Archive for June 27th, 2008

ग़ज़ल: हादसों के शहर में – ‘प्राण’ शर्मा

ग़ज़ल – हादसों के शहर में

सो रहा था चैन से मैं फ़ुर्सतों के शहर में
जब जगा तो ख़ुद को पाया हादसों के शहर में
फ़ासले तो फ़ासले हैं दो किनारों की तरह
फ़ासले मिटते कहाँ हैं फ़ासलों के शहर में
दोस्तों का दोस्त है तो दोस्त बन कर ही तू रह
दुश्मनों की कब चली [...]

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