महावीर

June 27, 2008

ग़ज़ल: हादसों के शहर में - ‘प्राण’ शर्मा

Filed under: उर्दू शायरी, प्राण शर्मा — महावीर @ 11:29 pm

ग़ज़ल - हादसों के शहर में

सो रहा था चैन से मैं फ़ुर्सतों के शहर में
जब जगा तो ख़ुद को पाया हादसों के शहर में

फ़ासले तो फ़ासले हैं दो किनारों की तरह
फ़ासले मिटते कहाँ हैं फ़ासलों के शहर में

दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह
दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में

थक गये हैं आप तो आराम कर लीजे मगर
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में

मिल नहीं पाया कहीं सोने का घर तो क्या हुआ
पत्थरों का घर सही, अब पत्थरों के शहर में

हर किसी में होती है कुछ प्यारी प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन ख़ुशबुओं के शहर में

धरती-अम्बर, चाँद-तारे, फूल-ख़ुशबू, रात-दिन
कैसा-कैसा रंग है इन बंधनों के शहर में

हम चले हैं ‘प्राण’ मंज़िल की तरफ़ लेकर उमंग
आप रहियेगा भले ही हसरतों के शहर में

‘प्राण’ शर्मा

May 22, 2008

‘प्राण’ शर्मा जी की एक ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, प्राण शर्मा — महावीर @ 8:15 pm

मेरे दुखों में मुझ पे ये अहसान कर गए
कुछ लोग मशवरों से मेरी झोली भर गए

पुरवाईयों में कुछ इधर और कुछ उधर गए
पेड़ों से टूट कर कहीं पत्ते बिखर गए

वो प्यार के ऐ दोस्त उजाले किधर गए
हर ओर नफ़रतों के अंधेरे पसर गए

अपने घरों को जाने के क़ाबिल नहीं थे जो
मैं सोचता हूं कैसे वो औरों के घर गए

हर बार उनका शक की निगाहों से देखना
इक ये भी वजह थी कि वो दिल से उतर गए

तारीफ़ उनकी कीजिए, औरों के वास्ते
जो लोग चुपके चुपके सभी काम कर गए

यूं तो किसी भी बात का डर था नहीं हमें
डरने लगे तो अपने ही साए से डर गए

प्राण शर्मा

April 7, 2008

ग़म की दिल से दोसती होने लगी-ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 11:37 pm

ग़म की दिल से दोसती होने लगी।
ज़िन्दगी से दिल्लगी होने लगी।

जब मिली उसकी निगाहों से मिरी
उसकी धड़कन भी मिरी होने लगी।

ज़ुल्फ़ की गहरी घटा की छांव में
ज़िन्दगी में ताज़गी होने लगी।

बेसबब जब वो हुआ मुझ से ख़फ़ा
ज़िन्दगी में हर कमी होने लगी।

बह न जाएं आंसू के सैलाब में
सांस दिल की आखिरी होने लगी।

आंसुओं से ही लिखी थी दासतां
भीग कर क्यों धुन्धली होने लगी।

जाने क्यों मुझ को लगा कि चांदनी
तुझ बिना शमशीर सी होने लगी।

आज दामन रो के क्यों गीला नहीं?
आंसुओं की भी कमी होने लगी।

तश्नगी बुझ जाएगी आंखों की कुछ
उसकी आंखों में नमी होने लगी।

डबडबाई आंख से झांको नहीं
इस नदी में बाढ़ सी होने लगी।

इश्क़ की तारीक गलियों में जहां
दिल जलाया, रौशनी होने लगी।

आ गया क्या वो तसव्वर में मिरे
दिल में कुछ तस्कीन सी होने लगी।

मरना हो, सर यार के कांधे पे हो
मौत में भी दिलकशी होने लगी।

महावीर शर्मा

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March 3, 2008

तिरे सांसों की ख़ुश्बू - ग़ज़ल.

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:50 pm

तिरे सांसों की ख़ुश्बू - ग़ज़ल.

तिरे सांसों की ख़ुश्बू से ख़िज़ाँ की रुत बदल जाए,
जिधर को फैल जाए, आब-दीदा* भी बहल जाए।

(*आब-दीदाः जिसकी आंखों में आंसू भरे हुए हों)

ज़माने को मुहब्बत की नज़र से देखने वाले,
किसी के प्यार की शम.आ तिरे दिल में भी जल जाए।

मिरे तुम पास ना आना मिरा दिल मोम जैसा है,
तिरे सांसों की गरमी से कहीं ये दिल पिघल जाए।

कभी कोई किसी की ज़िन्दगी से प्यार ना छीने,
वो किस काम का जिस फूल से ख़ूश्बू निकल जाए

तमन्ना है कि मिल जाए कोई टूटे हुए दिल को,
बनफ़्शी हाथों से छू ले, किसी का दिल बहल जाए।

ज़रा बैठो, ग़मे-दिल का ये अफ़साना अधूरा है,
तुम्हीं अंजाम लिख देना, मिरा गर दम निकल जाए।

मिरी आंखें जुदा करके मिरी तुर्बत* पे रख देना, (*क़ब्र, मज़ार)
नज़र भर देख लूं उसको, ये हसरत भी निकल जाए।

महावीर शर्मा

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February 14, 2008

विभिन्न देशों में वैलंटाइन दिवस

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 8:27 am

विभिन्न देशों में वैलंटाइन दिवस

विश्व के विभिन्न देशों में 14 फ़रवरी के दिन वैलंटाइन डे ज़ोर शोर से मनाया जाता है। प्रेमी और प्रेमिकाएं अपने हृदय के उद्गार व्यक्त करने के लिए नए नए विलक्षण तरीक़े ढूंढते हैं। अलग अलग देशों में इस दिवस पर प्रेम के इज़हार के ढंग उनकी सभ्यता और रिवाजों के रंगों में रंगते हुए अलग से ही रूप ले लेते हैं, जैसेः-

ये ख़ास दिन है प्रेमियों का, प्यार की बातें करो
कुछ तुम कहो कुछ वो कहे, इज़हार की बातें करो
.
जब दो दिलों की धड़कनें इक गीत सा गाने लगें
आंखों में आंखें डाल कर इक़रार की बातें करो
.
ये कीमती सा हार जो लाए हो वो रख दो कहीं
बाहें गले में डाल कर, इस हार की बातें करो
.
जिस के लबों की मुस्कुराहट ने बदल दी ज़िंदगी
उस गुल बदन के होंट औ रुख्सार की बातें करो
.
अब भूल जाओ हर जफ़ा, ये प्यार का दस्तूर है
राहे-मुहब्बत में वफ़ा-ए-यार की बातें करो

डेनमार्क में एक रिवाज के अनुसार लोग अपने मित्रों को दबे हुए स्नो ड्राप्स के फूल भेजते हैं। पुरुष हास्य-युक्त पत्र भी लिखते हैं जिसे डेनिश में गेकेब्रेव कहते हैं। अपने नाम के स्थान पर अपने नाम के अक्षरों की संख्या के बराबर ‘बिंदु’ लगा देते हैं। जिस महिला को यह पत्र मिलता है, वह बिंदुओं के अंकों से लिखने वाले का नाम ठीक बता दे तो उसे अप्रैल में ईस्टर-एग मिलता है।

स्कॉटलैण्ड में यह दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। अलग अलग जगहों में यह उत्सव
मनाने में थोड़ा थोड़ा अंतर हो जाता है। लेकिन साधारण रूप से, बराबर संख्या में पुरुष और महिलाएं छोटी छोटी पर्चियों पर अपने अपने नाम लिख देते हैं। एक हैट पुरुषों के लिए और दूसरा हैट महिलाओं के लिए रख दिया जाता है। पुरुष और महिलाएं अपने अपने हैट में यह पर्चियां रख देती हैं। प्रत्येक महिला पुरुषों के हैट में से एक पर्ची निकालती है और उस दिन दोनों साथी बन जाते हैं। पुरुष महिलाओं को उपहार देते हैं। यह आवश्यक नहीं कि वे दोनों गर्ल-फ्रेंड ही बन जाएं या उनका विवाह हो।

स्काटलैंड के कुछ भागों में एक और रिवाज है जो अब मिटता जा रहा है। उस दिन कोई भी युवक और युवती गली में या कहीं भी पहली बार मिले तो उस लड़की का वह युवक वैलंटाइन बन जाता है और दोनों ही एक दूसरे को अपने प्रेम-बंधन के टोकन के रूप में उपहार देते हैं।

जापान में वैलंनटाइन दो बार मनाया जाता है। 14 फरवरी को युवतियां युवकों को उपहार देती हैं। उस समय सब से सर्वप्रिय उपहार चाकलेट (गिरि-चोको) माना गया है। ‘तोमो-चोको’ भी गर्लफ्रेंड के लिए लोकप्रिय है। युवतियों की मान्यता है कि स्टोर से खरीदी हुई स्वीट्स सच्चे प्यार की द्योतक नहीं हैं। इसी लिए वे अपने वैलंटाइन के लिए अपने हाथों से बनाती हैं।
एक मास के पश्चात 15 मार्च जिसे ‘श्वेत दिवस’ कहा जाता है, दिए हुए उपहार को वापस लौटाया जाता है। इसी लिए लड़कियां १४ फरवरी के दिन बढ़िया से बढ़िया उपहार चुनती हैं।

कोरिया में बहुत कुछ जापान की ही तरह है लेकिन वहां दो दिन ना होकर तीन दिन वैलंटाइन दिवस के लिए रखे हैं। जापान की तरह युवतियां युवकों के लिए कैंडी (मिठाई) का उपहार देती हैं। 14 मार्च जो ‘श्वेत दिवस’ कहलाता है, युवक अपनी स्वीट-हार्ट के प्रति पहली बार अपने प्रेम को स्वीकार करते हैं। जिन लोगों का कोई प्रणय-संबंधी साथी नहीं होता है, उनके लिए 14 अप्रैल का दिन निश्चित किया गया है जिसे ‘काला दिवस’ कहते हैं। उस दिन ऐसे लोग इकट्ठे होकर जजांग नूडल्स खाते हैं जो काले रंग के होते हैं। इसी लिए इस दिन को ‘काला दिवस’ कहा गया है।

ताइवान में अन्य देशों की तरह ही 14 फरवरी के दिन वैलंटाइन मनाया जाता है, लेकिन फिर 7 जुलाई के दिन वैलंटाइन डे विशेष महत्व रखता है। इन दोनों दिनों पर पुरुष मूल्यवान गुलाब और अन्य फूलों के बूके अपनी स्वीट-हार्ट को देते हैं। फूलों की संख्या और रंग का एक विशेष अर्थ होता है। उदाहरणार्थ - एक गुलाब का अर्थ है ‘केवल एक प्रेमिका’, 11 गुलाब के फूलों का अर्थ है ‘प्रिय-पात्र’ और 99 गुलाब के फूलों का अर्थ है ‘हमेशा के लिए’ । 108 गुलाबों का अर्थ है, ‘मुझ से शादी करोगी ?’

ब्रिटेन में भिन्न भिन्न स्थानों में अपने अपने रिवाजों के अनुसार वैलंटाइन डे मनाया जाता है। फिर भी कार्ड, फूल, चाकलेट और अन्य प्रकार के उपहार एक दूसरे को भेजना सामान्य है। पति और पत्नियां, गर्ल-फ्रेंड्स, एक दूसरे को, बच्चे अपने टीचर और माँ आदि को वैलंटाइन कार्ड और उपहार देते हैं। आजकल यह प्रवृत्ति भी है कि अखबारों और मैग्ज़ीनों में वैलंटाइन-कविताएं छापी जाती हैं। रोमांटिक गाने गाए जाते हैं। बच्चे भी वैलंटाइन के गाने गाते हैं और बदले में उन्हें कैंडी, फल, चाकलेट और कुछ धन-राशि भी उपहार में मिल जाती है। कहीं कहीं कुंवारी महिलाएं प्रातः जल्दी उठ जाती हैं और अपनी खिड़की के पास होकर सड़क पर गुजरते हुए व्यक्तियों को निहारती हैं। वह समझती हैं कि जो पहला व्यक्ति दिखाई देगा, वही भविष्य में उसका पति बनेगा।

किसी हद तक यहां प्रत्येक लड़की का कोई ना कोई बॉय-फ़्रैंड होता ही है, इसलिए आज के समय में इसे मजाक के रूप में ही लिया जाता है।
महावीर शर्मा

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February 8, 2008

अधूरी हसरतें – ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 1:16 pm

अधूरी हसरतें – ग़ज़ल

कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गये।

गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंट से
याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गये।

जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।

यूं तो तेरा हर लम्हा यादों के नग़मे बन गये
वो ही नग़मे घुट के सोज़ो-साज़ दिल में रह गये।

दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गये।

दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।

ख़्वाब में दीदार हो जाता तिरी तस्वीर का
नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गये।
महावीर शर्मा

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December 17, 2007

पर्दा हटाया ही कहां है?-ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 6:36 pm

पर्दा हटाया ही कहां है?

ज़िन्दगी में प्यार का वादा निभाया ही कहां है
नाम लेकर प्यार से मुझ को बुलाया ही कहां है?

टूट कर मेरा बिखरना, दर्द की हद से गुज़रना
दिल के आईने में ये मञ्ज़र दिखाया ही कहां है?

शीशा-ए-दिल तोड़ना है तेरे संगे-आसतां पर
तेरे दामन पे लहू दिल का गिराया ही कहां है?

ख़त लिखे थे ख़ून से जो आंसुओं से मिट गये वो
जो लिखा दिल के सफ़े पर, वो मिटाया ही कहां है?

जो बनाई है तिरे काजल से तस्वीरे-मुहब्बत
पर अभी तो प्यार के रंग से सजाया ही कहां है?

देखता है वो मुझे, पर दुश्मनों की ही नज़र से
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां है?

ग़ैर की बाहें गले में, उफ़ न थी मेरी ज़ुबां पर
संग दिल तू ने अभी तो आज़माया ही कहां है?

जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों ही
उसके चेहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां है?

उन के आने की ख़ुशी में दिल की धड़कन थम ना जाये
रुक ज़रा, उनका अभी पैग़ाम आया ही कहां है?

महावीर शर्मा

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November 28, 2007

इस ज़िन्दगी से दूर – ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 1:40 pm

इस ज़िन्दगी से दूर – ग़ज़ल

इस ग़ज़ल का मतला (पहला शेअर) उन लोगों को समर्पित है जो ज़िन्दगी के ढलान
पर हैं। जिस्म और ज़हन पूरी तरह साथ नहीं दे पाते। मस्तिष्क से शब्द निकल कर
देर तक ज़ुबान को चाट चाट कर मुंह से निकलते हैं, या फिर ख़ामोशी से मस्तिष्क के
शब्दकोश की अंधेरी कोठरी में वापस चले जाते हैं। ख़ुद को भी उसी सफ़ में देख रहा हूँ।

इस ज़िन्दगी से दूर, हर लम्हा बदलता जाए है,
जैसे किसी चट्टान से पत्थर फिसलता जाए है।

अगले दो अशआर उन लोगों को समर्पित करता हूं जो बुढ़ापे में तन्हाई के कैदख़ाने की
सलाखों से जूझते रहते हैं।

अपने ग़मों की ओट में यादें छुपा कर रो दिए
घुटता हुआ तन्हा, कफ़स में दम निकलता जाए है।

कोई नहीं अपना रहा जब, हसरतें घुटती रहीं
इन हसरतों के ही सहारे दिल बहलता जाए है।

………………..
तपती हुई सी धूप को हम चांदनी समझे रहे
इस गर्मिये-रफ़तार में दिल भी पिघलता जाए है।

जब आज वादा-ए-वफ़ा की दासतां कहने लगे,
ज्यूं ही कहा ‘लफ़्ज़े-वफ़ा’, वो क्यूं संभलता जाए है।

इक फूल बालों में सजाने, खार से उलझे रहे,
वो हैं कि उनका फूल से भी, जिस्म छिलता जाए है।

दौलत जभी आए किसी के प्यार में दीवार बन,
रिश्ता वफ़ा का बेवफ़ाई में बदलता जाए है।

महावीर शर्मा

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July 24, 2007

खून से मेंहदी रचाते हैं – ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 2:30 pm

अदा देखो, नक़ाबे-चश्म वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं फिर भी क़दम क्यों डगमगाते हैं?

ज़रा अन्दाज़ तो देखो, न है तलवार हाथों में,
हमारा दिल ज़िबह कर, खून से मेंहदी रचाते हैं।

हमें मञ्ज़ूर है गर, गैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगी कि दिल कैसे लगाते हैं।

सुना है आज वो हम से ख़फ़ा हैं, बेरुख़ी भी है,
नज़र से फिर नज़र हर बार क्यों हम से मिलाते हैं?

हमारी क्या ख़ता है, आज जो ऐसी सज़ा दी है,
ज़रा सा होश आता है मगर फिर भी पिलाते हैं।

ज़रा तिर्छी नज़र से आग कुछ ऐसी लगादी है,
बुझे ना ज़िन्दगी भर, रात दिन दिल को जलाते हैं।

वफ़ा के इम्तहाँ में जान ले ली, ये भी ना देखा
किसी की लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।

महावीर शर्मा

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May 23, 2007

पीनी पड़ गई - ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 7:22 pm

कभी कभी इनसान कुछ ऐसे हालात का शिकार हो जाता है कि ना
चाहते हुए भी पीने पर मजबूर हो जाता है। इस ग़ज़ल में ऐसे ही
शरीफ़ आदमियों की मजबूरियां देखिए जिसकी वजह से
पीनी पड़ गई
हाँ, आप भी ज़रूर बताईयेगा कि आप को कौन सी मजबूरी थी
जिसकी
वजह से इस दिलकश मनहूसपीनी पड़ गईके आगोश
में
सब भूल गए थे।

१. हम कहां पीते, मगर इक बार पीनी पड़ गई

मिल गए कुछ ब्लॉगियाई यार, पीनी पड़ गई।

२. हम ने तो कर ली थी तौबा, सिर्फ़ पी कर एक बार

इश्क़ में जब हो गए बीमार, पीनी पड़ गई।

३. डाल कर बाहें गले में हंस के बोले साकिया

दिल तोड़ो, पी भी लो सरकार! पीनी पड़ गई।

४. मुस्कुरा, नीची नज़र से होंट पर ख़म ला के बोलीं

मत सताओ, मय में मेरा प्यार, पीनी पड़ गई।

५. चश्म के पैमाने थे या जाम दो लबरेज़ थे

देख कर, ना कर सके इनकार, पीनी पड़ गई।

६. देख शोख़े-मैकदा को हम तो बिस्मिल हो गए

लुट गए हम, जब किया इज़हार, पीनी पड़ गई।

७. नाम मेरा प्यार से अपनी हथेली पर लिखा

हाथ छू कर वस्ल का इक़रार, पीनी पड़ गई।

महावीर शर्मा

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