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Nov
Posted by महावीर in देवी नागरानी, लघु कथा. 15 Comments

देवी नागरानी
लघुकथा
असली शिकारी
देवी नागरानी
हमारे पड़ोसी श्री बसंत जी अपनी तेरह महीने के नाती को स्ट्रोलर में लेकर घर से बाहर आए और मुझे सामने हरियाली के आस पास टहलते देखकर कहाः “”नमस्कार बहन जी”
“नमस्कार भाई साहब. आज नन्हें शहज़ादे के साथ सैर हो रही है आपकी. “
” हाँ यह तो है पर एक कारण इसका और है। इस नन्हें शिकारी से अंदर बैठे महमानों और घरवालों को बचाने का यही तरीका है.”
” वह कैसे?” मैंने अनायास पूछ लिया.
” अजी सब खाना खा रहे हैं, और यह किसीको एक निवाला भी खाने नहीं देता. किसीकी थाली पर तो किसी के हाथ के निवाले पर झपट पड़ता है और……………..”
अभी उनकी बात ख़त्म ही नहीं हुई तो एक कौआ जाने किन ऊँचाइयों से नीचे उतरा और बच्चे के हाथ में जो बिस्किट था, झपटे से अपनी चोंच में ले उड़ा. मैंने उड़ते हुए पक्षी की ओर निहारते हुए कहा..” बसंत जी, देखिये तो असली शिकारी कौन है?”
और वे कुछ समझ कर मुस्कराये और फिर ठहाका मारकर हस पड़े.
वक्त को मात है दे रहा ऐसा ही इक बाज़
काल शिकारी आएगा यूँ ही बिन आवाज़
देवी नागरानी
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लघुकथा
तरबूजे का सफ़र
यादों के गुलशन से महका करती है भूली बिसरी आप बीती बातें जो हमारी उम्र के साथ हमारी समझ के साथ भी अर्थ बदलती है, उन्हीं यादों का यह अंश है.
बहन से विदा लेते हुए जब शशिकाँत अपने गाँव जाने को हुआ तो बड़ी बहन ने पास में रक्खा एक बड़ा तरबूजा उठाकर उसे देते हुए कहाः “इसे तुम्हें माँ तक ले जाना है, पर संभालकर.”
१८, १९ साल का शशिकाँत अदब की मर्यादा से परिचित था, हामी भरकर तरबूजे को उठाया और बस के लिये रवाना हुआ. सफ़र तो बस सफ़र था, कोई आसान न था. एक बस से दूसरी बस, फिर टाँगे की सवारी तय करके ट्रेन पकड़ कर सफर का आख़िरी पड़ाव तय किया और किसी तरह उस तरबूज़े के बोझ को झेलता हुआ शशिकाँत घर पहुंचा और माँ को अमानत सौंपते हूए खुद को आज़ाद किया.
आख़िर नतीजा क्या हुआ? लाड़ प्यार से लाये हुए उस तरबूज़ को ५०० किलोमीटर तक संभाला, पर जब माँ ने उसे काटा तो वह बिलकुल सफेद निकला और माँ हक्की बक्की बेटे का मुंह देखती रही. क्या प्यार का रंग भी फीका पड़ सकता है!!!
देवी नागरानी
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Posted by समीर लाल ’उड़न तश्तरी’ वाले on November 4, 2009 at 1:05 am
बहुत गहरा अर्थ लिए दोनों लघुकथाएँ पसंद आईं.
Posted by - लावण्या on November 4, 2009 at 3:44 am
क्या खूब नसीहत दी है हमारी देवी बहन ने इन लघुकथाओं से के मन प्रसन्न हो गया –
वाह वाह
बहु आदर व स्नेह सहित,
- लावण्या
Posted by Asha Joglekar on November 4, 2009 at 2:05 pm
मैने इस ब्लॉग की काफी सारी कथाएं पढीं और बहुत अच्छी लगीं ।
Posted by परमजीत बाली on November 4, 2009 at 8:04 pm
बहुत बढ़िया लघु कथाएं है।बधाई।
Posted by sanjiv 'salil' on November 4, 2009 at 9:21 pm
दोनों लघुकथाएँ सटीक सन्देश देती हैं, दोहे में लय-दोष है. मुझे निम्न रूप बेहतर लगा:
मात वक्त को दे रहा, ऐसा ही इक बाज़
काल शिकारी आएगा यूँ ही बिन आवाज़
लेखिका – प्रकाशक को अच्छी रचनाएँ पढ़वाने हेतु धन्यवाद.
Posted by Roop Singh Chandel on November 5, 2009 at 2:07 am
दोनों लघुकथाएं बहुत अच्छी हैं.
बधाई.
चन्देल
Posted by Urmi on November 5, 2009 at 2:40 am
बहुत बढ़िया लघुकथाएं लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई!
Posted by ashok andrey on November 5, 2009 at 3:31 am
dono achchhi lgukathaon ke liye badhai man ko chhu gaee hain
Posted by nirmla.kapila on November 5, 2009 at 4:46 am
ासली lशिकारी बहुत अच्छी कहानी है। गहरे भाव लिये हुये। दाने दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है। बच्चे से बचाया तो कौआ ले गया! सुन्दर मगर दूसरी कहानी मे किसी भाव को कहानी के साथ नहीं जोडा जा सका। प्यार का रंग फीका लगा तो उसे किसी घटना से जोडना चाहिये थ कि इस लिये प्यार का रंग फीका ;लगा वरना माँ बेटी के प्यार का रंग कैसे फीका हो सकता है या फिर उसे लाल दिखाती कि मँ-बेटी के प्यार का रंग या भाइ के प्यार का बिन किसी कारण फीका नहीं हो सकता। कहानी स्प्श्टत: कोई संदेश नहीं देती लगी। वैसे कहनी का शिल्प अच्छा है। धन्यवाद नागरानी जी को पढना हमेशा अच्छा लगता है इस कहानी पर पुन विचार करें। शुभकामनायें
Posted by Digamber on November 5, 2009 at 7:32 am
Samauy ke saath saath rishton mein bhi badlaav aate hain aur kai baar atpratyaashit ho jaata hai …. bahoot gahri baat nazar aati hai in kahaaniyon mein …….
Posted by neeraj1950 on November 5, 2009 at 7:47 am
देवी दीदी की कलम से निकली हर रचना कमाल की होती होती चाहे वो शायरी हो या लघु कथा…ये लघु कथाएँ भी अपवाद नहीं हैं …उनकी लेखनी का लोहा मनवाती हैं…
नीरज
Posted by arsh on November 6, 2009 at 5:54 pm
aadarniya devi didi ki kahani lekhan pe jo pakad hai use salaam inki gazalen to pahale hi bahut baari padha chukaa hun aaj laghu kathaa lekhan se bhi wakif hua …… waah kya tewar hain… kamaal ki baat hai dono hi laghu kathaa me … salaam inki lekhani ko…
arsh
Posted by Devi nangrani on November 9, 2009 at 9:08 pm
Nirmala kapilaji
sadar namaste
aapka kahana ek tarah se thik hi hai, har rang mein ek aur rang bhi shamil hota hai..kahani ek hakeeki guftagoo se rabta rakhti hai, aur vah tarbooja dene wali bahen apni sauteli maan ke liye bhej rahi hai..maine jaan boojh kar kuch sachaion ko benakaab nahin kiya aur vahin par pyaar ke rang ke saath kahani ka rang bhi pheeka pad gaya.
is or dhyan dilane ke liye abhari hoon.
dhanywaad ke saath
Devi Nangrani
Posted by महावीर on November 9, 2009 at 10:10 pm
देवी जी
आपकी दोनों लघुकथाएं ‘असली शिकारी’ और ‘तरबूजे का सफ़र’ बहुत पसंद आईं.
मंथन पर अपनी कथाएं देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.
Posted by Sudha Om Dhingra on November 11, 2009 at 12:48 am
गहरे अर्थ लिए अच्छी लघुकथाएँ.
बधाई.