महावीर

June 22, 2008

छोटी सी बिंदिया ! -3 क्षणिकाए

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 7:07 am

छोटी सी बिंदिया ! -3 क्षणिकाएं

- महावीर शर्मा

दुलहन

अलसाये नयनों में निंदिया, भावों के झुरमुट मचलाए

घूंघट से मुख को जब खोला, आंखों का अंजन इतराए

फूल पर जैसे शबनम चमके,दुलहन के माथे पर बिंदिया।

मुस्काए माथे पर बिंदिया।

मुजरा

तबले पर ता थइ ता थैया, पांव में घुंघरू यौवन छलके

मुजरे में नोटों की वर्षा, बार बार ही आंचल ढलके

माथे से पांव पर गिर कर, उलझ गई घुंघरू में बिंदिया

सिसक उठी छोटी सी बिंदिया !

सीमा के रक्षक

दूर दूर तक हिम फैली थी, क्षोभ नहीं था किंचित मन में

गर्व से ‘जय भारत’ गुञ्जारा, गोली पार लगी थी तन में

सूनी हो गई मांग प्रिया की, बिछड़ गई माथे से बिंदिया।

छोड़ गई कुछ यादें बिंदिया।

- महावीर शर्मा

May 27, 2008

“मेनिक अवसाद”- (एक सत्य घटना पर आधारित)

Filed under: महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 8:38 pm

“मेनिक अवसाद”- (एक सत्य घटना पर आधारित)
लेखकः महावीर शर्मा

(साभारः सरिता, जुलाई-द्वितीय २००६)

कोर्नवाल, इंगलैण्ड:-

अक्तूबर के महीने में प्रातः काल प्राची की दिशा में घुमड़ते बादलों के पीछे छिपे हुए सूर्य की किरणें बाहर निकलने का असफल प्रयास कर रहीं थी और उस पर वर्षा की भारी बौछारें शीत लहर को दक्षिण की ओर धकेले जा रही थीं। इस देश में अनिश्चित मौसम ना जाने कब, किस समय और कहां लोगों के जीवन की दैनिक दिनचर्या में बाधक बन ललकार कर सामने आजाये! ऐसे ही दिन की भयानक रात में ४७ वर्षीय कारखाने में वैल्डिंग का काम करने वाला स्टीव ओकॉनर सारी रात अपने बिस्तर पर करवटें बदल बदल कर कभी नींद और खुली आंखों में समझौता करता रहा, तो कभी आत्म-हत्या की योजना बनाता रहा और ऐसे ही सुबह हो गई। प्रातः हर दिन की तरह उठा, अपने सैंडविच बनाए और थैले में रख लिये। बाहर आकर कार स्टार्ट की और फैक्टरी की ओर रवाना हो गया।

यहां के अनिश्चित मौसम की तरह, मन की भटकन लिये हुए कार पार्क करके गाड़ी में ही बैठा रहा। स्टीयरिंग के मध्य में आंखें गाड़े हुए सोचता रहा। कुछ देर बाद कार फिर चला दी। काम पर ना जाकर दिशाहीन, उद्देश्यहीन कार को घुमाता रहा। उसे यह भी भान न था कि वह कहां जा रहा था। मस्तिष्क में कुछ चेतना का आभास हुआ तो देखा वह “पोर्टरीथ” के स्थान में था। गाड़ी रोक दी और बाहर आगया।

वहीं समुद्र के किनारे पर ५० फुट ऊंची चट्टान पर चढ़ कर चोटी से घण्टों समुद्र की लहरों में अपनी मृत्यु के नाच का काल्पनिक दृश्य देखता रहा। घंटों की यह दीर्घ अवधि ऐसी लग रही थी जैसे कुछ ही क्षण बीते हों। उसी समय उसने देखा कि एक समुद्री रक्षक (सी रेस्क्यू) हैलीकॉप्टर उसके ऊपर चारों ओर घूम रहा था। स्टीव ने बनावटी मुस्कुराहट के साथ हाथ हिलाया जिससे हैलीकॉप्टर के चालक को निश्चय हो गया कि स्टीव किसी विपत्ति में नहीं है। हैलिकॉप्टर उसी घरघराहट के साथ उड़ता हुआ दूर चला गया। उसके मस्तिष्क का संतुलन जैसे लौट आया हो। एक विचित्र विचार ने उसके मन को झंझोड़ सा दिया। “ये लोग आत्म-हत्या या अन्य कारणों से डूबते हुओं को बचाने के प्रयास में स्वयं के जीवन को ख़तरों और जोखम में डालने के लिये तैयार हो जाते हैं।” बस इसी विचार ने उसके जीवन और मृत्यु के बीच का फ़ासला बढ़ा दिया। लौट कर कार में बैठ कर कुछ देर पिछले दिनों की यादों में से कुछ खोजता रहा! वापस घर आ गया। स्टीव ‘बार्नस्टेपल’ में ‘होबर्ट फूड प्रेप्रेशन’ नामक कम्पनी में वैल्डर कार्य-रत, ‘वर्किंग ट्रेड यूनियन’ का सदस्य जो सदैव सत्य कहने और अपने साथियों के अधिकारों की मांग के लिये निर्भीक होकर आगे रहता था। इसी निडरता के कारण एक दिन २० वर्ष की नौकरी से हाथ धोना पड़ा। उसके पश्चात एक के बाद एक विपदाओं ने उसके जीवन के सारे सुख छीन लिये। उसका घर छिन गया, पत्नि ने साथ छोड़ दिया और एक बार आत्म-हत्या से बाल बाल बचा।

मस्तिष्क का संतुलन अधिक बिगड़ने लगा तो डाक्टरों और मनोचिकित्सकों का सहारा लेना पड़ा। जांच से पता लगा कि वह बाल्यावस्था से ही “मेनिक अवसाद” (मेनिक डिप्रैशन) मनोरोगमें ग्रस्त था। उस समय वह आयरलैंड में टिपरेरी नगर के निकट खेतों पर काम करता था। विडंबना यह थी कि कभी भी इस रोग की जांच नहीं हुई। मेनिक अवसाद एक मानसिक रोग है। साधारणतयः व्यक्तियों की चित्तवृत्तियां और मूड का संतुलन एक विषुवत रेखा के द्वि-ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। मस्तिष्क में कुछ ऐसे रसायनिक पदार्थ होते हैं जो इस संतुलन को बनाए रखते हैं। यदि यह संतुलन बिगड़ जाए तो रोगी की चित्तवृत्तियों में बिना किसी कारण के ही परिवर्तन होने लगते हैं। मनुष्य के जीवन में उच्चतम और निम्नतम अनुभव होते ही रहते हैं, किंतु कुछ ही समय में स्थिति सामान्य हो जाती है। लेकिन द्वि-ध्रुवीय क्रम-भंग (बाई पोलर डिसआर्डर) के रोगी का मस्तिष्क कभी उच्चतम तो कभी निम्नतम अनुभवों में ऐसा जकड़ जाता है कि दीर्घ काल तक फंसा रहता है और उन्माद की स्थिति तक आजाती है। कभी हताश हो जाता है, हीनता की भावना उसे दबा लेती है, उखड़ी नींद, जीवन के हर पहलू में निराशावादी भावनाएं, निरंतर थकान, आनंद और हर्ष तो जैसे उसके शब्दकोष में से ही निकल गये हों। स्टीव कहता था कि जब तुम इस प्रकार के अवसाद के निम्नतम अनुभव की जकड़ में होते हो तो विचारधारा आत्महत्या की प्रवृत्ति की ओर झुक जाती है किसी भी काम में दिल नहीं लगता। यह अवस्था बहुत समय तक चलती रहती है।

किंतु , दूसरी ओर, यदि रोगी उच्चतम अनुभवों की स्थिति में हो तो खयालों में हवाई किले बनाना शुरू कर देता है और एक सनक और उन्माद की स्थिति में पहुंच जाता है। एक अनोखी ऊर्जा उसके शरीर में आजाती है। उसकी प्रसन्नता, हर्ष और आनंद की सीमा नहीं रहती। इस सनक की हालत में उसे कोई भी कार्य असंभव नहीं लगता। किसी भी असाधारण कार्य करने को उद्यत हो जाता है। ऐसी ही अनिश्चित विकट परिस्थितियों में अग्निपथ पर चलते हुए अपने जीवन और मरण का खेल खेलता रहता है।

विडम्बना यह थी कि यदि किसी का पैर टूट जाता है तो कम से कम यह सामने तो दिखाई देता है। चिकित्सा हो जायेगी। लेकिन मेनिक अवसाद जैसे मानसिक रोग की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। यह दिखाई भी नहीं देती पर जीवन के हर पहलू पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता रहता है, रोगी को आभास तक नहीं होता। यदि इस गति को रोका ना जाए और चिकित्सा ना की जाए तो इसके भीषण परिणाम हो सकते हैं।

स्टीव इस गति को रोक ना सका और परिणामस्वरूप मति-भ्रम, हास्यास्पद अभिलाषाओं की व्यर्थ योजनाएं बनाना, ऋण में फंस जाना और फिर गहरे अवसाद में डूब गया। स्टीव के मूड दवा और नियमानुसार मनोवैज्ञानिकों के सहारे किसी सीमा तक नियंत्रित हो गए। किंतु उसने यह भी अनुभव किया कि मनुष्य जब किसी खेल, हॉबी, व्यायाम या किसी रुचिकर कार्य में संलग्न ना हो तो केवल दवाईयों से इस रोग का उपचार नहीं हो पाता। व्यायाम से एड्रीनलीन हारमोंस का स्राव नियंत्रण में रहता है और मन भी स्थिर होने लगता है।

स्टीव के लिये यह स्वयं-उपचार एक चौदह वर्षीय अरबी घोड़े के रूप में मिला जिसे उसने “कोलीना” का नाम दिया। स्वास्थ्य को लौटाने के लिये कितनी ही रुचिकर हाबी हैं पर उसे दूर दूर तक घुड़सवारी द्वारा नगर नगर घूम कर आनंद प्राप्त करने की राह रास आई। उसका बचपन खेतों में व्यतीत हुआ था। खेतों के पशुओं में वह घुलमिल गया था। उसे वे उसके परिवार के सदस्य और मित्र से लगते थे, ऐसे मित्र जो हर समय उसकी बातें सुनते थे पर उसकी भर्त्सना या आलोचना नहीं करते थे। जब से ही उसे घोड़ों और घुड़सवारी में विशेष रुचि हो गई थी।

जब उसे इस मनोरोग से उपचार द्वारा कुछ थोड़ी सी राहत मिली तो उसने अपने घोड़े “कोलीना” के साथ दक्षिणी स्पेन से मध्य-युगीन तीर्थ स्थानों के रास्तों से गुजरते हुए पुर्तगाल, पायरेनीस और पश्चिमी फ्रांस होते हुए इंग्लैंड में पैंजेंस तक की दो हज़ार मील की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। इस घुड़-यात्रा से उसे अपनी मानसिक स्थिति में बहुत लाभ हुआ। चार मास की यात्रा में “कोलीना” और उसमें प्रगाढ़ मित्रता हो गई थी। यात्रा के मध्य जो लोग मिले, उनका भी बड़ा उदारपूर्वक व्यवहार रहा। यह योजना बड़ी सफल रही। रास्ते में भिन्न-भिन्न देशों में कितने ही लोगों के दिल और घरों के द्वार सत्कार के लिये खुले रहे। स्टीव का मानवता के प्रति एक नया विश्वास उत्पन्न हो गया। जब भी लोग उसे घोड़े पर देखते तो उन्हें अन्य सैलानियों से भिन्न लगता था। दूसरे लोगों को भी सड़कों पर देखा है जो कि पूरे विश्व तक का चक्कर लगाते हैं किंतु वे या तो मोटर-साइकल, बाइसिकल या फिर कार आदि द्वारा ही दिखाई देते हैं। पाश्चात्य देशों में घोड़े पर एक लम्बी यात्रा अपने आप में ही एक नयापन और विचित्रता लिये हुए है। “कोलीना” को यदि कोई व्यक्ति जानवर की संज्ञा देता है तो उसे अच्छा नहीं लगता। कह देता है कि यदि यह जानवर ही है तो अगले जन्म में मुझे जानवर का ही शरीर मिले। कम से कम किसी का वास्तविक मित्र तो बन सकूंगा। स्टीव के विवाह-विच्छेद के कानूनी-निर्णय में उसे तीन हज़ार पौंड मिले। उस राशि में से कुछ तो अपने इलाज में और शेष राशि लोगों में “मेनिक अवसाद”- बाई-पोलर डिसॉर्डर- रोग के भीषण परिणाम के महत्व के प्रति जागरुकता लाने के लिये विभिन्न साधनों पर खर्च कर दी। स्टीव ओकॉनर के लिये ‘कोर्नवॉल’ के समुद्रीय तटवर्ती क्षेत्रों में विचरते हुए प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेने का अनुभव उसकी चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया। एक मानसिक तृप्ति सी मिलती थी, विघ्नित मनःस्थिति में शांति और स्थिरता सी आजाती है। उन प्राकृतिक वनों, समुद्री तटों के समीप उठती हुई तरंगो का स्वर्गीय दृष्य देखने के लिये ‘कोलीना’ के साथ सवारी और हवाखोरी के लिये जाना एक नियम बन गया। अब अपने घोड़े “कोलीना” के साथ चार सप्ताह के लिये एक्समोर, डार्टमोर, बॉडमोर आदि प्रकृतिक स्थानों में विचरण करने की योजना बनाई है। इन स्थानों में आबादी नहीं होती, बस प्रकृति का ही वास अधिक होता है।

घोड़े को सहलाते हुए उसकी आंखें नम होगईं और कहने लगा,
“कोलीना यदि तू ना होता तो ना जाने क्या होता!”
महावीर शर्मा
(साभार – सरिता)

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May 1, 2008

वसीयत - कहानी

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा — महावीर @ 8:58 pm

(इंग्लैंड में बूढ़ों की दुर्दशा पर एक मार्मिक कहानी)

वसीयत - कहानी
लेखकः
महावीर शर्मा

(साभारः सरिता, दिसंबर-प्रथम २००६)

सुबह नाश्ते के लिये कुर्सी पर बैठा ही था कि दरवाज़े की घण्टी बज उठी। उठने लगा तो सीमा ने कहा, “आप चाय पीजिये, मैं जाकर देखती हूं।” दरवाज़ा खोला तो पोस्टमैन ने सीमा के हाथ में चिट्ठी देकर दस्तखत करने को कहा,
“किस की चिट्ठी है?” मैंने बैठे बैठे ही पूछा।
चिट्ठी देख कर सीमा ठिठक गई और आश्चर्य से बोली, ” किसी सॉलिसिटर का है। लिफ़ाफ़े पर भेजने वाले का नाम ‘जॉन मार्टिन-सॉलिसिटर्स’ लिखा है।”
यह सुनते ही मैं ने चाय का प्याला होंटों तक पहुंचने से पहले ही मेज पर रख दिया। इंग्लैण्ड में वैध रूप से आया था, और इस ६५ वर्ष की आयु में वकील का पत्र देख कर दिल को कुछ घबराहट होने लगी थी। उत्सुकता और भय का भाव लिए पत्र खोला तो लिखा था.

“जेम्स वारन, ३० डार्बी एवेन्यू , लंदन निवासी का ८५ वर्ष की आयु में २८ नवंबर २००४ को देहांत हो गया। उसकी वसीयत में अन्य लोगों के साथ आपका भी नाम है। जेम्स की वसीयत १५ दिसम्बर २००४ दोपहर के बाद ३ बजे जेम्स वारन के निवास पर पढ़ी जायेगी। आप से अनुरोध है कि आप निर्धारित तिथि पर वहां पधारें या आफिस के पते पर टेलीफोन द्वारा सूचित करें।”

“यह जेम्स वारन कौन है? सीमा ने उत्सुकता से कहा, “मेरे सामने तो आपने कभी भी इस व्यक्ति का कोई जिक्र नहीं किया।” मैं जैसे किसी पुराने टाइमज़ोन में पहुंच गया। चाय का एक घूंट पीते हुए मैं ने सीमा को बताना शुरू किया।

“उस समय मैं अविवाहित था और लंदन में रहता था। मैं कभी कभी दो मील की दूरी पर एवेन्यू पार्क में जाता था। वहां एक अंगरेज़ वृद्ध जिस की उम्र लगभग ५५ - ६० की होगी, बैंच पर अकेला बैठा रहता और वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को हंस कर “गुड-मॉर्निंग” या “गुड डे” कह कर इस अंदाज़ मेंअभिवादन करता, जैसे कुछ कहना चाहता हो।

इंगलैंड में धूप की खिलखिलाती हो तो कौन उस बूढ़े की ऊलजलूल बातों में समय गंवाए ? यह सोच कर लोग उसे नज़रअंदाज़ कर चले जाते और बैंच पर अकेला बैठा होता था। मैं भी औरों की तरह आंखें नीचे किए कतरा कर चला जाता। कुछ झुटपुटा होने लगता तो पार्क की चहल पहल सूनेपन में बदलना आरम्भ हो जाती। मैं भी चलने लगता। बूढ़ा अपनी लकड़ी के सहारे धीरे धीरे चल देता।

हर रोज अंधेरा होने से पहले बूढ़ा अपनी जगह से उठता और धीरे धीरे चल देता।मैं कभी अनायास ही पीछे मुड़ कर देखता तो हाथ हिला कर “हैलो” कह कर मुस्कुरा देता। मैं भी उसी प्रकार उत्तर देकर चला जाता। यह क्रम चलता रहा। एक दिन रात को ठीक से नींद नहीं आई तो विचारों के क्रम में बारबार बूढ़े की आकृति सामने आती रही, फिर नींद लगी तो देर से सो कर उठा। सामान्य कार्यों के बाद कुछ भोजन कर कपड़े बदले और पार्क जा पहुंचा।
बूढ़ा उसी बैंच पर मुंह नीचे किए हुए बैठा हुआ था जैसे किसी घोर चिंता में डूबा हुआ हो। इस बार कतराने के बजाय मैं ने उस से कहा,”हैलो, जेंटिलमैन!”
बूढ़े ने मुंह ऊपर उठाया। उसकी नजरें कुछ क्षणों के लिए मेरे चेहरे पर अटक गई। फिर एक दम उसकी आंखों में चमक सी आगई, मुस्कुराहट से गाल फैलने से चेहरे की झुर्रियां गहरा गईं। वह बड़े उल्लासपूर्वक बोला, “हैलो, सर। आप मेरे पास बैठेंगे क्या? …” मैं उसी बैंच पर उसके पास बैठ गया। बूढ़े ने मुझ से हाथ मिलाया, जैसे कई वर्षों के बाद कोई अपना मिला हो। मैंने पूछा,” आप कैसे हैं? “जब कोई दो व्यक्ति मिलते हैं तो यह एक ऐसा वाक्य है जो स्वतः ही मुख से निकल जाता है। कुछ देर मौन ने हम को अलग रखा था पर मैंने ही फिर पूछा ,” आप पास में ही रहते हैं?”
मेरे इस सवाल पर ही उस ने बिना झिझक के कहना शुरू कर दिया, ” मेरा नाम जेम्स वारन है।३० डार्बी एवेन्यू , फिंचले में अकेला ही रहता हूं।” मैंने कहा, ” मिस्टर वारन ….”,
“नहीं, नहीं … जेम्स! आप मुझे जेम्स कह कर ही पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा।” जेम्स ने मेरी बात पूरी कहने से पहले ही कह दिया।
मैं जानता था कि जेम्स वारन के पास कहने को बहुत कुछ है, जिसे उस ने अंदर दबा कर रखा है। ना जाने जेम्स ने कब से अपने उद्गार दबा कर रखे होंगे, ना जाने कब से अचेतन मन में पड़ी हुई सिसकती हुई पुरानी यादें चेतना पर आने के लिये संघर्ष कर रही होंगी किंतु किस के पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिए समय है? जेम्स ने एक आह सी भरी और कहना शुरू किया,
“मैं अकेला हूं। चार बैड-रूम के मकान की भांयभांय करती हुई दीवारों से पागलों की तरह बातें करता रहता हूं।” इतना कह कर जेम्स ने चश्मे को उतारा और उसे साफ़ कर के दोबारा बोलना शुरू किया।
‘ऐथल, यानी मेरी पत्नी, केवल सुंदर ही नहीं, स्वभाव से भी बहुत अच्छी थी। हम दोनों एक दूसरे की सुनते थे। उसके साथ दुख का आभास ही नहीं होता था तो दुख की पहचान कैसे होती?। मेरी माँ उस समय जीवित थी किंतु पिता मेरे बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे।
‘एक दिन पत्नी ने मुझे जो बताया उसे सुन कर मैं फूला न समाया था। पिता बनने की खबर ने मुझे ऐसे हवाई सिंहासन पर बैठा दिया जैसे एक बड़ा साम्राज्य मेरे अधीन हो। मेरी मां ने दादी बनने की खुशी में घर पर परिचितों को बुला कर पार्टी दे डाली। इस तरह ८ महीने आनंद से बीत गए। ऐथल ने अपने आफिस से अवकाश ले लिया था। मैं सारे दिन बच्चे और ऐथल के बारे में सोचता रहता।

‘एक रात जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी। बीच बीच में कभी कभी बिजली कौंध जाती और भयानक बिजली के कड़कने की गरजन हृदय को दहला देती। वह रात वास्तव में भयावह रात बन गई। ऐथल के ऐसा तेज़ दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था। मैंने एम्बुलैंस मंगाई और ऐथल की करहाटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुंच गया।
‘नर्सों ने एंबुलेंस से ऐथल को उतारा और तेजी से सी.आई.यू. में ले गईं। डॉक्टर ने ऐथल की हालत जांच कर कहा कि शीघ्र ही आप्रेशन करना पड़ेगा। अंदर डॉक्टर और नर्सें ऐथल और बच्चे के जीवन और मौत के बीच अपने औज़ारों से लड़ते रहे, बाहर मैं अपने से लड़ता रहा। काफी देर के बाद एक नर्स ने आकर बताया कि तुम एक लड़के के पिता बन गये हो। खुशी में एक उन्माद सा छागया। नर्स को पकड़ कर मैं नाचने लगा। नर्स ने मुझे ज़ोर से झंजोड़ सा दिया पर मेरा हाथ जोर से दबाए रही। कहने लगी,”मिस्टर वारन, मुझे बहुत ही दुख से कहना पड़ रहा है कि डाक्टरों की हर कोशिश के बाद भी आपकी पत्नि नहीं बच सकी।” मेरे पावों से नीचे की धरती सी खिसक गई।आज पता चला कि दुःख क्या होता है!”
जेम्स ने आंखों से चश्मा उतार कर फिर साफ किया। उसकी आंखें आंसुओं के भार को संभाल ना पाई। एक लम्बी सांस छोड़ी और इस वेदना भरी कहानी जारी करते हुए कहा, “माँ पोते की खुशी और ऐथल की मृत्यु की पीड़ा में समझौता कर जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश करने लगी। मेरी माँ बड़ी साहसी थीं। उन्होंने बच्चे का नाम विलियम वारन रखा क्योंकि विलियम ब्लेक, ऐथल का मनपसंद लेखक था।

‘इसी तरह ८ वर्ष बीत गए। माँ बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। एक दिन वह भी विलियम को मुझे सौंप कर इस संसार से विदा लेकर चली गई। उस दिन से विलियम के लिये मैं ही माँ, दादी और पिताके कर्तव्यों को पूरी जिम्मेदारी से निभाता। उसे प्रातः नाश्ता देकर स्कूल छोड़ कर अपने दफ्तर जाता। वहां से भी दिन के समय स्कूल में फोन पर उसकी टीचर से उसका हाल पूछता रहता। विलियम की उंगली में जरा सी चोट लग जाती तो मुझे ऐसा लगता जैसे मेरे सारे शरीर में दर्द फैल गया हो।
‘इतने लाड़ प्यार में पलते हुए वह १८ वर्ष का हो गया। ए-लैवल की परीक्षा में ए ग्रेड में पास होने की खबर सुन कर मैं इतना खुश हुआ कि सीधे ऐथल की फोटो के सामने जाकर न जाने कितनी देर तक उससे बातें करता रहा। जब ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी से ऑनर्स की डिग्री पास की तो मेरे आनंद का पारावार न था।
‘विलियम की गर्लफ्रैंड जैनी जब भी उसके साथ हमारे घर आती तो मैं खुशी से नाच पड़ता। जैनी और विलियम का विवाह उसी चर्च में संपन्न हुआ जहां मेरा और ऐथल का विवाह हुआ था। एक वर्ष के पश्चात ही वलियम और जैनी ने मुझे दादा बना दिया। उस दिन मुझे माँ और ऐथल की बड़ी याद आई। मेरी आंख भर आई! पोते का नाम जॉर्ज वारन रखा। हंसते खेलते एक साल बीत गया। इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था।

“डैडी, जैनी और मुझे कंपनी एक बहुत बड़ा पद देकर आस्ट्रेलिया भेज रही है। वेतन भी बहुत बढ़ा दिया है, मकान, गाड़ी, हवाई जहाज़ की यात्रा के साथ कंपनी जॉर्ज के स्कूल का प्रबंध आदि सुविधाएं भी दे रही है”, विलियम ने बताया तो मेरी आंखें खुली ही रह गईं। यह सब सुन कर मैं धम्म से सोफे पर धंस गया तो विलियम मेरा आशय समझ मुसकरा कर कहने लगा, “डैडी, आप अकेले हो जाएंगे। हम दोनों यह प्रस्ताव अस्वीकार कर देंगे। वैसे तो यहां भी सब कुछ है।”‘मैंने अपने आपको संभाला और कहा कि वाह, मेरा बेटा और बहू इतने बड़े पद पर जारहे हैं। मेरे लिए तो यह गर्व की बात है। सच, मुझे इससे बड़ी खुशी क्या होगी?” जाने की तैयारियां होने लगीं। दिन तो बीत जाता पर रात में नींद न आती। कभी विलियम और जैनी तो कभी जार्ज के स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती।

‘वह दिन भी आ ही गया जब लंदन एयरपोर्ट पर विलियम, जैनी और जॉर्ज को विदा कर भीगे मन से घर वापस लौटना पड़ा। विलियम और जैनी ने जातेजाते भी अपने वादे की पुष्टि की कि वे हर सप्ताह फोन करते रहेंगे और मुझ से आग्रह किया कि मैं उनसे मिलने के लिए आस्ट्रेलिया अवश्य जाऊं। वे टिकट भेज देंगे। मन में उमड़ते हुए उद्गार मेरे आंसुओं को संभाल ना पाए। जार्ज को बार बार चूमा। एअरपोर्ट से बाहर आने के बाद वापस घर लौटने के लिए दिल ही नहीं करता था। कार को दिन भर दिशाहीन घुमाता रहा। शाम को घर लौटना ही पड़ा। दीवारें खाने को आरही थीं। सामने जॉर्ज की दूध की बोतल पड़ी थी, उठा कर सीने से चिपका ली और ऐथल की तस्वीर के सामने फूट फूट कर रोया,
“देख रही है ऐथल, मैं कहा करता था लोगों को जरा सा दुख होता है तो भड़म्बा बना देते हैं। आज पता लगा कि दुख कितना तड़पा देता है।”
‘चार दिन के बाद फोन की घण्टी बजी तो दौड़ कर रिसीवर उठाया,”हैलो डैडी!”

यह स्वर सुनने के लिए कब से बेचैन था। मैं भर्राये स्वर में बोला,
“तुम सब ठीक हो न, जॉर्ज अपने दादा को याद करता है कि नहीं?” मैं यह भी भूल गया कि गोद का बच्चा क्या याद करेगा और क्या भूलेगा। जैनी से भी बात की और यह जान कर दिल को बड़ा सुकून हुआ कि वे सब स्वस्थ और कुशलपूर्वक हैं।
‘विलियम ने टेलीफोन को जॉर्ज के मुंह के आगे कर दिया, तो उसके ‘आंउ आंउ’ की आवाज़ ने कानों में अमृत सा घोल दिया। थोड़ी देर बाद फोन पर वो आवाज़ें बंद हो गईं।
‘तीन माह तक उनके टेलीफोन लगातार आते रहे, किंतु उसके बाद यह गति धीमी हो गई। मैं फोन करता तो कभी कह देता कि दरवाज़े पर कोई घंटी दे रहा है और फोन काट देता। बातचीत शीघ्र ही समाप्त हो जाती। छः महीने इसी तरह बीत गए। कोई फोन नहीं आया तो घबराहट होने लगी।
‘एक दिन मैंने फोन किया तो पता लगा कि वे लोग अब सिडनी चले गए हैं। यह भी कहने पर कि मैं उसका पिता हूं, नए किरायेदार ने उसका पता नहीं दिया। उसकी कंपनी को फोन किया तो पता चला कि उसने कंपनी की नौकरी छोड़ दी थी। यह जान कर तो मेरी चिंता और भी बढ़ गई थी। वे लोग कहां थे, काम कहां कर रहे थे, कुछ पता नहीं लगा।

‘मेरा एक मित्र आर्थर छुट्टियां मनाने तीन सप्ताह के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था। मैं ने उसे अपनी समस्या बताई तो बोला कि वह दो दिन सिडनी में रहेगा और यदि विलियम का पता कहीं मिल गया तो मुझे फोन कर के बता देगा। आर्थर का फोन नहीं आया। तीन सप्ताहों की अंधेरी रातें अंधेरी ही रहीं। तीनों की फोटो बत्ती की रोशनी में निहारता रहता। देखता रहता कि जॉर्ज की आंखें ऐथल की तरह नीली थी, उसकी नाक विलियम और मेरी तरह की, ललाट और मुंह पर जैनी की झलक दिखाई देती थी। कल्पना-लोक में विचरता रहता, कल्पना में ही कभी उस अनजाने देश के समुद्र के किनारों पर उन्हें ढूंढता,कल्पना में ही कभी वहां के बाजारों में पागलों की तरह लोगों के चेहरे देखते रहता कि कहीं कोई चेहरा विलियम या जैनी का ना दिख जाए। यह सब मेरा पागलपन ही तो था। ‘तीन सप्ताह के पश्चात जब आर्थर वापस आया तो आशा दुख भरी निराशा में बदल गई। विलियम और जैनी उसे एक रेस्तरां में मिले थे किंतु वे किसी आवश्यक कार्य के कारण जल्दी में अपना पता, टेलीफोन नंबर यह कह कर नहीं दे पाए कि शाम को डैडी को फोन करके नया पता आदि बता देंगे। ‘उसके फोन की आस में अब हर शाम टेलीफोन के पास बैठ कर ही गुज़रती है। जिस घण्टी की आवाज़ सुनने के लिए इन छः सालों से बेज़ार हूं, वह घण्टी कभी नहीं सुनी। हो सकता है कि उसे डर लगता हो कि कहीं बाप आस्ट्रेलिया ना धमक जाए, बूढ़े से काम तो होगा नहीं, उसका काम भी करना पड़ेगा और वैसे भी बूढ़े और युवकों का मेल इस देश में कहां निभता है?”

जेम्स ने एक लंबी सांस ली। मुझ से पता पूछा तो मैं ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर दे दिया और बोला, “जेम्स, किसी भी समय मेरी जरूरत हो तो बिना झिझक के मुझे फोन कर देना। आइए, मैं आपको आप के घर छोड़ देता हूं। मेरी कार बराबर की गली में खड़ी है।’ “धन्यवाद! मैं पैदल ही जाऊंगा क्योंकि इस प्रकार मेरा व्यायाम भी हो जाता है।” डबडबाई आंखों से विदा लेकर अपनी छड़ी के सहारे चल दिया।

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घर आने पर देखा तो डाक में कुछ चिट्ठियां पड़ी थीं। मैंने कोर्बी टाउन के एक स्कूल में गणित विभाग के अध्यक्ष के पद के लिये इन्टर्वियू दिया था। पत्र खोला तो पता चला कि मुझे नियुक्त कर लिया गया है। नये स्कूल के लिये अपनी स्वीकृति भेज दी। जाने में केवल एक सप्ताह शेष था। जाते हुए जेम्स से विदा लेने के लिए उसके मकान पर गया पर वह वहां नहीं था। पड़ौसी से पता लगा कि अस्पताल में भरती है। इतना समय नहीं था कि अस्पताल में जाकर उसका हाल देख लूं।

एक दिन की मुलाकात मस्तिष्क की चेतना पर अधिक समय नहीं टिकी। समय के साथ मैं जेम्स को बिल्कुल भूल गया।

वकील के पत्रानुसार नियत समय पर जेम्स के घर पर पहुंच गया। उसी दरवाजे पर घण्टी का बटन दबाया जहां से ३० साल पहले जेम्स से मिले बिना ही लौटना पड़ा था। आज बड़ा विचित्र सा लग रहा था। लगभग ४५ वर्षीय एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला। मैंने अपना और सीमा का परिचय दिया तो वकील ने भी अपना परिचय देकर हमें अंदर ले जा कर लाउंज में एक सोफे पर बैठा दिया, वहां तीन पुरुष और एक महिला पहले ही मौजूद थे। मि. मार्टिन ने हम सब का परिचय कराया। एक सज्जन आर.एस.पी.सी.ए. (दि रॉयल सोसायटी फॉर दि प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टु ऐनिमल्स) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अन्य तीन, विलियम वारन (जेम्स वारन का पुत्र), उसकी पत्नी जैनी वारन तथा जेम्स का पौत्र जॉर्ज वारन थे जो आस्ट्रेलिया से आए थे। उनमें से कोई भी जेम्स के अंतिम संस्कार में सम्मलित नहीं हुआ था। बाईं ओर छोटे से नर्म गद्दीदार गोल बिस्तर में एक बड़ी प्यारी सी काली और सफेद रंग की बिल्ली कुंडली के आकार में सोई पड़ी थी, जिसका नाम ‘विलमा’ बताया गया।

मार्टिन ने अपनी फाइल से वसीयत के कागज़ निकाल कर पढ़ना शुरू किए। अपनी संपत्ति के वितरण के बारे में कुछ कहने से पहले जेम्स ने अपनी सिसकती वेदना का चित्रण इन शब्दों में किया था: “लगभग ४ दशक पहले मेरे अपने बेटे विलियम और उसकी पत्नी जैनी ने लंदन छोड़ कर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया। मैं फोन पर अपने पोते और इन दोनों की आवाज़ सुनने को तरस गया। मैं फोन करता तो शीघ्र ही किसी बहाने से काट देते और एक दिन इस फोन ने मौन धारण
कर यह सहारा भी छीन लिया। किसी कारण स्थानांतरण होने पर बेटे ने मुझे नए पते या टेलीफोन नंबर की सूचना तक नहीं दी। मैं इस अकेलेपन के कारण तड़पता रहा। कोई बात करने वाला नहीं था। कौन बात करेगा, जिसका अपना ही खून सफेद हो गया हो।

‘६ साल जीभ बिना हिले पड़ी पड़ी बेजान हो गई थी कि एक दिन एक भारतीय सज्जन राकेश वर्मा ने पार्क में इस मौन व्यथा को देखा और समझा। मेरे उमड़ते हुए उद्गारों को इस अनजान आदमी ने पहचाना। विडम्बना यह रही कि वह भी व्यक्तिगत कारणवश लंदन से दूर चले गये।

‘राकेश वर्मा के साथ एक दिन की भेंट मेरे सारे जीवन की धरोहर बन यादों में एक सुकून देती रही, फिर इस भयावह अकेलेपन ने धीरेधीरे भयानक रूप ले लिया। आयु और शारीरिक रोगों के अलावा मानसिक अवसाद ने भी मुझे घेर लिया।

‘इस अभिशप्त जीवन में एक आशा की लहर मेरे मकान के बाग में न जाने कहां से एक बिल्ली के रूप में आगई। कौन जाने इसका मालिक भी देश छोड़ गया हो और इसे भी इसके भाग्य पर मेरी तरह ही अकेला छोड़ गया हो! बिल्ली को मैंने एक नाम दिया - ‘ विलमा ‘।

‘दो-तीन दिनों में विलमा और मैं ऐसे घुलमिल गए जैसे बचपन से हम दोनों साथ रहे हों। मैं उसे अपनी कहानी सुनाता और वह ‘मियाऊंमियाऊं’ की भाषा में हर बात का उत्तर देती। मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जॉर्ज से बात कर रहा हूं। विल्मा को खाना खिलाता, उसके साथ एक रस्सी को घुमा कर बिल्ली-चूहे का खेल खेलता तो मेरी आंखों के सामने जॉर्ज की सूरत नाचने लगती। विल्मा कभी मेरे साथ मेरे पांव की ओर सोने की जिद्द करती तो मुझे बड़ा अच्छा लगता था।
‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जॉर्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था। मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा। अगले दिन वह वापस आगई। बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा।

मैंने उसे गोद में उठा कर बहुत प्यार किया और उससे शिकायत भी करता रहा। वह मेरे पांव में पूंछ लगा लगा कर जैसे क्षमा मांग रही हो।
‘विलमा के संग रहने से मेरे मानसिक अवसाद में इतना सुधार हुआ जो अच्छी से अच्छी दवाओं से नहीं हो पाया था। उसने मुझे एक नया जीवन दिया। वह कब क्या चाहती है, मैं हर बात समझ लेता था - ये सब वर्णन से बाहर है, केवल अनुभूति ही हो सकती है।”

विलियम, जैनी और जॉर्ज, तीनों के चेहरों पर उतार चढ़ाव कभी रोष तो कभी पश्चाताप के लक्षणों का स्पष्टीकरण कर रहे थे। जेम्स ने अपनी वसीयत में मुख्य रूप से कहा था कि मेरी सारी चल और अचल सम्पत्ति में से समस्त टैक्स तथा हर प्रकार के वैध खर्च, बिल आदि देने के बाद शेष बची धन-राशि का इस प्रकार वितरण किया जायेः

‘मिस्टर राकेश वर्मा , जिनका पुराना पता था: २३ रैले ड्राइव, वैटस्टोन, लन्दन एन २०, को दो हजार पौण्ड दिये जाएं और उनसे मेरी ओर से विनम्रतापूर्वक कहा जाए कि यह राशि उनके उस एक दिन का मूल्य ना समझा जाए जिस के कारण मेरे जीवन के मापदण्ड ही बदल गये थे। उन अमूल्य क्षणों का मूल्य तो चुकाने की सामर्थ्य किसी के भी के पास ना होगी। यह क्षुद्र रकम मेरे उद्गारों का केवल टोकन भर है। मेरे उक्त वक्तव्य से, स्पष्ट है कि विलियम वारन, जैनी वारन या जॉर्ज वारन इस सम्पत्ति के उत्तराधिकार के अयोग्य हैं।”
वकील कहते कहते कुछ क्षणों के लिए रुक गया। विलियम, जैनी और जॉर्ज की मुखाकृति पर एक के बाद एक भाव आजा रहे थे। वे कभी आंखें नीची करते हुए दांत पीसते तो कभी अपने कठोर व्यवहार पर पश्चात्ताप करते। विलियम अपने क्रोध को वश में ना रख सका और खड़े होकर सामने रखी मेज़ पर ज़ोर से हाथ मार कर जाने को खड़ा हो गया तो जैनी ने उसे समझाबुझा कर बैठा लिया। तीनो मेरी ओर वैमनस्य-भरी दृष्टि से घूरते रहे।

वकील ने पुनः वसीयत पढ़नी शुरू की तो यह जानकर सभी आश्चर्यचकित हो गये कि शेष समस्त सम्पत्ति विलमा बिल्ली के नाम कर दी गई थी और साथ ही कहा गया था कि आर.एस.पी.सी.ए. को ‘विलमा’ के शेष जीवन के पालनपोषण का अधिकार दिया जाए और इसी संस्था को प्रबंधक नियुक्त किया जाए। साथ ही एक सूची थी जिसमें विलमा को जेम्स किस प्रकार रखता था, उसका पूरा वर्णन था। आगे लिखा था,
‘विलमा के निधन पर एक स्मारक बनाया जाए। उसके बाद शेष धन को राह भटके हुए, प्रताड़ित पशुओं की दशा के सुधारने पर व्यय किया जाए।
मैंने मार्टिन से कहा, “यदि आप अनुमति दें तो ये दो हजार पौण्ड, जो वसीयत के अनुसार जेम्स वारन मुझे दे रहें हैं, इस राशि को भी ‘विलमा’ की वसीयत की राशि में ही मिला दें तो मुझे हार्दिक सुख मिलेगा।”
वकील ने कहा,” इस को विधिवत बनाने में थोड़ी अड़चन आ सकती है। हां, इसी राशि का एक चेक आर.एस.पी.सी.ए. को अपनी इच्छानुसार देना अधिक सुगम होगा।” मेरे इन शब्दों को सुनते ही विलियम लज्जा से आंखें नीची करके कुछ कहने लगा जो मैं स्पष्ट रूप से सुन नहीं सका।
अंत में औपचारिक शब्दों के साथ मार्टिन ने वसीयत बंद कर बैग में रखली। बिल्ली, जो अभी भी सारी कारवाही से अनजान सोई हुई थी, आर.एस.पी.सी.ए. के प्रतिनिधि को सौंप दी गई। इस प्रकार वकील का भी प्रतिदिन विलमा की देखरेख का भार समाप्त होगया। सब मकान से बाहर आगए।

मैंने सीमा से कहा कि मैं तुम्हें उस मकान पर लेजाता हूं जहां लंदन में विवाह से पहले रहता था। कार दस मिनट में २३ रैले ड्राइव के सामने पहुंच गई। कार एक ओर खड़ी की और ना जाने क्यों बिना सोचेसमझे ही उंगली उस मकान की घंटी के बटन पर दबा दी।
एक अंग्रेज़ बूढ़े ने छोटे से कुत्ते के साथ दरवाजा खोला। कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया। मैंने उस वृद्ध को बताया कि लगभग ३० वर्ष पहले मैं इस मकान में किराएदार था। बस, इधर से गुजर रहा था तो पुरानी याद आगई…।” इस से पहले कि मैं आगे कुछ कहता, बूढ़े ने बड़े रूखेपन से कहना आरम्भ कर दिया।
” यदि तुम इस मकान को खरीदने के विचार से आए हो तो वापस चले जाओ। इन दीवारों में केरी और चार्ल्स की यादें बसी हुई हैं। चार्ल्स की माँ, मेरी पत्नि तो मुझे कब की छोड़ गई।….चार्ली अमेरिका से एक दिन अवश्य आएगा।… हां, कहीं उसका फोन ना आजाये?”
इतना कहतेकहते उस ने दरवाजा बंद कर लिया। अंदर से कुत्ता अभी भी भौंक रहा था।
सीमा की दृष्टि दरवाजे पर अटकी हुई थी, कह रही थी, “एक और जेम्स वारन !”
- महावीर शर्मा

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April 7, 2008

ग़म की दिल से दोसती होने लगी-ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 11:37 pm

ग़म की दिल से दोसती होने लगी।
ज़िन्दगी से दिल्लगी होने लगी।

जब मिली उसकी निगाहों से मिरी
उसकी धड़कन भी मिरी होने लगी।

ज़ुल्फ़ की गहरी घटा की छांव में
ज़िन्दगी में ताज़गी होने लगी।

बेसबब जब वो हुआ मुझ से ख़फ़ा
ज़िन्दगी में हर कमी होने लगी।

बह न जाएं आंसू के सैलाब में
सांस दिल की आखिरी होने लगी।

आंसुओं से ही लिखी थी दासतां
भीग कर क्यों धुन्धली होने लगी।

जाने क्यों मुझ को लगा कि चांदनी
तुझ बिना शमशीर सी होने लगी।

आज दामन रो के क्यों गीला नहीं?
आंसुओं की भी कमी होने लगी।

तश्नगी बुझ जाएगी आंखों की कुछ
उसकी आंखों में नमी होने लगी।

डबडबाई आंख से झांको नहीं
इस नदी में बाढ़ सी होने लगी।

इश्क़ की तारीक गलियों में जहां
दिल जलाया, रौशनी होने लगी।

आ गया क्या वो तसव्वर में मिरे
दिल में कुछ तस्कीन सी होने लगी।

मरना हो, सर यार के कांधे पे हो
मौत में भी दिलकशी होने लगी।

महावीर शर्मा

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March 3, 2008

तिरे सांसों की ख़ुश्बू - ग़ज़ल.

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:50 pm

तिरे सांसों की ख़ुश्बू - ग़ज़ल.

तिरे सांसों की ख़ुश्बू से ख़िज़ाँ की रुत बदल जाए,
जिधर को फैल जाए, आब-दीदा* भी बहल जाए।

(*आब-दीदाः जिसकी आंखों में आंसू भरे हुए हों)

ज़माने को मुहब्बत की नज़र से देखने वाले,
किसी के प्यार की शम.आ तिरे दिल में भी जल जाए।

मिरे तुम पास ना आना मिरा दिल मोम जैसा है,
तिरे सांसों की गरमी से कहीं ये दिल पिघल जाए।

कभी कोई किसी की ज़िन्दगी से प्यार ना छीने,
वो किस काम का जिस फूल से ख़ूश्बू निकल जाए

तमन्ना है कि मिल जाए कोई टूटे हुए दिल को,
बनफ़्शी हाथों से छू ले, किसी का दिल बहल जाए।

ज़रा बैठो, ग़मे-दिल का ये अफ़साना अधूरा है,
तुम्हीं अंजाम लिख देना, मिरा गर दम निकल जाए।

मिरी आंखें जुदा करके मिरी तुर्बत* पे रख देना, (*क़ब्र, मज़ार)
नज़र भर देख लूं उसको, ये हसरत भी निकल जाए।

महावीर शर्मा

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February 17, 2008

वैलंटाइन के अंतिम दिन

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 8:17 pm

‘वैलंटाइन के अंतिम दिन’
महावीर शर्मा

वैलंटाइन कारागार की कोठरी में फ़र्श पर बैठा हुआ था। जीवन के अंतिम दिनों को गिनते हुए आने वाली मौत की कल्पना से हृदय की धड़कनों की गति को संभालना कठिन हो रहा था। बाहर खड़े लोग खिड़की की सलाखों में से फूल बरसा रहे थे, उसकी रिहाई के नारों से चारों दिशाएं गूंज रही थीं। उसी समय सैनिकों की एक टुकड़ी ने आकर बिना चेतावनी दिए ही इन निहत्थे लोगों पर डंडों की वर्षा कर, भीड़ को तितर बितर कर दिया।

वैलंटाइन गहरी चिंता में सिर को नीचे किए बैठा हुआ था। अचानक दरवाज़ा खुला तो देखा कि कारापाल एक युवती के साथ कोठरी के अंदर प्रवेश कर रहे थे। कारापाल ने वैलंटाइन को अभिवादन कर नम्रता के साथ कहा, ‘पादरी, यह मेरी बेटी जूलिया है। आप विद्वान हैं। आप धर्म, गणित, विज्ञान, अर्थ-शास्त्र जैसे अनेक विषयों के भंडार हैं। अपने अंतिम दिनों में यदि आप जूलिया को इस असीम ज्ञान का कुछ अंश सिखा सकें तो आजीवन आभारी रहूंगा। सम्राट क्लॉडियस की क्रूरता को कौन नहीं जानता, मैं उसके नारकीय निर्णय में तो हस्तक्षेप नहीं कर सकता किंतु आप जब तक इस कारागार में समय गुजारेंगे, उस समय तक आपकी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।’

वैलंटाइन की भीगी आंखें जूलिया की आंखों से टकराईं किंतु जूलिया के चेहरे के भाव-चिन्हों में कोई बदलाव नहीं आया। जेलर ने बताया कि जूलिया आंशिक रूप से अंधी है। उसे बहुत ही कम दिखाई देता है। अगले दिन की सांय का समय निश्चित होने के बाद जूलिया और जेलर चले गए। दरवाज़ा पहले की तरह बंद हो गया। इसी प्रकार जूलिया हर शाम वैलंटाइन से शिक्षा प्राप्त करती रही।

उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
“मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।”

यह घटना तीसरी शताब्दी के समय की है। रोमन काल में सम्राट क्लॉडियस द्वितीय की क्रूरता से दूर दूर देशों के लोग तक थर्राते थे। उसकी महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं था। वह चाहता था कि एक विशाल सेना लेकर समस्त संसार पर रोमन की विजय-पताका फहरा दे। उसके समक्ष एक कठिनाई थी। लोग सेना में भर्ती होने से इंकार करने लगे क्योंकि वे जानते थे कि क्लॉडियस की वजय-पिपासा कभी समाप्त नहीं होगी, सारा जीवन विभिन्न देशों में युद्ध करते करते समाप्त हो जाएगा। अपने परिवार और प्रिय-जनों से एक बार विलग होकर कभी भी मिलने का अवसरनहीं मिलेगा।

इसी कारण, क्लॉडियस ने रोम में जितने भी विवाह होने वाले थे , रुकवा दिए। शादियां अवैध करार कर दी गईं। पति या पत्नी शब्द का अब कोई अर्थ नहीं रहा। जनता में चिंता की लहर दौड़ गई। यदि कोई विवाह करता पकड़ा जाता तो उसके साथ विवाह सम्पन्न करने वाले पादरी को भी कड़ा दण्ड दिया जाता। युवक उनकी इच्छा के विरुद्ध सेना में भर्ती कर लिए गए। कितनी ही युवतियों ने अपने प्रियतम के विरह में मृत्यु को गले लगा लिया।

प्रथा के अनुसार लड़के और लड़कियां अलग रखे जाते थे। 14 फरवरी के दिन विवाह की देवी ‘जूनो’ के सम्मान में नगर के सब व्यवसाय बंद कर दिए जाते थे। अगले दिन 15 फरवरी को ‘ल्यूपरकेलिया’ का उत्सव मनाया जाता और सांय के समय रोमन लड़कियों के नाम कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर एक

प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

बड़े बर्तन में रख दिए जाते। युवक बारी बारी एक पर्ची निकालते और उत्सव के दौरान वह उसी लड़की का साथी बना रहता। यदि साझेदारी प्यार में बदल जाती तो दोनों चर्च में जाकर विवाह-बंधन में बंध जाते। क्लॉडियस के इस निराधार कानून के कारण ल्यूपरकेलिया का यह त्यौहार समाप्त होगया।

वैलंटाइन ने प्रेमियों के दिलों में झांक कर उनकी व्यथा को देखा था। जानता था कि हृदयहीन क्लॉडियस का यह कानून अमानवीय था, प्रकृति के प्रतिकूल था, सृष्टि यहीं रुक जाएगी! पादरी होने के नाते, वैलंटाइन सेंट मेरियस के सहयोग से इस कानून की अवेहलना करते हुए अपने चर्च में गुप्त-रूप से युवक और युवतियों के विवाह करवाते रहे।

एक अंधेरी रात में जब चंद्रमा अपनी चांदनी के साथ शयन कर रहा था, झंझावात के साथ मूसलाधार वर्षा ने मानो सारे नगर को डुबोने की ठान ली हो। सेंट मेरियस उस रात कार्यवश कहीं दूर चले गए थे। वैलंटाइन मोमबत्ती के धीमे से प्रकाश में एक युवक और युवती के विवाह की विधि संपूर्ण ही कर पाए थे, क्लॉडियस के सैनिकों के पदचाप सुनाई दिये। वैलंटाइन ने दोनों को चर्च के पिछले द्वार से निकालने का प्रयत्न किया किंतु जब तक सैनिक आ चुके थे, दोनों वर-वधू को को एक दूसरे से अलग कर दिया गया। वे दोनों कहां गए, उनका क्या हुआ, कोई नहीं जानता।

वैलंटाइन को कारागार में डाल दिया। उसे मृत्यु-दण्ड की सज़ा दी गई। उसके जीवन लीला की समाप्ति के लिए
१४ फरवरी सन् 270 ई० का दिन निश्चित कर दिया गया।

एक दिन पहले जूलिया वैलंटाइन से मिली, आंखें रो रो कर सूज गई थीं। इतने दिनों में दोनो के दिलों में पवित्र प्रेम की लहर पैदा हो चुकी थी। उसी लहर ने उसके मनोबल को बनाए रखा। जूलिया के इन आंसुओं में दृष्टि के विकार भी बह गए थे। उसकी आंखें पहले से अधिक देखने के योग्य हो गईं। दोनों एक दूसरे से लिपट गए। वैलंटाइन ने मोमबत्ती की लौ को देख कर कहा,’ जूलिया,शमा की इस लौ को जलाए रखना। मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। एक दिन क्लॉडियस स्वयं अपने ही बनाये हुए कानून के जाल में फंस जाएगा। प्रेम कभी किसी का दास नहीं होता।’

थोड़ी देर के पश्चात जेल के दो सैनिकों ने आकर पादरी को प्रणाम किया और आदर सहित जूलिया को घर पहुंचा दिया।

वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही।

ज़िंदगी की अंतिम रात वैलंटाइन ने कुछ कोरे कागज़ और एक कलम मंगवाए। कागजों में कुछ लिखता और फिर मोमबत्ती की लौ में जला देता। केवल एक कागज़ बचा हुआ था। उस कोरे कागज़ को आंखों से लगाया, फिर दिल के पास दबाए रखा। कलम उठाई, उस में कुछ लिखा और नीचे लिखा - “तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित।” उसकी आंखों से दो आंसू ढुलक गए जो जमीन पर न गिर कर उस प्रेम-पत्र में समा गए। प्रहरी को बुला कर कहा, ‘ मेरे मरने के बाद यदि इस पत्र को जूलिया तक पहुंचा दो तो मरने के बाद भी मेरी आत्मा आभारी रहेगी।” प्रहरी के नेत्र सजल हो उठे, कहने लगा, ‘पादरी, आप का जीवन बहुत मूल्यवान है। अभी भी मैं कोई उपाय सोचता हूं जिससे आप को कारागार से निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाए। इस शुभ-कार्य में मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है।’
वैलंटाइन ने रोक कर कहा, “मेरे इस कार्य में कायरता की मिलावट की बात ना करो। मेरे बाद अनेक वैलंटाइन पैदा होंगे जो प्रेम की लौ जलाए रखेंगे।” प्रहरी ने कागज़ लेकर गीली आंखों को पोंछते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया।

अगले दिन नगर-द्वार के पास, जो आज उसकी स्मृति में पोर्टा वैलटीनी नाम से विख्यात है, अनगिनित लोगों की भीड़ थी। जनता के चारों ओर सशस्त्र सैनिक तैनात थे। सैनिक वैलंटाइन को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ कर मृत्यु-मंच पर ले आए। लोगों के नारों से गगन गूंज रहा था, जमीन आंसुओं से भीग गई थी। उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
‘ मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।” भीड़ में किसी युवक ने भर्राये हुए स्वर में कहा, ‘इस हृदय-विदारक घटना को सुन कर कौन सा पत्थर-दिल इनसान होगा जो शोक, खेद और संताप रहित इस
उत्सव को मना सकेगा।’ साथ ही एक बूढ़े ने युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,’प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।’

वैलंटाइन को मंच पर रखे हुए तख्ते पर लिटा दिया गया। चार जल्लाद हाथों में भारी भारी दण्ड लिए हुए थे। पांचवे जल्लाद के हाथ में एक पैनी धार का फरसा था। दण्डाधिकारी ने ऊंचे स्वर में वैलंटाइन से कहा,

‘वैलंटाइन, तुमने रोमन विधान की अवेहलना कर लोगों के विवाह करवा कर सम्राट क्लॉडियस का अपमान किया है। यह एक बहुत बड़ा अपराध है, पाप है जिसके लिए एक ही सज़ा है - निर्मम मृत्यु-दण्ड! तुम यदि अपने अपराध को स्वीकार कर लो तो फरसे से एक ही झटके से तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा और तुम्हारी मौत कष्टरहित होगी। यदि अपना अपराध स्वीकार नहीं करोगे तो इस बेरहमी से मारे जाओगे कि मौत के लिए याचना करोगे पर वो सामने नाच नाच कर तुम्हारे अपराध की याद दिलाती रहेगी।”

वैलंटाइन के मुख पर भय के कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहे थे। उसने दृढ़तापूर्वक कहा,

‘ मैंने कोई अपराध नहीं किया है। दो प्रेमियों को विवाह-बंधन में जोड़ना मेरा धर्म है, पाप नहीं है।” चारों ओर से एक ही आवाज़ आ रही थी - “वैलंटाइन निर्दोष है।”

दण्डाधिकारी का इशारा देखते ही चारों जल्लादों ने दण्ड को घुमा घुमा कर वैलंटाइन को मारना शुरू कर दिया। दर्शकों की चीखें निकल गई, कुछ तो इस दृश्य को देख कर मूर्छित होगए। जनता के हाहाकार, क्रंदन और चीत्कार के शोर के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता था। एक बार तो जल्लादों के पाषाण जैसे हृदय भी पिघलने लगे। थोड़ी ही देर में सब समाप्त हो गया। वैलंटाइन का निर्जीव शव रक्त से रंगा हुआ था।
वैलंटाइन का शव रोम के एक चर्च में दफना दिया गया जो आज ‘चर्च आव प्राक्सिडिस’ के नाम से प्रसिद्ध है।

जूलिया में इतना साहस न था कि वह इस अमानवीय वीभत्स दृश्य को सहन कर सके। वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही। उसी समय कारागार के प्रहरी ने आकर जूलिया को वैलंटाइन का लिखा पत्र देते हुए कहा, ‘पादरी ने कल रात यह पत्र आपके लिए लिखा था।’
प्रहरी आंखों को पोंछता हुआ चला गया। जूलिया ने पत्र खोला तो वैलंटाइन के अमोल आंसू के चिन्ह ऐसे दिखाई
दे रहे थे जैसे वैलंटाइन की आंखें अलविदा कह रही हों। बार बार पढ़ती रही जब तक आंसुओं से पत्र भीग भीग कर गल गया। पत्र के अंत में लिखा थाः
‘तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित!’

*** *** *** *** *** *** ***
महावीर शर्मा

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February 14, 2008

विभिन्न देशों में वैलंटाइन दिवस

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 8:27 am

विभिन्न देशों में वैलंटाइन दिवस

विश्व के विभिन्न देशों में 14 फ़रवरी के दिन वैलंटाइन डे ज़ोर शोर से मनाया जाता है। प्रेमी और प्रेमिकाएं अपने हृदय के उद्गार व्यक्त करने के लिए नए नए विलक्षण तरीक़े ढूंढते हैं। अलग अलग देशों में इस दिवस पर प्रेम के इज़हार के ढंग उनकी सभ्यता और रिवाजों के रंगों में रंगते हुए अलग से ही रूप ले लेते हैं, जैसेः-

ये ख़ास दिन है प्रेमियों का, प्यार की बातें करो
कुछ तुम कहो कुछ वो कहे, इज़हार की बातें करो
.
जब दो दिलों की धड़कनें इक गीत सा गाने लगें
आंखों में आंखें डाल कर इक़रार की बातें करो
.
ये कीमती सा हार जो लाए हो वो रख दो कहीं
बाहें गले में डाल कर, इस हार की बातें करो
.
जिस के लबों की मुस्कुराहट ने बदल दी ज़िंदगी
उस गुल बदन के होंट औ रुख्सार की बातें करो
.
अब भूल जाओ हर जफ़ा, ये प्यार का दस्तूर है
राहे-मुहब्बत में वफ़ा-ए-यार की बातें करो

डेनमार्क में एक रिवाज के अनुसार लोग अपने मित्रों को दबे हुए स्नो ड्राप्स के फूल भेजते हैं। पुरुष हास्य-युक्त पत्र भी लिखते हैं जिसे डेनिश में गेकेब्रेव कहते हैं। अपने नाम के स्थान पर अपने नाम के अक्षरों की संख्या के बराबर ‘बिंदु’ लगा देते हैं। जिस महिला को यह पत्र मिलता है, वह बिंदुओं के अंकों से लिखने वाले का नाम ठीक बता दे तो उसे अप्रैल में ईस्टर-एग मिलता है।

स्कॉटलैण्ड में यह दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। अलग अलग जगहों में यह उत्सव
मनाने में थोड़ा थोड़ा अंतर हो जाता है। लेकिन साधारण रूप से, बराबर संख्या में पुरुष और महिलाएं छोटी छोटी पर्चियों पर अपने अपने नाम लिख देते हैं। एक हैट पुरुषों के लिए और दूसरा हैट महिलाओं के लिए रख दिया जाता है। पुरुष और महिलाएं अपने अपने हैट में यह पर्चियां रख देती हैं। प्रत्येक महिला पुरुषों के हैट में से एक पर्ची निकालती है और उस दिन दोनों साथी बन जाते हैं। पुरुष महिलाओं को उपहार देते हैं। यह आवश्यक नहीं कि वे दोनों गर्ल-फ्रेंड ही बन जाएं या उनका विवाह हो।

स्काटलैंड के कुछ भागों में एक और रिवाज है जो अब मिटता जा रहा है। उस दिन कोई भी युवक और युवती गली में या कहीं भी पहली बार मिले तो उस लड़की का वह युवक वैलंटाइन बन जाता है और दोनों ही एक दूसरे को अपने प्रेम-बंधन के टोकन के रूप में उपहार देते हैं।

जापान में वैलंनटाइन दो बार मनाया जाता है। 14 फरवरी को युवतियां युवकों को उपहार देती हैं। उस समय सब से सर्वप्रिय उपहार चाकलेट (गिरि-चोको) माना गया है। ‘तोमो-चोको’ भी गर्लफ्रेंड के लिए लोकप्रिय है। युवतियों की मान्यता है कि स्टोर से खरीदी हुई स्वीट्स सच्चे प्यार की द्योतक नहीं हैं। इसी लिए वे अपने वैलंटाइन के लिए अपने हाथों से बनाती हैं।
एक मास के पश्चात 15 मार्च जिसे ‘श्वेत दिवस’ कहा जाता है, दिए हुए उपहार को वापस लौटाया जाता है। इसी लिए लड़कियां १४ फरवरी के दिन बढ़िया से बढ़िया उपहार चुनती हैं।

कोरिया में बहुत कुछ जापान की ही तरह है लेकिन वहां दो दिन ना होकर तीन दिन वैलंटाइन दिवस के लिए रखे हैं। जापान की तरह युवतियां युवकों के लिए कैंडी (मिठाई) का उपहार देती हैं। 14 मार्च जो ‘श्वेत दिवस’ कहलाता है, युवक अपनी स्वीट-हार्ट के प्रति पहली बार अपने प्रेम को स्वीकार करते हैं। जिन लोगों का कोई प्रणय-संबंधी साथी नहीं होता है, उनके लिए 14 अप्रैल का दिन निश्चित किया गया है जिसे ‘काला दिवस’ कहते हैं। उस दिन ऐसे लोग इकट्ठे होकर जजांग नूडल्स खाते हैं जो काले रंग के होते हैं। इसी लिए इस दिन को ‘काला दिवस’ कहा गया है।

ताइवान में अन्य देशों की तरह ही 14 फरवरी के दिन वैलंटाइन मनाया जाता है, लेकिन फिर 7 जुलाई के दिन वैलंटाइन डे विशेष महत्व रखता है। इन दोनों दिनों पर पुरुष मूल्यवान गुलाब और अन्य फूलों के बूके अपनी स्वीट-हार्ट को देते हैं। फूलों की संख्या और रंग का एक विशेष अर्थ होता है। उदाहरणार्थ - एक गुलाब का अर्थ है ‘केवल एक प्रेमिका’, 11 गुलाब के फूलों का अर्थ है ‘प्रिय-पात्र’ और 99 गुलाब के फूलों का अर्थ है ‘हमेशा के लिए’ । 108 गुलाबों का अर्थ है, ‘मुझ से शादी करोगी ?’

ब्रिटेन में भिन्न भिन्न स्थानों में अपने अपने रिवाजों के अनुसार वैलंटाइन डे मनाया जाता है। फिर भी कार्ड, फूल, चाकलेट और अन्य प्रकार के उपहार एक दूसरे को भेजना सामान्य है। पति और पत्नियां, गर्ल-फ्रेंड्स, एक दूसरे को, बच्चे अपने टीचर और माँ आदि को वैलंटाइन कार्ड और उपहार देते हैं। आजकल यह प्रवृत्ति भी है कि अखबारों और मैग्ज़ीनों में वैलंटाइन-कविताएं छापी जाती हैं। रोमांटिक गाने गाए जाते हैं। बच्चे भी वैलंटाइन के गाने गाते हैं और बदले में उन्हें कैंडी, फल, चाकलेट और कुछ धन-राशि भी उपहार में मिल जाती है। कहीं कहीं कुंवारी महिलाएं प्रातः जल्दी उठ जाती हैं और अपनी खिड़की के पास होकर सड़क पर गुजरते हुए व्यक्तियों को निहारती हैं। वह समझती हैं कि जो पहला व्यक्ति दिखाई देगा, वही भविष्य में उसका पति बनेगा।

किसी हद तक यहां प्रत्येक लड़की का कोई ना कोई बॉय-फ़्रैंड होता ही है, इसलिए आज के समय में इसे मजाक के रूप में ही लिया जाता है।
महावीर शर्मा

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February 8, 2008

अधूरी हसरतें – ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 1:16 pm

अधूरी हसरतें – ग़ज़ल

कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गये।

गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंट से
याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गये।

जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।

यूं तो तेरा हर लम्हा यादों के नग़मे बन गये
वो ही नग़मे घुट के सोज़ो-साज़ दिल में रह गये।

दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गये।

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।

ख़्वाब में दीदार हो जाता तिरी तस्वीर का
नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गये।
महावीर शर्मा

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February 2, 2008

मुश्‍किल भूखों का जीना है !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 11:14 pm

मुश्‍किल भूखों का जीना है !

मेहनत करके निज हाथों से, बेचारे खेत उगाते हैं,
सारे दिन खून बहा अपना , सूरज ढलने पर आते हैं,
वर्तमान के कष्‍टों को, मुस्‍का मुस्‍का कर सहते हैं,
केवल भाव