अदृष्य हो गया!”

लेखकः महावीर शर्मा

सोमवार ११ सितम्बर,१८९३। अमेरिका स्थित शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन में गेरुए वस्त्र धारण किए हुए एक ३० वर्षीय भारतीय युवक सन्यासी ने, जिसके हाथ में भाषण के लिए ना कोई कागज़ था, ना कोई पुस्तक, चार शब्दों “अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों” से श्रोताओं को संबोधित कर चकित कर डाला। ७००० श्रोताओं की १४००० हथेलियों से बजती हुई तालियों से ३ मिनट तक चारों दिशाएं गूंजती रही। अमेरिका निवासी सदैव केवल “लेडीज़ एण्ड जेंटिलमेन” जैसे शब्दों से ही संबोधित किए जाते थे।
यह थे स्वामी विवेकानंद जिन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय आध्यात्मिक तत्वनिरूपण कर जन-समूह एवं विभिन्न धर्मों के ज्ञान-विद प्रतिनिधियों के मन को मोह लिया था। अंतिम अधिवेशन में वक्ताओं,विभिन्न देशों और धर्मों के प्रतिनिधियों , श्रोताओं का धन्यवाद देते हुए जिस प्रकार प्रभावशाली भाषण को समाप्त किया, लोग आनंद-विभोर हो उठे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू-धर्म केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही नहीं, अपितु इस में भी विश्वास करता है कि समस्त धर्म सत्य और यथा-तथ्यों पर आधारित हैं।
* * * * *
लगभग नौ वर्ष पश्चातशुक्रवार, ४ जुलाई १९०२ के दिन अमेरिका-निवासी १८५वां स्वतंत्रता-दिवस धूम-धाम से मनाते हुए २ लाख व्यक्ति शैनले-पार्क, पिट्सबर्ग में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का भाषण सुन रहे थे, उसी दिन जिस सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने ११ सितंबर १८९३ में अमेरिका में ज्ञान-दीप जला कर सत्य के प्रकाश से लोगों के ह्रदयों को आलोकित किया था—

भारत के पश्चिमी बंगाल के कोलकात्ता नगर के समीप हावड़ा क्षेत्र में हुगली नदी के दूसरे तीर पर स्थित बेलूर मठ में सूर्यास्त के साथ साथ स्वामी विवेकानंद सदैव के लिए नश्वर शरीर त्याग कर ‘महा-समाधि’ लेकर महा-प्रयाण की ओर अग्रसर थे।

स्वामी विवेकानंद प्रातः ही उठ गए थे। साढ़े आठ बजे मंदिर में जाकर ध्यान-रत हो गए। एक घण्टे के पश्चात एक शिष्य को कमरे के सारे द्वार और खिड़कियां बंद करने को कह कर लगभग डेढ़ घण्टे उस बंद कक्ष में भीतर ही रहे। लगभग डेढ़ घण्टे बाद माँ काली के भजन गाते हुए नीचे आगए। स्वामी जी स्वयं ही धीमी आवाज में कुछ कह रहे थेः “यदि एक अन्य विवेकानंद होता तो वह ही समझ पाता कि विवेकानंद ने क्या किया है। अभी आगामी समय में कितने विवेकानंद जन्म लेंगे।” पास में ही स्वामी प्रेमानंद इन शब्दों को सुन कर सतब्ध से रह गए। भोजन के पश्चात स्वामी जी प्रतिदिन की भांति ब्रह्मचारियों को ३ घण्टे तक संस्कृत-व्याकरण सिखाते रहे।
आज स्वामी जी के चेहरे पर किसी गंभीर चिंता के लक्षण प्रगट हो रहे थे। अन्य स्वामी तथा शिष्य-गण देखकर भी उनसे पूछ ना सके। सांय ४ बजे एक अन्य स्वामी के साथ पैदल ही घूमने चले गए। लगभग १ मील चल कर वापस मठ पर चले आए। ऊपर, अपने कक्ष में जाकर अपनी जप-माला मंगवाई। एक ब्रह्मचारी को बाहर प्रतीक्षा करने के लिए कह कर धयानस्थ हो गए। पौने आठ बजे एक ब्रह्मचारी को बुलाकर कमरे के दरवाज़े और खिड़कियां खुलवा कर फ़र्श पर अपने बिस्तर पर लेट गए। शिष्य पंखा झलते हुए सवामी जी के पांव दबाता रहा।
दो घण्टे के पश्चात स्वामी जी का हाथ थोड़ा सा हिला, एक हलकी सी चीख़ के साथ एक दीर्घ-श्वास! सिर तकिये से लुढ़क गया- एक और गहरा श्वास !! भृकुटियों के बीच आंखें स्थिर हो गईं। एक दिव्य-ज्योति सब के ह्रदयों को प्रकाशित कर, नश्वर शरीर छोड़ कर लुप्त हो गई।
शिष्य उनकी शिथिल स्थिर मुखाकृति देख कर डर सा गया। बोझल ह्रदय के साथ दौड़ कर नीचे एक अन्य स्वामी को हड़बड़ाते हुए बताया। स्वामी ने समझा कि स्वामी विवेकानंद समाधि में रत हो गए हैं। उनके कानों में श्री राम कृष्ण परमहंस का नाम बार बार उच्चारण किया, किंतु स्वामी जी का शरीर शिथिल और स्थिर ही रहा, उसमें कोई गति का चिन्ह नहीं दिखाई दिया।
कुछ ही क्षणों में डॉक्टर महोदय आगए। जिस सन्यासी ने अनेक व्यक्तियों के ह्रदयों में दैवी-श्वास देकर जीवन का रहस्य बता कर अर्थ-पूर्ण जीवन-दान दिया , आज उस भव्यात्मा के शरीर में डॉक्टर की कृत्रिम-श्वासोच्छवास में गति नहीं दे सकी। स्वामी विवेकानंद ३९ वर्ष, ५ मास और २४ दिनों के अल्प जीवन-काल में अन्य-धर्मान्ध व्यक्तियों द्वारा हिंदु-धर्म के विकृत-रूप के प्रचार से प्रभावित गुमराह लोगों को हिंदु-धर्म का यथार्थ मर्म सिखाते रहे।
स्वामी ब्रह्मानंद स्वामी जी के गतिहीन शरीर से लिपट गए। एक अबोध बालक की तरह फफक फफक कर रो पड़े। उनके मुख से स्वतः ही निकल पड़ाः
“हिमालय अदृष्य हो हो गया है!”
प्रातः स्वामी जी के नेत्र रक्तिम थे और नाक, मुख से हल्का सा रक्त निकला हुआ था।

तीन दिन पहले २ जुलाई को स्वामी जी ने निवेदिता को दो बार आशीर्वाद देकर आध्यात्मिकता का सत्य-रूप दिखाया था और आज वह उसी दिव्य-ज्योति में समाधिस्थ थी। कक्ष के दरवाजे पर थपक सुन कर ध्यानस्थ निवेदिता ने आंखें खोली और द्वार खोल दिया। एक ब्रह्मचारी सामने खड़ा हुआ था, आंखों में अश्रु निकल रहे थे। भर्राये हुए स्वर से बोला, “स्वामी जी रात के समय—” कहते कहते उसका गला रुंध गया, पूरी बात ना कह पाया। निवेदिता स्तब्ध सी शून्य में देखती रह गई जैसे अंग-घात हो गया हो। जिब्हा बोलने की चेष्टा करने का प्रयास करते हुए भी निश्चल रही। फिर स्वयं को संभाला और मठ की ओर चलदी।
स्वामी जी के शरीर को गोद में रख लिया। दृष्टि उनके शरीर पर स्थिर हो गई, पंखे से हवा देने लगी और उन्माद की सी अवस्था में वो समस्त सुखद घटनाएं दोहराने लगी जब स्वामी जी ने इंग्लैंड की धरती से निवेदिता को भारत की परम-पावन धरती में लाकर एक नया सार्थक जीवन दिया था।
मृत-शरीर नीचे लाया गया। भगवा वस्त्र पहना कर सुगंधित पुष्पों से सजा कर शुद्ध- वातावरण को बनाए रखने के लिए अगर बत्तियां जलाई गईं। शंख-नाद से चारों दिशाएं गूंज उठी। लोगों का एक विशाल समूह उस सिंह को श्रद्धाञ्जली देने के लिए एकत्रित हो गया। शिष्य, ब्रह्मचारी, अन्य स्वामी-गण, और सभी उपस्थित लोगों की आंखें अश्रु-भार संभालने में अक्षम थे। निवेदिता एक निरीह बालिका की भांति दहाड़ दहाड़ कर रो रही थी। उसने स्वामी जी के कपड़े को देखा और विषादपूर्ण दृष्टि लिए स्वामी सदानंद से पूछा, “क्या यह वस्त्र भी जल जाएगा ? यह वही वस्त्र है जब मैंने उन्हें अंतिम बार पहने हुए देखा था। क्या मैं इसे ले सकती हूं ? “

स्वामी सदानंद ने कुछ क्षणों के लिए आंखें मूंद ली, और तत्पश्चात बोले,
“निवेदिता, तुम ले सकती हो। “
निवेदिता सहम सी गई, ऐसा कैसे हो सकता था? वह यह वस्त्र एक याद के रूप में जोज़फ़ीन को देना चाहती थी। उसने वस्त्र नहीं लिया।

चमत्कार था या संयोग-कौन जाने ?

निवेदिता को जिस वस्त्र को लेने की इच्छा थी, जलती हुई चिता से उसी वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा हवा से उड़कर उसके पांव के पास आकर गिर पड़ा। वस्त्र को देख, वह विस्मित हो गई। छोटे से टुकड़े को श्रद्धापूर्वक बार बार मस्तक पर लगाया। उसने यह स्वमी जी का दिया हुआ अंतिम उपहार जोज़फ़ीन के पास भेज दिया जिसने दीर्घ काल तक उसे संजोए रखा।
उस चिता की अग्नि-शिखा आज भी स्वामी जी के अनुपम कार्यों में निहित, विश्व में भारतीय अंतश्चेतना, अंतर्भावनाशीलता और सदसद् विवेक का संदेश दे, भटके हुए को राह दिखा रही है!
“ईश्वर को केवल मंदिरों में ही देखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा ईश्वर उन लोगों से अधिक प्रसन्न होते हैं जो जाति, प्रजाति, रंग, धर्म, मत, देश-विदेश पर ध्यान ना देकर निर्धन, निर्बल और रोगियों की सहायता करने में तत्पर रहते हैं। यही वास्तविक ईश्वर-उपासना है। जो व्यक्ति ईश्वर का रूप केवल प्रतिमा में ही देखता है, उसकी उपासना प्रारंभिक एवं प्रास्ताविक उपासना है। मानव-ह्रदय ही ईश्वर का सब से बड़ा मंदिर है।”

महावीर शर्मा

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April 20, 2006

एक परिचय - लावण्या शाह

Filed under: सामान्य/General — महावीर @ 4:46 pm

एक परिचय - लावण्या शाह

जब समाज में विशृंखलता उत्पन्न होकर गति रुद्ध हो जाती है, ऐसे समय में उस गति-रुद्धता को मिटा कर
पारस्परिक सहयोग एवं समानता का वातावरण बनाने के लिए कवि की वाणी विशेष महत्व रखती है। भावों का कोश वाणी के प्रतीकों द्वारा ह्रदयगत अनुभूतियों को व्यक्त करने में दक्ष स्व० पंडित नरेंद्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या जी जिनकी वाणी उनके अंतःकरण से निकल कर रेडयो-वार्ता , उनकी हाल ही में प्रकाशित काव्य-पुस्तक “फिर गा उठा प्रवासी”, विश्व-जाल के अनेक जालघरों द्वारा कोने कोने में फैली हुई हैं, उनका परिचय तथा कविता उनकी अपनी ही वाणी द्वारा प्रस्तुत हैः

मेरा परिचय :

मै लावण्या , बम्बई महानगर मे पली बडी हुई - शोर शराबे से दूर, एक आश्रम जैसे पवित्र घर में , मेरे पापाजी, स्वर्गीय पँ. नरेन्द्र शर्मा व श्रीमती सुशीला शर्मा की छत्रछाया मे , पल कर बडा होने का सौभाग्य मिला.मेरे पापाजी एक बुद्धिजीवी , कवि और दार्शिनिक रहे.
मेरी अम्मा , हलदनकर ईनस्टिटयूट में ४ साल चित्रकला सीखती रही. १९४७ मे उनका ब्याह हुआ और उन्होने बम्बई मे घर बसा लिया.
मेरा जन्म १९५० नवम्बर की २२ तारीख को हुआ. मेरे पति दीपक और मै एक ही स्कूल मे पहली कक्षा से साथ साथ पढ़े हैं. मैने समाज शात्र और मनोविज्ञान मे बी.ए. होनर्स किया. २३ वर्ष की आयु मे , १९७४, मे शादी कर के हम दोनो लॉस ~ ऍजिलीस शहर मे , केलीफोर्नीया , यू. स. ए. ३ साल , १९७४, ७५, ७६ , तक रुके जहां वे ऐम.बी.ए. कर रहे थे. उस के बाद हम फिर बम्बई लौट आये. परिवार के पास — और पुत्री सिंदुर का जन्म हुआ. ५ वर्ष बाद पुत्र सॉपान भी आ गये.

१९८९ की ११ फरवरी के दिन पापाजी महाभारत सीरीयल को और हम सब को छोड कर चले गये.

घटना चक्र ऐसे घूमे हम फिर अमरिका आ गये. अब सीनसीनाटी , ओहायो मे हूं. पुत्री सिंदुर का ब्याह हो चुका है और मै नानी बनने वाली हू. पुत्र सॉपान जनरल मील्र मे कार्यरत है.
जीवन के हर ऊतार चढ़ाव के साथ कविता , मेरी आराध्या , मेरी मित्र , मेरी हमदर्द रही है. विष्व-जाल के जरिये, कविता पढ़ना , लिखना और इन से जुड़े माध्यमो द्वारा भारत और अमरीका के बीच की भौगोलिक दूरी को कम कर पायी हू. स्व-केन्द्रीत , आत्मानुभूतियों ने , हर बार , समस्त विश्व को , अपना - सा पाया है. पापाजी पँ. नरेन्द्र शर्मा की कुछ काव्य पँक्तिया दीप-शिखा सी , पथ प्रदर्शित करती हुई , याद आ रही है.

” धरित्री पुत्री तुम्हारी, हे अमित आलोक
जन्मदा मेरी वही है स्वर्ण गर्भा कोख !”

और
” आधा सोया , आधा जागा देख रहा था सपना,
भावी के विराट दर्पण मे देखा भारत अपना !
गाँधी जिसका ज्योति-बीज, उस विश्व वृक्ष की छाया
सितादर्ष लोहित यथार्थ यह नहीं सुरासुर माया ! “

अस्तु विश्व बन्धुत्व की भावना , सर्व मँगल भावना ह्र्दय मे समेटे , जीवन के मेले मे हर्ष और उल्लास की दृष्टि लिये , अभी जो अनुभव कर रही हू उसे मेरी कविताओं के जरिये , माँ सरस्वती का प्रसाद समझ कर , मेरे सहभागी मानव समुदाय के साथ बाँट रही हू.
पापाजी की लोकप्रिय पुस्तक ” प्रवासी के गीत ” को मेरी श्राद्धाँजली देती , हुई मेरी प्रथम काव्य पुस्तक ” फिर गा उठा प्रवासी ” प्रकाशित हो गई है.
स्वराँजलि पर मेरे रेडयो-वार्तालाप स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मँगेषकर पर व पापाजी पर प्रसारित हुए है. महभारत सीरीयल के लिये १६ दोहे पापाजी के जाने के बाद लिखे थे !
एक नारी की सँवेदना हर कृति के साथ सँलग्न है. विश्व के प्रति देश के प्रति , परिवार और समाज के प्रति वात्सल्य भाव है. भविष्य के प्रति अटल श्रद्धावान हूं. और आज मेरी कविता आप के सामने प्रस्तुत कर रही हू.
आशा है मेरी त्रुटियों को आप उदार ह्रदय से क्षमा कर देंगे -
विनीत,
लावण्या

सीता जी के वर्णन से सँबन्धित श्लोक -
श्री सीता - स्तुति

सुमँगलीम कल्याणीम
सर्वदा सुमधुर भाषिणीम i
वर दायिनीम जगतारिणीम
श्री राम पद अनुरागिणीम ii

वैदेही जनकतनयाम
मृदुस्मिता उध्धारिणीम i
चँद्र ज्योत्सनामयीँ, चँद्राणीम
नयन द्वय, भव भय हारिणीम ii

कुँदेदू सहस्त्र फुल्लाँवारीणीम
श्री राम वामाँगे सुशोभीनीम i
सूर्यवँशम माँ गायत्रीम
राघवेन्द्र धर्म सँस्थापीनीम ii

श्री सीता देवी नमोस्तुते !
श्री राम वल्लभाय नमोनम: i
हे अवध राज्य ~ लक्ष्मी नमोनम: i
हे सीता देवी त्वँ नमोनम: नमोनम:ii

लावण्या

June 25, 2005

ग़लत फ़हमी

Filed under: महावीर शर्मा, सामान्य/General — महावीर @ 10:35 pm

ग़लत फ़हमी

अभी मेरे ही किसी मित्र ने ई-पत्र भेजा और कहा भई, यह क्या किया कि जितेन्द्र भाई के “मेरा पन्ना” मे ‘मिर्ज़ा-पुराण’ वाले मिर्ज़ा का अपहरण कर के “महावीर” चिट्ठे में क्यों खींच लाए, जिनका हवाला ९ जून के ‘ये माजरा क्या है?’ में दिया है। खैर, मैं ने तो उनको उत्तर दे दिया है पर हो सकता है कुछ दूसरे लोगों के मगज़-ए-शरीफ़ में भी ये खयाल झनझना रहे होंगे। मैं कुछ शब्द लिख रहा हूं जिस से उनकी गलत-फ़हमी दूर हो जायेः

१.इन दोनों चिट्ठों में एक ही “मिर्ज़ा” नहीं है बल्कि दोनों भिन्न व्यक्ति हैं। “मेरा पन्ना” वाले मिर्ज़ा कुवैत में रहते हैं और मैं ने जिन “मिर्ज़ा अता उल्लाह ख़ानख़ाना ‘हुड़कचुल्लू’ देहलवी” का तार्रुफ़ दिया है, वो देहली में रहते हैं।
२. कुवैत के मिर्ज़ा अड़ियल होते हुए भी ठोस बातें कहते हैं लेकिन मिर्ज़ा हुड़कचुल्लू की बातों की रेलगाड़ी कभी कभी पटरी से उतर जाती है।
३. मिर्ज़ा हुड़कचुल्लू का कहना है कि वो कुवैत वाले मिर्ज़ा के मौसेरे भाई हैं पर किसी ने मज़ाक में यह भी कह डाला कि अजी ये ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ हैं। मेरा इस बारे में ख़ामोश रहना ही ठीक होगा। इस में तो जितेन्द्र भाई ही पता कर के बता सकते हैं कि उनका कोई रिश्ता है भी या नहीं।
४. जितेन्द्र भाई से मुआफ़ी चाहूंगा अगर उन्हें इस क़िस्म की फ़हमी में कुछ वज़न दिखाई देता हो तो।
कुवैत के मिर्ज़ा से “मेरे पन्ने ” वाली गली में मिलता रहता हूं और बड़ा आनंद मिलता है। सच मानिये, आप सब मिर्ज़ा पुराण को पढ़ कर देखिये, दिल ख़ुश हो जायेगा।

महावीर

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