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Jun
Posted by महावीर in ग़ज़ल/नज़्म, प्राण शर्मा. 14 Comments
ग़ज़ल – हादसों के शहर में
सो रहा था चैन से मैं फ़ुर्सतों के शहर में
जब जगा तो ख़ुद को पाया हादसों के शहर में
फ़ासले तो फ़ासले हैं दो किनारों की तरह
फ़ासले मिटते कहाँ हैं फ़ासलों के शहर में
दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह
दुश्मनों की कब चली है दोस्तों के शहर में
थक गये हैं आप तो आराम कर लीजे मगर
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में
मिल नहीं पाया कहीं सोने का घर तो क्या हुआ
पत्थरों का घर सही, अब पत्थरों के शहर में
हर किसी में होती है कुछ प्यारी प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन ख़ुशबुओं के शहर में
धरती-अम्बर, चाँद-तारे, फूल-ख़ुशबू, रात-दिन
कैसा-कैसा रंग है इन बंधनों के शहर में
हम चले हैं ‘प्राण’ मंज़िल की तरफ़ लेकर उमंग
आप रहियेगा भले ही हसरतों के शहर में
‘प्राण’ शर्मा
Posted by ranjanabhatia on June 28, 2008 at 2:58 am
मिल नहीं पाया कहीं सोने का घर तो क्या हुआ
पत्थरों का घर सही, अब पत्थरों के शहर में
बहुत खूब …
Posted by mehek on June 28, 2008 at 3:22 am
थक गये हैं आप तो आराम कर लीजे मगर
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में
मिल नहीं पाया कहीं सोने का घर तो क्या हुआ
पत्थरों का घर सही, अब पत्थरों के शहर में
हर किसी में होती है कुछ प्यारी प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन ख़ुशबुओं के शहर में
wah bahut sundar, kash log hadse chod khushiyon ke sheher bas jaye.
Posted by Advocate Rashmi saurana on June 28, 2008 at 9:23 am
vha bhut acche.badhai.
Posted by अशोक पाण्डेय on June 28, 2008 at 11:20 am
सुंदर गजल पढ़ाने के लिये धन्यवाद।
Posted by hemjyotsana "Deep" on June 28, 2008 at 3:02 pm
आदरणीय प्राण सर ,
बहुत अच्ची गज़ल लगी आपकी ,
धरती-अम्बर, चाँद-तारे, फूल-ख़ुशबू, रात-दिन
कैसा-कैसा रंग है इन बंधनों के शहर में ,
हम चले हैं ‘प्राण’ मंज़िल की तरफ़ लेकर उमंग
आप रहियेगा भले ही हसरतों के शहर में ,
ये शेर बहूत अच्छे लगे ।
सादर
हेम ज्योत्स्ना
Posted by समीर लाल on June 28, 2008 at 4:46 pm
हर किसी में होती है कुछ प्यारी प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन ख़ुशबुओं के शहर में
–बहुत उम्दा, बेहतरीन..!!
Posted by ramadwivedi on June 29, 2008 at 4:03 am
हर किसी में होती है कुछ प्यारी प्यारी चाहतें
क्यों न डूबे आदमी इन ख़ुशबुओं के शहर में
बहुत खूब…अन्दाज़े बयां बहुत भाया ज़नाब…बधाई…
— डा. रमा द्विवेदी
Posted by Shrddha on July 2, 2008 at 4:22 am
थक गये हैं आप तो आराम कर लीजे मगर
काम क्या है पस्तियों का हौसलों के शहर में
मिल नहीं पाया कहीं सोने का घर तो क्या हुआ
पत्थरों का घर सही, अब पत्थरों के शहर में
wah bahut khoob bahut khoob
http://bheegigazal.blogspot.com
Posted by महावीर on July 2, 2008 at 8:35 pm
आदरणीय प्राण शर्मा जी
आप की ग़ज़ल पढ़ी। बेहद आला और नफ़ीस खयालात हैं। आपकी ग़ज़लें पढ़ता रहता
हूं और हर बार वही लुत्फ़ आता है। आपकी ग़ज़लों और लेखों से मेरे ब्लॉग में जैसे
चार चांद लग गए हैं। आपका बहुत बहुत आभार।
महावीर शर्मा
Posted by रवि on July 8, 2008 at 4:47 am
ख़ूबसूरत ग़ज़ल है.
Posted by RAZIA MIRZA on July 8, 2008 at 6:56 am
क्या मिला है, क्या मिलेगा? अब हमें रहना नहीं।
छोडदो,क्यों है शिकायत नफ़रतों के शहर में।
बहोत खुब अच्छी है आपकी रचना।
बधाई स्विकारें
Posted by vipin jain on July 14, 2008 at 9:23 am
मेरी ये पंक्तिया आपको समर्पित………..
ये किस शहर में आ गये हैं हम?
करते है मोहब्बत ,
तो जुर्म कहते हैं,
और बनाते है दोस्त,
तो ग़रेबा पकड़ते है,
ये कैसा शहर है,
बेदर्दो का, ज़ालिमों का,
जॅहा न मोहब्बत है न दोस्ती है,
न प्यार है, न वफ़ा है,
शायद हम तेरे शहर में,
आ गये है”ज़िन्दगी”
Posted by vipin jain on July 14, 2008 at 9:28 am
मेरा ब्लॉग भी आप देख कर मुझे अनुग्रहित करे
vipin jain
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Posted by vipin jain on July 14, 2008 at 9:29 am
mera blog hai….
http://vipinkizindagi.blogspot.com/
vipin jain