मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार”- भाग 1

मुशायरा/कवि-सम्मेलन “बरखा-बहार” (पहला भाग)

दोस्तों, प्राण शर्मा जी का और मेरा (महावीर शर्मा) आप सभी को प्यार भरा नमस्कार
यह कहने में गर्व होता है कि इस ‘बरखा-बहार’ मुशायरे/कवि-सम्मेलन में देश-विदेश के
कवि इस मंच की रौनक़ बढ़ाने के लिए इकट्ठे हुए हैं।

आज हमारी ख़ुशकिस्मती है कि अमेरिका से इस मंच पर बरखा पर अपनी कविता से आपके दिलों में आनंद का संचार करने के लिए श्रीमती लावण्या शाह जी आ रही हैं। मैं देख रहा हूं कि लावण्या जी का नाम सुनते ही तालियों के शोर में मेरी आवाज़ ऐसे गुम हो गई जैसे नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़। मैं जानता हूं कि आप उनकी कविता के लिए बेज़ार हो रहे हैं। हों भी क्यों ना, जिनकी ख्याति उनके ब्लॉग अंतरमन और कितने ही जालघरों, पत्रिकाओं, कवि-सम्मेलनों आदि में फैली हुई है। आप जानते ही कि लावण्या जी महाकवि स्व. पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं । पंडित जी के विषय में कुछ कहना तो सूरज के सामने दीपक दिखाने वाली बात होगी।


लीजिए,
लावण्या जी माइक पर आगई हैं-

” पाहुन “
बरखा स -ह्रदया, उमड घुमड कर बरसे,
तृप्त हुई, हरी भरी बन्, शुष्क धरा,
बागोँ मेँ खिल उठे कँवल – दल
कलियोँ ने ली मीठी अँगडाई !

फैला बादल दल , गगन पर मस्ताना
सूखी धरती भीग कर मुस्काई !

मटमैले पैरोँ से हल जोत रहा

कृषक थका गाता पर उमग भरा
” मेघा बरसे मोरा जियरा तरसे ,
आँगन देवा, घी का दीप जला जा !”

रुन झुन रुन झुन बैलोँ की जोडी,
जिनके सँग सँग सावन गरजे !
पवन चलये बाण, बिजुरिया चमके

सत्य हुआ है स्वप्न धरा का आज,
पाहुन बन हर घर बरखा जल बरसे !

बहुत सुंदर।
बागोँ मेँ खिल उठे कँवल – दल
कलियोँ ने ली मीठी अँगडाई !
***************

पंजाब के ‘जगराँव’ शहर का नाम आता है तो भारत स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गज ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय के नाम मात्र से ही गर्व से सर उठ जाता है। उसी ‘जगरांव’ में जन्में, आज व्यस्त के जीवन से कुछ क्षण निकाल कर यू.के. के सुविख्यात लेखक, कवि, कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा जी इस मुशायरे में शिरकत कर रहे हैं।

(वे अभी तो मंच पर भी नहीं आए और नाम लेते ही उनके स्वागत में तालियों से हॉल गूंज उठा है।)

तेजेन्द्र जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंगरेज़ी की डिग्री हासिल की। उनके हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिन में कुछ कविता एवं ग़ज़ल संग्रह ‘यह घर तुम्हारा है’, पांच कहानियों का संग्रह, और अंगरेज़ी में (Black & White – the biography of a Banker, Lord Byron – Don Juan, John Keats – The Two Hyperions) उल्लेखनीय हैं।

उनके अन्य भाषाओं नेपाली, उर्दू और पंजाबी में अनुवादित संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरुस्कार के अतिरिक्त देश-विदेशों में पुरुस्कारों से सम्मनित हुए हैं।
तेजेन्द्र जी आजकल लंदन में कथा यू.के. के महासचिव हैं। उनकी १६ कहानियों की आडियो बुक और ग़ज़लों की एक सी.डी. भी बाज़ार में उपलब्ध है।

लीजिए, तेजेन्द्र जी माइक पर आगये हैं और उनकी रचना का लुत्फ़ उठाइयेः

(एक बार फिर से हॉल तालियों से गूंज उठा है)

तेजेन्द्र शर्मा:

लंदन में बरसात….

ऐसी जगह पे आके बस गया हूं दोस्तो

बारिश का जहां कोई भी होता नहीं मौसम .
पतझड़ हो या सर्दी हो या गर्मी का हो आलम
वर्षा की फुहारें हैं बस गिरती रहें हरदम ..

मिट्टी है यहां गीली, पानी भी गिरे चुप चुप
ना नाव है कागज़ की, छप छप ना सुनाई दे .

वो सौंघी सी मिट्टी की ख़ुशबू भी नहीं आती
वो भीगी लटों वाली, कमसिन ना दिखाई दे ..

इस शहर की बारिश का ना कोई भरोसा है
पल भर में चुभे सूरज, पल भर में दिखें बादल .

क्या खेल है कुदरत का, ये कैसे नज़ारे हैं
सब कुछ है मगर फिर भी ना दिल में कोई हलचल.

चेहरे ना दिखाई दें, छातों की बनें चादर
अपना ना दिखे कोई, सब लगते हैं बेगाने .

लगता ही नहीं जैसे यह प्यार का मौसम है
शम्मां हो बुझी गर तो, कैसे जलें परवाने..

वाह!
चेहरे ना दिखाई दें, छातों की बनें चादर
अपना ना दिखे कोई, सब लगते हैं बेगाने .
(फिर वही ना रुकने वाली तालियां)

**********

‘न बुझ सकेगी ये आंधियाँ
ये चराग़ है, दिया नहीँ।’

जी हाँ, ये शे’र उस शाइरा का लिखा हुआ है जिन्हों ने अपनी ग़ज़लों में भाव, उद्गारों और अहसास के उमड़ते हुए सैलाब को अपने ग़ज़ल संग्रहों चराग़े-दिलआस की शमअ’(सिंधी में), दिल से दिल तक और ‘सिंध जी माँ जाई आह्याँ’ में समेट लिया है। ‘रेडियो सबरंग’ में अपनी गुलोसोज़ आवाज़ से और राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं , जालघरों में ग़ज़ल, कहानियों और लेखों, मुशायरों में अपनी रचनाओं की अमिट छाप छोड़ देती हैं।

वह हैं श्रीमती ‘देवी’ नागरानी जी जिन्हें भारत और अमेरिका में अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया हैं। अमेरिका में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से ‘Eminent Poet’ काव्य सम्मान, स्वतंत्रता दिवस २००७ पर जर्सी सिटी के मेयर द्वारा ‘Proclamation Honor Award’, न्यू यार्क में विद्याधाम का ‘काव्य रतन’, बाल दिवस पर पदक और काव्यमणि परुस्कार, रायपुर छत्तीसगढ़ राज्य की सृजन सन्मान का ‘सृजन-श्री सम्मान’ उल्लेखनीय हैं। अमेरिका निवासी श्रीमती ‘देवी’ नागरानी ग़ज़ल के सफ़र में अथक मुसाफ़िर हैं। लीजिए,

देवी नागरानी जी मंच पर माइक के सामने आगई हैं…

(सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा हैः)
देवी नागरानीः

आपके सामने एक ग़ज़ल पेश हैः

बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना.

ये कलियां, ये गुंचे ये रंग और खुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना.

हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना.

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.

खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गवाना.

मैं देवी खुदा से दुआ मांगती हूं
बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना.

बहुत ख़ूब देवी जी,
चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना.
(देवी जी मंच से दूर जारहीं हैं और सारा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से
गूंज रहा है।)

****************

राक्षसों के विनाश हेतु भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की एकत्रित शक्तियों से पहाड़ों से एक ज्वाला उठी और उसी ज्वाला से ‘आदि-शक्ति’ देवी माँ का जन्म हुआ। हिमाचल प्रदेश की उसी पवित्र-पावन भूमि ज्वालामुखी में अप्रैल १९३८ में एक शायर का जन्म हुआ जिसे आज हम सुरेश चन्द्र “शौक़” के नाम से जानते हैं। आप आजकल ए.जी. आफ़िस से बतौर सीनियर आडिट आफ़िसर रिटायर होकर शिमला में रहते हैं। सुप्रसिद्ध शायर श्री राजेन्द्र नाथ “रहबर” ने कहा थाः ” ‘शौक़’ साहिब की शायरी किसी फ़कीर द्वारा मांगी गई दुआ की तरह है जो हर हाल में क़बूल हो कर रहती है।” ‘शौक़’ साहिब का ग़ज़ल संग्रह “आँच” बहुत लोकप्रिय हुआ है।

लीजिए ‘शौक’ साहिब का कलाम…….
(लोगों को इतनी उत्सुक्ता हो रही थी कि मेरी बात को नज़र अंदाज़ कर उनके स्वागत
में खड़े हो गए और तालियों से हाल गूंज उठा)

जनाब सुरेश चन्द्र जी ‘शौक़’ :


सावन की बरखा

भूले बिसरे दर्द जगा कर बीत गई सावन की बरखा
दिल में सौ तूफ़ान उठा कर बीत गई सावन की बरखा

दीवारो —दर को सुलगा कर बीत गई सावन की बरखा
जज़्बों में हलचल— सी मचा कर बीत गई सावन की बरखा

कितने फूल खिले ज़ख़्मों के,कितने दीप जले अश्कों के
कितनी यादों को उकसा कर बीत गई सावन की बरखा

सोज़,तड़प, ग़म ,आँसू ,आहें ,टीसें ,ख़ामोशी, तन्हाई
हिज्र के क्या—क्या रंग दिखा कर बीत गई सावन की बरखा

रिम—झिम,रिम—झिम बूँदे थीं या सुर्ख दहकते अंगारे थे
दिल के नगर में आग लगा कर बीत गई सावन की बरखा

उनसे मिलन की आस कॊ शबनम साथ लिये आई थी ,लेकिन
यास के शोलों को भड़का कर बीत गई सावन की बरखा

हिज्र की रातें काटने वालों से यह जाकर पूछे कोई

क्या—क्या क़ह्र दिलों पर ढा कर बीत गई सावन की बरखा

ये आँखों की ज़ालिम बरखा आ कर जाने कब बीतेगी
‘शौक़’! सुना है कब की आ कर बीत गई सावन की बरखा.

(लोग मंत्रमुग्ध से ‘शौक़’ साहिब के चेहरे को निरख रहे हैं। अचानक यह क्या हुआ कि सब खड़े हो गए और आनंदविभोर हो कर तालियाँ से अपने उद्गारों का इज़हार कर रहे हैं।)

‘शौक़’ साहिब आपकी ग़ज़ल के सारे अशा’र एक से एक बढ़ कर हैं। हर शे’र पर वाह! ख़ुदबख़ुद निकल जाता है। काश! आपके पास कुछ और वक़्त होता और हम सुनते रहते।

(‘शौक़’ साहिब मंच से उतर रहे हैं।)

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अनछुई छुअन से सिहर गई पगली !

एक ही पंक्ति जो दिल के साज़ के तारों को झंकार दे तो क्या उनकी पूरी कविता सुनकर अपना दिल संभाल पाएंगे? लीजिए दिल संभाल लीजिए जो आपके दिल के तारों को झंकारने के लिए हिन्दी तथा अंगरेज़ी में स्नातकोत्तर, ‘हृदय गवाक्ष’ ब्लॉग में जिनकी कविताओं और लेखों से ‘अनछुअन’ से भी ‘छुअन’ का आभास होने लगता है। हृदय गवाक्ष गवाह है कि उनकी रचनाएं कितनी संवेदनाशील और प्रभावशाली हैं।

गन्ना विकास निदेशालय, लखनऊ में हिंदी अनुवादक पद पर कार्यरत मंच पर माइक के सामने आगई हैं-

आप हैं कंचन चौहान जीः

(तालियों से हॉल गूंज रहा है।)

पेड़ों के काधों पे झुकी हुई बदली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

तन कर खड़े हैं तरू, पहल पहले वो करे,
बदली ने झुक के कहा, अहं भला क्या करें ?

तुम से मिले, मिल के झुके नैन अपने,
झुकना तो सीख लिया, उसी दिन से हमने,

ये लो मैं झुकी पिया, शर्त धरो अगली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

तेरे लिए घिरी पिया, तेरे लिए बरसी,
तुझे देख हरसी पिया, तेरे लिए तरसी।

तेरे पीत-पात रूपी गात नही देख सकी,
सरिता,सर,सागर भरे, इतना आँख बरसी,

तुझे देख मैं जो हँसी, नाम मिला बिजली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

कंचन चौहान

वाह! क्या बात हैः
ये लो मैं झुकी पिया, शर्त धरो अगली।
अनछुई छुअन से सिहर गई पगली।।

(सारा हॉल तालियों से गूंज रहा है।)
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मुम्बई से कवि कुलवंत सिंह जी जिनकी विभिन्न विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कुछ प्रकाशनाधीन हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं होती रहती हैं। ‘काव्य भूषण सम्मान’, ‘काव्य अभिव्यक्ति सम्मान’, ‘भारत गौरव सम्मान’, ‘राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान, ‘बाबा अंबेडकर मेडल’ आदि सम्मानों से विभूषित आजकल भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर आसीन हैं। जिनके गीत सुनहरे आप पढ़ते ही रहते हैं, किंतु सावन के महीने में प्रकृति की सुंदरता आप के सामने अपनी सुंदर कविता से आपका दिल मोह लेंगे।

कवि कुलवंत सिंह जी-

(हॉल की दीवारों से तालियों की गड़गड़हट टकरा कर अद्भुत नाद कर रही हैं। तालियों
की गूंज अब कम हो गई है और कवि जी माइक के सामने आगए हैं)

प्रकृति – बरखा बहार
सावन का महीना, प्रकृति की सुंदरता, बरसात.. इस मौसम में एक कविता प्रस्तुत है॥

सतरंगी परिधान पहन कर,
आच्छादित है मेघ गगन,

प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,
चहक रहे द्विज हो मगन ।

कन – कन बरखा की बूंदे,
वसुधा आँचल भिगो रहीं,

किरनें छन – छन कर आतीं,
धरा चुनर है सजो रहीं ।

सरसिज दल तलैया में,
झूम – झूम बल खा रहे,
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,
समीर सुगंधित कर रहे ।

हर लता हर डाली बहकी,

मलयानिल संग ताल मिलाये,
मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।

कल – कल करती तरंगिणी,
उज्जवल तरल धार संवरते,

जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,
माणिक, मोती, हीरक लगते।

मृग शावक कुलाँचे भरता,
गुंजन मधुप मंजरी भाता,

अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,
लोचन बसता, हृदय लुभाता ।

वाह! दिल मोह लियाः
हर लता हर डाली बहकी,

मलयानिल संग ताल मिलाये,

मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।

कवि कुलवंत जी शायराना अंदाज़ से लोगों का धन्यवाद देते हुए मंच से जा रहे हैं और हॉल में अभी भी ‘सतरंगी परिधान पहन कर’
लोगों की ज़बान पर है और साथ ही तालियाँ बज रही हैं।

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आप दिल को थाम लीजिए क्योंकि आज हमारे बीच डॉक्टर महक जी मौजूद हैं जिनके क्लीनिक में उनके इलाज से कितने ही मरीज़ों को ज़िन्दगी में मायूसी से राहत मिली है। दोस्तों, आज वे आपके दिल की बढ़ती हुई धड़कनें दवाओं से नहीं बल्कि अपनी रोग निवारक खूबसूरत कविता से करेंगी। डॉ. महक जी की महक आपको उनके ब्लॉगों महक और मराठी भाषा में चांदणी में भी आपके दिलो-दिमाग़ की ताज़गी बनाए रखेगी।

(लीजिए, डॉ. महक माइक पर आगई हैं। लोग उनके स्वागत में ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजा रहे हैं।)

डॉ. महक जीः

मेघा बरसो रे आज

मौसम बदल रहा है ,एक नया अंदाज़ लाया
बहती फ़िज़ायो संग रसिया का संदेसा आया

आसमान पर बिखरे सात रंग
रोमांचित,पुलकित,मैं हूँ दन्ग
भिगाना चाहूं इन खुशियों में तनमन से
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

वादीयां भी तुमको,आवाज़ दे रही है

हवाए लहेराकर अपना साज़ दे रही है
घटाओ का जमघट हुआ है
रसिया का आना हुआ है
भीगना चाहती हूँ रसिया की अगन मे
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

हरे पन्नो पर बूँदे बज रही है
मिलन की बेला मैं अवनी सज रही है
थय थय मन मयूर नाच रहे है
पूरे हुए सपने,जो अरसो साथ रहे है

भीगना चाहती हूँ,प्यार के सावन में
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

डॉ. महक जी

बहुत ही सुंदर कविता सुनाई है आपने-

‘हरे पन्नों पर बूंदे बज रही है।’

बड़ा खूबसूरत ख़याल है।

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आप सब उत्सुक्ता से अगले कवि का स्वागत करने के लिए बेज़ार हो रहे हैं। मैं जानता हूं कि ऑडियो वेब साइट रेडियो सबरंग के संचालक व्यस्तता के कारण खाना तक भी भूल जाते हैं। मैं देख रहा हूं कि इस वक़्त भी कान पर मोबाइल है, लीजिए उनका मोबाइल बंद हो गया है और मंच पर आगए हैं। आप हैं डेनमार्क से जनाब ‘चाँद शुक्ला हदियाबादी’ जी :-

लोगों की तालियां रुकने में नहीं आर हीं हैं।

जनाब चाँद साहिब माइक पर आगए हैं-

क़दम क़दम पे हमें मौसम ने रोका था
हम अपनी आंखों में बरसात लिये फिरते हैं।

लीजिए उनका मोबाइल बीच में ही बज उठा है और वो कह रहे हैं कि एक बहुत ही ज़रूरी काम से बीच में जाना पड़ रहा है जिसके लिए वह बहुत मुआफ़ी की दर्ख़्वास्त कर रहे हैं।

(लोगों के चेहरों पर मायूसी छा गई है लेकिन हॉल तालियों की गूंज से अभी भी गूंज रहा है।)

हम सब उनके आभारी हैं जो ‘ रेडियो सबरंग’ के ज़रिए ‘सुर संगीत’, ‘कलामे शायर’, ‘सुनो कहानी’ और ‘भूले बिसरे गीत’ २७ देशों में सुनने वालों का मनोरंजन कर रहे हैं।

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राजस्थान-भ्रमण में यदि कोटा बुन्दी देखने न जाएं तो राजस्थान-यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। आज उसी ऐतिहासिक कोटा नगर से हेमज्योत्स्ना ‘दीप’ जी अपने लम्हें जिन्दगी के कुछ लम्हे कविता के रूप में आपके सामने प्रस्तुत करने आ रही हैं।

हेम ज्योत्स्ना जी व्यवसाय से सॉफ्टवेअर इन्जीनियर हैं। B.E. (I.T.) के अतिरिक्त गणित से स्नातक की डिग्री ली है। उनकी काव्य-प्रतिभा तो छोटी सी आयु में ही पता लग गई थी जब ११वीं कक्षा में एक सुंदर कविता ने लोगों को चकित कर डाला था। मुझे तो लगता है कि ११वीं कक्षा में से ही नहीं, पिछले जन्म से भी इन्हें काव्य से लगाव रहा होगा।
(लोगों की तालियां अनायास ही बज उठी हैं।)

लीजिए हेमज्योतस्ना जी माइक के सामने आ गई हैं।

(तालियां और भी ज़ोर से बजने लगी हैं)

मन की चिड़िया
मन की चिड़िया सावन में तन का मैल है धोये ।
देख के बादल मतवारे निकले ,होना हो जो होये ।

कभी इधर को मचले , कभी उधर को मचले,
मौसम के इस जादु में मन बावरा सा होये ।

जेठ दुपहरी ,खून पसीना एक करा सब खेत में ,
खेत खड़े सब धरती-पुत्र मेघ के संग-संग रोये ।

तितली-भँवरे , फूल-बगीचा , गांव शहर ,
हर मौसम में लगे अलग ,सावन में एकसा होये ।

रिमझिम की झड़ी जब साज उठा कर गाये ,
सब के सब ताल मिलाये , उम्र कोई भी होये ।

मिट्टी में मिल जाये गम, भुल के नाचो गाओ ,
बिखरे सपनो के पर आओ उम्मीद की फसले बोये ।

आज घिरे हैं मेघ गगन में , “दीप” जलाओ कोई,
दिन में जब-जब बरखा आई , घना अन्धेरा होये ।

वाह! हेम ज्योत्स्ना जी, आपकी ‘मन की चिड़िया’ ने तो श्रोताओं के मन को जीत लिया।

(हेम ज्योत्सना जी श्रोताओं की ओर मुस्कुराते हुए मंच से जा रही हैं और
लोग और भी ज़ोर से तालियां बजा रहे हैं।)

मुशायरा अभी ख़त्म नहीं हुआ है। हमारे काफ़ी कवि और शायर आज के मुशायरे में शिरकत नहीं कर पाये लेकिन जुलाई २२, २००८ मंगलवार के दिन उन कवियों और शायरों की कविताएं, उनके ख़ूबसूरत कलाम का इसी ब्लॉग पर लुत्फ़ उठाना ना भूलियेगा,

जिनके नाम हैं-
प्राण शर्मा, समीर लाल ‘समीर’, देव मणि पांडेय, डॉ. मंजुलता, द्विजेन्द्र ‘द्विज’, रज़िया अकबर मिर्ज़ा ‘राज़’, राकेश खंडेलवाल,
रंजना भाटिया ‘रंजू’, नीरज गोस्वामी और हास्य-रस कवि नीरज त्रिपाठी।

इस मुशायरे/कवि-सम्मेलन में जिन कवियों और शायरों ने अपनी अनमोल रचनाएं और अमूल्य समय देकर इसे सफल बनाने में योगदान दिया है, उसके लिए हम आभारी हैं और हार्दिक धन्यवाद करते हैं। मुशायरा चाहे किसी हॉल में हो, पार्क में हो या ब्लॉग पर हो, श्रोताओं, दर्शकों या पाठकों के बिना मुशायरा एक शेल्फ़ पर पड़ी किताब बन कर रह जाती है। इस ब्लॉग पर आने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद करते हैं।
हाँ, इसका दूसरा भाग मंगलवार २२ जुलाई २००८ के दिन इसी ब्लॉग पर देखना ना भूलियेगा।

ख़ाकसार
महावीर शर्मा

mahavirpsharmaऐटyahoo.co.uk

28 Responses to this post.

  1. लावण्या जी, तेजेन्द्र जी, देवी नागरानी जी, जनाब सुरेश चन्द्र जी ‘शौक़’ , कंचन चौहान जी, कवि कुलवंत सिंह जी, डॉक्टर महक जी, हेमज्योत्स्ना ‘दीप’ जी की जबरदस्त शिरकत रही. छा गये बिल्कुल सभी. हम तो बस ताली बजाते रहे. आनन्द आ गया. अगली कड़ी का इन्तजार है. महावीर जी और प्राण जी को इस बेहतरीन आयोजन के लिए साधुवाद. अभी जनाब चाँद साहिब को सुनना बाकी है.

    अनेकों शुभकामनाऐं.

    Reply

  2. बेहतरीन आयोजन के लिए साधुवाद.

    Reply

  3. आदरणीय महावीर जी,
    प्राण भाई साहब,
    वाह ! क्या कहने ..
    इतने शानदार तरीके से कवि सम्मेलन का सँचालन किया आपने
    मानोँ होल मेँ श्रोतागण हैँ, हम और आप हैँ
    और माँ सरस्वती का प्रसाद “कविता” स्वरुप मध्य मेँ रखा श्रीफल है !
    ये प्रयास सराहनीय है जो अलग भूखँडोँ मेँ बसे,
    हिन्दी प्रेमी , साहित्य प्रेमी और समरस भागी इन्सानोँ को
    एक तार से जोडने मेँ सफल हुआ है -
    तेजेन्द्र जी,
    देवी नागरानी जी,
    जनाब सुरेश चन्द्र जी ‘शौक़’ ,
    कंचन चौहान जी,
    कवि कुलवंत सिंह जी,
    डॉक्टर महक जी,
    हेमज्योत्स्ना ‘दीप’ जी,
    - आप सभी की कृति सुनकर मन प्रसन्न है -

    जनाब चाँद साहिब ,
    आप को रेडियो सबरँग के लिये बधाई व शुभकामना !
    ..आपको सुनने का इँतजार रहेगा ..
    जैसे अन्य साथियोँ की बारी का बेसब्री से इँतजार है !
    सादर, स ~ स्नेह,
    – लावण्या

    Reply

  4. महावीर जी
    जबरदस्त कवि सम्मलेन- मुशायरा चल रहा है. हर कोई लगता है पुरे रंग में है. किसी एक रचना या रचयेता को इंगित नहीं किया जा सकता क्यूँ की सबने कमाल का कलाम पेश किया है.
    रुन झुन रुन झुन बैलोँ की जोडी,
    जिनके सँग सँग सावन गरजे !
    पवन चलये बाण, बिजुरिया चमके
    वाह…कौन कहेगा की लावण्या जी के साथ अभी उनका गावं अमेरिका में नहीं है…लगता है उनके वतन की मिटटी अभी भी उनके आँचल में बंधी हुई है…वाह.
    चेहरे ना दिखाई दें, छातों की बनें चादर
    अपना ना दिखे कोई, सब लगते हैं बेगाने .
    भाई तेजेंद्र जी ने जिस अंदाज़ में लन्दन के मौसम के साथ दिन की वीरानी का जिक्र किया है वो यकीनन काबिले दाद है.
    हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
    कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना.
    देवी दीदी जब भी अपनी पुर कशिश आवाज में अपनी रचना सुनाती है लगता है वक्त थम गया है…बहुत उम्दा कलाम और बेहद दिलचस्प अंदाज़ उनकी अदायगी का…तालियाँ कितनी बजाएं..हाथ दुखने लगे हैं.:)
    सोज़,तड़प, ग़म ,आँसू ,आहें ,टीसें ,ख़ामोशी, तन्हाई
    हिज्र के क्या—क्या रंग दिखा कर बीत गई सावन की बरखा
    “शौक” साहेब को आज पहली बार सुना….इस एक शेर से ही पता लगता है की वो किस पाये के शायर हैं…उनको और सुनने की तलब पैदा हो गयी है.
    तेरे पीत-पात रूपी गात नही देख सकी,
    सरिता,सर,सागर भरे, इतना आँख बरसी,
    ऐसे संवेदन शील शब्दों का चयन कंचन जी ही कर सकती हैं…वे बहुत संस्कारी कवयित्री हैं और इसकी झलक उनके ब्लॉग और इस कविता में खूब झलक रही है…बहुत सुंदर.
    मलयानिल संग ताल मिलाये,
    मधुरिम कोकिल की बोली,
    सरगम सरिता सुर सजाए ।
    कविता में संगीत पैदा करना ही कुलवंत जी का कौशल है…मेरा ये छोटा प्यारा भाई हिन्दी की जैसी सेवा कर रहा है उसकी जितनी प्रशंशा की जाए कम है…आज आप के इस मंच से भी इसने हिन्दी की पताका क्या खूब फेह्रई है…साधुवाद इस रचना के लिए.
    भीगना चाहती हूँ,प्यार के सावन में
    मेघा बरसो रे आज बरसो रे |
    इतने अनुराग से सावन को बुलाने वाली महक जी बधाई की पात्र हैं…बहुत आनंद आया उन्हें सुन कर…तालियाँ.
    “भाई चाँद शुक्ला जी” के लिए क्या कहा जाए…रेडियो सबरंग उनका जीवन है और उसके लिए वो कुछ भी कुर्बान कर सकते हैं. अफ़सोस है की वो एक शेर सुना कर ही चलते बने लेकिन अपनी जानदार आवाज और अदायगी का लोहा मनवा गए…उम्मीद है की दूसरे दौर में वो जर्रोर हमें नवाजेगे .
    तितली-भँवरे , फूल-बगीचा , गांव शहर ,
    हर मौसम में लगे अलग ,सावन में एकसा होये ।
    वाह ज्यत्सना जी वाह…बहुत सुंदर लगी आप की रचना…और बहुत मन से आपने सुनाई भी….मुशायरा चाय पान के लिए बीच में छोड़ना अच्छा नहीं लग रहा…मंच पर बिराजे महारथियों को सुन ने की उत्सुकता अपनी चरम सीमा पर है. कब आएगी बाईस जुलाई????
    नीरज

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  5. बहुत ही बढ़िया आयोजन है यह तो ..मजा आ गया .बरखा के गीत खूब बरसे हर रचना से …सबकी रचना एक से बढ कर एक लगी ….इसका प्रकार का आयोजन होता रहना चाहिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाये

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  6. किसकी प्रशंसा करुँ..? सब तो एक से बढ़ कर एक हैं,… लावण्या दी, तेजेंद्र जी, नागरानी जी, सुरेश जी, कुलवंत जी, महक जी, हेमज्योत्सना जी सब तो हैं एख से बढ़ कर एक…! बस तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ

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  7. इस ‘बरखा-बहार’ ने तो सचमुच भावों की बरसात कर दी।

    खेत व आंगन में प्रकृति की रिमझिम, चांदी से चमकते पानी का अनंत विस्‍तार, पौधों की हरी-हरी बाढ़, रंग-बिरंगे बादलों से पटा आकाश – यह सब देखकर मन-मयूर पहले से ही झूम रहा था। ब्‍लॉगजगत की इस रसों की फुहार के बाद तो अंदर-बाहर हर जगह वर्षा ऋतु की ही छटा बिखरी पड़ी है।

    इतने सुंदर मुशायरा सह कवि सम्‍मेलन के आयोजन के लिये भाई महावीर शर्मा जी और प्रतिभागी कवियों को हार्दिक धन्‍यवाद।

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  8. माहौल खुशनुमा और मन खिल गया आप सब को पढ़कर्…बधाई व शुभकामनायें सभी मित्रों को

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  9. मन को जो पागल कर देती वह सावन की मल्हार कहूँ
    शारद के प्रांगण में छेड़ी, वह वीणा की झंकार कहूँ
    मौसम की चरम स्वप्न विधि का मैं,कोई है सुकुमार कहूँ
    सम्मेलन के आयोजक को भाषा का राजकुमार कहूँ
    पढ़ कर मैं प्रमुदित होता हूँ, इन सबको बारंबार कहूँ.

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  10. सभी की ग़ज़ल और कविताएँ महक रही हैं और आलम रंगो-आब से सँवर उठा है! बधाईयाँ!

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  11. भाई महावीर जी

    इस ख़ूबसूरत आयोजन के लिये आपको और आपके साथ जुड़े प्रत्येक मित्र एवं कवि को आज को कवि सम्मेलन के लिये ढेर सी बधाइयां। कविताएं चुटीली हैं, ग़जलें सुरीली हैं, मौसम सुहाना है दिलकश ज़माना है। अगले आयोजन के लिये पहले ही बधाई और ढेर सी शुभकामनाएं। भाई चान्द शुक्ला से बहुत दिनों से बात नहीं हो पाई थी। आज आपके आयोजन में उनका चेहरा देख कर अच्छा लगा।

    तेजेन्द्र शर्मा – कथा यू.के., लन्दन

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  12. आदरनीय महावीर जी:
    एक बेहद सुन्दर आयोजन के लिये धन्यवाद। लगभग सभी कवियों को अलग अलग तो पढा और सुना था लेकिन आज सब को एक साथ और एक ही ’थीम’ पर पढ कर बहुत अच्छा लगा । अगाली कड़ी का इंतज़ार रहेगा ।

    सादर

    अनूप

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  13. Posted by Rakesh Jain on July 16, 2008 at 1:35 pm

    bahut sundar ayojan, aur bahut hi sashakt abhivyaktiyan, sabhi ko dhanyabad aur Badhaiyan

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  14. Posted by देव मणि पांडेय on July 16, 2008 at 1:58 pm

    baarish ka yah shaandaar mushayra yadgaar ban gaya hai.
    mere khyal se meri taliyon ki aavaz aap tak pahunch gai hogi.
    mushayre ke bad hamne surahi ka fir se lutf uthaya.
    क्या निराली मस्ती लाती है सुरा
    वेदना पल में मिटाती है सुरा
    मैं भुला सकता नहीं इसका असर
    रंग कुछ ऐसा चढ़ाती है सुरा

    Devmani Pandey (Poet)
    A-2, Hyderabad Estate
    Nepean Sea Road, Malabar Hill
    Mumbai – 400 036
    M : 98210-82126 / R : 022 – 2363-2727
    Email : devmanipandey@gmail.com

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  15. वाह! भाई वाह! बडा मज़ा आया।प्राण जी और महादेव जी आपका बडा शुक्रिया जो आपने हमें लावण्याजी,तेजेन्द्रजी देवी, नागरानीजी,सुरेन्द्रचन्द्र’शौक़जी,कंचनजी,कुलवंतसिंहजी,अरे डो.महेकजी,चांदशुक्लाजी,हेमज्योतस्नाजी जैसे महान कविओं कि कविताओं कि बरख़ा बहार से नहेला दिया। कुछ देर ठहरं आपके बुलावे पर हम भी आ…रहे…है।

    Reply

  16. Mahavir ji aapko aur pran sharma ji ko hamesha hi padhti rahi hoon
    aaj fir se aapke blog par mushayara dekha aur aapki sunder prastuti bhi dekhi
    barkha par sunder sunder bhaav dekhe
    jaise indradhanush ban gaya ho

    shukiriya aapka itne achhe aayojan ke liye

    Reply

  17. Posted by ऊषा राजे सक्सेना on July 16, 2008 at 5:59 pm

    माननीय शर्मा जी (द्वय)
    ‘बरखा-बहार पर मुशायरा -कवि सम्मेलन ‘ भाग एक का लुत्फ़ उठा रही हूँ। आनंद आ गया। क्या महफिल सजाई है। लावणया , देवी नागरानी ओर शौक़ साहब के कलामों ने दिल को छू लिया।
    आप दोनों के संचालन भी आला दर्ज़े के है।
    बधाई!!

    Reply

  18. बहुत ही नए क़िस्म का विचार, जिसे बख़ूबी, बेहतरीन, आनंददायी रूप में मूर्त रूप दिया गया. एक सुझाव है – रचनाकारों से उनकी अपनी वाणी में प्रकाशित रचनाओं की ऑडियो फ़ाइल भी हासिल हो जाए और यहाँ पॉडकास्ट रूप में प्रकाशित हो जाए तो सोने में सुहागा!

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  19. कविताओं की यह अद्भुत बारिश देख और देश विदेश के इतने दिग्गजों को एक साथ एक विषय पर पढ़कर(सुनकर :-) ) मन बाग़ बाग़ हो गया..
    और संचालन तो अद्भुत रहा .सच में लगने लगा था की हम भी वहीँ मौजूद हैं जहाँ तालियाँ बजती ही जा रही हैं और लोग झूम रहे हैं काव्य सरिता में.

    कविताओं का स्तर उच्च कोटि का रहा और हाँ हमने भी ढेरों तालियाँ बजाईं पढ़ते पढ़ते ….

    लावण्या जी की कविता ने तो मधुर फुहार सा काम किया और शुरू में ही कुछ ऐसी मस्ती फैलाई जो अंत तक छाई रही …
    तेजेन्द्र जी, देवी नागरानी जी, सुरेश चन्द्र जी ‘शौक़’ , कंचन चौहान जी, कुल्वान्य्त सिंह जी, डॉक्टर महक जी, हेमज्योत्स्ना ‘दीप’ जी को पढ़कर बहुत बढ़िया लगा |

    ब्लॉग जगत में अपने आप में यह अनूठा प्रयोग है, आदरणीय महावीर जी और प्राण शर्मा जी को इस सफल आयोजन पर बधाई |

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  20. आदरणीय, महावीर जी,
    नमस्कार,
    हमने कविसंमेलन/मुशायरे का बडा लुत्फ़ उठाया। बडा मज़ा आया। आपसे अनुरोध है कि 26जनवरी,15अगस्त जैसे राष्ट्रिय त्यौहारों पर भी आप कविसंमेलन/मुशायरों का आयोजन करें
    बडा मज़ा आयेगा।
    आभार।

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  21. Posted by surjeet on July 18, 2008 at 9:58 am

    bahut accha laga

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  22. Posted by surjeet on July 18, 2008 at 10:08 am

    बहुत प्रसन्न हुआ आपका विचर देख कर्

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  23. बहुत ही मजेदार। एक से बढ़्कर एक कवितायें, मन तो इस सुंदर कविताओं से भीग गया पर तन अभी भी बारिश से भीगने को इंतजार कर रहा है।

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  24. [...] ‘बरखा-बहार’ पर १५ जुलाई २००८ के मुश… का अभी भी ख़ुमार बाक़ी है। आज जो गुणवान कवि और कवियत्रियां अपना अमूल्य समय देकर रचनाओं से इस कवि-सम्मेलन की शोभा बढ़ा रहे हैं, उन्हें मैं विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूं। आप सभी श्रोताओं का हार्दिक स्वागत है। [...]

    Reply

  25. लावण्या जी, तेजेन्द्र जी, जनाब सुरेश चन्द्र जी ‘शौक़’ , कंचन चौहान जी, कवि कुलवंत सिंह जी, डॉक्टर महक जी, ज्योत्स्ना ‘दीप’ जी की जबरदस्त शिरकत रही. छा गये बिल्कुल सभी.
    वाह समीर वाह!
    तू अगर बाँसुरी सुना जाए
    मेरे दिल को करार आ जाए..मंव का शेर है
    समीर जी आप भी बस काम करते है पर अद्रश्य रूप में!!!!!!!!
    दिल से दिल तक जुड़ी हुई है ग़ज़ल
    बीच में उनके पुल बनी है ग़ज़ल
    इस प्रयास को सफ़ल बनाने के लिये जो अद्भुत कार्य लँडन निवासी महावीर जी ‌और प्राण जी ने किया किया उसके लिये जौरदार तालियाँ हन सभी मँचकारों की तरफ़ से हो जाये जिसकी गूंज हिंदुस्तान तक के हर गली कूचे में सुनाई पड़े.

    शर्माजी के प्रयास की ये तो शुरूआत है
    और होने को ग़ज़लों की बरसात है

    हैं अभी और उनसे उमीदें बहुत
    उनके दिल में बड़ा शोरे-जज़्बात है

    और हमारे नौजवान मंच के रचनाकारों को मेरी बधाई
    सस्नेह
    देवी

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  26. itne khas logo ko ek saath padhker aur dekhker bahut khushi hue hai…aap logo ka bahut dhanyvad……..cp

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  27. आपके आयोजन में शामिल हो कर सुखद अनुभूति हो रही है.. बहुत धन्यवाद आप सभी का.

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  28. AGLa Mushaira kab hoga??????????????
    Talabgaar hain sabhi
    Devi nangrani

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