महावीर

May 1, 2008

वसीयत - कहानी

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा — महावीर @ 8:58 pm

(इंग्लैंड में बूढ़ों की दुर्दशा पर एक मार्मिक कहानी)

वसीयत - कहानी
लेखकः
महावीर शर्मा

(साभारः सरिता, दिसंबर-प्रथम २००६)

सुबह नाश्ते के लिये कुर्सी पर बैठा ही था कि दरवाज़े की घण्टी बज उठी। उठने लगा तो सीमा ने कहा, “आप चाय पीजिये, मैं जाकर देखती हूं।” दरवाज़ा खोला तो पोस्टमैन ने सीमा के हाथ में चिट्ठी देकर दस्तखत करने को कहा,
“किस की चिट्ठी है?” मैंने बैठे बैठे ही पूछा।
चिट्ठी देख कर सीमा ठिठक गई और आश्चर्य से बोली, ” किसी सॉलिसिटर का है। लिफ़ाफ़े पर भेजने वाले का नाम ‘जॉन मार्टिन-सॉलिसिटर्स’ लिखा है।”
यह सुनते ही मैं ने चाय का प्याला होंटों तक पहुंचने से पहले ही मेज पर रख दिया। इंग्लैण्ड में वैध रूप से आया था, और इस ६५ वर्ष की आयु में वकील का पत्र देख कर दिल को कुछ घबराहट होने लगी थी। उत्सुकता और भय का भाव लिए पत्र खोला तो लिखा था.

“जेम्स वारन, ३० डार्बी एवेन्यू , लंदन निवासी का ८५ वर्ष की आयु में २८ नवंबर २००४ को देहांत हो गया। उसकी वसीयत में अन्य लोगों के साथ आपका भी नाम है। जेम्स की वसीयत १५ दिसम्बर २००४ दोपहर के बाद ३ बजे जेम्स वारन के निवास पर पढ़ी जायेगी। आप से अनुरोध है कि आप निर्धारित तिथि पर वहां पधारें या आफिस के पते पर टेलीफोन द्वारा सूचित करें।”

“यह जेम्स वारन कौन है? सीमा ने उत्सुकता से कहा, “मेरे सामने तो आपने कभी भी इस व्यक्ति का कोई जिक्र नहीं किया।” मैं जैसे किसी पुराने टाइमज़ोन में पहुंच गया। चाय का एक घूंट पीते हुए मैं ने सीमा को बताना शुरू किया।

“उस समय मैं अविवाहित था और लंदन में रहता था। मैं कभी कभी दो मील की दूरी पर एवेन्यू पार्क में जाता था। वहां एक अंगरेज़ वृद्ध जिस की उम्र लगभग ५५ - ६० की होगी, बैंच पर अकेला बैठा रहता और वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को हंस कर “गुड-मॉर्निंग” या “गुड डे” कह कर इस अंदाज़ मेंअभिवादन करता, जैसे कुछ कहना चाहता हो।

इंगलैंड में धूप की खिलखिलाती हो तो कौन उस बूढ़े की ऊलजलूल बातों में समय गंवाए ? यह सोच कर लोग उसे नज़रअंदाज़ कर चले जाते और बैंच पर अकेला बैठा होता था। मैं भी औरों की तरह आंखें नीचे किए कतरा कर चला जाता। कुछ झुटपुटा होने लगता तो पार्क की चहल पहल सूनेपन में बदलना आरम्भ हो जाती। मैं भी चलने लगता। बूढ़ा अपनी लकड़ी के सहारे धीरे धीरे चल देता।

हर रोज अंधेरा होने से पहले बूढ़ा अपनी जगह से उठता और धीरे धीरे चल देता।मैं कभी अनायास ही पीछे मुड़ कर देखता तो हाथ हिला कर “हैलो” कह कर मुस्कुरा देता। मैं भी उसी प्रकार उत्तर देकर चला जाता। यह क्रम चलता रहा। एक दिन रात को ठीक से नींद नहीं आई तो विचारों के क्रम में बारबार बूढ़े की आकृति सामने आती रही, फिर नींद लगी तो देर से सो कर उठा। सामान्य कार्यों के बाद कुछ भोजन कर कपड़े बदले और पार्क जा पहुंचा।
बूढ़ा उसी बैंच पर मुंह नीचे किए हुए बैठा हुआ था जैसे किसी घोर चिंता में डूबा हुआ हो। इस बार कतराने के बजाय मैं ने उस से कहा,”हैलो, जेंटिलमैन!”
बूढ़े ने मुंह ऊपर उठाया। उसकी नजरें कुछ क्षणों के लिए मेरे चेहरे पर अटक गई। फिर एक दम उसकी आंखों में चमक सी आगई, मुस्कुराहट से गाल फैलने से चेहरे की झुर्रियां गहरा गईं। वह बड़े उल्लासपूर्वक बोला, “हैलो, सर। आप मेरे पास बैठेंगे क्या? …” मैं उसी बैंच पर उसके पास बैठ गया। बूढ़े ने मुझ से हाथ मिलाया, जैसे कई वर्षों के बाद कोई अपना मिला हो। मैंने पूछा,” आप कैसे हैं? “जब कोई दो व्यक्ति मिलते हैं तो यह एक ऐसा वाक्य है जो स्वतः ही मुख से निकल जाता है। कुछ देर मौन ने हम को अलग रखा था पर मैंने ही फिर पूछा ,” आप पास में ही रहते हैं?”
मेरे इस सवाल पर ही उस ने बिना झिझक के कहना शुरू कर दिया, ” मेरा नाम जेम्स वारन है।३० डार्बी एवेन्यू , फिंचले में अकेला ही रहता हूं।” मैंने कहा, ” मिस्टर वारन ….”,
“नहीं, नहीं … जेम्स! आप मुझे जेम्स कह कर ही पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा।” जेम्स ने मेरी बात पूरी कहने से पहले ही कह दिया।
मैं जानता था कि जेम्स वारन के पास कहने को बहुत कुछ है, जिसे उस ने अंदर दबा कर रखा है। ना जाने जेम्स ने कब से अपने उद्गार दबा कर रखे होंगे, ना जाने कब से अचेतन मन में पड़ी हुई सिसकती हुई पुरानी यादें चेतना पर आने के लिये संघर्ष कर रही होंगी किंतु किस के पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिए समय है? जेम्स ने एक आह सी भरी और कहना शुरू किया,
“मैं अकेला हूं। चार बैड-रूम के मकान की भांयभांय करती हुई दीवारों से पागलों की तरह बातें करता रहता हूं।” इतना कह कर जेम्स ने चश्मे को उतारा और उसे साफ़ कर के दोबारा बोलना शुरू किया।
‘ऐथल, यानी मेरी पत्नी, केवल सुंदर ही नहीं, स्वभाव से भी बहुत अच्छी थी। हम दोनों एक दूसरे की सुनते थे। उसके साथ दुख का आभास ही नहीं होता था तो दुख की पहचान कैसे होती?। मेरी माँ उस समय जीवित थी किंतु पिता मेरे बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे।
‘एक दिन पत्नी ने मुझे जो बताया उसे सुन कर मैं फूला न समाया था। पिता बनने की खबर ने मुझे ऐसे हवाई सिंहासन पर बैठा दिया जैसे एक बड़ा साम्राज्य मेरे अधीन हो। मेरी मां ने दादी बनने की खुशी में घर पर परिचितों को बुला कर पार्टी दे डाली। इस तरह ८ महीने आनंद से बीत गए। ऐथल ने अपने आफिस से अवकाश ले लिया था। मैं सारे दिन बच्चे और ऐथल के बारे में सोचता रहता।

‘एक रात जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी। बीच बीच में कभी कभी बिजली कौंध जाती और भयानक बिजली के कड़कने की गरजन हृदय को दहला देती। वह रात वास्तव में भयावह रात बन गई। ऐथल के ऐसा तेज़ दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था। मैंने एम्बुलैंस मंगाई और ऐथल की करहाटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुंच गया।
‘नर्सों ने एंबुलेंस से ऐथल को उतारा और तेजी से सी.आई.यू. में ले गईं। डॉक्टर ने ऐथल की हालत जांच कर कहा कि शीघ्र ही आप्रेशन करना पड़ेगा। अंदर डॉक्टर और नर्सें ऐथल और बच्चे के जीवन और मौत के बीच अपने औज़ारों से लड़ते रहे, बाहर मैं अपने से लड़ता रहा। काफी देर के बाद एक नर्स ने आकर बताया कि तुम एक लड़के के पिता बन गये हो। खुशी में एक उन्माद सा छागया। नर्स को पकड़ कर मैं नाचने लगा। नर्स ने मुझे ज़ोर से झंजोड़ सा दिया पर मेरा हाथ जोर से दबाए रही। कहने लगी,”मिस्टर वारन, मुझे बहुत ही दुख से कहना पड़ रहा है कि डाक्टरों की हर कोशिश के बाद भी आपकी पत्नि नहीं बच सकी।” मेरे पावों से नीचे की धरती सी खिसक गई।आज पता चला कि दुःख क्या होता है!”
जेम्स ने आंखों से चश्मा उतार कर फिर साफ किया। उसकी आंखें आंसुओं के भार को संभाल ना पाई। एक लम्बी सांस छोड़ी और इस वेदना भरी कहानी जारी करते हुए कहा, “माँ पोते की खुशी और ऐथल की मृत्यु की पीड़ा में समझौता कर जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश करने लगी। मेरी माँ बड़ी साहसी थीं। उन्होंने बच्चे का नाम विलियम वारन रखा क्योंकि विलियम ब्लेक, ऐथल का मनपसंद लेखक था।

‘इसी तरह ८ वर्ष बीत गए। माँ बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। एक दिन वह भी विलियम को मुझे सौंप कर इस संसार से विदा लेकर चली गई। उस दिन से विलियम के लिये मैं ही माँ, दादी और पिताके कर्तव्यों को पूरी जिम्मेदारी से निभाता। उसे प्रातः नाश्ता देकर स्कूल छोड़ कर अपने दफ्तर जाता। वहां से भी दिन के समय स्कूल में फोन पर उसकी टीचर से उसका हाल पूछता रहता। विलियम की उंगली में जरा सी चोट लग जाती तो मुझे ऐसा लगता जैसे मेरे सारे शरीर में दर्द फैल गया हो।
‘इतने लाड़ प्यार में पलते हुए वह १८ वर्ष का हो गया। ए-लैवल की परीक्षा में ए ग्रेड में पास होने की खबर सुन कर मैं इतना खुश हुआ कि सीधे ऐथल की फोटो के सामने जाकर न जाने कितनी देर तक उससे बातें करता रहा। जब ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी से ऑनर्स की डिग्री पास की तो मेरे आनंद का पारावार न था।
‘विलियम की गर्लफ्रैंड जैनी जब भी उसके साथ हमारे घर आती तो मैं खुशी से नाच पड़ता। जैनी और विलियम का विवाह उसी चर्च में संपन्न हुआ जहां मेरा और ऐथल का विवाह हुआ था। एक वर्ष के पश्चात ही वलियम और जैनी ने मुझे दादा बना दिया। उस दिन मुझे माँ और ऐथल की बड़ी याद आई। मेरी आंख भर आई! पोते का नाम जॉर्ज वारन रखा। हंसते खेलते एक साल बीत गया। इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था।

“डैडी, जैनी और मुझे कंपनी एक बहुत बड़ा पद देकर आस्ट्रेलिया भेज रही है। वेतन भी बहुत बढ़ा दिया है, मकान, गाड़ी, हवाई जहाज़ की यात्रा के साथ कंपनी जॉर्ज के स्कूल का प्रबंध आदि सुविधाएं भी दे रही है”, विलियम ने बताया तो मेरी आंखें खुली ही रह गईं। यह सब सुन कर मैं धम्म से सोफे पर धंस गया तो विलियम मेरा आशय समझ मुसकरा कर कहने लगा, “डैडी, आप अकेले हो जाएंगे। हम दोनों यह प्रस्ताव अस्वीकार कर देंगे। वैसे तो यहां भी सब कुछ है।”‘मैंने अपने आपको संभाला और कहा कि वाह, मेरा बेटा और बहू इतने बड़े पद पर जारहे हैं। मेरे लिए तो यह गर्व की बात है। सच, मुझे इससे बड़ी खुशी क्या होगी?” जाने की तैयारियां होने लगीं। दिन तो बीत जाता पर रात में नींद न आती। कभी विलियम और जैनी तो कभी जार्ज के स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती।

‘वह दिन भी आ ही गया जब लंदन एयरपोर्ट पर विलियम, जैनी और जॉर्ज को विदा कर भीगे मन से घर वापस लौटना पड़ा। विलियम और जैनी ने जातेजाते भी अपने वादे की पुष्टि की कि वे हर सप्ताह फोन करते रहेंगे और मुझ से आग्रह किया कि मैं उनसे मिलने के लिए आस्ट्रेलिया अवश्य जाऊं। वे टिकट भेज देंगे। मन में उमड़ते हुए उद्गार मेरे आंसुओं को संभाल ना पाए। जार्ज को बार बार चूमा। एअरपोर्ट से बाहर आने के बाद वापस घर लौटने के लिए दिल ही नहीं करता था। कार को दिन भर दिशाहीन घुमाता रहा। शाम को घर लौटना ही पड़ा। दीवारें खाने को आरही थीं। सामने जॉर्ज की दूध की बोतल पड़ी थी, उठा कर सीने से चिपका ली और ऐथल की तस्वीर के सामने फूट फूट कर रोया,
“देख रही है ऐथल, मैं कहा करता था लोगों को जरा सा दुख होता है तो भड़म्बा बना देते हैं। आज पता लगा कि दुख कितना तड़पा देता है।”
‘चार दिन के बाद फोन की घण्टी बजी तो दौड़ कर रिसीवर उठाया,”हैलो डैडी!”

यह स्वर सुनने के लिए कब से बेचैन था। मैं भर्राये स्वर में बोला,
“तुम सब ठीक हो न, जॉर्ज अपने दादा को याद करता है कि नहीं?” मैं यह भी भूल गया कि गोद का बच्चा क्या याद करेगा और क्या भूलेगा। जैनी से भी बात की और यह जान कर दिल को बड़ा सुकून हुआ कि वे सब स्वस्थ और कुशलपूर्वक हैं।
‘विलियम ने टेलीफोन को जॉर्ज के मुंह के आगे कर दिया, तो उसके ‘आंउ आंउ’ की आवाज़ ने कानों में अमृत सा घोल दिया। थोड़ी देर बाद फोन पर वो आवाज़ें बंद हो गईं।
‘तीन माह तक उनके टेलीफोन लगातार आते रहे, किंतु उसके बाद यह गति धीमी हो गई। मैं फोन करता तो कभी कह देता कि दरवाज़े पर कोई घंटी दे रहा है और फोन काट देता। बातचीत शीघ्र ही समाप्त हो जाती। छः महीने इसी तरह बीत गए। कोई फोन नहीं आया तो घबराहट होने लगी।
‘एक दिन मैंने फोन किया तो पता लगा कि वे लोग अब सिडनी चले गए हैं। यह भी कहने पर कि मैं उसका पिता हूं, नए किरायेदार ने उसका पता नहीं दिया। उसकी कंपनी को फोन किया तो पता चला कि उसने कंपनी की नौकरी छोड़ दी थी। यह जान कर तो मेरी चिंता और भी बढ़ गई थी। वे लोग कहां थे, काम कहां कर रहे थे, कुछ पता नहीं लगा।

‘मेरा एक मित्र आर्थर छुट्टियां मनाने तीन सप्ताह के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था। मैं ने उसे अपनी समस्या बताई तो बोला कि वह दो दिन सिडनी में रहेगा और यदि विलियम का पता कहीं मिल गया तो मुझे फोन कर के बता देगा। आर्थर का फोन नहीं आया। तीन सप्ताहों की अंधेरी रातें अंधेरी ही रहीं। तीनों की फोटो बत्ती की रोशनी में निहारता रहता। देखता रहता कि जॉर्ज की आंखें ऐथल की तरह नीली थी, उसकी नाक विलियम और मेरी तरह की, ललाट और मुंह पर जैनी की झलक दिखाई देती थी। कल्पना-लोक में विचरता रहता, कल्पना में ही कभी उस अनजाने देश के समुद्र के किनारों पर उन्हें ढूंढता,कल्पना में ही कभी वहां के बाजारों में पागलों की तरह लोगों के चेहरे देखते रहता कि कहीं कोई चेहरा विलियम या जैनी का ना दिख जाए। यह सब मेरा पागलपन ही तो था। ‘तीन सप्ताह के पश्चात जब आर्थर वापस आया तो आशा दुख भरी निराशा में बदल गई। विलियम और जैनी उसे एक रेस्तरां में मिले थे किंतु वे किसी आवश्यक कार्य के कारण जल्दी में अपना पता, टेलीफोन नंबर यह कह कर नहीं दे पाए कि शाम को डैडी को फोन करके नया पता आदि बता देंगे। ‘उसके फोन की आस में अब हर शाम टेलीफोन के पास बैठ कर ही गुज़रती है। जिस घण्टी की आवाज़ सुनने के लिए इन छः सालों से बेज़ार हूं, वह घण्टी कभी नहीं सुनी। हो सकता है कि उसे डर लगता हो कि कहीं बाप आस्ट्रेलिया ना धमक जाए, बूढ़े से काम तो होगा नहीं, उसका काम भी करना पड़ेगा और वैसे भी बूढ़े और युवकों का मेल इस देश में कहां निभता है?”

जेम्स ने एक लंबी सांस ली। मुझ से पता पूछा तो मैं ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर दे दिया और बोला, “जेम्स, किसी भी समय मेरी जरूरत हो तो बिना झिझक के मुझे फोन कर देना। आइए, मैं आपको आप के घर छोड़ देता हूं। मेरी कार बराबर की गली में खड़ी है।’ “धन्यवाद! मैं पैदल ही जाऊंगा क्योंकि इस प्रकार मेरा व्यायाम भी हो जाता है।” डबडबाई आंखों से विदा लेकर अपनी छड़ी के सहारे चल दिया।

— —- —- —-
घर आने पर देखा तो डाक में कुछ चिट्ठियां पड़ी थीं। मैंने कोर्बी टाउन के एक स्कूल में गणित विभाग के अध्यक्ष के पद के लिये इन्टर्वियू दिया था। पत्र खोला तो पता चला कि मुझे नियुक्त कर लिया गया है। नये स्कूल के लिये अपनी स्वीकृति भेज दी। जाने में केवल एक सप्ताह शेष था। जाते हुए जेम्स से विदा लेने के लिए उसके मकान पर गया पर वह वहां नहीं था। पड़ौसी से पता लगा कि अस्पताल में भरती है। इतना समय नहीं था कि अस्पताल में जाकर उसका हाल देख लूं।

एक दिन की मुलाकात मस्तिष्क की चेतना पर अधिक समय नहीं टिकी। समय के साथ मैं जेम्स को बिल्कुल भूल गया।

वकील के पत्रानुसार नियत समय पर जेम्स के घर पर पहुंच गया। उसी दरवाजे पर घण्टी का बटन दबाया जहां से ३० साल पहले जेम्स से मिले बिना ही लौटना पड़ा था। आज बड़ा विचित्र सा लग रहा था। लगभग ४५ वर्षीय एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला। मैंने अपना और सीमा का परिचय दिया तो वकील ने भी अपना परिचय देकर हमें अंदर ले जा कर लाउंज में एक सोफे पर बैठा दिया, वहां तीन पुरुष और एक महिला पहले ही मौजूद थे। मि. मार्टिन ने हम सब का परिचय कराया। एक सज्जन आर.एस.पी.सी.ए. (दि रॉयल सोसायटी फॉर दि प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टु ऐनिमल्स) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अन्य तीन, विलियम वारन (जेम्स वारन का पुत्र), उसकी पत्नी जैनी वारन तथा जेम्स का पौत्र जॉर्ज वारन थे जो आस्ट्रेलिया से आए थे। उनमें से कोई भी जेम्स के अंतिम संस्कार में सम्मलित नहीं हुआ था। बाईं ओर छोटे से नर्म गद्दीदार गोल बिस्तर में एक बड़ी प्यारी सी काली और सफेद रंग की बिल्ली कुंडली के आकार में सोई पड़ी थी, जिसका नाम ‘विलमा’ बताया गया।

मार्टिन ने अपनी फाइल से वसीयत के कागज़ निकाल कर पढ़ना शुरू किए। अपनी संपत्ति के वितरण के बारे में कुछ कहने से पहले जेम्स ने अपनी सिसकती वेदना का चित्रण इन शब्दों में किया था: “लगभग ४ दशक पहले मेरे अपने बेटे विलियम और उसकी पत्नी जैनी ने लंदन छोड़ कर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया। मैं फोन पर अपने पोते और इन दोनों की आवाज़ सुनने को तरस गया। मैं फोन करता तो शीघ्र ही किसी बहाने से काट देते और एक दिन इस फोन ने मौन धारण
कर यह सहारा भी छीन लिया। किसी कारण स्थानांतरण होने पर बेटे ने मुझे नए पते या टेलीफोन नंबर की सूचना तक नहीं दी। मैं इस अकेलेपन के कारण तड़पता रहा। कोई बात करने वाला नहीं था। कौन बात करेगा, जिसका अपना ही खून सफेद हो गया हो।

‘६ साल जीभ बिना हिले पड़ी पड़ी बेजान हो गई थी कि एक दिन एक भारतीय सज्जन राकेश वर्मा ने पार्क में इस मौन व्यथा को देखा और समझा। मेरे उमड़ते हुए उद्गारों को इस अनजान आदमी ने पहचाना। विडम्बना यह रही कि वह भी व्यक्तिगत कारणवश लंदन से दूर चले गये।

‘राकेश वर्मा के साथ एक दिन की भेंट मेरे सारे जीवन की धरोहर बन यादों में एक सुकून देती रही, फिर इस भयावह अकेलेपन ने धीरेधीरे भयानक रूप ले लिया। आयु और शारीरिक रोगों के अलावा मानसिक अवसाद ने भी मुझे घेर लिया।

‘इस अभिशप्त जीवन में एक आशा की लहर मेरे मकान के बाग में न जाने कहां से एक बिल्ली के रूप में आगई। कौन जाने इसका मालिक भी देश छोड़ गया हो और इसे भी इसके भाग्य पर मेरी तरह ही अकेला छोड़ गया हो! बिल्ली को मैंने एक नाम दिया - ‘ विलमा ‘।

‘दो-तीन दिनों में विलमा और मैं ऐसे घुलमिल गए जैसे बचपन से हम दोनों साथ रहे हों। मैं उसे अपनी कहानी सुनाता और वह ‘मियाऊंमियाऊं’ की भाषा में हर बात का उत्तर देती। मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जॉर्ज से बात कर रहा हूं। विल्मा को खाना खिलाता, उसके साथ एक रस्सी को घुमा कर बिल्ली-चूहे का खेल खेलता तो मेरी आंखों के सामने जॉर्ज की सूरत नाचने लगती। विल्मा कभी मेरे साथ मेरे पांव की ओर सोने की जिद्द करती तो मुझे बड़ा अच्छा लगता था।
‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जॉर्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था। मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा। अगले दिन वह वापस आगई। बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा।

मैंने उसे गोद में उठा कर बहुत प्यार किया और उससे शिकायत भी करता रहा। वह मेरे पांव में पूंछ लगा लगा कर जैसे क्षमा मांग रही हो।
‘विलमा के संग रहने से मेरे मानसिक अवसाद में इतना सुधार हुआ जो अच्छी से अच्छी दवाओं से नहीं हो पाया था। उसने मुझे एक नया जीवन दिया। वह कब क्या चाहती है, मैं हर बात समझ लेता था - ये सब वर्णन से बाहर है, केवल अनुभूति ही हो सकती है।”

विलियम, जैनी और जॉर्ज, तीनों के चेहरों पर उतार चढ़ाव कभी रोष तो कभी पश्चाताप के लक्षणों का स्पष्टीकरण कर रहे थे। जेम्स ने अपनी वसीयत में मुख्य रूप से कहा था कि मेरी सारी चल और अचल सम्पत्ति में से समस्त टैक्स तथा हर प्रकार के वैध खर्च, बिल आदि देने के बाद शेष बची धन-राशि का इस प्रकार वितरण किया जायेः

‘मिस्टर राकेश वर्मा , जिनका पुराना पता था: २३ रैले ड्राइव, वैटस्टोन, लन्दन एन २०, को दो हजार पौण्ड दिये जाएं और उनसे मेरी ओर से विनम्रतापूर्वक कहा जाए कि यह राशि उनके उस एक दिन का मूल्य ना समझा जाए जिस के कारण मेरे जीवन के मापदण्ड ही बदल गये थे। उन अमूल्य क्षणों का मूल्य तो चुकाने की सामर्थ्य किसी के भी के पास ना होगी। यह क्षुद्र रकम मेरे उद्गारों का केवल टोकन भर है। मेरे उक्त वक्तव्य से, स्पष्ट है कि विलियम वारन, जैनी वारन या जॉर्ज वारन इस सम्पत्ति के उत्तराधिकार के अयोग्य हैं।”
वकील कहते कहते कुछ क्षणों के लिए रुक गया। विलियम, जैनी और जॉर्ज की मुखाकृति पर एक के बाद एक भाव आजा रहे थे। वे कभी आंखें नीची करते हुए दांत पीसते तो कभी अपने कठोर व्यवहार पर पश्चात्ताप करते। विलियम अपने क्रोध को वश में ना रख सका और खड़े होकर सामने रखी मेज़ पर ज़ोर से हाथ मार कर जाने को खड़ा हो गया तो जैनी ने उसे समझाबुझा कर बैठा लिया। तीनो मेरी ओर वैमनस्य-भरी दृष्टि से घूरते रहे।

वकील ने पुनः वसीयत पढ़नी शुरू की तो यह जानकर सभी आश्चर्यचकित हो गये कि शेष समस्त सम्पत्ति विलमा बिल्ली के नाम कर दी गई थी और साथ ही कहा गया था कि आर.एस.पी.सी.ए. को ‘विलमा’ के शेष जीवन के पालनपोषण का अधिकार दिया जाए और इसी संस्था को प्रबंधक नियुक्त किया जाए। साथ ही एक सूची थी जिसमें विलमा को जेम्स किस प्रकार रखता था, उसका पूरा वर्णन था। आगे लिखा था,
‘विलमा के निधन पर एक स्मारक बनाया जाए। उसके बाद शेष धन को राह भटके हुए, प्रताड़ित पशुओं की दशा के सुधारने पर व्यय किया जाए।
मैंने मार्टिन से कहा, “यदि आप अनुमति दें तो ये दो हजार पौण्ड, जो वसीयत के अनुसार जेम्स वारन मुझे दे रहें हैं, इस राशि को भी ‘विलमा’ की वसीयत की राशि में ही मिला दें तो मुझे हार्दिक सुख मिलेगा।”
वकील ने कहा,” इस को विधिवत बनाने में थोड़ी अड़चन आ सकती है। हां, इसी राशि का एक चेक आर.एस.पी.सी.ए. को अपनी इच्छानुसार देना अधिक सुगम होगा।” मेरे इन शब्दों को सुनते ही विलियम लज्जा से आंखें नीची करके कुछ कहने लगा जो मैं स्पष्ट रूप से सुन नहीं सका।
अंत में औपचारिक शब्दों के साथ मार्टिन ने वसीयत बंद कर बैग में रखली। बिल्ली, जो अभी भी सारी कारवाही से अनजान सोई हुई थी, आर.एस.पी.सी.ए. के प्रतिनिधि को सौंप दी गई। इस प्रकार वकील का भी प्रतिदिन विलमा की देखरेख का भार समाप्त होगया। सब मकान से बाहर आगए।

मैंने सीमा से कहा कि मैं तुम्हें उस मकान पर लेजाता हूं जहां लंदन में विवाह से पहले रहता था। कार दस मिनट में २३ रैले ड्राइव के सामने पहुंच गई। कार एक ओर खड़ी की और ना जाने क्यों बिना सोचेसमझे ही उंगली उस मकान की घंटी के बटन पर दबा दी।
एक अंग्रेज़ बूढ़े ने छोटे से कुत्ते के साथ दरवाजा खोला। कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया। मैंने उस वृद्ध को बताया कि लगभग ३० वर्ष पहले मैं इस मकान में किराएदार था। बस, इधर से गुजर रहा था तो पुरानी याद आगई…।” इस से पहले कि मैं आगे कुछ कहता, बूढ़े ने बड़े रूखेपन से कहना आरम्भ कर दिया।
” यदि तुम इस मकान को खरीदने के विचार से आए हो तो वापस चले जाओ। इन दीवारों में केरी और चार्ल्स की यादें बसी हुई हैं। चार्ल्स की माँ, मेरी पत्नि तो मुझे कब की छोड़ गई।….चार्ली अमेरिका से एक दिन अवश्य आएगा।… हां, कहीं उसका फोन ना आजाये?”
इतना कहतेकहते उस ने दरवाजा बंद कर लिया। अंदर से कुत्ता अभी भी भौंक रहा था।
सीमा की दृष्टि दरवाजे पर अटकी हुई थी, कह रही थी, “एक और जेम्स वारन !”
- महावीर शर्मा

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

February 17, 2008

वैलंटाइन के अंतिम दिन

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 8:17 pm

‘वैलंटाइन के अंतिम दिन’
महावीर शर्मा

वैलंटाइन कारागार की कोठरी में फ़र्श पर बैठा हुआ था। जीवन के अंतिम दिनों को गिनते हुए आने वाली मौत की कल्पना से हृदय की धड़कनों की गति को संभालना कठिन हो रहा था। बाहर खड़े लोग खिड़की की सलाखों में से फूल बरसा रहे थे, उसकी रिहाई के नारों से चारों दिशाएं गूंज रही थीं। उसी समय सैनिकों की एक टुकड़ी ने आकर बिना चेतावनी दिए ही इन निहत्थे लोगों पर डंडों की वर्षा कर, भीड़ को तितर बितर कर दिया।

वैलंटाइन गहरी चिंता में सिर को नीचे किए बैठा हुआ था। अचानक दरवाज़ा खुला तो देखा कि कारापाल एक युवती के साथ कोठरी के अंदर प्रवेश कर रहे थे। कारापाल ने वैलंटाइन को अभिवादन कर नम्रता के साथ कहा, ‘पादरी, यह मेरी बेटी जूलिया है। आप विद्वान हैं। आप धर्म, गणित, विज्ञान, अर्थ-शास्त्र जैसे अनेक विषयों के भंडार हैं। अपने अंतिम दिनों में यदि आप जूलिया को इस असीम ज्ञान का कुछ अंश सिखा सकें तो आजीवन आभारी रहूंगा। सम्राट क्लॉडियस की क्रूरता को कौन नहीं जानता, मैं उसके नारकीय निर्णय में तो हस्तक्षेप नहीं कर सकता किंतु आप जब तक इस कारागार में समय गुजारेंगे, उस समय तक आपकी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।’

वैलंटाइन की भीगी आंखें जूलिया की आंखों से टकराईं किंतु जूलिया के चेहरे के भाव-चिन्हों में कोई बदलाव नहीं आया। जेलर ने बताया कि जूलिया आंशिक रूप से अंधी है। उसे बहुत ही कम दिखाई देता है। अगले दिन की सांय का समय निश्चित होने के बाद जूलिया और जेलर चले गए। दरवाज़ा पहले की तरह बंद हो गया। इसी प्रकार जूलिया हर शाम वैलंटाइन से शिक्षा प्राप्त करती रही।

उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
“मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।”

यह घटना तीसरी शताब्दी के समय की है। रोमन काल में सम्राट क्लॉडियस द्वितीय की क्रूरता से दूर दूर देशों के लोग तक थर्राते थे। उसकी महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं था। वह चाहता था कि एक विशाल सेना लेकर समस्त संसार पर रोमन की विजय-पताका फहरा दे। उसके समक्ष एक कठिनाई थी। लोग सेना में भर्ती होने से इंकार करने लगे क्योंकि वे जानते थे कि क्लॉडियस की वजय-पिपासा कभी समाप्त नहीं होगी, सारा जीवन विभिन्न देशों में युद्ध करते करते समाप्त हो जाएगा। अपने परिवार और प्रिय-जनों से एक बार विलग होकर कभी भी मिलने का अवसरनहीं मिलेगा।

इसी कारण, क्लॉडियस ने रोम में जितने भी विवाह होने वाले थे , रुकवा दिए। शादियां अवैध करार कर दी गईं। पति या पत्नी शब्द का अब कोई अर्थ नहीं रहा। जनता में चिंता की लहर दौड़ गई। यदि कोई विवाह करता पकड़ा जाता तो उसके साथ विवाह सम्पन्न करने वाले पादरी को भी कड़ा दण्ड दिया जाता। युवक उनकी इच्छा के विरुद्ध सेना में भर्ती कर लिए गए। कितनी ही युवतियों ने अपने प्रियतम के विरह में मृत्यु को गले लगा लिया।

प्रथा के अनुसार लड़के और लड़कियां अलग रखे जाते थे। 14 फरवरी के दिन विवाह की देवी ‘जूनो’ के सम्मान में नगर के सब व्यवसाय बंद कर दिए जाते थे। अगले दिन 15 फरवरी को ‘ल्यूपरकेलिया’ का उत्सव मनाया जाता और सांय के समय रोमन लड़कियों के नाम कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर एक

प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

बड़े बर्तन में रख दिए जाते। युवक बारी बारी एक पर्ची निकालते और उत्सव के दौरान वह उसी लड़की का साथी बना रहता। यदि साझेदारी प्यार में बदल जाती तो दोनों चर्च में जाकर विवाह-बंधन में बंध जाते। क्लॉडियस के इस निराधार कानून के कारण ल्यूपरकेलिया का यह त्यौहार समाप्त होगया।

वैलंटाइन ने प्रेमियों के दिलों में झांक कर उनकी व्यथा को देखा था। जानता था कि हृदयहीन क्लॉडियस का यह कानून अमानवीय था, प्रकृति के प्रतिकूल था, सृष्टि यहीं रुक जाएगी! पादरी होने के नाते, वैलंटाइन सेंट मेरियस के सहयोग से इस कानून की अवेहलना करते हुए अपने चर्च में गुप्त-रूप से युवक और युवतियों के विवाह करवाते रहे।

एक अंधेरी रात में जब चंद्रमा अपनी चांदनी के साथ शयन कर रहा था, झंझावात के साथ मूसलाधार वर्षा ने मानो सारे नगर को डुबोने की ठान ली हो। सेंट मेरियस उस रात कार्यवश कहीं दूर चले गए थे। वैलंटाइन मोमबत्ती के धीमे से प्रकाश में एक युवक और युवती के विवाह की विधि संपूर्ण ही कर पाए थे, क्लॉडियस के सैनिकों के पदचाप सुनाई दिये। वैलंटाइन ने दोनों को चर्च के पिछले द्वार से निकालने का प्रयत्न किया किंतु जब तक सैनिक आ चुके थे, दोनों वर-वधू को को एक दूसरे से अलग कर दिया गया। वे दोनों कहां गए, उनका क्या हुआ, कोई नहीं जानता।

वैलंटाइन को कारागार में डाल दिया। उसे मृत्यु-दण्ड की सज़ा दी गई। उसके जीवन लीला की समाप्ति के लिए
१४ फरवरी सन् 270 ई० का दिन निश्चित कर दिया गया।

एक दिन पहले जूलिया वैलंटाइन से मिली, आंखें रो रो कर सूज गई थीं। इतने दिनों में दोनो के दिलों में पवित्र प्रेम की लहर पैदा हो चुकी थी। उसी लहर ने उसके मनोबल को बनाए रखा। जूलिया के इन आंसुओं में दृष्टि के विकार भी बह गए थे। उसकी आंखें पहले से अधिक देखने के योग्य हो गईं। दोनों एक दूसरे से लिपट गए। वैलंटाइन ने मोमबत्ती की लौ को देख कर कहा,’ जूलिया,शमा की इस लौ को जलाए रखना। मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। एक दिन क्लॉडियस स्वयं अपने ही बनाये हुए कानून के जाल में फंस जाएगा। प्रेम कभी किसी का दास नहीं होता।’

थोड़ी देर के पश्चात जेल के दो सैनिकों ने आकर पादरी को प्रणाम किया और आदर सहित जूलिया को घर पहुंचा दिया।

वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही।

ज़िंदगी की अंतिम रात वैलंटाइन ने कुछ कोरे कागज़ और एक कलम मंगवाए। कागजों में कुछ लिखता और फिर मोमबत्ती की लौ में जला देता। केवल एक कागज़ बचा हुआ था। उस कोरे कागज़ को आंखों से लगाया, फिर दिल के पास दबाए रखा। कलम उठाई, उस में कुछ लिखा और नीचे लिखा - “तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित।” उसकी आंखों से दो आंसू ढुलक गए जो जमीन पर न गिर कर उस प्रेम-पत्र में समा गए। प्रहरी को बुला कर कहा, ‘ मेरे मरने के बाद यदि इस पत्र को जूलिया तक पहुंचा दो तो मरने के बाद भी मेरी आत्मा आभारी रहेगी।” प्रहरी के नेत्र सजल हो उठे, कहने लगा, ‘पादरी, आप का जीवन बहुत मूल्यवान है। अभी भी मैं कोई उपाय सोचता हूं जिससे आप को कारागार से निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाए। इस शुभ-कार्य में मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है।’
वैलंटाइन ने रोक कर कहा, “मेरे इस कार्य में कायरता की मिलावट की बात ना करो। मेरे बाद अनेक वैलंटाइन पैदा होंगे जो प्रेम की लौ जलाए रखेंगे।” प्रहरी ने कागज़ लेकर गीली आंखों को पोंछते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया।

अगले दिन नगर-द्वार के पास, जो आज उसकी स्मृति में पोर्टा वैलटीनी नाम से विख्यात है, अनगिनित लोगों की भीड़ थी। जनता के चारों ओर सशस्त्र सैनिक तैनात थे। सैनिक वैलंटाइन को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ कर मृत्यु-मंच पर ले आए। लोगों के नारों से गगन गूंज रहा था, जमीन आंसुओं से भीग गई थी। उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
‘ मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।” भीड़ में किसी युवक ने भर्राये हुए स्वर में कहा, ‘इस हृदय-विदारक घटना को सुन कर कौन सा पत्थर-दिल इनसान होगा जो शोक, खेद और संताप रहित इस
उत्सव को मना सकेगा।’ साथ ही एक बूढ़े ने युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,’प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।’

वैलंटाइन को मंच पर रखे हुए तख्ते पर लिटा दिया गया। चार जल्लाद हाथों में भारी भारी दण्ड लिए हुए थे। पांचवे जल्लाद के हाथ में एक पैनी धार का फरसा था। दण्डाधिकारी ने ऊंचे स्वर में वैलंटाइन से कहा,

‘वैलंटाइन, तुमने रोमन विधान की अवेहलना कर लोगों के विवाह करवा कर सम्राट क्लॉडियस का अपमान किया है। यह एक बहुत बड़ा अपराध है, पाप है जिसके लिए एक ही सज़ा है - निर्मम मृत्यु-दण्ड! तुम यदि अपने अपराध को स्वीकार कर लो तो फरसे से एक ही झटके से तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा और तुम्हारी मौत कष्टरहित होगी। यदि अपना अपराध स्वीकार नहीं करोगे तो इस बेरहमी से मारे जाओगे कि मौत के लिए याचना करोगे पर वो सामने नाच नाच कर तुम्हारे अपराध की याद दिलाती रहेगी।”

वैलंटाइन के मुख पर भय के कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहे थे। उसने दृढ़तापूर्वक कहा,

‘ मैंने कोई अपराध नहीं किया है। दो प्रेमियों को विवाह-बंधन में जोड़ना मेरा धर्म है, पाप नहीं है।” चारों ओर से एक ही आवाज़ आ रही थी - “वैलंटाइन निर्दोष है।”

दण्डाधिकारी का इशारा देखते ही चारों जल्लादों ने दण्ड को घुमा घुमा कर वैलंटाइन को मारना शुरू कर दिया। दर्शकों की चीखें निकल गई, कुछ तो इस दृश्य को देख कर मूर्छित होगए। जनता के हाहाकार, क्रंदन और चीत्कार के शोर के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता था। एक बार तो जल्लादों के पाषाण जैसे हृदय भी पिघलने लगे। थोड़ी ही देर में सब समाप्त हो गया। वैलंटाइन का निर्जीव शव रक्त से रंगा हुआ था।
वैलंटाइन का शव रोम के एक चर्च में दफना दिया गया जो आज ‘चर्च आव प्राक्सिडिस’ के नाम से प्रसिद्ध है।

जूलिया में इतना साहस न था कि वह इस अमानवीय वीभत्स दृश्य को सहन कर सके। वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही। उसी समय कारागार के प्रहरी ने आकर जूलिया को वैलंटाइन का लिखा पत्र देते हुए कहा, ‘पादरी ने कल रात यह पत्र आपके लिए लिखा था।’
प्रहरी आंखों को पोंछता हुआ चला गया। जूलिया ने पत्र खोला तो वैलंटाइन के अमोल आंसू के चिन्ह ऐसे दिखाई
दे रहे थे जैसे वैलंटाइन की आंखें अलविदा कह रही हों। बार बार पढ़ती रही जब तक आंसुओं से पत्र भीग भीग कर गल गया। पत्र के अंत में लिखा थाः
‘तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित!’

*** *** *** *** *** *** ***
महावीर शर्मा

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

June 25, 2007

शीत लहर - कहानी

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा — महावीर @ 10:56 pm

दिल्ली में एक पुल के नीचे पटड़ियों पर एक ओर ११ और दूसरी ओर १० व्यक्ति जीवन- यातना भुगत रहे हैं। शयनागार, रसोई, कारोबारालय, चौपाल - सभी कुछ इसी में समाये हुए हैं। ना दरवाज़े हैं, ना खिड़की हैं, ताले का तो प्रश्न ही नहीं होता।

इन में कुछ पुरुष और कुछ स्त्रियां हैं और एक स्त्री की गोद में एक बच्चा भी है। इन लोगों की जाति क्या है? ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय,शूद्र या दलित वर्ग में तो यह लोग आ नहीं सकते। जाति-वर्गित लोगों को तो लड़ाई झगड़ा करने का, ऊंच और नीच दिखाने का, आरक्षण का, फूट डलवा कर देश में दंगा फ़साद करवाने का और फिर अवैध युक्तियों से अपने बैंक बैलेंस को फुलाने का, अनेक सामाजिक, असामाजिक, वैध या अवैध अधिकार हैं। इन २१ व्यक्तियों को तो ऐसा एक भी अधिकार नहीं है तो इनकी जाति कैसे हो सकती है!

तो फिर ये लोग कौन हैं? इनके नाम हैं - भिखारी, कोढ़ी, लंगड़ा, अंधा, भूखा-नंगा, अपंग, भुखमरा, कंगला, और गरीब होने के कारण इनके तीन नाम और भी हैं क्योंकि कहते हैं,
“गरीबी तेरे तीन नाम; लुच्चा, गुंडा, बेईमान!!”

हां, वह जो बीच में बैठी हुई जवान सी औरत है, उसका नाम है ‘झबिया’। उसकी गोद में जो नन्हा सा बालक है, उसे ये लोग ‘ललुआ’ कह कर पुकारते हैं। पिता का नाम ना ही पूछा जाए तो उचित होगा क्योंकि कभी कभी कुछ विषम स्थिति में असली नाम बताना किसी गोपनीय मृत्यु-दण्ड जैसे अंजाम तक भी पहुंचा सकता है।
झबिया की क्या मजाल है कि कह सके कि उसकी गोद में इस हड्डियों के ढांचे पर पतली सी खाल का आवरण लिए हुए नन्हे से बच्चे का पिता नगर के प्रतिष्ठित नेता का जवान सुपुत्र है।
*** *** *** ***

उस दिन अमावस्या की रात थी जब वह अपनी चमचमाती कार खड़ी करके बाहर निकला था तो झबिया ने केवल इतना ही कहा था,
“साब, भूकी हूं, कुछ पैसे दे दो। भगवान आपका भला करें!”
शराब का हलका सा नशा, अंधी जवानी का जोश और नेतागीरी के आगे गिड़गिड़ाता हुआ कानून -बस उसने झबिया को घसीट कर कार में खींच लिया। झबिया ने तो केवल भूखे पेट भरने को दो रोटी के लिए कुछ पैसे मांगे थे, ना कि यह मांगा था कि अपने उदर में उसका बच्चा लेकर उसको भी भूख से मरता देखती रहे!
*** *** *** ***

गर्मियों की चिलचिलाती हुई धूप, बरसात की तूफानी बौछारें और कंपकंपा देने वाली सर्दियां इन पुलों के नीचे रहने वाले बिन वोटों के नागरिकों के जीवन को अगले मौसम को सौंप कर चल देती हैं।
इस बार तो ठण्ड ने कई वर्षों का रिकार्ड तोड़ डाला। ये कंपकंपाते हुए अभागे बिजली के खम्बों की
रोशनी पर टकटकी लगाए हुए हैं। शायद इतनी दूर से बिजली के बल्ब से ही कुछ गर्मी उन तक पहुंच जाए!

हिमालय की पर्वत-शृंखलाओं से शिशिर ऋतु की डसने वाली बर्फीली शीत लहर गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से टक्कर खाती हुई हार मानकर खिसियाई बिल्ली की तरह इन जीवित लाशों पर टूट पड़ी। इन निरीह निःस्सहाय अभागों ने बचाव के लिए कुछ यत्न करने का प्रयास किया जैसे कंपकंपी, चिथड़े, कोई फटी पुरानी गुदड़ी या फिर एक दूसरे से सटकर बैठ जाना। इससे अधिक वे कर भी क्या सकते थे? सभी के दांत ठण्ड से कटकटा रहे थे जैसे सर्दी ध्वनि का रूप लेकर अपने प्रकोप की घोषणा कर रही हो। कुछ शोहदे बिगड़ैल छोकरे राह चलते हुए छींटाकशी से अपना ओछापन दिखाने से नहीं मानते-
“ऐसा लगता है जैसे मृदंग या पखावज पर कोई ताल चगुन पर बज रही है।” इन ठिठुरे हुए बेचारों के कानों के पर्दे सर्दी के कारण जम चुके हैं, कुछ सुन नहीं पाते कि ये छोकरे क्या कुछ कहकर हंसते हुए चले गए। यदि सुन भी लेते तो क्या करते? बस अपने भाग्य को कोस कर मन मसोस कर रह जाते!

झबिया की गोद में ललुआ ठिठुर कर अकड़ सा गया है, ना ठीक तरह से रो पाता है, ना ही ज्यादा हिल-डुल पाता है। माँ उसे सर्दी से बचाने के लिए अपने वक्ष का कवच देकर जोर से चिपका लेती है। ललुआ माँ के दूध-रहित स्तनों को काटे जारहा है। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से हार कर बड़े आवेग से एक बार फिर यह बर्फानी हवा का झोंका इन पराजित निहत्थों पर भीषण प्रहार कर अपनी खीज उतार रहा है।

एक गाड़ी इस हवा के झोंके की तीव्र गति को पछाड़ती हुई सड़क पर पड़े हुए बर्फीली पानी पर से
सरसराती हुई चली जाती है। कार के पहियों से उछलती हुई छुरी की तरह बर्फीली पानी की बौछारों से इन
लोगों के दातों की कटकटाहट भयंकर नाद का रूप लेलेती हैं। ललुआ ने अकस्मात ही झबिया के वक्ष को
काटना, चूसना बंद कर दिया, आंखें खुली पड़ी हैं, माँ की ओर टिकी हुई हैं जैसे पूछ रहा हो,
“माँ, मुझे क्यों पैदा किया था?”

झबिया उसे हिलाती-डुलाती है किंतु ललुआ के शरीर में कोई हरकत नहीं है। वह दहाड़ कर चीख़ उठती है। सभी की आंखें उसकी ओर घूम जाती हैं, बोलना चाहते हैं पर बोलने की शक्ति तो शीत-लहर ने छीन ली है!!

महावीर शर्मा

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

May 2, 2007

एक बेटी का अभागा पिता

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 6:11 pm

एक बेटी का अभागा पिता
लेखकः महावीर शर्मा
साभारः “कादम्बिनी” मार्च 2006

लन्दन
15 जुलाई, 2005

मेरी प्यारी बेटी
मेरे इस पत्र की तिथि देख कर तुम सोचती होगी कि इससे दो दिन पहले ही तो फ़ोन पर बात हुई थी,फिर यह पत्र क्यों?… बेटी, इस पत्र में जो कुछ लिख रहा हूं, वह फोन पर सम्भव नहीं था। इस पत्र की प्रेरणा मुझे दो बातों से मिली। सुबह सड़क पर गिरे कुछ काग़ज़ मिले जिन में किसी पिता के मर्म-स्पर्शी उद्‌गार भरे हुए थे। ऐसा लगा जैसे कि उसकी आत्मा उन्हीं काग़ज़ों के पुलिंदे के इर्द-गिर्द भटक रही हो। दूसरे, स्वर्गीय पं. नरेन्द्र शर्मा की पंक्तियों को पढ़ कर ह्रदय विह्वल हो उठा।

तुम जिस प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थीं, उसी के पास वुडसाइड पार्क ट्यूब स्टेशन के साथ वुडसाइड एवेन्यू पर प्रायः घूमने जाता हूं जहां दोनो ओर सुन्दर वृक्षों की शृंखला है और रास्ते में वही स्कूल तुम्हारे बचपन की यादें ताज़ा करता रहता है। उसी समय पर एक पुलिस ऑफिसर भी प्रतिदिन गश्त पर मिल जाता है। बड़ा मिलनसार और स्वभाव से हंस-मुख है। वह मजाकिया भी है। आज रोज़ की तरह सुबह सैर के लिये उसी वुडसाइड एवेन्यू पर जा रहा था कि काग़ज़ों के एक पुलिंदे पर पाँव की हल्की-सी ठोकर लगी। मैं वहीं रुक गया। अपनी छड़ी से उसे हिलाया और झुक कर उठा लिया। देख ही रहा था कि इस में क्या है, वही पुलिस ऑफिसर भी पास आ गयाः‘ हैलो सीनियर! क्या कोई खज़ाना मिल गया है?” वह मुस्कुरा कर बोला।

पैन्शनर (सीनियर सिटीज़न) होने के नाते वह मुझे मज़ाक में सीनियर ही कह कर सम्बोधित करता था। मैं ने भी परिहास की भाषा में उत्तर दियाः ‘ आप ही देख कर बताओ कि कहीं किसी आतंकवादी का रखा हुआ बम तो नहीं है?’ पुलिंदे को देख कर हंसते हुए कहने लगाः ‘ लोग wildes-letter-1.jpgइतने सुस्त और लापरवाह हो गये हैं कि रद्दी के काग़ज़ बराबर में रखे हुए डस्ट बिन (कूड़े-दान) तक में भी नहीं डाल सकते ! लाओ, मैं ही डाल देता हूं।” मैं उन काग़ज़ों को अपने हाथों में उलट-पलट ही रहा था कि देखा पत्रों के साथ एक विवाह प्रमाण-पत्र भी था। मैं ने उसका ध्यान इस की ओर आकर्षित किया। कुछ क्षणों के लिये तो वह स्तब्ध रह गया। उसके चेहरे पर आर्द्रता का भाव झलक उठा, “ये किसी की धरोहर है। मैं इसे पुलिस-स्टेशन में जमा करवा दूंगा।” मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई। मैंने उन पत्रों को देखने की इच्छा प्रकट की तो उसने कहा कि यह बंडल क्योंकि तुम्हें ही मिले हैं, तुम पुलिस-स्टेशन जा कर देख सकते हो और यदि छः मास तक किसी ने भी इसके स्वामित्व का दावा नहीं किया तो हो सकता है कि यह तुम्हारी ही संपत्ति मानी जाए।

उत्सुकतावश मैं दोपहर के समय पुलिस-स्टेशन चला गया। संयोगवश स्वागत-कक्ष में वही ऑफिसर ड्यूटी पर था। औपचारिक कार्यवाही के पश्चात मैं एक एकांत कोने में बैठ कर पढ़ता रहा। बेटी! ये मुड़े-तुड़े पुराने साधारण से दिखनेवाले काग़ज़ एक हृदय-स्पर्शी पत्रों का एक संग्रह था जिस में कुछ पत्र प्रथम विश्वयुद्ध में युद्धस्थल से किसी सैनिक ‘राइफलमैन जॉर्ज वाइल्ड‘ ने अपनी इकलौती प्यारी बेटी ‘ऐथल ’ के नाम लिखे थे। कैसी विडंबना है! उसके उद्‌गार, उसके अरमान, उसकी सिसकती वेदना- आज भग्न-स्वप्न की तरह सड़क के किनारे इन काग़ज़ों में सिसक रहे थे! पत्र, पेंसिल से पीले काग़ज़ों पर लिखे हुए थे। इन पत्रों में आतताइयों का वर्णन था। वह अभागा सैनिक ऐसे स्थान पर था, जिसे ‘नो मैन्सलैण्ड’ कहा जाता था, जहां केवल चूहे थे। औषधियों का अभाव था, बीमारियों का बाहुल्य था और वे वनस्पतियां थीं जो फुंसी-फोड़े, अंधौरी और ददौरी आदि के अतिरिक्त कुछ नहीं देती थीं।
वह अपनी बेटी को सांत्वना देते हुए लिखता है- ‘ मेरी बेटी! तुम भाग्यशाली हो। उन व्यक्तियों की ओर दृष्टि डाल कर देखो जिनके पिता, भाई, पति, पुत्र-पुत्री… युद्ध की वीभत्स-घृणित-भूख को मिटा ना सके। इसीलिये ही कहता हूं कि तुम कितनी भाग्यवान हो कि अभी भी तुम्हारा पिता इन पत्रों को लिखने के लिये जीवित है।’
बेटी ऐथल को अपने अंतिम पत्र में लिखता है- ‘मैं हर समय घर लौटने का स्वप्न देखता रहता हूं कि तुम और शारलौट (उनकी पत्नी) दरवाज़े पर मेरी बाट निहारते होंगे और मैं गले लगा कर, रो-रो कर अपने दमित उद्‌गार और उन यातना भरे क्षणों को खुशियों के आँसुओं के सैलाब में बहा दूं! किन्तु ईश्वर ही जानता है कि भविष्य में तुम से मिलने की यह आकांक्षा पूरी हो सकेगी या नहीं। मैं सदैव आशान्वित जीवन में जीता हूं।’

किंतु दुर्भाग्य और आशा के युद्ध में दुर्भाग्य ही जीत गया। 19 नवम्बर 1917 के दिन शत्रु के एक लड़ाकू-वायुयान के आक्रमण में घायल होने के कारण फ्रांस में न. 63, ‘केज़ुअलटी क्लीयरिंग स्टेशन’ में भर्ती हो गया। डॉक्टर और सर्जन उसे बचा न सके। 10 दिन के बाद अपनी प्यारी बेटी और प्रिया शारलॉट से मिलने की अधूरी अभिलाषा अपने साथ ले कर इस वैषम्य भरे संसार से 39 वर्ष की आयु में सदैव के लिये विदा ले ली!

उनकी पत्नी को युद्ध कार्यालय की ओर से एक औपचारिक सूचना मिली कि तुम्हारे पति जो लन्दन रेजिमेण्ट की 9वीँ बटालियन में सैनिक था, के शव को बेल्जियम में ‘हैरिंगे मिलिट्री कब्रिस्तान‘ में अंतिम संस्कार सहित दफ़ना दया गया।

इन पत्रों के साथ एक अखबार की कतरन भी थी जिसमें पश्चिमी रण-स्थल का नक्शा था। साथ ही था जॉर्ज वाइल्ड तथा शारलॉट एलिज़ाबेथ हॉकिन्स के विवाह का प्रमाण-पत्र जिसके अनुसार उन दोनो का विवाह 8 जुलाई 1900 में लन्दन के चेल्सी क्षेत्र में सेंट सिमंस चर्च में समपन्न हुआ था।

आज इन अमूल्य लेख्य-पत्रों को ठोकरों में स्थान मिला। पुलिस ने साल्वेशन आर्मी और अन्य संस्थाओं से संपर्क किया है किंतु इन दु:ख भरे दस्तावेज़ों के उत्तराधिकारी की खोज में अभी सफलता नहीं मिली।
(बेटी, कभी कभी न जाने क्यों मेरे मन में नकारात्मक विचार आ जाते हैं कि क्या मेरे पत्रों का भी यही हाल होगा ?)
प्यार भरे आशीर्वाद सहित
तुम्हारे डैडी

यह पत्र मिलते ही मेरी बेटी ने फौरन् ही टेलीफोन किया और कहा, ‘डैडी, जिस प्रकार आपने लंदन के वातावरण में भी मुझे इस योग्य बना दिया कि आपके हिंदी में लिखे पत्र पढ़ सकती हूं और समझ भी सकती हूं, उसी प्रकार मैं आपके नाती को हिंदी भाषा सिखा रही हूं ताकि बड़ा हो कर वह भी अपने नाना जी के पत्र पढ़ सके। आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं। मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!’

सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!

महावीर शर्मा

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

March 28, 2007

“मेरा बेटा लौटा दो!!”

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 11:36 pm

“मेरा बेटा लौटा दो!!”-
(एक सत्य घटना पर आधारित कहानी)

महावीर शर्मा

लखनऊ में खटीक समुदाय की बस्ती से दूर जंगल में रामू की माँ चिलला चिल्ला कर दहाड़ रही थी, ” मेरा बेटा लौटा दो! मेरे रामू को लौटा दो!” रामू के बापू और साथियों ने जंगल का चप्पा चप्पा छान डाला, पर बालक का कोई पता नहीं चला। रामू की माँ का हाल बेहाल हो
रहा था। पति ने अपनी मैली सी धोती के पल्ले से आंखों से गिरते आंसुओं को पोंछा। पत्नी को
दिलासा दे कर,घर लौट आए।

रात हो चुकी थी। बाहर जरा सा भी खड़का सा सुनाई देता तो रामू की माँ दौड़ कर दरवाजे पर कहती ‘मेरा रामू आगया!” बस मृग-तृष्णा का छलावा दोनों के साथ खेल खेलता रहता।
कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। रामू सारे दिन काम से थका हारा खटिया में लेट गया। आंखें बंद की तो उस भयानक रात की घटना किसी हॉरर फ़िल्म की तरह आंखों की पलकों के पीछे चल रही थी।

‘उमंगों से भरे वर्ष 1947 ने इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया था। इनसान का वीभत्स रूप भी देखा था। इनसान के मस्तिष्क, हृदय और आत्मा के बिगड़ते हुए संतुलन को भी देखा था। धर्म के नाम पर सीमा के दोनों ओर “हर हर महादेव” और “अल्लाह हू अकबर” के नारों
की गूंज में बालकों, स्त्रियों यहां तक बूढ़ों तक को निर्दयता से बलि दी जा रही थी। उसी वर्ष तो हमारे रामू ने इस लहू से भरी लाल रंग की धरती पर जन्म लिया था।

‘गरीबी की चादर ओढ़े इकलौते रामू के साथ सुख-दुख के मिले-जुले जीवन के दिन बीत रहे थे। रामू के भविष्य के लिए न जाने कितने मनसूबे बनाते थे। भौंरिया तो काम के समय भी रामू को सीने से चिपकाए रहती थी। रात को अपनी गोद में ही सीने से लगा कर सोती थी। यही झुग्गी हमारे महल से कम नहीं लगती थी जब आंगन में एक बरस के नन्हें से रामू की किलकारी में जीवन के सारे दुख समा जाते।

एक अंधेरी रात में हवा नें आंधी का रूप धारण कर लिया था। इस आंधी और किवाड़ के में हार जीत की बाज़ी लगी हुई थी। यूं तो ऐसी तेज़ हवाओं के तो हम आदी हो चुके थे। भौंरिया रामू को गोद में चिपकाए हुए सो गई थी। सारे दिन के जिस्म-तोड़ काम ने शरीर को इतना थका दिया था कि किवाड़ की खड़खड़ाहट और तेज़ हवा की सांय सांय भी हमारी नींद को उखाड़ ना सकी।

अचानक से किवाड़ खुले और एक ही झपट्टे में एक खूंख्वार भेड़िया रामू को गोद से छीन कर जंगल की ओर भाग गया। ये सब इतनी फुर्ती से हुआथा कि हम दोनों हड़बड़ा कर खड़े तक भी ना हो पाए थे। हम चीखने चिल्लाने लगे, दौड़ कर भेड़िये के पीछे भागे, शोर सुन कर
बस्ती के लोग अपनी लालटैन ले लेकर साथ हो लिए, पर भेड़िया रामू को ले कर दूर बीहड़ जंगल में लापता हो गया था।
भौंरिया तो बेटे के वियोग में पागल सी हो गई थी। हम दोनों हर रोज़ दूर दूर तक इस जंगल की कांटों भरी झाड़ियों को हटा हटा कर ढूंढते रहते, हाथ कांटों से लहूलुहान हो जाते थे। जितना प्रयत्न करते, सफलता उतनी ही दूर हो जाती। भौंरिया के धैर्य का बांध टूट गया। पागलों की
तरह जंगल में इधर उधर भाग भाग कर दहाड़ दहाड़ कर चिल्लाती -’ अरे भेड़िये, मेरे लाल को वापस दे दे। तुझे मानस का मांस ही चाहिए ना? ले मैं सामने खड़ी हूं, मेरे अंग अंग को नोच कर खा जा पर मेरे रामू को लौटा दे!’साथ में आए मुखिया ने कहा, ‘ रामू की माँ! भेड़िये और मानव
का तो पुराना बैर है, रामू तो भेड़िये का कभी का आहार बन चुका होगा।’ भौंरिया फूट फूट कर रो पड़ी।’
**** **** ****
इस घटना को 6 वर्ष बीत गए। लोग रामू को भूल से गए। रामू के माँ और बापू ने दिल पर पत्थर रख अपनी रोज की दिनचर्या को सामान्य बनाने का प्रयत्न करते रहते।

दोनों काम से हारे थके सांय झुग्गी के बाहर बैठे हुए थे। रामू के बापू ने बीड़ी सुलगाई ही थी कि सामने वाली बुढ़िया लाठी टेकती हुई मुस्करा कर दोनों के सामने बैठ गई।
अरे, दोनों के लिए बड़ी खुसखबरी ले कर आई हूं। दुनिया चाहे ना माने पर मेरा दिल तो यही गवाही देवे है कि वह रामू ही है।’
दोनों सकते में आगए। कुछ क्षणों तक तो बुढ़िया का मुंह ही तकते रहे, कुछ समझ नहीं आ रहा था। रामू की माँ एक दम तेजी से कहने लगी,’ताई, पहेलियां मत बुझा, मेरा हिया फटा जा रहा है, साफ साफ बता कहां है वो?’
‘अरी मैं ठीक से बैठ तो जाऊं। रामू के बापू, जरा एक बीड़ी तो सुलगाइयो।’
बीड़ी का सुट्टा लगा कर बुढ़िया ने कहना शुरू किया,’ तू तो जाने ही है कि तेरा ताऊ अखबार बांच लेवे है। बता रहे थे कि छापे में लिखा था कि कुछ वकत हुआ, बलरामपुर के अस्पताल में एक बच्चा भरती हुआ है जिसकी चाल-ढाल, आदतें, हाव-भाव ही नहीं हाथ पैर तक के भी
भेड़िये की तरह हैं।’

दोनों सवेरे ही बलरामपुर के अस्पताल पहुंच गए। एक नर्स से बात हुई, अपनी दारुण-कथा सुनाई। नर्स उनके हाव-भाव को आंकने की कोशिश कर ही थी। दोनों रो रहे थे। दोनों को वहीं बैठा कर, अंदर जा कर डाक्टर को बताया कि एक दम्पति इस बालक के माता-पिता होने का दावा कर रहे हैं। नर्स ने यह भी कहा कि यह भी हो सकता है कि यह दोनों एक घड़न्त कहानी बना कर अखबार वालों से इस कहानी को भुनाने की कोशिश कर रहे हों।
डाक्टर ने दोनों को बुला कर सीधा प्रश्न किया, ‘तुम किस आधार पर कहते हो कि यह तुम्हारा ही बेटा है?” भौंरिया भावों के बहाव में रोती हुई कहने लगी, ‘डाक्टर जी, मेरा दिल कहता है कि वह मेरा रामू ही है।’ डाक्टर कुछ कहना चाह रहा था कि रामू के बापू ने कहा,
‘मालिक ! रामू के माथे पर जनम का निसान है और उसकी दाईं जांघ पर जनम का नीला निसान भी है।’डाक्टर ने मुस्कराते हुए कहा, ‘जाओ, नर्स के साथ जाकर अपने रामू से मिल लो पर उससे सतर्क रहना।’

देखते ही भौंरिया की ममता उमड़ पड़ी। बालक को गले से लगा लिया। नर्स विस्मित हो गई कि वही रामू जिसको पकड़ने के लिए एक युद्ध सा करना पड़ता था,चुपचाप इस औरत के गले लगा हुआ था। रामू का बापू धोती के पल्ले से खुशी के आंसू पोंछ रहा था। अब ग़ौर से देखा तो दोनों का हृदय द्रवित हो गया। घुटनों और हाथों में गट्ठे पड़े हुए थे। गर्दन के पीछे दांतों के निशान थे। बोलने के नाम पर केवल भेड़ियों की तरह हुवा-हुवा करता। साथ ही रखे हुए कटोरे में मुंह डाल कर जानवरों की तरह ही पीता था। नर्स ने कहा,’ अब इसकी दवा का समय है, तुम बाहर बैठो, मैं अभी आती हूं। ‘

नर्स को दोनों ने 6 वर्ष पहली घटना विस्तार से सुनाई। नर्स का दिल भी पिघल सा गया। नर्स ने बताया,’1954 के इसी साल में थोड़े समय की बात है, इस बालक को लखनऊ के स्टेशन के थर्ड-क्लास वेटिंग-रूम में देखा गया था। लोग इस से डरते थे। बड़ी कठिनाई से इसे पकड़ कर
17 जनवरी को यहां लाया गया था।’
दोनों की उत्सुक्ता बढ़ रही थी, ‘वह कैसा लगता था उस वकत?’ नर्स जारी रही, ‘वह मानव की संगत पसंद नहीं करता था। हां, चिड़ियाघर में ले जाते तो भेड़ियों को देख कर उत्तेजित हो जाता था। खाने की वस्तुओं को टुकड़े टुकड़े कर डालता हे।हड्डियों को घंटों तक चबाता रहता था। इसी लिए डाक्टर कहते हैं कि लगता है इसे भेड़ियों ने पाला था। कोई भी नहीं कह सकता था वह किसी भी रुप से मानवीय हो। सिर पर गुथे हुए बाल जटाएं बन चुकी थीं, चारों हाथ पैरों से जानवरों की तरह ही चलता था। ज्यों ही कपड़े पहनाते तो फाड़ डालता। रात को भेड़ियों की तरह ‘हुवाने’ की आवाज़ें करता। हंसना तो जानता ही न था। हां, रात के समय उसकी आंखें चमकती थीं। मांस को दूर से ही सूंघ कर पहचान लेता था।’

‘जब वह आया था, कच्चा मांस और फल खाता था। अब यहां दूसरे रोगियों को देख देख कर पकाई हुई सब्जियां और रोटी भी खाने लगा है। बिजली के इलाज से इसे लाभ हुआ है। पहले हाथ पैरों को फैलाता तक नहीं था पर अब पहले से अच्छा है।’ दोनों सुन कर आंसुओं को थाम ना सके।
नर्स ने कहा, ‘उसका पूरा हाल ना ही सुनो तो अच्छा होगा। इसे तुम घर ले जाकर संभाल नहीं पाओगे। यहां देखभाल, दवा, इलाज की उचित व्यवस्था है। बस आकर जब भी चाहो, देख जाया करो।’ दोनों इस से सहमत थे।

रामू मानवीय गुणों को पूरी तरह स्वीकार ना कर पाया। मां बाप १४ वर्षों तक नियम पूर्वक अस्पताल में जाकर अपने ममत्व को सींचते रहे। रामू की हालत बिगड़ने लगी। दवा और इलाज का असर खत्म हो गया। 20 अप्रेल 1968 की रात रामू की अंतिम रात बन गई। कुछ
मानवीय और कुछ पशु-पालित भेड़ियों के गुणों का समन्वित रूप साथ ले कर आंखें हमेशा के लिए बंद कर ली।

बेटे की चिता से अस्थियां इकट्ठी की, भीगी आंखों से राख के पात्र को सीने से लगाया। जाकर उसी बीहड़ जंगल की हवा में अस्थि-विसर्जित करते हुए हुए कहा, “ऐ भेड़ियों, हम तुम्हारे ऋणी हैं। हमारे रामू को तुम्हीं ने तो पाला था!!”
महावीर शर्मा


Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

July 4, 2006

हिमालय अदृष्य हो गया - महावीर शर्मा

Filed under: कहानी, लेख, सामान्य/General — महावीर @ 12:17 am

“हिमालय अदृष्य हो गया!”

लेखकः महावीर शर्मा

सोमवार ११ सितम्बर,१८९३। अमेरिका स्थित शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन में गेरुए वस्त्र धारण किए हुए एक ३० वर्षीय भारतीय युवक सन्यासी ने, जिसके हाथ में भाषण के लिए ना कोई कागज़ था, ना कोई पुस्तक, चार शब्दों “अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों” से श्रोताओं को संबोधित कर चकित कर डाला। ७००० श्रोताओं की १४००० हथेलियों से बजती हुई तालियों से ३ मिनट तक चारों दिशाएं गूंजती रही। अमेरिका निवासी सदैव केवल “लेडीज़ एण्ड जेंटिलमेन” जैसे शब्दों से ही संबोधित किए जाते थे।
यह थे स्वामी विवेकानंद जिन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय आध्यात्मिक तत्वनिरूपण कर जन-समूह एवं विभिन्न धर्मों के ज्ञान-विद प्रतिनिधियों के मन को मोह लिया था। अंतिम अधिवेशन में वक्ताओं,विभिन्न देशों और धर्मों के प्रतिनिधियों , श्रोताओं का धन्यवाद देते हुए जिस प्रकार प्रभावशाली भाषण को समाप्त किया, लोग आनंद-विभोर हो उठे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू-धर्म केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में ही नहीं, अपितु इस में भी विश्वास करता है कि समस्त धर्म सत्य और यथा-तथ्यों पर आधारित हैं।
* * * * *
लगभग नौ वर्ष पश्चातशुक्रवार, ४ जुलाई १९०२ के दिन अमेरिका-निवासी १८५वां स्वतंत्रता-दिवस धूम-धाम से मनाते हुए २ लाख व्यक्ति शैनले-पार्क, पिट्सबर्ग में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का भाषण सुन रहे थे, उसी दिन जिस सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने ११ सितंबर १८९३ में अमेरिका में ज्ञान-दीप जला कर सत्य के प्रकाश से लोगों के ह्रदयों को आलोकित किया था—

भारत के पश्चिमी बंगाल के कोलकात्ता नगर के समीप हावड़ा क्षेत्र में हुगली नदी के दूसरे तीर पर स्थित बेलूर मठ में सूर्यास्त के साथ साथ स्वामी विवेकानंद सदैव के लिए नश्वर शरीर त्याग कर ‘महा-समाधि’ लेकर महा-प्रयाण की ओर अग्रसर थे।

स्वामी विवेकानंद प्रातः ही उठ गए थे। साढ़े आठ बजे मंदिर में जाकर ध्यान-रत हो गए। एक घण्टे के पश्चात एक शिष्य को कमरे के सारे द्वार और खिड़कियां बंद करने को कह कर लगभग डेढ़ घण्टे उस बंद कक्ष में भीतर ही रहे। लगभग डेढ़ घण्टे बाद माँ काली के भजन गाते हुए नीचे आगए। स्वामी जी स्वयं ही धीमी आवाज म