आनंदवादी
-महावीर शर्मा
मैं बहुत हँसता था। हँसना, हँसाना और आनंद के भौतिक पहलूको ही जीवन का आधार मानता था। कहा करता था - सृष्टि की उत्पत्ति जब आनंद-विभु से ही हुई है तो आनंद में ही निवास करना जीवन का सार है। लोग ब्रह्म-आनंद की बात करते तो बात काट देता कि इस अमूर्त,काल्पनिक अव्यावहारिक शून्यमनस्कता का समक्ष-आनंद के सामने कोई क्रियात्मक मूल्य नहीं है।गर्व से कहता था “मैं आनंदवादी हूं।” काव्य-कहानियों में निराशा और जीवन का नकारात्मक पहलू मुझे साहित्य में प्रदूषण की भांति लगता था।
आराम कुर्सी पर बैठे हुए हाथ में पकड़ी हुई पुस्तक का पन्ना उलटते हुए अनायास ही मस्तिष्क के किसी कोने में छुपी हुई अतीत की स्मृतियों ने ३५ वर्ष पुराने टाईम-ज़ोन में धकेल दिया। पुस्तक के पन्नों में शब्द लुप्त से हो गए। ऐसा लगा जैसे इन पन्नों में चल- चित्र की रीलें चल रही हो। मेरी हँसी, मेरी मुस्कान, आनंद-विभु से बनी हुई सृष्टि – सब ‘झबिया’ की गोद में नन्हे से ’ललुआ’ की पथराई आँखों से ढुलके हुए दो आँसुओं में समाये जा रहे हों।
पुरानी घटनाएं सजीव हो उठी। दिल्ली का वही पुल तो है जिसके नीचे सड़क के दोनों ओर फुटपाथों पर एक ओर ११ और दूसरी ओर [...]
Archive for August, 2009
कहानी: ‘आनंदवादी’ – महावीर शर्मा
August 26, 2009“शिष्टता” और “जंगल में जनतंत्र” – प्राण शर्मा और आचार्य संजीव ‘सलिल’ की लघुकथाएँ
August 19, 2009लघुकथा
शिष्टता
प्राण शर्मा
किसी जगह एक फिल्म की शूटिंग हो रही थी. किसी फिल्म की आउटडोर शूटिंग हो वहां दर्शकों की भीड़ नहीं उमड़े, ये मुमकिन ही नहीं है. छोटा-बड़ा हर कोई दौड़ पड़ता है उस स्थल को जहाँ फिल्म की आउटडोर शूटिंग हो रही होती है. इस फिल्म की आउटडोर शूटिंग के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ. दर्शक भारी [...]
प्राण शर्मा और देवी नागरानी की लघु कथाएँ.
August 12, 2009लघुकथा
‘मुराद’
-प्राण शर्मा
सीता देवी ख़ुशी से फूली नहीं समायी जब उसके कानों में उसके भांजे मोहन के ये शब्द पड़े -”मौसीजी, वैष्णो देवी के दर्शन करने की लिए तैयार हो जाइये . “परसों ही हम निकल पड़ेंगे. देखिये ये टिकटें.”
सीता देवी भले ही ६५ पार कर चुकी थी और जवानों सा दमख़म नहीं था उसमें अब [...]
रक्षाबँधन का नेह पत्र -मिनी का गोलू के नाम
August 5, 2009‘मंथन’ और ‘महावीर’ के संपादकों और पंकज सुबीर की ओर से
राखी के मंगलमय पर्व
पर सभी बहनों और भाईयों को शुभकामनाएं
रक्षाबँधन का नेह पत्र -मिनी का गोलू के नाम
कहानी : पंकज सुबीर
तुमको लिख रही हूँ तब मन बहुत उदास है । उदास है रक्षांबधन के एक सप्ताह पहले । इस दिन का कभी [...]









