देवी नागरानी की लघुकथा – भिक्षा-पात्र

devi_nangrani

भिक्षा पात्र

(लघुकथा)

देवी नागरानी

दरवाज़े पर भिक्षा दते हुए देवेन्द्र नारायण सोच रहे थे, ये सिलसिला कब तक चलेगा ? पिताजी के ज़माने से चलता आ रहा है ! दरवाज़े पर आए भिक्षुक को खाली हाथ न भेजो ! और बेख्याली में भिक्षा पात्र में न पड़कर नीचे ज़मीन पर गिरी। कुछ रूखे अंदाज़ से बढ़बढ़ाते हुए कह उठे, “भई ज़रा उठा लेना, मैं जल्दी में हूँ” और अंदर चले गए ।

बरसों बीत गए और ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव जहाँ ऊँट की करवट लेकर थमे, वहाँ पासा भी पलटा । सेठ देवेन्द्र नारायण मसइलों की गर्दिश से गुज़र कर खास से आम हो गए और फिर पेट के फाके क्या नहीं कराते ? नियति कहें या परम विधान! एक दिन वो भिक्षा पात्र लेकर उसी भिक्षू के दरवाजे की चौखट पर आ खड़े हुए जिसे एक बार उन्होंने अनचाहे मन से भिक्षा दी थी । बाल भिक्षू अब सुंदर गठीला नौजवान हो गया था और कपड़ों से उसके मान-सम्मान की व्याख्यान मिलती रही । सर नीचे किये हुए सोच से घिरे देवेन्द्रनारायण अतीत में खो गए। “
मान्यवर आप कृपया अपना पात्र सीधा रखें ताकि मैं आपकी सेवा कर पाऊँ ।” विनम्रता का भाव उनके हृदय में करुणा भरता गया और साथ में दीनता भी । नौजवान ने उनके भावों को पहचानते हुए और विनम्रता से कहा – “हम तो वही है मान्यवर बस स्थान बदल गए है और यह परिवर्तन एक नियम है जो हमें स्वीकारना है, इस भिक्षा की तरह. न हमारा कुछ है, न कुछ आपका ही है। बस लेने वाले हाथ कभी देने वाले बन जाते हैं.”।

देवी नागरानी
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9 Responses to this post.

  1. विनम्रता से कहा – “हम तो वही है मान्यवर बस स्थान बदल गए है और यह परिवर्तन एक नियम है जो हमें स्वीकारना है, इस भिक्षा की तरह. न हमारा कुछ है, न कुछ आपका ही है। बस लेने वाले हाथ कभी देने वाले बन जाते हैं.”।

    ” जिन्दगी का एक अद्भुत सत्य उजागर करती कथा…..सच कहा कब लेने वाले हाथ देने वाले बन जाएँ कोई नहीं जानता….”

    regards

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  2. अच्छी कहानी है


    चर्चा । Discuss INDIA

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  3. Posted by pran sharma on July 6, 2009 at 10:42 am

    DEVI NANGRANI KEE LAGHU KATHA MUN KO CHHOOTEE HAI.

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  4. जिंदगी के करीब ले जाती रचना।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  5. दीदी ने लघु कथा में भी ग़ज़लों सी गहराई भर दी है…देवी जी जिस विधा को अपनाती हैं वो ही उनकी अपनी हो जाती है…विलक्षण लेखन …
    नीरज

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  6. Posted by moverspacker on July 7, 2009 at 6:21 am

    Nice Posting

    Really Great

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  7. Mahavirji ji ki shukrguzaar hoon jo hamari lekhni ko yeh manch pradaan kiya hai. evaz iske
    Aapke sneh ki Patra bani uske liye dil se abhari hoon. Apne apne sthan par ham sabhi kuch kuch lene dene ke prayaas mein tatpar hain, yah bhi ek uplabdhi hai
    shubhkamnaon ke saath

    Devi Nangrani

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  8. मार्मिक-शिक्षाप्रद लघुकथा.

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  9. Zindagi sabhi se ik jaisa salook karti hai, isi satya ko jaan lein ya pahchaan lein to dushwarion mein bhi raahton se mulaakat ho jayegi. lena aur dena samman taur par balanced hi hota hai.

    Zindagi Rang kya dikhati hai
    ye hasati hai aur rulaati hai

    Devi nangrani

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