Archive for May 22nd, 2008

‘प्राण’ शर्मा जी की एक ग़ज़ल

मेरे दुखों में मुझ पे ये अहसान कर गए
कुछ लोग मशवरों से मेरी झोली भर गए
पुरवाईयों में कुछ इधर और कुछ उधर गए
पेड़ों से टूट कर कहीं पत्ते बिखर गए
वो प्यार के ऐ दोस्त उजाले किधर गए
हर ओर नफ़रतों के अंधेरे पसर गए
अपने घरों को जाने के क़ाबिल नहीं थे जो
मैं सोचता हूं कैसे वो [...]

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