देवी नागरानी एक संवेदन शील कवियित्री
-प्राण शर्मा
‘प्रतिभाशाली और श्रेष्ट कवि कौन है?’ के उत्तर में गुरु ने कहा की प्रतिभाशाली और श्रेष्ट कवि वह है जिसके पास विपुल भाषा का
भंडार हो, जिसके पास संसार का अनुभव ही अनुभव हो, जिसमें सॉफ-सुथरी कविता कहने की निपुणता हो, और जिसको छंदों- बहरों का पूरा ग्यान हो. पूछने वाले में संतुष्टि की लहर दौड़ गयी.
देवी नागरानी एक ऐसी सशक्त कवियित्री हैं, जिसमें उपरोक्त चारों विशेषताएँ हैं. उनका भाषा पर अधिकार भी है, उनको संसार का अनुभव भी है, उनमें सॉफ-सुथरी कविता कहने की क्षमता भी है और उन्हें छंदों- बहरों का पूरा ग्यान भी है. उनमें इन्ही विशेषताओं एवं गुणों के कारण हिंदी और उर्दू के मूधन्यि साहित्यकारों डा॰. कमल किशोर गोयनका, आर. पी शर्मा “महर्षि” , अहमद वसी, अंजना सँधीर, दीक्षित दनकौरी, मरियम ग़ज़ाला, हसन माहिर और अनवरे इस्लाम ने उनके चरागे-दिल की ग़ज़लों को भरपूर सराहा है. उनकी शायरी के बारे में जनाब अनवरे इस्लाम का कथन वर्णननीय है -” मैने पाया की वे (देवी नागरानी) महसूस करके फ़िक्र के साथ शेर कहती हैं, आपकी फ़िक्र में दिल की मामलेदारियों के साथ ग़मे ज़माना और उसके तमाम मसाइल शेरों में ढलकर ‘रंगे-रुख़े-बुताँ’ की तरह हसीन हो जाते हैं क्योंकि वे ग़म में भी ख़ुशी के पहलू तलाश करना जानती हैं -
ज़िंदगी अस्ल में तेरे ग़म का है नाम
सारी ख़ुशियाँ है बेकार अगर ग़म नहीं
चराग़े-दिल के पश्चात देवी नागरानी का नया ग़ज़ल-संग्रह है- “दिल से दिल तक” ग़ज़ल-संग्रह की लगभग सभी ग़ज़लें मैने पढ़ी है. प्रसन्नता की बात है कि देवी नागरानी ने ग़ज़ल की सभी विशेषताओं का निर्वाह बख़ूबी किया है. मैने अपने लेख ‘उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल’ में लिखा है-” अच्छा शेर सहज भाव स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छन्द के सम्मिलन का नाम है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दीख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईँट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर के विचार से शब्द-सौंदर्या तथा लय का माधुर्या प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है.”
चूँकि देवी नागरानी के पास भाषा है, भाव है और छन्दों-बेहरों का ग्यान है, उनकी ग़ज़लों में लय भी है, गेयता भी है और शब्द सौंदर्या भी है. वे उपयुक्त शब्दों के अनुसार छन्दों का और उपयुक्त छंदो के अनुसार शब्दों का प्रयोग करने में प्रवीण हैं, इसलिए उनके एक-एक शेर में माधुर्य और सादगी निहित है. अपनी ग़ज़लों में देवी नागरानी एक कुशल राजगीर की तरह कौशलता दिखाती है. उन्होने अपने मन के आँगन को यादों से ख़ूब सजाया है. बिल्कुल वैसे ही जैसे एक माली उध्यान को फूलों से सजाता है. उनके अनगिनत शेर ऐसे हैं जिन्हें गुनगुनाने को जी करता हैं. मसलन-
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती
वक्त़ किसका कहाँ हुआ ‘देवी’
कल हमारा था अब तुम्हारा है.
हमको ढूंढो न तुम मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं
वफ़ा मेरी नज़र अंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का ज़िक्र कल जिनकी ज़ुबाँ पर था
हस्ती ही मेरी तन्हा,
इक द्वीप सी रही है
चारों तरफ़ है पानी,
फिर भी बची हुई है.
भरोसा करने से पहले ज़रा तू सोचती देवी
कि सच में झूठ कितना उस फ़रेबी ने मिलाया है
देवी
नागरानी एक कुशल कवियित्री हैं. यूँ तो ‘दिल से दिल तक’ में सुख के भाव भी बिखरे हैं लेकिन दुख के भाव कुछ ज़्यादा ही व्यक्त हुए हैं. उनके शब्दों में-
ग़म तो हर वक्त साथ साथ रहे
ग़म कहीं अपना रुख़ बदलते हैं.
यहां मैं महादेवी वर्मा की दो पंक्तियां कहना चाहूँगा जिनके शब्दों से दर्द उसी तरह टपकता है जैसे देवी नागरानी जी के शेरों से –
मैं नीर भरी दुख की बदली
उमड़ी कल थी मिट आज चली.
मानव-जीवन में सुख-आगमन पर दुख भरे शेर भी मीठे लगते हैं, महान अँग्रेज़ी कवि शैले की इस पंक्ति की तरह-
Our sweetest songs are those
That tell of saddest thoughts.
परिणाम स्वरूप देवी नागरानी के अधिकांश शेर सर पर चढ़ कर बोलते ही नहीं, दिल में भी उतरते चले जाते हैं.
प्राण शर्मा
3 Crackston Close
Coventry CV25EB
U.K
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नामे किताबः दिल से दिल तक,
शायराः देवी नागरानी, पन्नेः १४४, मूल्यः १५०, प्रकाशकः लेखक










Posted by balkishan on August 10, 2008 at 2:17 pm
पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए आपका आभार.
Posted by समीर लाल ’उड़न तश्तरी वाले’ on August 10, 2008 at 9:52 pm
बिल्कुल सत्य!!
बहुत खूब कहा है आपने देवी जी के लिए, प्राण भाई.
आभार इस आलेख के लिए.
Posted by neeraj1950 on August 11, 2008 at 9:17 am
प्राण साहेब
आप ने देवी नागरानी जी ,जिनको मैं दीदी कहता हूँ , की इस पुस्तक का बहुत सार्थक विश्लेषण किया है. मुझे उनसे दो बार मिलने का अवसर मिला है और दोनों बार लगा जैसे किसी मीठे पानी के झरने के पास आ गया हूँ…इस रविवार को उनके घर एक गोष्टी में तेज बारिश के कारण ना जा पाने का बहुत दुःख है. उम्मीद है आने वाले समय में उनकी और भी बहुत सारी किताबें हमें पढने को मिलेंगी.
नीरज
Posted by महामंत्री-तस्लीम on August 12, 2008 at 8:39 am
देवी नागरानी जी किसी परिचय की मोहताज नहीं। वर्षों से मैं उनकी रचनाएं पढता आ रहा हूं। आज आपके ब्लॉग पर उनके बारे में पढकर अच्छा लगा।
Posted by izmir evden eve on August 14, 2008 at 3:06 pm
thanks..
Posted by lpg on December 1, 2008 at 11:11 am
thanks