प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं


अधजल गगरी छलकत जाए

- प्राण शर्मा

कमाल मेरा नया नया दोस्त बना था. दसवीं में तीन बार फ़ेल था. बेकारी में घूम रहा था. एक दिन मिला तो उसने अपने नाना, दादा की तारीफ़ें करनी शुरू दीं. कहने लगा-“मेरे चाचा जी एम .ए. और पी.एच .डी थे. सरकारी विभाग में सीनिअर ऐडवाईज़र थे. पांच हजार रूपये उनकी मंथली इनकम थी. मैं तब की बात कर रहा हूँ जब भारत के दो टुकड़े नहीं हुए थे. मेरे मामा जी रईस थे, रईस. कई राजे-महाराजे और नवाब उनका हुक्का भरा करते थे. मेरे दादा जी की योग्यता का कहना ही क्या! वे अंग्रेजी बोलते थे तो अँगरेज़ वाह, वाह कह उठते थे.  कई दांतों तले उँगलियाँ दबा लेते थे और कई पानी-पानी हो जाते थे. नाना जी इतने सुन्दर थे कि अंग्रेज युवतियां गोपियों की तरह उनके आगे-पीछे मंडराती थी. खूबियाँ ही खूबियाँ थी मेरे सम्बन्धियों में. “

” कोई खूबी अपनी भी सुनाओ, कमाल.”  सुनते ही कमाल कोई बहाना बनाकर भाग उठा.

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दादी

-प्राण शर्मा

कुछ महीने पहले गाँव से आई दादी ने अपने दस साल के पोते को अपने पास बिठाकर पूछा-

” तू कितना अच्छा ,कितना आज्ञाकारी है! है न ?”

” हाँ”. पोते ने उत्तर दिया.”

” मेरी एक छोटी सी बात मानेगा ?”

” मानूंगा.”

” मुझे तू क्या कहकर पुकारता है ?”

” दादी माँ .”

” अब से तू मुझे ग्रैंड मम कहकर पुकारा कर.”

” वो क्यों?”  पोते ने जिज्ञासा में पूछा.

” ये आजकल का फैशन है, बेटे. सभी बच्चे अब माँ को

मम और दादी माँ को ग्रैंड मम कहते हैं.

पोता अपनी दादी का चेहरा देखने लगा.

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10 Comments

  1. 1
    Roop Singh Chandel Says:

    आदरणीय शर्मा जी

    प्राण जी की दोनों लघुकथाएं पढ़ गया. दोनों में छुपी व्यंग्यात्मकता स्प्ष्ट है. दूसरी लघुकथा आजकी बदली परिस्थिति भली भांति अभिव्यक्त करने में सक्षम है.

    प्राण की भाषा की सहजता उनकी विशेषता है.

    आप दोनों को बधाई.

    चन्देल

  2. 2
    Ranjana Says:

    Waah ! Bahut sadha hua vyangy saadha hai aapne in laghukathaon ke maadhyam se…

  3. 3

    दिल को छूती यथार्थपरक लघुकथाओं हेतु धन्यवाद.

  4. प्राण भाई साहब,
    आप की चारों लघु कथाएँ पढ़ीं–
    प्रेमिका और दादी अधिक पसंद आईं.
    बस इसी तरह लिखते रहें और हमें अपने लेखन से
    सराबोर करते रहें…

  5. 5
    Roop Singh Chandel Says:

    आदरणीय शर्मा जी

    खेद व्यक्त करना चाहता हूं. मेरी टिप्पणी में दूसरे पैरा में ’प्राण जी’ के स्थान पर केवल ’प्राण’ गया है. पाठक कृपया उसे ’प्राण जी’ पढ़ेंगे यह अनुरोध है. प्राण जी हमारे वरिष्ठ हैं और ऎसा टाइपिगं की त्रुटिवश हो गया है.

    चन्देल

  6. 6
    drarifnadeem Says:

    आदरणीय शर्मा जी
    बस इसी तरह लिखते रहें और हमें अपने लेखन से
    सराबोर करते रहें…यथार्थपरक लघुकथाओं हेतु धन्यवाद !

    Dr Arif Nadeem
    Bareilly College
    Bareilly
    drarifnadeem@gmail.com

  7. 7

    आदरणीय शर्मा जी,
    सादर नमन!

    आशा है आप स्वस्थ्य -सानंद होंगे …मै इस समय कैलीफ़ोर्निया में हूं।

    आदरणीय प्राण साहब की दोनो लघुकथाएं समाज की बदलती मानसिकता पर गहरी चोट करती हैं …उनकी लेखनी को सादर नमन करती हूं।

    डा. रमा द्विवेदी

  8. 8
    ashokandrey Says:

    priya bhai pran jee aaj ke badle hue samaaj kee nabj par karaaree chot kee hai aur apnee baat ko sahaj hee dishaa dekar hame bhee sochne ko vivash kiya hai jo iski takat hai badhai
    ashok andrey

  9. 9

    Adarneey Paranji ki laghukathaaon mein ek tajurbe ka jazba gaalib hai. bete hue kal ke ahsaasaat aaj aur aane wale kal ke liye ek umda se nakshe pa ban payein aur is jazbaat v ahsaasat ki dharohar ko apna lein to yeh ek badi uplabdhi hogi sahity ke liye.
    har ek katha pur asar hai
    sadar
    Devi nangrani

  10. हुत अच्छे !! कमाल चुप हो गया ना !!
    शीर्षक भी बिलकुल सही चुना है आपने प्राण भाई साहब -
    और ये दादी जी बड़ी स्मार्ट निकलीं — पोता भी हक्का बक्का रह गया ;-)
    आ. महावीर जी व प्राण भाई साहब, आपकी हरेक पोस्ट पढने से हम सीख रहे हैं
    दोनों को सादर स्नेह,
    - लावण्या


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