महावीर

April 7, 2008

ग़म की दिल से दोसती होने लगी-ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 11:37 pm

ग़म की दिल से दोसती होने लगी।
ज़िन्दगी से दिल्लगी होने लगी।

जब मिली उसकी निगाहों से मिरी
उसकी धड़कन भी मिरी होने लगी।

ज़ुल्फ़ की गहरी घटा की छांव में
ज़िन्दगी में ताज़गी होने लगी।

बेसबब जब वो हुआ मुझ से ख़फ़ा
ज़िन्दगी में हर कमी होने लगी।

बह न जाएं आंसू के सैलाब में
सांस दिल की आखिरी होने लगी।

आंसुओं से ही लिखी थी दासतां
भीग कर क्यों धुन्धली होने लगी।

जाने क्यों मुझ को लगा कि चांदनी
तुझ बिना शमशीर सी होने लगी।

आज दामन रो के क्यों गीला नहीं?
आंसुओं की भी कमी होने लगी।

तश्नगी बुझ जाएगी आंखों की कुछ
उसकी आंखों में नमी होने लगी।

डबडबाई आंख से झांको नहीं
इस नदी में बाढ़ सी होने लगी।

इश्क़ की तारीक गलियों में जहां
दिल जलाया, रौशनी होने लगी।

आ गया क्या वो तसव्वर में मिरे
दिल में कुछ तस्कीन सी होने लगी।

मरना हो, सर यार के कांधे पे हो
मौत में भी दिलकशी होने लगी।

महावीर शर्मा

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