महावीर

June 22, 2008

छोटी सी बिंदिया ! -3 क्षणिकाए

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 7:07 am

छोटी सी बिंदिया ! -3 क्षणिकाएं

- महावीर शर्मा

दुलहन

अलसाये नयनों में निंदिया, भावों के झुरमुट मचलाए

घूंघट से मुख को जब खोला, आंखों का अंजन इतराए

फूल पर जैसे शबनम चमके,दुलहन के माथे पर बिंदिया।

मुस्काए माथे पर बिंदिया।

मुजरा

तबले पर ता थइ ता थैया, पांव में घुंघरू यौवन छलके

मुजरे में नोटों की वर्षा, बार बार ही आंचल ढलके

माथे से पांव पर गिर कर, उलझ गई घुंघरू में बिंदिया

सिसक उठी छोटी सी बिंदिया !

सीमा के रक्षक

दूर दूर तक हिम फैली थी, क्षोभ नहीं था किंचित मन में

गर्व से ‘जय भारत’ गुञ्जारा, गोली पार लगी थी तन में

सूनी हो गई मांग प्रिया की, बिछड़ गई माथे से बिंदिया।

छोड़ गई कुछ यादें बिंदिया।

- महावीर शर्मा

February 2, 2008

मुश्‍किल भूखों का जीना है !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 11:14 pm

मुश्‍किल भूखों का जीना है !

मेहनत करके निज हाथों से, बेचारे खेत उगाते हैं,
सारे दिन खून बहा अपना , सूरज ढलने पर आते हैं,
वर्तमान के कष्‍टों को, मुस्‍का मुस्‍का कर सहते हैं,
केवल भावी की आशा में, दो दो दिन भूखे रहते हैं,
पकने पर फ़सल बना सोना, उनका बहुमूल्‍य पसीना है ।
मुश्‍किल भूखों का जीना है !

खलिहानों में निज फ़सल देख वह खड़ा खड़ा मुस्‍काता है,
सूदख़ोर गाड़ी में भर कर, फ़सल साथ ले जाता है,
यूं ही सूरज चला गया, पूनम का चांद निकल आया,
उसे लगा यह चांद नहीं, कोई गोल गोल रोटी लाया ,
एक काले बादल ने आकर, उस रोटी को भी छीना है ।
मुश्‍किल भूखों का जीना है !

पीते हैं कुत्ते दूध कहीं, पर वह भूखा चिल्‍लाता है ,
ऊंचे महलों के नीचे वह, कुटिया में रात बिताता है ,
भूखा रहने के कारण उसकी, आंख नहीं लग पाती है ,
यदि आंख लगे तो सपने में, बिल्‍ली रोटी ले जाती है ,
इस डर से सोता नहीं रात भर, केवल आंसू पीना है ।
मुश्‍किल भूखों का जीना है !!

महावीर शर्मा

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September 18, 2007

प्रेम डगरिया

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:30 pm

प्रेम डगरिया ही ऐसी है जहां न लुटने का ग़म होता
नयन सजल हों ढल जाएं पर अश्रुकोष नहीं कम होता।

मदमाती पलकों की छाया, मिल जाती यदि तनिक पथिक को,
तिमिर, शूल से भरा मार्ग भी आलोकित आनन्द-सम होता।

डगर प्रेम की आस प्रणय की उद्वेलित हों भाव हृदय के,
अंतर ज्योति की लौ में जल कर नष्ट निराशा का तम होता।

विछड़ गया क्यों साथ प्रिय का, सिहर उठा पौरुष अंतर का,
जीर्ण वेदना रही सिसकती, प्यार में न कोई बंधन होता।

अकथ कहानी सजल नयन में लिए सोचता पथिक राह में,
दूर क्षितिज के पार कहीं पर, एक अनोखा संगम होता!

महावीर शर्मा

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August 30, 2007

यदि मेरा अधःपतन……

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:33 pm

यदि मेरा अधःपतन तेरे इस जीवन का आधार बने तो,
स्वागत सौ सौ बार पतन का !
यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,
स्वागत सौ सौ बार शमन का !

मैं ने देखे हैं वे मानव, ऊंचे महलों में रहते हैं,
बड़े गर्व से जिन्‍हें सभी, उद्योग-पति ही कहते हैं,
मखमल के फर्शों पर चलते, थकने का जिनको भान नहीं,
दानी और श्रीमान बिना, होता जिनका सम्मान नहीं,
धन की मदिरा में मस्त बने, आता न कभी विचार गमन का ।
स्वागत सौ सौ बार पतन का !

वे मानव भी देखे मैं ने, जो फ़ुट पाथों पर रहते हैं,
नफ़रत से आंखें फेर जिन्हें, सब भिखमंगा ही कहते हैं,
पावों से रिसता रक्त , भूख से आंखों में दम आता है,
बोल निकलता नहीं मगर, “बाबा पैसा” चिल्लाता है,
मरने पर लाश पड़ी नंगी है, नहीं वहां कुछ काम कफ़न का!
स्वागत सौ सौ बार पतन का !!

यदि मेरा अधःपतन तेरे इस जीवन का आधार बने तो
स्वागत सौ सौ बार पतन का !
महावीर शर्मा

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August 20, 2007

वह मौन था !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 4:31 pm

रो उठी व्याकुल निशा -
वह मौन था !
सिसकती वेदना
कराह रही उस झोंपड़ी की चेतना में !
था भूख औ बेकारी से यौवन जरा-सम,
अकुला रही थी भूख भी
जड़वत नयन की पुतलियों में !
उस दर्द पर
मक्खियां थी भिनभिनाती
और भिनभिनाहट के सिवा
हर चीज़ वहां खामोश थी ।
क्षुधा - पीड़ित -
मर चुका था !
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था !!

रो उठी व्याकुल निशा -
वह मौन था !
सिसकती वेदना !
जल रही थी स्वप्न की निशि होलिका में
संजोये आशा की मिटती किरण
चिर विरह कुण्‍ठित हुई
रोती रही
गाती रही !
खो गया जीवन समूचा
उस गीत की आवाज़ में ,
अतिरिक्त उस आवाज़ के
जो कुछ भी था निःशब्द था
चिर विरही !
मर चुका था,
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था !!

- महावीर शर्मा

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August 14, 2007

स्वतन्त्रता-दिवस पर शुभकामनाएं

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 12:53 pm

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रामधारी सिंहदिनकर

ध्वज-वंदना

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नमो, नमो, नमो।

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो !
नमो नगाधिराज - श्रृंग की विहारिणी !
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नयी प्रभा,नमो, नमो!

हम किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर फहर केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

 

तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़ *
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

- रामधारी सिंहदिनकर

प्रेषक- महावीर शर्मा

( * जिस समय यह काविता लिखी गयी थी, उस समय भारत की जन-संख्या चालीस करोड़ थी।)

August 8, 2007

“अतीत”

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 8:46 pm

अतीत

याद किसी की गीत बन गई!
कितना अलबेला सा लगता था, मुझे तुम्‍हारा हर सपना,
साकार बनाने से पहले , क्यों फेरा प्रयेसी मुख अपना,
तुम थी कितनी दूर और मैं, नगरी के उस पार खड़ा था,
अरुण कपोलों पर काली सी, दो अलकों का जाल पड़ा था,
अब तुम ही अनचाहे मन से अंतर का संगीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

उस दिन हंसता चांद और तुम झांक रही छत से मदमाती
आंख मिचौनी सी करती थीं लट संभालती नयन घुमाती
कसे हुए अंगों में झीने पट का बंधन भार हो उठा
और तुम्‍हारी पायल से मुखरित मेरा संसार हो उठा
सचमुच वह चितवन तो मेरे अंतर्तम का मीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

तुम ने जो कुछ दिया आज वह मेरा पंथ प्रवाह बना है
आज थके नयनों में पिघला आंसू मन की दाह बना है
अब न शलभ की पुलक प्रतीक्षा और न जलने की अभिलाषा
सांसों के बोझिल बंधन में बंधी अधूरी सी परिभाषा
लेकिन यह तारों की तङपन धङकन की चिर प्रीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

महावीर शर्मा

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July 10, 2007

खिले एक डाली पर दो फूल !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 12:56 pm

जब मैं चौथी क्लास में था (१९४३), उर्दू की एक ग़ज़ल का यह शेर पढ़ा थाः

दो फूल साथ फूले, किस्मत जुदा जुदा है
नौशे के एक सर पे, इक क़ब्र पर चढ़ा है

यह ग़ज़ल मशहूर गायक स्वः मनोहर बरवे (१९१०-१९७२) ने भी गायी थी।

आगे चल कर मैंने इसी प्रत्यय को लेकर हिंदी में एक कविता लिखी, जो नीचे दे रहा हूं:-

खिले एक डाली पर दो फूल !

आई एक बासंती बाला, पड़ती जल बूंदें अलकों से
विकसित सुमनों की सुवास पा, नयनों से ढकती पलकों से
कुछ खोल नयन फिर हाथ बढ़ा, दो सुमनों से एक तोड़ लिया
डलिया के रखे फूलों में एक और सुमन भी जोड़ लिया
मदिर चाल से चली , पवन से लहरा उठा दुकूल ।

पहुंची गौरी के मंदिर में, श्रद्धा से मस्तक नत करके
माँ को फिर फूल किये अर्पित , अपने को भी विस्मृत कर के
गौरी की पूजा में आकर, वह सुमन भाग्य पर इठलाया
मुस्का कर कहने लगा अहा ! कितना स्वर्णिम अवसर पाया
उस डाली पर मिलता मुझ को, प्रति पग पर एक शूल ।

डाली से नीचे गिरा फूल, अगले दिन जब आंधी आई
मिट्टी पर पड़ कर सूख गया, मुख की मञ्जुलता मुरझाई
वह बाला पुनः वहां आई, नव विकसित सुमन चयन करने
पैरों के नीचे कुचल गया, तो लगा फूल आहें भरने
जिस ने जीवन दिया अंत में, मिली वही फिर धूल ।

खिले एक डाली पर दो फूल !!
महावीर शर्मा

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June 18, 2007

गीत तो गाए बहुत!

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 10:36 am

गीत तो गाए बहुत जाने अजाने
स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या ना पहुंचे कौन जाने!

उड़ गए कुछ बोल जो मेरे हवा में
स्यात् उनकी कुछ भनक तुम को लगी हो,
स्वप्न की निशि होलिका में रंग घोले
स्यात् तेरी नींद की चूनर रंगी हो,

भेज दी मैं ने तुम्हें लिख ज्योति पाती,
सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने।

यह शरद का चांद सपना देखता है
आज किस बिछड़ी हुई मुमताज़ का यों,
गुम्बदों में गूंजती प्रतिध्वनि उड़ाती
आज हर आवाज़ का उपहास यह क्यों?

संगमरमर पर चरण ये चांदनी के
बुन रहे किस रूप की सम्मोहिनी के आज ताने।

छू गुलाबी रात का शीतल सुखद तन
आज मौसम ने सभी आदत बदल दी,
ओस कण से दूब की गीली बरौनी,
छोड़ कर अब रिमझिमें किस ओर चल दीं,

किस सुलगती प्राण धरती पर नयन के,
यह सजलतम मेघ बरबस बन गए हैं अब विराने।

प्रात की किरणें कमल के लोचनों में
और शशि धुंधला रहा जलते दिये में,
रात का जादू गिरा जाता इसी से
एक अनजानी कसक जगती हिये में,

टूटते टकरा सपन के गृह-उपगृह,
जब कि आकर्षण हुए हैं सौर-मण्डल के पुराने।

स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने!

महावीर शर्मा

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June 8, 2007

नयनों से भीगे से जलकण!

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:52 pm

कवि हृदय विकल जब होता है तो भाव उमड़ ही आते हैं
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

आते बसंत को जब देखा, हो विकसित कवि का मन बोला
आई उपवन में हरियाली, सुमनों ने दृग अंचल खोला
मुस्का कर देखा ऊपर को, जहां अंशुमालि थे घूम रहे
अपनी आल्हादित किरणों से, सुमनों के मुख को चूम रहे

मधुमास में उनकी किरणों से पल्लव शृंगार बनाते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

हो कर ओझल क्षण भर में ही, स्वप्नों का खण्डन कर डाला
क्षण भर को ही क्यों आई थी? बोलो मधु बासंती बाला
अब नयनों में ले भाव सजल, अधरों पर ले कंपित वाणी
क्या हुआ तुम्हारे यौवन को, पतझड़ में बोलो कल्याणी!

कवि की वीणा के सुप्त तार, बस वीत राग अब गाते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

महावीर शर्मा

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